शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 2) 24 Dec

🌹 गायत्री एक या अनेक

🔴 गायत्री के 24 अक्षरों में से प्रत्येक में एक-एक प्रेरणा और सामर्थ्य छिपी पड़ी है। उसे ध्यान में रखते हुए 24 महा-मातृकाओं का उल्लेख है। यह न तो एक दूसरे की प्रतिद्वन्द्वी हैं और न आद्यशक्ति की समग्र क्षमता के स्थानापन्न होने के उपयुक्त। हर अक्षर का तत्त्वदर्शन एवं साधना-क्षेत्र निरूपित करने के लिए 24 प्रतिमाओं का स्वरूप निर्धारित हुआ है। यह एक ही तत्त्व के भेद-उपभेदों को एक-एक करके समझाने और एक-एक चरण में दिव्य सामर्थ्यों का रहस्य, उद्घाटन करने की प्रक्रिया भी है।

🔵 नवदुर्गाओं की तरह गायत्री महाशक्ति के भी नौ विभाग हैं, उन्हें नव देवियां कहते हैं। इस विभाजन को अध्याय—प्रकरण के तुल्य माना जा सकता है। महामन्त्र के तीन चरणों में से प्रत्येक में तीन-तीन शब्द हैं। इस तरह यह शब्द परिवार सौर-परिवार के नौ शब्दों की तरह बन जाता है। यज्ञोपवीत के नौ धागे इसी विभाजन—वर्गीकरण का संकेत देते और विवेचना की सुविधा प्रस्तुत करते हैं। इस आधार पर गायत्री-तत्त्व-मंडल में नौ देवियों को मान्यता मिली है और उनकी प्रथक-प्रथक प्रतिमा बनाई गई हैं।

🔴 ब्रह्मतत्त्व एक व्यापक एवं निराकार है पर उनकी विभिन्न सामर्थ्यों की विवेचना करने की दृष्टि से देवताओं का स्वरूप एवं प्रयोजन निर्धारित किया गया है। गायत्री के नौ शब्दों की नौ देवियां—चौबीस अक्षरों की चौबीस मातृकाओं की प्रतिमाएं बनी हैं। यह एक ही महाशक्ति-सागर की छोटी-बड़ी लहरें हैं। इस भिन्नता में भी एकता का दर्शन है। अंग-अवयवों को मिलाकर काया बनती है। आद्यशक्ति की प्रेरणाओं, शिक्षाओं, सामर्थ्यों, सिद्धियों का निरूपण ही इन प्रतीक प्रतिमाओं के अन्तर्गत हुआ है। अतएव गायत्री एक ही है। प्रतिमाओं में भिन्नता होते हुए भी उसकी तात्त्विक एकता में अन्तर नहीं आता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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