शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 69)

🔵 तुम्हें किसी रूप की आवश्यकता नहीं है। संन्यास वृत्ति का ही महत्त्व है, वेश का नहीं। विद्वत् संन्यास ही असल संन्यास है जो कि अन्तर्ज्ञान का पर्यायवाची है। तुम्हारा नाम लक्ष्य के लिये आप्राण चेष्टा करनेवालों में हो। साधु जीवन में अनन्त विकास है। वेश कुछ नहीं जीवन ही सब कुछ है।

🔴 शक्ति में इन्द्र के समान बनो। स्थिरता में हिमालय के समान बनो। सर्वोपरि निस्वार्थी बनो तथा अपनी आत्मा से संपर्क करो। मेरे नाम को तुम्हारा मंत्र बन जाने दो। मेरी आत्मा से तुम्हारी आत्मा के मिलन को तुम्हारा योग बन जाने दो वस्तुओं की अन्तरात्मा में मैं और तुम एक हैं इस सचेत ज्ञान को तुम्हारी अनुभूति बनने दो। भेद ही मृत्यु है। एकत्व ही जीवन है।

🔵 तुमने मेरी वाणी सुनी है; तुमने मेरा उपदेश ग्रहण किया है, अब नि:शंक हो कर उनका पालन करो। असीम प्रेम करो। निःस्वार्थ कार्य करो। मेरे उपकरण बन जाओ। तुम्हारे व्यक्तित्व को ही मेरा बन जाने दो। कहो, शिवोऽहम्!!

🔴 यह समस्त ब्रह्माण्ड ही ब्रह्म है। तुममें और मुझमें जो समान रूप से ब्रह्म है उसे खोजो। उस ब्रह्म को स्वयं में तथा सभी में एकम् अद्वितीयम् सच्चिदानन्द के रूप में अनुभव करो और मुक्त हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...