मंगलवार, 8 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 9 Nov 2016


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 9 Nov 2016


👉 हमारी फितरत

🔴 एक घर में गृह प्रवेश की पूजा हो रही थी। पंडित जी पूजा करा रहे थे।

🔵 पंडित जी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया। सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई। पंडित जी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा।”

🔴 लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते। गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई।

🔵 हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए। गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे। उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए।

🔴 मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई। सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई। घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था।

🔵 हवन पूरा होने के बाद पंडित जी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे  अग्नि में डाल दें। गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें।

🔴 एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई। सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया। पूरा घर धुंए से भर गया। वहां बैठना मुश्किल हो गया। एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए।

🔵 अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था। काफी देर तक इंतज़ार करना पडा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में।

👉 ये कहानी तो यहीं रुक जाती है। परन्तु.......


🔴 उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है। पर सबने उसे बचाए रखा। सबने बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी।

🔵 ऐसा ही हम करते हैं। यही हमारी फितरत है। हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं।

🔴 ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है। हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि जब सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले है, उसे बचा कर क्या करना। बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही देगा।

🔵 संसार हवन कुंड है और जीवन पूजा। एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है।

🔴 अच्छी पूजा वही है, जिसमें हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो l

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 23)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 हमसे भी जिन परमाणुओं का काम पड़ेगा वह स्वभावतः हमारी परिक्रमा करेंगे क्योंकि हम चेतना के केन्द्र हैं। इस बिल्कुल स्वाभाविक चेतना को भलीभाँति हृदयंगम कर लेने से तुम्हें अपने अन्दर एक विचित्र परिवर्तन मालूम पड़ेगा। ऐसा अनुभव होता हुआ प्रतीत होगा कि मैं चेतना का केन्द्र हूँ और मेरा संसार, मुझसे सम्बन्धित समस्त भौतिक पदार्थ मेरे इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। मकान, कपड़े, जेवर-धन, दौलत आदि मुझसे सम्बन्धित हैं, पर वह मुझमें व्याप्त नहीं, बिल्कुल अलग है। अपने को चेतना का केन्द्र समझने वाला, अपने को माया से सम्बन्धित मानता है, पर पानी में पड़े हुए कमल के पत्ते की तरह कुछ ऊँचा उठा रहता है, उसमें डूब नहीं जाता।

🔵  जब वह अपने को तुच्छ, अशक्त और बँधे हुए जीव की अपेक्षा चेतन-सत्ता और प्रकाश-केन्द्र स्वीकार करता है, तो उसे उसी के अनुसार परिधान भी मिलते हैं। बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो उसके छोटे कपड़े उतार दिये जाते हैं। अपने को हीन, नीच और शरीराभिमानी तुच्छ जीव जब तक समझोगे, तब तक उसी के लायक कपड़े मिलेंगे। लालच, भोगेच्छा, कामेच्छा, चाटुकारिता, स्वार्थपरता आदि गुण तुम्हें पहनने पड़ेंगे, पर जब अपने स्वरूप को महानतम अनुभव करोगे, तब यह कपड़े निरर्थक हो जायेंगे। छोटा बच्चा कपड़े पर टट्टी कर कर देने में कुछ बुराई नहीं समझता, किन्तु बड़ा होने पर वह ऐसा करने से घृणा करता है।

🔴 कदाचित बीमारी की दशा में वह ऐसा कर भी बैठे, तो अपने को बड़ा धिक्कारता है और शर्मिन्दा होता है। नीच विचार, हीन भावनाएँ, पाशविक इच्छाएँ और क्षुद्र स्वार्थपरता ऐसे ही गुण हैं, जिन्हें देखकर आत्म-चेतना में विकसित हुआ मनुष्य घृणा करता है। उसे अपने आप वह गुण मिल गये होते हैं, जो उसके इस शरीर के लिए उपयुक्त हैं। उदारता, विशाल हृदयता, दया, सहानूभूति, सच्चाई प्रभृति गुण ही तब उसके लायक ठीक वस्त्र होते हैं। बड़ा होते ही मेढक की लम्बी पूँछ जैसे स्वयमेव झड़ पड़ती है, वैसे ही दुर्गुण उससे विदा होने लगते हैं और वयोवृद्घ हाथी के दाँत की तरह सद्गुण क्रमशः बढ़ते रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/Main_Kya_Hun/v4.2

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 12)

🌹युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री कार्यक्रम

🔵 यदि अपना दृष्टिकोण बदल दिया जाय, संयम और नियमितता की नीति अपना ली जाय तो फिर न बीमारी रहे और न कमजोरी। अपनी आदतें ही संयमशीलता और आहार-विहार में व्यवस्था रखने की बनानी होंगी। इस निर्माण में जिसे जितनी सफलता मिलेगी वह उतना आरोग्य लाभ का आनन्द भोग सकेगा। इस संदर्भ में पालन करने योग्य 10 नियम नीचे दिए जा रहे हैं।

🔴 1. दो बार का भोजनभोजन, दोपहर और शाम को दो बार ही किया जाय। प्रातः दूध आदि हल्का पेय पदार्थ लेना पर्याप्त है। बार-बार खाते रहने की आदत बिलकुल छोड़ देनी चाहिए।

🔵 2. भोजन को ठीक तरह चबाया जाय —भोजन उतना चबाना कि वह सहज ही गले से नीचे उतर जाय। इसकी आदत ऐसे डाली जा सकती है कि रोटी अकेली, बिना साग के खावे और साग को अलग से खावें। साग के साथ गीली होने पर रोटी कम चबाने पर भी गले के नीचे उतर जाती है। पर यदि उसे बिना शाक के खाया जा रहा है तो उसे बहुत देर चबाने पर ही गले से नीचे उतारा जा सकेगा। यह बात अभ्यास के लिये है। जब आदत ठीक हो जाय तो शाक मिलाकर भी खा सकते हैं।

🔴 3. भोजन अधिक मात्रा में न हो आधा पेट भोजन, एक चौथाई जल, एक चौथाई सांस आने-जाने के लिये खाली रखना चाहिए। अर्थात् भोजन आधे पेट किया जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (अन्तिम भाग )

🔵 और उसके पश्चात् ध्यान की घड़ियों में मैं सदा बहार तथा भीतर एक प्राणवन्त उपस्थिति का अनुभव करता रहा एवं आनन्द में विभोर हो कर मैंने महामंत्र सुना तथा उसे दुहराता रहा।
ओम्! सदैव! सदैव! के लिये आपकी आत्मा मैं हूँ। आपकी शक्ति अनंत है।
उठो जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय बढ़ते चलो। तुम ब्रह्म हो! तुम ब्रह्म हो!!

ओम्! ओम्!! ओम!!!


🔴 अगर आप भारत को समझना चाहते हैं, तो विवेकानन्द का अध्ययन कीजिए। उनमें सब सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं है।…….
🌹 -विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर

🔵 निस्सन्देह किसी से स्वामी विवेकानन्द के लेखों के लिए भूमिका की अपेक्षा नहीं है। वे स्वयं ही अप्रतिहत आकर्षण हैं।….
🌹 - महात्मा गाँधी

🔴 उनके शब्द महान संगीत हैं, बोथोवन-शैली के टुकड़े हैं, हैंडेल के समवेत गान के छन्द- प्रवाह की भाँति उद्दीपक लय हैं। शरीर में विद्युत्स्पर्श के-से आघात की सिहरन का अनुभव किये बिना मैं उनके इन वचनों का स्पर्श नहीं कर सकता जो तीस वर्ष की दूरी पर पुस्तकों के पृष्ठों में बिखरे पड़े हैं। और जब वे नायक के मुख से ज्वलन्त शब्दों में निकले होंगे तब तो न आघात एवं आवेग पैदा हुए होंगे!
🌹 -रोमाँ रोलाँ

🌹 समाप्त
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 8 Nov 2016

🔴 मनोजगत् के प्रति दुर्व्यवहार की एक विडम्बना द्वेष, दुर्भाव और दुश्चिन्ताओं के रूप में देखी जा सकती है। जो प्रगति कर रहा है, उन्नति के पथ पर आगे बढ़ रहा है, उससे डाह रखकर हम उसकी प्रगति तो नहीं रोक सकते, हाँ अपने ही विकास में रोड़े जरूर खड़े कर सकते हैं। यह शत्रुता फिर किसके साथ बरती कही जाएगी, प्रगति करने वाले के साथ या अपने आपके साथ? इसी प्रकार की निर्मूल चिन्ताएँ, अकरणीय आशंकाएँ और आंतरिक द्वन्द्वों के बीच अपनी योग्यता, प्रतिभा, शक्ति को पीसते रहकर आत्म हिंसा का मार्ग ही तय किया जा सकता है।

🔵 जीवन निर्माण के लिए आत्म-निष्ठा पर आधारित आत्म-विश्वास की अभिवृद्धि आवश्यक है। इसका सहज मार्ग अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को ईमानदारी के साथ पूर्ण करते चलने में है। कार्यों के छोटे-बड़े की चिन्ता नहीं होनी चाहिए। छोटे-छोटे कार्यों के सम्पादन करते चलने से मनोबल बढ़ता है और आगे का मार्ग प्रशस्त होता है। बड़े लोगों ने अपने जीवन काल के प्रारंभ में छोटे काम ही हाथ में लिए थे। कोई भी कार्य छोटा और बड़ा नहीं होता, यह तो कार्य सम्पादन करने वालों की मनोभूमि पर आधारित होते हैं।

🔴 जीवन के हर क्षेत्र में विश्वास की आवश्यकता है। विश्वास हमारा मार्गदर्शन करता है तथा सद्पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। जीवन रहस्य को समझने के लिए आत्म-विश्वास का सहारा लेना ही पड़ेगा। जीवन निर्माण में आत्म-विश्वास का प्रधान हाथ रहता है। जो व्यक्ति अपनी इस शक्ति का विकास नहीं कर पाये उन्हें अभाव और दरिद्रता में पलते हुए जीवन को समाप्त करना पड़ा। अविश्वासी व्यक्ति न तो किसी के सहायक हो पाते हैं और न दूसरों की आत्मीयता पूर्ण सहानुभूति ही प्राप्त कर पाते हैं।

🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...