शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 24 Dec 2016


👉 आज का सद्चिंतन 24 Dec 2016


👉 सतयुग की वापसी (भाग 19) 24 Dec

🌹 समस्याओं की गहराई में उतरें   

🔴 समर्थता, व्यायामशालाओं में या टॉनिक बेचने वालों की दुकानों में नहीं पाई जा सकती। उसके लिए संयम, साधना और सुनियोजित दिनचर्या अपनाने से ही अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। दूसरों का रक्त अपने शरीर में प्रवेश करा लेने पर भी उस उपलब्धि का अन्त थोड़े ही समय में हो जाता है। अपने निजी रक्त उत्पादन के सुव्यवस्थित हो जाने पर ही काम चलता है।   

🔵 अधिक उत्पादन, अधिक वितरण के लिए किए गए बाहरी प्रयास तब तक सफल न हो सकेंगे, जब तक कि मनुष्य का विश्वास ऊँचे स्तर तक उभारा न जाए। भूल यही होती रहती है कि मनुष्य को दीन, दुर्बल, असहाय, असमर्थ मान लिया जाता है और उसकी अनगढ़ आदतों को सुधारने की अपेक्षा, अधिक साधन उपलब्ध कराने की योजनाएँ बनती और चलती रहती हैं। लम्बा समय बीत जाने पर भी जब स्थिति यथावत् बनी रहती है, तब प्रतीत होता है कि कहीं कोई मौलिक भूल हो रही है।  

🔴 एक भ्रम यह भी जनसाधारण पर हावी हो गया है कि सम्पदा के आधार पर ही प्रगति हो सकती है। यह भ्रम इसलिए भी पनपता और बढ़ता गया है कि धनियों को ठाठ-बाट से रहते, गुलछर्रे उड़ाते देखकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि वह सुखी और समुन्नत भी हैं। पर लबादा उतारकर जब इस वर्ग को नंगा किया जाता है तो पता चलता है कि उसके भीतर एक अस्थिपंजर ही किसी प्रकार साँसें चला रहा है। प्रसन्नता के नाम पर उन्हें चिन्ताएँ ही खाए जा रही हैं। ईर्ष्या आशंका से लेकर अपने एवं अपनों के दुर्गुण-दुर्व्यसन स्थिति को पूरी तरह उलटकर रख दे रहे हैं। यह स्थिति उन्हें औसत नागरिक की तुलना में कहीं अधिक उद्विग्न, रुग्ण और चिन्तित बनाए रहती है। जीवन के आनन्द का बुरी तरह अपहरण कर लेती है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रार्थना ही नहीं पवित्रता भी

🔵 मनुष्य प्रार्थना करते हैं, पशु नहीं। क्योंकि मनुष्य ने पिता को पहचाना है, पशु ने नहीं। जो मनुष्य परमपिता की प्रार्थना नहीं करता वह सभी मनुष्य नहीं है। ऊपर से वह मनुष्य अवश्य है, लेकिन अन्दर से पशुओं की तरह जड़ और अज्ञान ही है, यदि कोई परमात्मा की प्रार्थना नहीं करता वह उसके दिये अनन्त अनुदानों की अवज्ञा करता है। प्रार्थना से हमारे हृदय के कलुष ही दूर नहीं होते हैं, परमात्मा के प्यार का असीम आनन्द मिलता है। वह तो उसके अतिरिक्त है, प्रार्थना उद्देश्य नहीं कर्तव्य है।

🔴 और हाँ, यदि प्रार्थना करने के लिये खड़े होते समय मन में किसी के लिये विरोध आये, किसी का अपराध स्मरण हो तो उसे प्रार्थना करने से पूर्व क्षमा कर देना चाहिये। अगर तुम ऐसा नहीं करते तो मन का विरोध और आत्मा का द्वेष, प्रार्थना के शब्द दूषित कर देंगे। संसार के जितने भी प्राणी हैं, वह तुम्हारी तरह ही परमात्मा के पुत्र हैं, तुम जिस तरह अपने दो पुत्रों को लड़ते-झगड़ते और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष करते रहते देखकर दुःख पाते हो उसी प्रकार परमात्मा भी तुम्हारी भावना और कर्तव्य रहित प्रार्थना से प्रसन्न नहीं होगा।

🔵 सब के दोष-दुर्गुण भूल कर सब की सेवा और उन्नति करना भी प्रार्थना है। यह प्रार्थना उन सब प्रार्थनाओं से अच्छी है, जिसमें भगवान् का नाम तो रहे पर अन्तःकरण की पवित्रता न रहे। प्रार्थना का बीज पवित्रता की ही भूमि पर अच्छी तरह अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होता है। उसी में अच्छे फल लगते है, उसी से मनुष्य को प्रार्थना का आनन्द मिलता है।

🌹 ~सन्त तिलुवल्लुवर
🌹 अखण्ड ज्योति 1969 मार्च पृष्ठ 1

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Dec 2016

 🔴 जन-नेतृत्व के लिए अभिलाषी प्रतिभाओं को हमारी अत्यन्त नेक, व्यावहारिक और दूरदर्शिता पूर्ण सलाह यह है कि वे इधर-उधर न भटकें, भीड़ में धक्के न खाएँ, वरन् युग निर्माण योजना के कार्यक्षेत्र में सीधे प्रवेश करें और देखें कि वे आत्म-गौरव को तृप्त करने वाले ही नहीं, राष्ट्र की सर्वतोमुखी प्रगति में योगदान दे सकने वाला कितना महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न कर रहे हैं।

🔵 हमें राष्ट्र की ठोस और सर्वतोमुखी प्रगति यदि सचमुच अपेक्षित हो और सच्चे मन से इसके लिए काम करना हो तो उसके लिए कटिबद्ध होना चाहिए और बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति का समग्र अनुष्ठान करना चाहिए। इस प्रक्रिया का नाम ‘युग निर्माण योजना’ है। हर प्रतिभा को उस आधार पर काम करने की हर क्षेत्र में सुविधा अनुभव हो सकती है।

🔴 आज दशमुख के रावणों से नहीं, सौ कुटुम्बियों के कौरवों से नहीं, हजार भुजा वाले सहस्रबाहु से नहीं, बल्कि अरबों की जनसंख्या वाले मानव समाज पर अगणित दुष्प्रवृत्तियों और दुर्भावनाओं के साथ छाये हुए सर्वग्राही महाअसुर से जूझना है। इस महाभारत में किसी को भी दर्शक बनकर नहीं बैठे रहना चाहिए। जिसके पास जो है, उसी को लेकर आगे आना चाहिए।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 2) 24 Dec

🌹 गायत्री एक या अनेक

🔴 गायत्री के 24 अक्षरों में से प्रत्येक में एक-एक प्रेरणा और सामर्थ्य छिपी पड़ी है। उसे ध्यान में रखते हुए 24 महा-मातृकाओं का उल्लेख है। यह न तो एक दूसरे की प्रतिद्वन्द्वी हैं और न आद्यशक्ति की समग्र क्षमता के स्थानापन्न होने के उपयुक्त। हर अक्षर का तत्त्वदर्शन एवं साधना-क्षेत्र निरूपित करने के लिए 24 प्रतिमाओं का स्वरूप निर्धारित हुआ है। यह एक ही तत्त्व के भेद-उपभेदों को एक-एक करके समझाने और एक-एक चरण में दिव्य सामर्थ्यों का रहस्य, उद्घाटन करने की प्रक्रिया भी है।

🔵 नवदुर्गाओं की तरह गायत्री महाशक्ति के भी नौ विभाग हैं, उन्हें नव देवियां कहते हैं। इस विभाजन को अध्याय—प्रकरण के तुल्य माना जा सकता है। महामन्त्र के तीन चरणों में से प्रत्येक में तीन-तीन शब्द हैं। इस तरह यह शब्द परिवार सौर-परिवार के नौ शब्दों की तरह बन जाता है। यज्ञोपवीत के नौ धागे इसी विभाजन—वर्गीकरण का संकेत देते और विवेचना की सुविधा प्रस्तुत करते हैं। इस आधार पर गायत्री-तत्त्व-मंडल में नौ देवियों को मान्यता मिली है और उनकी प्रथक-प्रथक प्रतिमा बनाई गई हैं।

🔴 ब्रह्मतत्त्व एक व्यापक एवं निराकार है पर उनकी विभिन्न सामर्थ्यों की विवेचना करने की दृष्टि से देवताओं का स्वरूप एवं प्रयोजन निर्धारित किया गया है। गायत्री के नौ शब्दों की नौ देवियां—चौबीस अक्षरों की चौबीस मातृकाओं की प्रतिमाएं बनी हैं। यह एक ही महाशक्ति-सागर की छोटी-बड़ी लहरें हैं। इस भिन्नता में भी एकता का दर्शन है। अंग-अवयवों को मिलाकर काया बनती है। आद्यशक्ति की प्रेरणाओं, शिक्षाओं, सामर्थ्यों, सिद्धियों का निरूपण ही इन प्रतीक प्रतिमाओं के अन्तर्गत हुआ है। अतएव गायत्री एक ही है। प्रतिमाओं में भिन्नता होते हुए भी उसकी तात्त्विक एकता में अन्तर नहीं आता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गृहस्थ-योग (भाग 43) 24 Dec

🌹 पारिवारिक स्वराज्य

🔵 ‘अनावश्यक संकोच’ पारिवारिक कलह की वृद्धि में सबसे प्रधान कारण हैं। बाहर के आदमियों से तो हम घुल घुल कर बात करते हैं, परन्तु घर वालों से सदा उदासीन रहते हैं, बहुत ही संक्षिप्त वार्तालाप करते हैं। बहुत कम परिवार ऐसे देखे जाते हैं, जिनमें घर के लोग एक दूसरे से अपने मन की बातें कह सकें। शिष्टाचार, बड़प्पन, लिहाज, लाज, पर्दा आदि का वास्तविक रूप नष्ट होकर उसका ऐसा विकृत स्वरूप बन गया है कि घर के सब लोग अपनी मनोभावनायें, आवश्यकताएं और अनुभूतियां एक दूसरे के सन्मुख रखते हुए झिझकते हैं।

🔴 इस गलती का परिणाम यह होता है कि एक दूसरे को ठीक तरह समझ नहीं पाते। किसी बात पर मतभेद हो तो उस भेद को अवज्ञा, अपमान या विरोध मान लिया जाता है ऐसा न होना चाहिये। किसी बात का निर्णय करना हो तो घर के सभी सलाह दे सकने के योग्य स्त्री पुरुषों की सलाह लेनी चाहिए। अपने अभाव प्रकट करने का हर एक को अवसर दिया जाय। जो काम करना हो उसे इस प्रकार अच्छी भूमिका के साथ, तर्क और उदाहरणों के साथ रखना चाहिए कि उस पर घर वालों की सहमति मिल जावे।

🔵  हर व्यक्ति यह अनुभव करे कि मेरे आदेश से ही यह कार्य हुआ। जिस प्रकार राज्य संचालन में प्रजा की सहमति आवश्यक है उसी प्रकार गृह व्यवस्था में परिजनों की सहमति रहने से शान्ति और सुव्यवस्था रहती है। राजनीतिक स्वराज्य से देश में अमनोअमान कायम रहता है। पारिवारिक स्वराज्य से परिवार में सुव्यवस्था रहती है। परिवार की प्रजा यह न समझे कि किसी की इच्छा जबरदस्ती हमारे ऊपर थोपी जा रही है वरन् उसे यह भान होना चाहिए कि सबसे लाभ और सब के हित के लिए विचार विनिमय और विवेक के साथ नीति निर्धारित की गई है तथा औचित्य एवं ईमानदारी को व्यवस्था संचालन में प्रधान स्थान दिया जा रहा है। इस सरल, स्वाभाविक और बिना किसी कठिनाई की नीति का जिस परिवार में पालन किया जाता है वहां सब प्रकार सुख-शान्ति बनी रहती है।।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्ये...