सोमवार, 16 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 50) :-- सदगुरु से संवाद की स्थिति कैसे बनें

🔵 इस परम सूत्र में जिस महागीत का इशारा किया गया है, निश्चित ही उसे आज की स्थिति में सम्पूर्ण रूप से नहीं सुना जा सकता है। इसे पूरी तरह से सुनने के लिए हमें भी धीरे- धीरे भीतर लयबद्ध होना पड़ेगा। क्योंकि समान ही समान का अनुभव कर सकता है। अगर हमें उस महासंगीत की अनुभूति करनी है तो खुद भी संगीतपूर्ण हो जाना पड़ेगा। अगर हम उस परम प्रकाश को देखना चाहते हैं तो निश्चित ही हमें प्रकाशपूर्ण हो जाना पड़ेगा। अगर उस दिव्य अमृततत्त्व का स्वाद चखना है तो मृत्यु के रहस्य के पार जाना होगा।
   
🔴 दरअसल हम जिसको जानना चाहते हैं, उसके जैसा हमें होना भी पड़ता है। क्योंकि समान की ही अनुभूति पायी जा सकती है। असमान की अनुभूति का कोई उपाय नहीं है। इसीलिए साधना के शिखर को पहुँचे हुए अनुभवी जनों ने कहा है- कि आँख हमारे भीतर सूरज का हिस्सा है, इसीलिए यह प्रकाश की अनुभूति पाने में सक्षम है। कान हमारे भीतर ध्वनि का हिस्सा है, इसीलिए यह सुन पाने में सक्षम है। कामवासना हमारे भीतर पृथ्वी का हिस्सा है, इसीलिए यह हमेशा नीचे की ओर खींचती रहती है। जबकि ध्यान हमारे भीतर परमात्मा का अंश है, इसीलिए हमें परमात्मा की ओर ले जाता है। यह बात जिन्दगी में बार- बार अनुभव होती है कि जो जिससे जुड़ा है, उसी का यात्रा पथ बन जाता है।
  
🔵 विचार करो, अहसास करने की कोशिश करो कि अपना खुद का जुड़ाव कहाँ और किससे है? अगर हम सर्वव्यापी परमचेतना के संगीत को सुनना चाहते हैं, तो उससे जुड़ना भी होगा। यह जुड़ाव कठिन तो है पर एकदम असम्भव नहीं है। भावनाएँ उस ओर बहें तो यह सम्भव है। उन भावनाओं की, उन भावानुभूतियों की स्मृति का स्मरण होता रहे तो यह सम्भव है।

🔴 कभी- कभी अचानक ही ये भावानुभूतियाँ हमें जीवन में घेर लेती हैं। जैसे किसी दिन सुबह सूरज को उगते देखकर रोम- रोम में शान्ति की लहर दौड़ने लगती है या फिर किसी रोज आकाश में तारे भरे हों और हम उन्हें जमीन पर लेटे हुए देख रहे हों, तभी अचानक अन्तर्चेतना में मौन उतर गया हो। ऐसी और भी अनेकों भावानुभूतियाँ हैं जो किसी खास क्षण में उपजती और उतरती हैं। इन अनुभूतियों का स्मरण हमें बार- बार करते रहना चाहिए। इस स्मरण के झरोखे से परम तत्त्व की झांकी उतरती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 4)


👉 पत्नी ने दी शिक्षा
🔴 वह तीर्थयात्रा की तैयारियाँ करने लगा। उसकी स्त्री केशिका भी साथ जाने के लिए तैयार हो गयी। उसने एक रूमाल में चार बैंगन बाँधकर रख दिए और जहाँ- जहाँ पतिदेव ने तीर्थयात्रा की, वहाँ- वहाँ वह स्वयं भी नहायी और पानी में बैंगनों को भी स्नान कराया। जहाँ- जहाँ दर्शन के लिए पतिदेव गये, वहाँ स्वयं भी दर्शन किया और उन चार बैंगनों को भी दर्शन कराया। सारे के सारे तीर्थ यात्रा करने के बाद उसका पति भी आ गया और केशिका भी आ गयी। जब घर आकर के बैठे, तब क्या हुआ कि उसने अपने पति के लिए भोजन बनाया। और वे चार बैंगन जो थे, जो कि सारे के सारे तीर्थों की यात्रा कर चुके थे और सब नदियों में स्नान कर चुके थे, उन बैंगनों की उसने साग बनाया। साग बनाकर पतिदेव की थाली में परोसकर रख दिया, तो पतिदेव को बड़ी दुर्गन्ध आयी।

🔵 पतिदेव ने कहा- अरे भागवान्! तूने यह क्या रख दिया? बदबू के मारे मेरी नाक सड़ी जा रही है और मुझे उल्टी होने वाली है। पत्नी ने कहा कि ये वह बैंगन हैं, जो चारों धाम की यात्रा करके आये हैं। ये वह बैगन हैं, जो भगवान् के जितने भी सारे तीर्थ हैं, उनके दर्शन करके आये हैं। इनमें तो सुगंध होनी चाहिए थी? इनमें तो स्वाद होना चाहिए था? उसने कहा- परन्तु इनमें न तो सुगंध है और न स्वाद है, तो मैं किस तरीके से मान लूँ? पत्नी ने कहा कि जब ये बैंगन सुगंध न प्राप्त कर सके, खुशबू प्राप्त न कर सके और स्वाद न प्राप्त कर सके, तो फिर यह तीर्थयात्रा आपको शान्ति दे पायेंगे क्या? भगवान् के दर्शन, कर्मकाण्ड आपको शान्ति दे पायेंगे क्या? मल्लाह के हृदय कपाट खुल गये और उसने अपने भीतर भगवान् को तलाश करना शुरू कर दिया और उसको शान्ति मिली।

👉 गहराई में प्रवेश करें
🔵 मित्रो! भगवान्, जिसके आधार पर यह सारा विश्व टिका हुआ है और मानव की सारी उन्नति उसके कृपा कटाक्ष के ऊपर अवलम्बित है, उसको हमको तलाश करना चाहिए और प्राप्त करना चाहिए। मेरे जीवन का सारे का सारा समय इसी काम में समाप्त हो गया और मेरी साठ साल की जिन्दगी सिर्फ इसी काम में समाप्त हो गयी। भगवान् कहाँ है? और भगवान् को किस तरीके से प्राप्त किया जाये? हमको इसके बारे में थोड़ी गहराई तक जाना पड़ेगा, जैसे कि मुझे मेरे गुरुजी ने गहराई में धकेलने की कोशिश की। मैं चाहता हूँ कि आपको भी गहराई तक धकेल दूँ, ताकि आप वास्तविकता को समझ सकें।

🔴 मित्रो! एक बार ऐसा हुआ कि भगवान् जी की इच्छा हुई कि मेरा प्यारा मनुष्य इस पृथ्वी पर निवास करता है और उसके पास मैं चलूँ, उसके पास रहूँ और उसकी खोज- खबर लिया करूँ, उसको शिक्षा दिया करूँ। मैंने बड़ी उम्मीदों और तमन्नाओं से उसको बनाया था। मैं उसको रास्ता बताऊँगा, उसको उसके कर्तव्य बताऊँगा और उसको यह बताऊँगा कि मनुष्य का जीवन कितना महान है और मनुष्य के जीवन से क्या किया जा सकता है? भगवान् जो कार्य स्वयं करता है, उसको मानव भी स्वयं कर सकता है, मैं जा करके ऐसा शिक्षण मनुष्य को दूँगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आस्था

यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्...