रविवार, 19 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 20 Feb 2017


👉 चुटकियों में हुआ ब्लड कैंसर का इलाज

🔴 वर्ष १९८६ के प्रारंभिक दिनों में शान्तिकुञ्ज से थोड़ी दूर, रायवाला छावनी के सैनिक आवास में मैं अपनी बीमार पत्नी श्रीमती उर्मिला लाल के साथ रहता था। राँची के एक वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रमण और कैंसर रिसर्च इन्स्टीट्यूट की रिपोर्ट के  अनुसार उन्हें ‘ब्लड कैंसर’ था, जो दुनिया के लिए आज भी लाइलाज बीमारी है।

🔵 चिकित्सकों की एक ही राय थी कि उनकी मृत्यु ६ माह के अन्दर निश्चित है। इसीलिए मैं उन्हें अपने पास रायवाला ले आया था। दिन में दो बार उन्हें १०६.४ डिग्री ताप का बुखार चढ़ता था, जो किसी भी दवा से थमता नहीं था और लगभग २ घंटे रहता ही था। रुड़की मिलिट्री हॉस्पिटल के कर्नल साहब ने भी स्वयं टेस्ट करके ‘ब्लड कैंसर’ की पुष्टि कर दी थी।

🔴 तभी रायवाला छावनी के मेजर सक्सेना ने सलाह दी कि मैं अपनी पत्नी का इलाज शान्तिकुञ्ज में कराऊँ। उर्मिला जी दिनों- दिन दुबली होती जा रही थीं, १८- २० दिनों से खाना बंद था। खाने का प्रयास करते ही उल्टी हो जाती थी। किसी तरह जीप में बिठाकर मैं उन्हें शान्तिकुञ्ज ले आया और डॉ. राम प्रकाश पाण्डेय के समक्ष उपस्थित हो गया। निरीक्षण के उपरान्त उन्होंने सलाह दी कि माता जी के दर्शन का समय है, अतः मैं पहले सपत्नीक उनके दर्शन कर लूँ, उसके बाद ही चिकित्सा प्रारम्भ करवाई जाए।
  
🔵 मैं आधे- अधूरे मन से माता जी के दर्शन के लिए चल पड़ा, क्योंकि मेरे मन में धार्मिक गुरुओं के प्रति अच्छी धारणा नहीं थी। अपने पिछले अनुभवों के कारण मैं उन्हें समाज का नासूर मानता था। किसी प्रकार पत्नी को सहारा दे कर प्रथम तल वाले उस कक्ष में ले गया, जहाँ माता जी बैठती थीं।

🔴 पत्नी ने रो- रो कर अपना दुखड़ा सुनाया। माता जी ने बड़े स्नेह और दुलार से कहा था ‘‘अरे बेटी, तुझे कुछ भी तो नहीं हुआ है, वैसे ही दुःखी हो रही है। तू तो अभी बहुत जियेगी और गुरुदेव का कार्य भी करेगी। छोटी- सी बीमारी है, पाण्डेय जी से जड़ी- बूटी लेकर ठीक हो जायेगी।’’

🔵 माता जी के शब्दों में न जाने कैसा जादू था कि मैं भाव- विह्वल हो उठा। मेरी आँखों से आँसुओं की धार फूट पड़ी। मैंने अपना सिर उनके चरणों में रख दिया। उन्होंने कहा भोजन- प्रसाद लेकर ही जाना। उस समय ऊपर ही भोजन की व्यवस्था थी। पता नहीं कैसे, पत्नी ने भी आधी रोटी खा ली।

🔴 डॉ. पाण्डेय जी के पास आने पर उन्होंने एक दवा खिलायी और कुछ देर और बैठने को कहा। दस मिनट के बाद मेरी पत्नी को ढेर सारी उल्टी हुई। उल्टी इतनी बदबूदार थी कि जैसे कोई जानवर मर कर सड़ गया हो। पास खड़े एक व्यक्ति ने हाथ- मुँह धुलवाया और अपने हाथों से फर्श की सफाई की। मैं सेवा भावना के इस रूप से परिचित नहीं था, सोचा कोई सफाई कर्मचारी होगा। मुझे तो बाद में पता चला कि सफाई करने वाले सज्जन उड़ीसा से आए हुए एक एम.बी.बी.एस. हैं, जो आदरणीय पाण्डेय जी से आयुर्वेद की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

🔵 मैं पत्नी को वापस रायवाला ले गया। वहाँ चिकित्सा प्रारम्भ हुई और पहले ही दिन बुखार १०२ डिग्री से अधिक नहीं बढ़ा। दूसरे दिन केवल १०१ डिग्री तक रहा और रात्रि के २ बजे के आस- पास पत्नी ने मुझे जगा कर कहा कि मुझे खाने को चाहिए, भूख लगी है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार मैंने एक सेब के चार टुकड़े किए, आधे ग्लास पानी में उबाल कर जूस को ठंडा करके पीने दे दिया। सेब का जूस पी कर उन्होंने कहा कि वह रोटी खाएँगी।

🔴 मुझे लगा कि अब उनका अंतिम समय आ गया है। यही सोचकर मैंने दो रोटियाँ सेंक दीं। पहली रोटी खाते ही उन्हें नशा- सा हो गया और वह बिना हाथ धोए सो ही गईं। ऐसे, जैसे बेहोश पड़ी हों। सुबह साढ़े चार बजे मैंने बाबूजी (डॉ. रामप्रकाश पाण्डेय) को फोन कर सारी बातें बताईं। पिता की तरह थोड़ी डाँट सुनने को मिली और निर्देश हुआ कि यथाशीघ्र, पत्नी की नींद खुलते ही, शांतिकुंज लेकर आऊँ।

🔵 शांतिकुंज पहुँचने पर उन्होंने पुनः उर्मिला जी का निरीक्षण किया। दवाइयाँ बदल दीं और मुझे विशेष निर्देश दिये, जो खान- पान और चिकित्सा से सम्बन्धित थे।  उन्होंने कहा- ठीक से देख- भाल करोगे, तो १० दिनों में १५ किलो वजन बढ़ जाएगा और शरीर में नई जान आ जाएगी।

🔴 नकारात्मक सोच में डूबा हुआ मेरा मन अपने- आप से कह उठा ‘‘वाह! बड़ा डॉक्टर आ गया, १० दिनों में १५ किलो वजन बढ़ा देगा।’’  मुझे क्या पता था कि महाकाल के इस घोंसले में जड़- चेतन सभी केवल उन्हीं की आज्ञा का पालन करते हैं। उनके शिष्य जो कहें,  वैसा न हो, यह असम्भव है। १० दिनों के बाद मैं जब पुनः जाँच कराने आया, तो पाया गया कि मेरी पत्नी का वजन था ५४ किलो। उस दिन वह स्वयं सीढ़ियाँ चढ़कर वंदनीया माता जी के पास आशीर्वाद लेने गईं।

🔵 ६ महीने की चिकित्सा के बाद जब पुनः मिलिट्री अस्पताल रुड़की में कैंसर का टेस्ट किया गया, तो रिपोर्ट देखकर कर्नल साहब देर तक मेरी पत्नी को अविश्वास की दृष्टि से देखते रहे। रिपोर्ट में कैंसर का नामोंनिशान नहीं था।

🔴 इस घटना को २४ वर्ष बीत चुके हैं। आज भी सब कुछ सामान्य है। वंदनीया माताजी की अनुकम्पा से मेरी पत्नी का उत्तम स्वास्थ्य आज भी आस- पास की महिलाओं के लिए एक उदाहरण है।

🌹 भास्कर प्रसाद लाल साधनगर, पालम कालोनी (नई दिल्ली)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 43)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ   

🔴 आदर्शवादी लोकशिक्षण के लिये इस प्रकार की आवश्यकता अनिवार्य रूप से रहती है। फिर भी यह आवश्यक नहीं कि पूर्णता प्राप्त करने तक हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहा जाये। छठी कक्षा का विद्यार्थी पाँचवी कक्षा वाले की तो कुछ न कुछ सहायता कर ही सकता है। अपने से कम योग्यता एवं स्थिति वालों को मार्गदर्शन करने में कोई भी समर्थ एवं सफल हो सकता है।   

🔵 इन दिनों उपरोक्त प्रयोजन यंत्रों की सहायता से भी बहुत कुछ हो सकता है। प्राचीन काल में पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थीं पर अब तो वे प्रेस से मशीनों से छपती हैं। इसी प्रकार दृश्य और श्रव्य के माध्यम भी अनेकों सुलभ हैं। उसका प्रयोग ज्ञान का विस्तार करने के लिये किया जा सकता है। टेप रिकार्डर में लाउडस्पीकर लगाकर संगीत और प्रवचन के रूप में होने वाली गोष्ठियों की आवश्यकता पूरी की जा सकती है। स्लाइड प्रोजेक्टर (प्रकाश चित्र यंत्र) कम लागत का और लोकरंजन के साथ लोकमंगल का प्रयोजन पूरा करने वाला उपकरण है। वीडियो कैसेट इस निमित्त बनायें और जहाँ टी०वी० है, वहाँ दिखाये जा सकते हैं। टेप प्लेयर पर टेप सुनाये जा सकते हैं।          
                      
🔴 संगीत टोलियाँ जहाँ भी थोड़े व्यक्ति एकत्रित हों, वहीं अपना प्रचार कार्य आरम्भ कर सकती हैं। लाउड स्पीकरों पर रिकार्ड या टेप बजाये जा सकते हैं। इस सन्दर्भ में दीपयज्ञों की आयोजन प्रक्रिया अतीव सस्ती, सुगम और सफल सिद्ध होती है। इस माध्यम से कर्मकाण्ड के माध्यम से आत्मनिर्माण, मध्याह्नकाल के महिला सम्मेलन में परिवार निर्माण और रात्रि के कार्यक्रम में समाज निर्माण की सुधार प्रक्रिया और संस्थापन विद्या का समावेश किया जा सकता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन-समर्पण की अनोखी पुण्य-प्रक्रिया

🔴 बात बहुत पुरानी है। नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थी उमंग भरे हृदयों से चीनी पर्यटक ह्वेनसांग को भाव भीनी विदाई देने जा रहे थे। सिंधु नदी के जल पर हिलती डोलती एक नौका चल रही थी। नौका मे बैठे हुए विद्यार्थी ह्वेनसांग के साथ विद्या-विनोद तथा धर्म-चर्चाऐं कर रहे थे। नाव किनारे की ओर तेजी से बढ़ती जा रही थी।

🔵 इतने में एकाएक एक भारी तूफान का झोंका आया। नौका तेजी से हिलने-डुलने लगी। अब डूबी तब डूबी का भय दिखाई देने लगा। नाविकों ने नौका को स्थिर रखने का जी-तोड़ प्रयत्न किया पर दुर्भाग्य से सब प्रयास विफल हुए।

🔴 और नौका में भार भी क्या कम था ? ह्वेनसांग भारत भर में घूमे थे और जहाँ भी उन्होंने भगवान् तथागत की अदस्य मूर्ति देखी या अप्राप्य ग्रथ देखा उसे तत्काल अपने साथ ले आए थे। जो अप्राप्त ग्रंथ प्राप्त न हो सका, उसकी वहीं कई दिन बैठकर नकल की। ऐसे अप्राप्य ग्रन्थ केवल १०-२० नहीं थे। खासे ६५७ ग्रन्थ और भगवान बुद्ध की लगभग १५० नयन मनोहर ध्यानस्थ मूर्तियाँ नौका में रखी हुईं थी।

🔵 दैवयोग से तूफान का जोर बड़ता गया। नाविकों के सब प्रयत्न बेकार साबित हुए। अंत में उनकी दृष्टि नौका मे भरी पुस्तकों और मूर्तियों पर पडी़। उन्होंने कहा-अब बचने का केवल एक ही मार्ग है। इन सारी पुस्तकों और मूर्तियां को जल में फैंक दो तो भार कुछ कम हो जायेगा और नाव धीरे-धीरे किनारे तक पहुँच जायेगी।

🔴 एक नाविक ने तो ग्रंथों का एक बंडल नदी में फैंकने के लिए उठा ही लिया था। यह दृश्य देखकर ह्वेनसांग तथागत की मन-ही मन प्रार्थना करने लगा- भगवान्। मुझे मृत्यु का तनिक भी भय नही है। मुझे भय केवल इसी बात का है कि अपने देश के लिये मैंने इतना कष्ट उठाकर जो यह अमूल्य सामग्री उपलब्ध की है वह सब एक पल में नष्ट हो जायेगी।''

🔵 फिर ह्वेनसांग ने खडे़ होकर शांति से कहा नौका का भार ही हलका करना है न, तो मैं स्वयं जल मे कूद पडता हूँ।"

🔴 नहीं मानव-जीवन बडी़ कीमती वस्तु है। भार तो इन पुस्तकों और मूर्तियों से कम करो। इसके बिना नौका किनारे तक पहुँचना सभव नहीं है।'' नाविकों ने कहा।

🔵 ह्वेनसांग बोला "मेरे मन में इस देह का कोई मूल्य नहीं। महत्व तो इन संस्कारवान वस्तुओ का है।''

🔴 इस वार्तालाप से नालंदा विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को सहसा प्रकाश मिला। एक वृद्ध चीनी यात्री की वर्षों की मेहनत इस तरह पानी में जायेगी। जो यह चीनी यात्री ही इन संस्कारो, वस्तुओं के लिए आत्मसमर्पण कर देगा तो हमारे भारत की आतिथ्य परंपरा का क्या महत्त्व रहा?

🔵 विद्यार्थियों ने मूक भाषा में संकेत में आपस में बातचीत की। उनमें से एक तेजस्वी बालक खडा हुआ। दोनों हाथ जोडकर सबसे अभिवादन करते हुए उसने कहा- भदंत! भारतवर्ष की भूमि से आपने जो यह संस्कार निधि एकत्र की है वह केवल नौका में भार के कारण डूब जाए यह हमारे लिए असह्य है। इतना कहकर वह युवक सिंधु नदी की अथाह धारा में कूद पडा। उसके बाद सभी विद्यार्थी जल में कूद कर लुप्त हो गए।

🔴 नाविक तो इस समर्पण का अद्भुत दृश्य फटी आँखों से देखते ही रहे। जीवन समर्पण की यह अनोखी पुण्य प्रक्रिया देख कर ह्वेनसांग कीं आँखों से भी अवरिल अश्रुधारा बहने लगी।

🔵 यह वह उज्ज्वल परपरा थी, जिसने न केवल ह्वेनसांग जैसे विदेशी मनीषी को ही प्रभावित किया, अपितु संसार में भारत की सांस्कृतिक गरिमा का उच्च आदर्श प्रस्थापित किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 38, 39

👉 विदुर का भोजन और श्रीकृष्ण

🔴 विदुर जी ने जब देखा कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन अनीति करना नहीं छोड़ते, तो सोचा कि इनका सान्निध्य और इनका अन्न मेरी वृत्तियों को भी प्रभावित करेगा। इसलिए वे नगर के बाहर वन में कुटी बनाकर पली सुलभा सहित रहने लगे। जंगल से भाजी तोड़ लेते, उबालकर खा लेते तथा सत्यकार्यो में, प्रभु स्मरण में समय लगाते।
 
🔵 श्रीकृष्ण जब संधि दूत बनकर गए और वार्ता असफल हो गयी तो वे धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य आदि सबका आमंत्रण अस्वीकार करके विदुर जी के यहाँ जा पहुँचे। वहाँ भोजन करने की इच्छा प्रकट की।

🔴 विदुर जी को यह संकोच हुआ कि शाक प्रभु को परोसने पड़ेंगे? पूछा- '' आप भूखे भी थे, भोजन का समय भी था और उनका आग्रह भी, फिर आपने वहाँ भोजन क्यों नहीं किया?''  

🔵 भगवान बोले-''चाचाजी! जिस भोजन को करना आपने उचित नहीं समझा, जो आपके गले न उतरा, वह मुझे भी कैसे रुचता? जिसमें आपने स्वाद पाया, उसमें मुझे स्वाद न मिलेगा, ऐसा आप कैसे सोचते हैं?''

🔴 विदुर जी भाव विह्वल हो गए, प्रभु के स्मरण मात्र से ही हमें जब पदार्थ नहीं संस्कारप्रिय लगने लगते है, तो स्वयं प्रभु की भूख पदार्थों से कैसे बुझ सकती है। उन्हें तो भावना चाहिए। उसकी विदुर दम्पत्ति के पास कहाँ कमी थी। भाजी के माध्यम से वही दिव्य आदान-प्रदान चला। दोनों धन्य हो गए।

🔵 स्वार्थी व्यक्ति उदारता पूर्वक सुविधाएँ देने का प्रयास करते हैं, कर्तव्य भाव से नहीं, इसलिए कि उसका अहसान जताकर अपनी मनमानी करवा सकें। ऐसी सुविधाएँ न भगवान ही स्वीकार करते है, न उनके भक्त। दोनों उनसे परहेज करते है।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 11

👉 किसी का जी न दुखाया करो (भाग 2)

🔴 क्या तुम समझते हो कि दूसरे के मन पर घात करने से तुम्हारी बात ऊंची रह जायेगी? क्या तुम सोचते हो कि तुम्हारे प्रहारों से दूसरे तुम्हारी बातें मान लेंगे? क्या तुम्हारा विचार है कि तुम केवल उसके जी को दुःखाते हुए उसे परास्त करके अपनी विजय स्थापित कर लोगे? क्या तुम्हारी धारण है कि उसका मन चुपचाप तुम्हारे प्रहारों को सहता रहेगा? ऐसा न समझो कि तुम उसको केवल परास्त करके मनवा सकोगे। उसका मन तुम्हारा सदा विरोध करेगा।

🔵 तुम्हारी बातों को वह मानेगा तो कदापि नहीं, हाँ भीतर ही भीतर वह तुम्हारा विरोधी अवश्य बन जायगा। उसका हृदय भी तुम्हारी ही भाँति कुछ आत्मगौरववान् होता है। उसकी भी इच्छा होती है कि वह तुम्हारे कथनों का प्रतिवाद करे। उसमें भी बदले की छिपी भावना रहती है। तुम उसे दुःखी करके विरोध को बढ़ाते ही हो, अपने मत को स्थापित नहीं करते।

🔴 विजय प्रेम से होती है। जो काम प्रेम से निकलता है वह क्रोध, दबाव या आघात से नहीं। किसी को समझाना प्रेम से अधिक अच्छी ढंग से हो सकता है, झिझकने, फटकारने या चुभती बात कहने से नहीं। मानव मन पर किसी का एकाधिकार तो है नहीं। यदि तुमसे ही कोई आज कहे कि तुम बड़ा बुरा करते हो कि बहस किया करते हो, तो तुम यही कहोगे न, कि जाओ, करते हैं- तुम्हें इससे क्या? यही दशा सबकी है।

🔵 दीवार से टकराकर पत्थर लौट जाता है। पहाड़ से टकराकर शब्द प्रति ध्वनित होता है। क्रिया की प्रतिक्रिया सदा होती ही है। फिर तुम्हारे जी दुखाने की प्रतिक्रिया क्यों न होगी? यदि वह प्रकट रूप से तुम्हें कुछ न कहेगा, तो उसकी अन्तरात्मा तो तुम्हें सदा कोसती रहेगी। तुम्हें वह चाहे एक शब्द भी न कहे, पर उसका मन हमेशा कुढ़ता रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 -अखण्ड ज्योति फरवरी 1948 पृष्ठ 24 

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Feb 2017

🔴 स्वामी विवेकानन्द ने कहा है-”हम जितना साध्य पर ध्यान देते हैं, उससे अधिक साधन पर दें। यदि साधन ठीक होंगे तो सही परिणाम मिलेगा ही। कारण से ही कार्य की उत्पत्ति होती है। कार्य अपने आप नहीं आ सकता। कारण जब तक उपयुक्त , ठीक और बलशाली न होगा तब तक ठीक परिणाम नहीं मिल सकता। एक बार हम अपना लक्ष्य बना लेते है और ठीक-ठीक साधनों का निश्चय हो जाय, तो फल तो मिलेगा ही यदि साधन में पूर्णता है। यदि हम कारण की परवाह करते हैं तो फल अपने आप स्वयं की परवाह कर लेगा। साधन ही कारण है, इसलिए उन पर ध्यान देना ही साध्य का रहस्य है।”

🔵 इसमें कोई सन्देह नहीं कि साध्य कितना ही पवित्र उत्कृष्ट महान् क्यों न हो यदि उस तक पहुँचने का साधन गलत है, दोषयुक्त क्यों है तो साध्य की उपलब्धि भी असम्भव है। जिस तरह मिट्टी का तेल जला कर वातावरण को सुगन्धित नहीं बनाया जा सकता, उसी तरह दोष-युक्त साधनों के सहारे उच्चस्थ लक्ष्य को प्राप्त करना असम्भव है। वातावरण की शुद्धि के लिए सुगन्धित द्रव्य जलाने होंगे। उत्तम साध्य के लिए उत्तम साधनों का होना आवश्यक है, अनिवार्य है। ठीक इसी तरह उत्कृष्ट साध्य-लक्ष्य का बोध न हो तो उत्तम साधन भी हानिकारक सिद्ध हो जाते हैं।

🔴 आज हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम साध्य तो उत्तम चुन लेते हैं, महान् लक्ष्य भी निर्धारित कर लेते है, लेकिन उसके अनुकूल साधनों पर ध्यान नहीं देते। इसीलिए हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में गतिरोध पैदा हो जाता है। और साध्य से हम दूर भटक जाते हैं हम जो कुछ भी लक्ष्य निर्धारित करते हैं, तो फिर हमारा ध्यान उस लक्ष्य पर ही रहता है। उसे कैसे जैसे भी प्राप्त कर लिया जाय, यही हमारी साधना होती है। और कई बार भ्रम में भटक कर हम गलत साधनों का उपयोग कर बैठते है। फलतः साध्य के प्राप्त होने का जो सन्तोष और प्रसन्नता मिलनी चाहिए, उससे हम वंचित रह जाते हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 15)

🌹 दिव्य विचारों से उत्कृष्ट जीवन
🔴 संसार में अधिकांश व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य का अविचारपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं किन्तु जो अपने जीवन में उत्तम विचारों के अनुरूप ढालते हैं उन्हें जीवन ध्येय की सिद्धि होती है। मनुष्य का जीवन उसके भले-बुरे विचारों के अनुरूप बनता है। कर्म का प्रारम्भिक स्वरूप विचार है। अतएव चरित्र और आचरण का निर्माण विचार ही करते हैं यही मानना पड़ता है। जिसके विचार श्रेष्ठ होंगे उसके आचरण भी पवित्र होंगे। जीवन की यह पवित्रता ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है, ऊंचा उठाती है। अविवेकपूर्ण जीवन जीने में कोई विशेषता नहीं होती सामान्य स्तर का जीवन तो पशु भी जी लेते हैं किन्तु उस जीवन का महत्व ही क्या जो अपना लक्ष्य न प्राप्त कर सके।

🔵 भले और बुरे— दोनों प्रकार के विचार मनुष्य के अन्तःकरण में भरे होते हैं। अपनी इच्छा और रुचि के अनुसार वह जिन्हें चाहता है उन्हें जगा लेता है, जिनसे किसी प्रकार का सरोकार नहीं होता वे सुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। जब मनुष्य कुविचारों का आश्रय लेता है तो उसका कलुषित अन्तःकरण विकसित होता है और दीनता, निकृष्टता, आधि-व्याधि, दरिद्रता, दैन्यता के अज्ञानमूलक परिणाम सिनेमा के पर्दे की भांति सामने नाचने लगते हैं। पर जब वह शुभ्र विचारों में रमण करता है तो दिव्य-जीवन और श्रेष्ठता का अवतरण होने लगता है, सुख, समृद्धि और सफलता के मंगलमय परिणाम उपस्थित होने लगते हैं। मनुष्य का जीवन और कुछ नहीं विचारों का प्रतिविम्ब मात्र है। अतः विचारों पर नियन्त्रण रखने और उन्हें लक्ष्य की ओर नियोजित करने का अर्थ है जीवन को इच्छित दिशा में चला सकने की सामर्थ्य अर्जित करना। जबकि अनियन्त्रित, अवियोजित विचार का अर्थ है, दिशाविहीन अनियन्त्रित जीवन प्रवाह।

🔴 समस्त शुभ और अशुभ, सुख और दुःख की परिस्थितियों के हेतु तथा उत्थान पतन के मुख्य कारण-विचारों को वश में रखना मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य है। विचारों को उन्नत कीजिये उनको मंगल मूलक बनाइये, उनका परिष्कार एवं परिमार्जन कीजिये और वे आपको स्वर्ग की सुखद परिस्थितियों में पहुंचा देंगे। इसके विपरीत यदि अपने विचारों को स्वतन्त्र छोड़ दिया उन्हें कलुषित एवं कलंकित होने दिया तो आपको हर समय नरक की ज्वाला में जलने के लिए तैयार रहना चाहिए। विचारों की चपेट से आपको संसार की कोई शक्ति नहीं बचा सकती।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 23)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 संसार में चिरकाल से दो प्रचण्ड-धाराओं का संघर्ष होता चला आया है। इसमें से एक की मान्यता है कि अपेक्षित साधनों की बहुलता से ही प्रसन्नता और प्रगति सम्भव है। इसके विपरीत दूसरी विचारधारा यह है कि मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। उसके आधार पर ही साधनों का आवश्यक उपार्जन और सत्प्रयोजनों के लिए सदुपयोग बन पड़ता है। वह न हो, तो इच्छित वस्तु पर्याप्त मात्रा में रहने पर भी अभाव और असन्तोष पनपता दीख पड़ता है।

🔴 एक विचारधारा कहती है कि यदि मन को साध सँभाल लिया जाये, तो निर्वाह के आवश्यक साधनों में कमी कभी नहीं पड़ सकती। कदाचित् पड़े भी, तो उस अभाव के साथ संयम, सहानुभूति, सन्तोष जैसे सद्गुणों का समावेश कर लेने पर जो है, उतने में ही भली प्रकार काम चल सकता है। कोई अभाव नहीं अखरता। दूसरी का कहना है कि जितने अधिक साधन, उतना अधिक सुख। समर्थता और सम्पन्नता होने पर दूसरे दुर्बलों के उपार्जन-अधिकार को भी हड़प कर मन चाहा मौज-मजा किया जा सकता है।   

🔵 दोनों के अपने अपने तर्क, आधार और प्रतिपादन हैं। प्रयोग भी दोनों का ही चिरकाल से होता चला आया है, पर अधिकांश लोग अपनी-अपनी पृथक मान्यतायें बनाये हुये चले आ रहे हैं। ऐसा सुयोग नहीं आया कि सभी लोग कोई सर्वसम्मत मान्यता अपना सकें। अपने अपने पक्ष के प्रति हठपूर्ण रवैया अपनाने के कारण, उनके बीच विग्रह भी खड़े होते रहते हैं। इसी को देवासुर संग्राम के नाम से जाना जाता है। पदार्थ ही सब कुछ हैं-यह मान्यता दैत्य पक्ष की है। वह भावनाओं को भ्रान्ति और प्रत्यक्ष को प्रामाणिक मानता है। देव पक्ष, भावनाओं को प्रधान और पदार्थ को गौण मानता है। दर्शन की पृष्ठभूमि पर इसी को भौतिकता और आध्यात्मिकता नाम दिया जाता है। हठवाद ने दोनों ही पक्षों को अपनी ही बात पर अड़े रहने के लिए भड़काया है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 साधक कैसे बनें? (भाग 3)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
🔴  एक हमारा आमंत्रण अगर आप स्वीकार कर सकें तो बड़ी मजेदार बात होगी। आप हमारी दुकान में शामिल हो जायें। आप दुकान में शामिल हो जायें। हमारी दुकान में बहुत फायदा है। इसमें से हर आदमी को मुनाफेदार शेयर मिल सकता है। माँगने से तो हम थोड़ा सा ही दें पायेंगे। ज्यादा हम कहाँ तक दे पायेंगे? भीख माँगने वाले को कहाँ, किसी ने क्या, कितना दिया है? थोड़ा सा ही दे पाते हैं। लेकिन आप हिस्सेदार क्यों नहीं बन जाते हमारी दुकान में? अन्धे और पंगे का योग क्यों नहीं बना लेते। हमारे गुरु और हमने साझेदारी की है। शंकराचार्य ने और मान्धाता ने साझेदारी की थी। 

🔵 सम्राट अशोक और बुद्ध ने साझेदारी की थी। समर्थ गुरु रामदास और शिवाजी ने साझेदारी की थी। रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द ने साझेदारी की थी। क्या आप ऐसा नहीं कर सकते? आप हमारे साथ शामिल हो जायें और हम और आप मिलकर के बड़ा काम करें। उसमें से जो मुनाफा आये, वो बाँट लें। अगर आप इतनी हिम्मत कर सकते हों और ये विश्वास कर सकते हों कि हम प्रामाणिक आदमी हैं तो जिस तरीके से हमने अपने गुरु की दुकान में साझा कर लिया है, आप आयें और हमारे साथ साझा करने की कोशिश करें। अपनी पूँजी उसमें लगायें। समय की पूँजी, श्रम की पूँजी, बुद्धि की पूँजी हमारी दुकान में शामिल करें और इतना मुनाफा कमायें जिससे कि आप निहाल हो जायें।

🔴 हमारी जिन्दगी के मुनाफे का यही तरीका है कि हमने अपनी पूँजी को अपने गुरुदेव के साथ में मिला दिया और उनकी कम्पनी में शामिल हो गये। हमारे गुरुदेव हमारे भगवान् की कम्पनी में शामिल हैं। हम अपने गुरुदेव की कम्पनी में शामिल हैं। आप में से हरेक को आवाहन करते हैं कि अगर आपकी हिम्मत है तो आप आयें और हमारे साथ जुड़ जायें और जुड़ करके हम जो लाभ कमायेंगे, भौतिक और आध्यात्मिक ,, उनका इतना हिस्सा आपके हिस्से में मिलेगा कि आप धन्य हो सकते हैं और निहाल हो सकते हैं, उसी तरीके से जैसे कि हम धन्य हो गये, निहाल हो गये। यही है साधकों से हमारा विनम्र अनुरोध।

🌹 आज की बात समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/sadhak_kese_bane

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 56)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण

🔴 अपनी पहली यात्रा में ही सिद्ध पुरुषों, संतों के विषय में वस्तु स्थिति का पता चल गया। हम स्वयं जिस भ्रम में थे, वह दूर हो गया और दूसरे जो लोग हमारी ही तरह सोचते रहे होंगे उनके भ्रम का निराकरण करते रहे, अपने साक्षात्कार प्रसंग को याद रखते हुए दुहराया कि अपनी पात्रता पहले ही अर्जित न कर ली हो तो उनसे भेंट हो जाना अशक्य है, क्योंकि वे सूक्ष्म शरीर में होते हैं और उचित अधिकारी के सामने ही प्रकट होते हैं। यह जानकारियाँ हमें पहले न थीं।

🔵 हमारी हिमालय यात्रा का विवरण पूर्व में ‘‘सुनसान के सहचर’’ पुस्तक में प्रकाशित किया गया है। यह विवरण तो लम्बा है, पर सारांश थोड़ा ही है। अभावों और आशंकाओं के बीच प्रतिकूलताओं को किस तरह मनोबल के सहारे पार किया जा सकता है, इसका आभास उनमें मिल सकेगा। मन साथ दे तो सर्वसाधारण को संकट दीखने वाले प्रसंग किस प्रकार हँसी-मजाक जैसे बन जाते हैं, कुछ इसी प्रकार के विवरण उन छपे प्रसंगों में पाठकों को मिल सकते हैं। अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले को मन इतना मजबूत तो बनाना ही पड़ता है।

🔴 पुस्तक बड़ी है, विवरण भी सुविस्तृत है, पर उसमें बातें थोड़ी सी हैं, साहित्यिक विवेचना ज्यादा है। हिमालय और गंगा तट क्यों साधना के लिए अधिक उपयुक्त हैं, इसका कारण हमने उसमें दिया है। एकांत में सूनेपन का जो भय लगता है, उसमें चिंतन की दुर्बलता ही कारण है। मन मजबूत हो तो साथियों की तलाश क्यों करनी पड़े? उनके न मिलने पर एकाकीपन का डर क्यों लगे? जंगली पशु अकेले रहते हैं। उनके लिए तो हिंस्र पशु-पक्षी भी आक्रमण करने को बैठे रहते हैं फिर मनुष्य से तो सभी डरते हैं। साथ ही उसमें इतनी सूझ-बूझ भी होती है कि आत्मरक्षा कर सके।

🔵 चिंतन भय की ओर मुड़े तो इस संसार में सब कुछ डरावना है। यदि साहस साथ दे तो हाथ, पैर, मुख और मन, बुद्धि इतनों का निरन्तर साथ रहने पर डरने का क्या कारण हो सकता है? वन्य पशुओं में कुछ ही हिंसक होते हैं। फिर मनुष्य निर्भय रहे, उनके प्रति अंतः से प्रेम भावना रखे तो खतरे का अवसर आने की कम ही सम्भावना रहती है। राजा हरिश्चन्द्र श्मशान की जलती चिताओं के बीच रहने की मेहतर की नौकरी करते थे। केन्या के मसाई शेरों के बीच झोपड़े बनाकर रहते हैं। वनवासी, आदिवासी सर्पों और व्याघ्रों के बीच रहते हैं। फिर कोई कारण नहीं कि सूझ-बूझ वाला आदमी वहाँ न रह सके, जहाँ खतरा समझा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 57)

🔵 देर बहुत हो गई थी। कुटी पर लौटते-लौटते अंधेरा हो गया। उस अंधेरे में बहुत रात गये तक सोचता रहा कि—मनुष्य की ही भलाई की, उसी की सेवा की, उसी के सान्निध्य की, उसी की उन्नति की, बात जो हम सोचते रहते हैं क्या इसमें जातिगत पक्षपात भरा नहीं है, क्या यह संकुचित दृष्टिकोण नहीं है? सद्गुणों की अपेक्षा से ही मनुष्य को श्रेष्ठ माना जा सकता है, अन्यथा वह अन्य जीवधारियों की तुलना में अधिक दुष्ट ही है। हमारा दृष्टिकोण मनुष्य की समस्याओं तक ही क्यों सीमित रहे? हमारा विवेक मनुष्येत्तर प्राणियों के साथ आत्मीयता बढ़ाने, उनके सुख-दुख में सम्मिलित होने के लिए अग्रसर क्यों न हो? हम अपने को मानव समाज की अपेक्षा विश्व समाज का एक सदस्य क्यों न मानें?

🔴 इन्हीं विचारों में रात बहुत बीत गई। विचारों के तीव्र दबाव में नींद बार-बार लगती-खुलती रही। सपने बहुत दीखे। हर स्वप्न में विभिन्न जीव-जन्तुओं के साथ क्रीड़ा, विनोद, स्नेह संलाप करने के दृश्य दिखाई देते रहे। उन सबके निष्कर्ष यही थे कि अपनी चेतना विभिन्न प्राणियों के साथ स्वजन सम्बन्धियों जैसी घनिष्ठता अनुभव कर रही है। आज के सपने बड़े ही आनन्ददायक थे। लगता रहा जैसे एक छोटे क्षेत्र से आगे बढ़कर आत्मा विशाल विस्तृत क्षेत्र को अपना क्रीड़ांगन बनाने के लिये अग्रसर हो रही है।

🔵 कुछ दिन पहले इस प्रदेश का सुनसान अखरता था पर अब तो सुनसान जैसी कोई जगह दिखाई ही नहीं पड़ती। सभी जगह तो विनोद करने वाले सहचर मौजूद हैं। वे मनुष्य की तरह भले ही न बोलते हों, उनकी परम्पराएं मानव समाज जैसी भले ही न हों पर इन सहचरों की भावनाएं मनुष्य की अपेक्षा हर दृष्टि से उत्कृष्ट ही है। ऐसे क्षेत्र में रहते हुए जी ऊबने का अब कोई कारण प्रतीत नहीं होता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...