रविवार, 19 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 43)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ   

🔴 आदर्शवादी लोकशिक्षण के लिये इस प्रकार की आवश्यकता अनिवार्य रूप से रहती है। फिर भी यह आवश्यक नहीं कि पूर्णता प्राप्त करने तक हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहा जाये। छठी कक्षा का विद्यार्थी पाँचवी कक्षा वाले की तो कुछ न कुछ सहायता कर ही सकता है। अपने से कम योग्यता एवं स्थिति वालों को मार्गदर्शन करने में कोई भी समर्थ एवं सफल हो सकता है।   

🔵 इन दिनों उपरोक्त प्रयोजन यंत्रों की सहायता से भी बहुत कुछ हो सकता है। प्राचीन काल में पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थीं पर अब तो वे प्रेस से मशीनों से छपती हैं। इसी प्रकार दृश्य और श्रव्य के माध्यम भी अनेकों सुलभ हैं। उसका प्रयोग ज्ञान का विस्तार करने के लिये किया जा सकता है। टेप रिकार्डर में लाउडस्पीकर लगाकर संगीत और प्रवचन के रूप में होने वाली गोष्ठियों की आवश्यकता पूरी की जा सकती है। स्लाइड प्रोजेक्टर (प्रकाश चित्र यंत्र) कम लागत का और लोकरंजन के साथ लोकमंगल का प्रयोजन पूरा करने वाला उपकरण है। वीडियो कैसेट इस निमित्त बनायें और जहाँ टी०वी० है, वहाँ दिखाये जा सकते हैं। टेप प्लेयर पर टेप सुनाये जा सकते हैं।          
                      
🔴 संगीत टोलियाँ जहाँ भी थोड़े व्यक्ति एकत्रित हों, वहीं अपना प्रचार कार्य आरम्भ कर सकती हैं। लाउड स्पीकरों पर रिकार्ड या टेप बजाये जा सकते हैं। इस सन्दर्भ में दीपयज्ञों की आयोजन प्रक्रिया अतीव सस्ती, सुगम और सफल सिद्ध होती है। इस माध्यम से कर्मकाण्ड के माध्यम से आत्मनिर्माण, मध्याह्नकाल के महिला सम्मेलन में परिवार निर्माण और रात्रि के कार्यक्रम में समाज निर्माण की सुधार प्रक्रिया और संस्थापन विद्या का समावेश किया जा सकता है। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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