शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 5 Nov 2016


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 5 Nov 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 9


🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 तब हम 30 हजार व्यक्ति एक जुट होकर इस शत-सूत्री कार्यक्रम में संलग्न हुए थे। गुरु-पूर्णिमा, (आषाढ़ सुदी 15) जून सन् 62 को इस महान् अभियान का विधिवत् उद्घाटन हुआ था। इन सभी को हर सदस्य कार्यान्वित करे—यह आवश्यक नहीं, पर जिससे जितना संभव हो सके, जिन कार्यक्रमों को अपनाया जा सके, उन्हें अपनाना चाहिए। वैसा ही परिजन कर भी रहे हैं। जैसे-जैसे एवं मनोबल बढ़ता चलेगा, अधिक तेजी से कदम आगे बढ़ेंगे।

🔴 अखण्ड-ज्योति के दस सदस्य या उससे थोड़े न्यूनाधिक सदस्य जहां कहीं हैं, वहां उनका एक संगठन बनाया जा रहा है। एक शाखा-संचालक तथा पांच अन्य व्यक्तियों की कार्य समिति चुन ली जाती है। इस शाखा का कार्यालय जहां रहता है, उसे युग-निर्माण केन्द्र कहते हैं। यह केन्द्र सदस्यों के परस्पर मिलने-जुलने का एक मिलन-मन्दिर बन कर योजना की रचनात्मक प्रवृत्तियों के संचालन का उद्गम बन जाता है।

🔵 इस स्थान पर अनिवार्य रूप से एक युग-निर्माण पुस्तकालय रहता है, जहां से जनता में घर-घर जीवन निर्माण का सत्साहित्य पहुंचाने पढ़ाने वापिस लाने एवं अभिरुचि उत्पन्न करने की प्रक्रिया चलती रहती है। परस्पर विचार विनिमय द्वारा सुविधानुसार जो कुछ जहां किया जाना सम्भव होता है, वह वहां किया जाता रहता है। इन कार्यों की सूचना ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक पत्रिका में छपती रहती है जिससे सभी शाखाओं को देशभर में चलने वाली इस महान् प्रक्रिया की प्रगति का पता चलता रहता है और समय-समय पर आवश्यक प्रकाश एवं मार्गदर्शन भी प्राप्त होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 69)

🔵 तुम्हें किसी रूप की आवश्यकता नहीं है। संन्यास वृत्ति का ही महत्त्व है, वेश का नहीं। विद्वत् संन्यास ही असल संन्यास है जो कि अन्तर्ज्ञान का पर्यायवाची है। तुम्हारा नाम लक्ष्य के लिये आप्राण चेष्टा करनेवालों में हो। साधु जीवन में अनन्त विकास है। वेश कुछ नहीं जीवन ही सब कुछ है।

🔴 शक्ति में इन्द्र के समान बनो। स्थिरता में हिमालय के समान बनो। सर्वोपरि निस्वार्थी बनो तथा अपनी आत्मा से संपर्क करो। मेरे नाम को तुम्हारा मंत्र बन जाने दो। मेरी आत्मा से तुम्हारी आत्मा के मिलन को तुम्हारा योग बन जाने दो वस्तुओं की अन्तरात्मा में मैं और तुम एक हैं इस सचेत ज्ञान को तुम्हारी अनुभूति बनने दो। भेद ही मृत्यु है। एकत्व ही जीवन है।

🔵 तुमने मेरी वाणी सुनी है; तुमने मेरा उपदेश ग्रहण किया है, अब नि:शंक हो कर उनका पालन करो। असीम प्रेम करो। निःस्वार्थ कार्य करो। मेरे उपकरण बन जाओ। तुम्हारे व्यक्तित्व को ही मेरा बन जाने दो। कहो, शिवोऽहम्!!

🔴 यह समस्त ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म है। तुममें और मुझमें जो समान रूप से ब्रह्म है उसे खोजो। उस ब्रह्म को स्वयं में तथा सभी में एकम् अद्वितीयम् सच्चिदानन्द के रूप में अनुभव करो और मुक्त हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 5 Nov 2016

🔴 दोष दिखाने वाले को अपना शुभ चिंतक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उलटे उस पर कु्रद्ध होता है, शत्रुता मानता और अपना अपमान अनुभव करता है, तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने का अभी एक पैर उठाना भी नहीं सीखा।

🔵 साहस ही जीवन की विशेषताओं को व्यक्त करने का अवसर देता है। मनुष्य में सभी गुण हों, वह विद्वान् हो, पंडित हो, शक्तिशाली हो, धनवान् हो, सद्गुण संपन्न हो, लेकिन उसमें साहस न हो तो वह अपनी विशेषताओं का, योग्यताओं का कोई उपयोग नहीं कर सकता है।

🔴 हर असफलता के बाद हम दूनी क्रियाशीलता के साथ आगे बढ़ें, यह पुरुषार्थ की चुनौती है। जो एक ही ठोकर में निराश हो बैठा, जिसका आशा दीप एक ही फूँक में बुझ गया। उस दुर्बल मन व्यक्ति ने न जीवन का स्वरूप समझा और न संसार का। यहाँ पग-पग पर संघर्ष करना होता है। कदम-कदम पर साहस, धैर्य और पुरुषार्थ की परीक्षा देनी होती है। जो उस मूल्य को चुकाने के लिए तैयार न हों, उन्हें सफलता जैसे वरदान की आशा भी नहीं करनी चाहिए।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जड़े गहरी जानी चाहिए

🔴 जापान में जहाँ देवदारु के पेड़ तीन-चार सौ फीट तक ऊँचे होते है, वहाँ कुछ ऐसे भी होते हैं जो बहुत पुराने होने पर भी दो-चार फीट के ही रह जाते हैं। इन बौने पेड़ों के बारे में मुझे बड़ा अचम्भा हुआ और उनके न बढ़ने का कारण मालूम किया तो बताया गया कि जापानी लोग जान बूझकर कौतूहलवश इन्हें छोटा बनाये रहते हैं, अपनी कारिस्तानी से बढ़ने नहीं देते। कारिस्तानी यह कि वे पेड़ की टहनियाँ और पत्तों को जरा भी नहीं छेड़ते पर उसकी जड़ों को जमीन में बढ़ने नहीं देते और उनकी बराबर काट-छाँट करते रहते हैं।

🔵 इंसानों में से अनेकों ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत छोटा या ओछा कहा जाता है। जापान के देवदारु पेड़ों की तरह उनकी भी जड़ें भीतर ही भीतर कटती रहती हैं और वे बौनी जिन्दगी बिताते रहते हैं। जो पेड़ बढ़ना और फलना-फूलना चाहता है उसकी जड़ों को गहराई तक जाना जरूरी हैं। जो मनुष्य उन्नतिशील बनना चाहता है उसके लिए यही उचित है कि अन्तरात्मा की जमीन में सद्गुणों को जड़ों की निरन्तर बढ़ाता चले, जब तक जड़ें न बढ़ेंगी पेड़ के बढ़ने और फलने फूलने की आशा कैसे की जा सकती है?

🌹 -स्वामी रामतीर्थ
🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1963 पृष्ठ 1

👉 मैं क्या हूँ? What Am I? (भाग 19)

🌞 दूसरा अध्याय

🔴 मानसिक लोक भी स्थूल लोक की तरह ही है। उसमें इसी बाहरी दुनियाँ की ही अधिकांश छाया है। अभी हम कलकत्ते का विचार कर रहे हैं, अभी हिमालय पहाड़ की सैर करने लगे। अभी जिनका विचार किया था, वह स्थूल कलकत्ता और हिमालय नहीं थे, वरन् मानस लोक में स्थित उनकी छाया थी, यह छाया असत्य नहीं होती। पदार्थों का सच्चा अस्तित्व हुए बिना कोई कल्पना नहीं हो सकती। इस मानस लोक को भ्रम नहीं समझना चाहिए। यही वह सूक्ष्म चेतना है, जिसकी सहायता से दुनियाँ के सारे काम चल रहे हैं।

🔵 एक दुकानदार जिसे परदेश से माल खरीदने जाना है, वह पहले उस परदेश की यात्रा मानसलोक में करता है और मार्ग की कठिनाइयों को देख लेता है, तदनुसार उन्हें दूर करने का प्रबन्ध करता है। उच्च आध्यात्मिक चेतनाएँ मानसलोक से आती हैं। किसी के मन में क्या भाव उपज रहे हैं, कौन हमारे प्रति क्या सोचता है, कौन सम्बन्धी कैसी दशा में है आदि बातों को मानसलोक में प्रवेश करके हम अस्सी फीसदी ठीक-ठीक जान लेते हैं।

🔴  यह तो साधारण लोगों के काम-काज की मोटी-मोटी बातें हुईं। लोग भविष्य को जान लेते हैं, भूतकाल का हाल बताते हैं, परोक्ष ज्ञान रखते हैं। ईश्वरीय सब चेतनाएँ मानस लोक में ही आती हैं। उन्हें ग्रहण करके जीभ द्वारा प्रगट कर दिया जाता है। यदि यह मानसिक इन्द्रियाँ न हुई होतीं तो मनुष्य बिल्कुल वैसा ही चलता-फिरता हुआ पुतला होता जैसे यांत्रिक मनुष्य विज्ञान की सहायता से योरोप और अमेरिका में बनाये गये हैं। दस सेर मिट्टी और बीस सेर पानी के बने हुए इस पुतले की आत्मा और सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध जोड़ने वाली चेतना यह मानस-लोक ही समझनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी युग निर्माण योजना भाग 8

🌹 युग की वह पुकार जिसे पूरा होना ही है

🔵 जिस प्रकार सर्वसाधारण को अपने रक्त सम्बन्धित परिवार को सुविकसित करने की जिम्मेदारी उठाने पड़ती है, उसी प्रकार हम अपने, इन तीस हजार कुटुम्बियों को लेकर जीवन-निर्माण कार्य में अवतीर्ण हो रहे हैं। उन्हें सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा तो बहुत पहले से दे रहे थे पर अब उनके सामने शत-सूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत करके आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता को जीवन व्यवहार में समन्वित करने का अभ्यास करा रहे हैं। यों इन कार्यक्रमों को लाखों व्यक्तियों द्वारा अपनाये जाने पर इनका प्रभाव समाज के नव-निर्माण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण दूरवर्ती एवं चिरस्थायी होगा।

🔴 बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति की महान आवश्यकता की वह चिनगारी जलेगी जो आगे चलकर पाप-तापों का भस्मसात करने में दावानल का रूप धारण कर सके। साथ ही इसमें आत्म-कल्याण एवं जीवन-मुक्ति का उद्देश्य भी सन्निहित है। यह योजना व्यक्ति को निकृष्ट स्तर का जीवनयापन करने की दुर्दशा से ऊंचा उठा कर उत्कृष्टता अपनाने की आध्यात्मिक साधना का अवसर उपस्थित करती है। इसलिए उसे एक प्रकार की योग साधना, तपश्चर्या, नर-नारायण की भक्ति तथा भावोपासना भी कह सकते हैं।

🔵 इस मार्ग पर चलते हुए—शत-सूत्री कार्यक्रमों में से जिसे जितने अनुकूल पड़े, उन्हें अपनाते हुए निश्चित रूप से साहस एवं मनस्विता का परिचय देना पड़ेगा। कई व्यक्ति उपहास एवं विरोध करेंगे। स्वार्थों को भी सीमित एवं संयमित करना पड़ेगा। आर्थिक दृष्टि से थोड़ा घाटा भी रह सकता है और अपने पूर्व संचित कुसंस्कारों से लड़ने में कठिनाई भी दृष्टिगोचर हो सकती है।

🔴 जो इतना साहस कर सकेगा उसे सच्चे अर्थों में साधना समर का शूरवीर योद्धा कहा जा सकेगा। यह साहस ही इस बात की कसौटी मानी जायगी कि किसी व्यक्ति ने आध्यात्मिक विचारों को हृदयंगम किया है, या केवल सुना समझा भर है। योजना एक विशुद्ध साधना है जो युग-निर्माण का—समाज की अभिनव रचना का उद्देश्य पूरा करते हुए व्यक्ति को उसका जीवन लक्ष्य पूरा कराने में किसी भी अन्य जप-तप वाली साधना की अपेक्षा अधिक सरलता से पूर्णता के लक्ष्य तक पहुंचा सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...