बुधवार, 14 मार्च 2018

👉 प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी प्रफेसर स्टीफन हॉकिंग का निधन

🔷 दुनिया के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी प्रफेसर स्टीफन हॉकिंग का 76 साल की आयु में बुधवार को ब्रिटेन के कैम्ब्रिज स्थित उनके घर पर निधन हो गया। स्टीफन हॉकिंग के बच्चों लुसी, रॉबर्ट और टिम ने बयान जारी कर कहा, 'हमें बेहद दुख है कि हमारे प्यारे पिता आज हमें छोड़कर चले गए।'

🔶 8 जनवरी, 1942 को इंग्लैंड को ऑक्सफर्ड में सेंकड वर्ल्ड वॉर के समय स्टीफन हॉकिंग का जन्म हुआ था।

🔷 गैलीलियो की मृत्यु के ठीक 300 साल बाद हॉकिंग का जन्म हुआ था। 1988 में उन्हें सबसे ज्यादा चर्चा मिली थी, जब उनकी पहली पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम: फ्रॉम द बिग बैंग टु ब्लैक होल्स' मार्केट में आई।

🔶 इसके बाद कॉस्मोलॉजी पर आई उनकी पुस्तक की 1 करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिकी थीं। इसे दुनिया भर में साइंस से जुड़ी सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक माना जाता है।

🔷 2014 में स्टीफन हॉकिंग की प्रेरक जिंदगी पर आधारित फिल्म 'द थिअरी ऑफ एवरीथिंग' रिलीज हुई थी।

🔶 प्रफेसर स्टीफन हॉकिंग ने 1965 में 'प्रॉपर्टीज ऑफ एक्सपैंडिंग यूनिवर्सेज' विषय पर अपनी पीएचडी पूरी की थी।


👉 दुनिया को बताई ब्लैक होल थिअरी

🔶 1974 में स्टीफन हॉकिंग ने दुनिया को अपनी सबसे महत्वपूर्ण खोज ब्लैक होल थिअरी के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि ब्लैक होल क्वॉन्टम प्रभावों की वजह गर्मी फैलाते हैं। पांच साल बाद ही वह कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में गणित के प्रफेसर बन गए। यह वही पद था जिस पर कभी महान वैज्ञानिक ऐलबर्ट आइनस्टाइन नियुक्त थे।

👉 ALS जैसी दुर्लभ बीमारी

🔷 हॉकिंग को (1963) में 21 साल की उम्र में amyotrophic lateral sclerosis (ALS) नामक गंभीर बीमारी हो गई थी। इस बीमारी की वजह से ही उनके शरीर ने धीरे-धीरे काम करना बंद कर दिया था। हॉकिंग जब ऑक्सफर्ड में फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहे थे तभी उन्हें सीढ़ियां चढ़ने में कठिनाइयों का समाना करना पड़ा। धीरे-धीरे यह समस्याएं इतनी बढ़ गईं कि उनकी बोली लड़खड़ाने लगी। डॉक्टर्स ने उस समय हॉकिंग को बताया था कि वह 2 साल से ज्यादा नहीं जी पाएंगे लेकिन यह दावा गलत साबित कर हॉकिंग ने अपनी रिसर्च जारी रखी।

👉 खास डिवाइस से करते थे सारे काम

🔶 हॉकिंग चल फिर नहीं सकते थे और हमेशा वील चेयर पर रहते थे। वह कम्प्यूटर और तमाम डिवाइसों के जरिए अपने शब्दों को व्यक्त करते थे। उन्होंने इसी तरह से भौतिकी के बहुत से सफल प्रयोग भी किए हैं।

👉 स्वर्ग की परिकल्पना को किया था खारिज

🔷 स्टीफन हॉकिंग ने स्वर्ग की परिकल्पना को सिरे से खारिज करते हुए इसे अंधेरे से डरने वाली कहानी बताया था। हॉकिंग ने कहा था कि हमारा दिमाग एक कम्प्यूटर की तरह है जब इसके पुर्जे खराब हो जाएंगे तो यह काम करना बंद कर देगा। खराब हो चुके कम्प्यूटरों के लिए स्वर्ग और उसके बाद का जीवन नहीं है। स्वर्ग केवल अंधेरे से डरने वालों के लिए बनाई गई कहानी है।

👉 किताब ने मचाया तहलका

🔶 साल 1998 में प्रकाशित हुई स्टीफन हॉकिंग की किताब 'अ ब्रीफ हिस्ट्ररी ऑफ टाइम' ने पूरी दुनिया में तहलका मचाया था। इस किताब में उन्होंने ब्रह्मांड विज्ञान के मुश्किल विषयों जैसे 'बिग बैंग थिअरी' और ब्लैक होल को इतने सरल तरीके से बताया कि एक साधारण पाठक भी उसे आसानी से समझ जाए। इस किताब की लाखों प्रतियां हाथों-हाथ बिक गई। हालांकि, स्टीफन हॉकिंग को किताब के लिए विरोध का भी सामना करना पड़ा था क्योंकि उन्होंने इस किताब में ईश्वर के अस्तित्व को नकारा था।

👉 ... तो धरती बन जाएगी आग का गोला

🔷 बीते साल ही स्टीफन हॉकिंग ने यह चेतावनी दी थी कि धरती पर जिस तेजी से आबादी और ऊर्जी की खपत बढ़ रही है, उस तरह से 600 सालों से भी कम समय में यह धरती आग का गोला बन जाएगी।

👉 पीएचडी थीसिस को 20 लाख ने देखा

🔶 स्टीफन हॉकिंग के पीएचडी शोधपत्र को सार्वजनिक करने के कुछ ही दिनों में इसे दुनियाभर के 20 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा था। 1966 में किया गया शोध इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे जारी करते ही कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की वेबसाइट ठप हो गई थी।

👉 मर्लिन मुनरो के दीवाने थे हॉकिंग

🔷 हॉकिंग एक टाइम मशीन बनाना चाहते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि अगर उनके पास टाइम मशीन होती तो वह हॉलिवुड की सबसे खूबसूरत अदाकारा मानी जाने वाली मर्लिन मुनरो से मिलने जाते।

👉 गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी

👉 सूत्र नं० 3

🔶 श्लोक-
विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।

अर्थ-
🔷 जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।

सूत्र –
🔶 यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 4)

🔶 इस प्रक्रिया को कौन किस प्रकार सम्पन्न करे, यह व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर ही एक सुनियोजित कार्यक्रम बन सकता है। जीवन साधना का तात्पर्य ही यह है कि दिशाधारा रीति-नीति में उत्कृष्टता का समावेश करना और ऐसी दिनचर्या बनाना जिसमें उपरोक्त तथ्यों का समुचित समन्वय हो सके। इसमें व्यक्तिगत दुर्बलताओं और अस्त-व्यस्तता को हटाने और उनके स्थान पर प्रगतिशील विधि-व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। आजीविका के औचित्य एवं स्तर को नये सिरे से निर्धारित करना होता है। परिवार में जो परम्परा चल रही है उसके ढर्रे में आवश्यक परिवर्तन करने होते हैं, साथ ही लोक साधना के लिए नये सिरे से अधिक समय लगाने की गुंजायश निकालनी होती है।

🔷 यह सभी काम ऐसे हैं जो उथली कल्पना करते रहने से नहीं बन पड़ते वरन् अवांछनीयताओं के उन्मूलन और सत्परम्पराओं के प्रचलन-परिपोषण के लिए ऐसा ताना-बाना बुनना पड़ता है मानो कोई बड़ा उद्योग व्यवसाय खड़ा करने के लिए योजना बनाने, पूँजी जुटाने, शिल्पियों को कार्यरत करने तथा उत्पादन को खपाने का सरंजाम खड़ा किया जा रहा हो। राष्ट्रीय बचत की पंचवर्षीय योजनाओं का ढाँचा खड़ा करने में जैसे कौशल की आवश्यकता पड़ती है, प्रायः वैसी ही सूझबूझ प्रगतिशील जीवन के अभिनव निर्धारण के लिए आवश्यक होती है। इससे कम में बात बनती ही नहीं। यहाँ जादू चमत्कार जैसा कुछ है नहीं। जिसे जो कुछ उपलब्ध हुआ है वह उसके नियोजन, निर्धारण और पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है। इसका समन्वय ही दैवी वरदान के नाम से जाना जाता है।

🔶 जीवनचर्या में परिवर्तन कायाकल्प है। दृष्टिकोण और प्रयास में घुसी हुई अवांछनीयता को हटाकर इसके स्थान पर उत्कृष्टता को प्रतिष्ठापित किया जा सके तो समझना चाहिए कि महानता का श्रेय साधन हस्तगत हो गया। पर यह हो कैसे? इसका उत्तर एक ही है कि उच्चस्तरीय निर्धारणों को कार्यान्वित करने के लिए समय सम्पदा का नियोजन किया जाय। उसके साथ श्रम और मनोयोग को भी संयुक्त रखा जाय। इसके बिना समुन्नत जीवन क्रम का श्रेय साधन सम्पन्न कर सकने का और कोई मार्ग है नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Last Part)

The tradition for ideal marriage should become more prevalent

🔶 We should hold debates and competitions on this topic in schools and colleges. We should arrange for exhibitions and awaken the masses. If we focus on colleges, universities and technical institutes, we could bring about a particular atmosphere within a couple of years in the entire country. The amount and wealth that is saved through this movement could be used for establishing schools, colleges and for creating employment avenues for the poor. At Shantikunj  Haridwar, Gayatri Tapobhumi in Mathura, and in the 4000 shaktipeeths ideal weddings are solemnized with minimum expense.

🔷 These marriages are conducted through the entire year with vedic rituals and processes. These marriages are not influenced by any kind of muhurats. Till now, more than 1.5 lakh marriages have been performed in this manner. Are we geared up to fight against this evil? Are the youth ready to take a vow that they will not take dowry? Are the young women courageous enough to say that they are not ready to be ‘sold’ and will not give dowry? If this happens, then our country can become more financially secure and socially healthy and harmonious nation. Our aim is to become the torchbearer for establishing global harmony and peace – a sense of unity in diversity – in the whole world.

✍🏻 Pranav Pandya
📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 4)

🔶 आपको एक घटना सुनाता हूँ। एक बार स्वामी माधवाचार्य जी वृन्दावन रहते थे। उन्होंने तेरह साल तक गायत्री के अनुष्ठान किए, लेकिन उन अनुष्ठानों का कोई परिणाम उनको नहीं मिला। न उनको आत्मशान्ति मिली, न भगवान का साक्षात्कार हुआ, न कोई मनोकामना पूरी हुई, न कोई सन्तोष हुआ, कुछ नहीं हुआ। तब? तब बड़े खिन्न हुए, दुःखी हुए कि हमको सफलता के कोई चिन्ह नजर नहीं आते हैं, तो स्तुति करने का क्या फायदा? उन्होंने गायत्री अनुष्ठान तेरह वर्षों तक करने के बाद में वृन्दावन त्याग दिया और वृन्दावन त्यागने के बाद में बनारस चले गए।

🔷 वह वहाँ काशी के मणिकर्णिका घाट पर बैठे हुए थे, आँखों में आँसू भरे हुए थे, बड़े दुःखी थे। एक साधक का रूप और दुःखी देख करके एक महात्मा उधर से निकले, उन्होंने पूछा—भाई क्या बात है? कैसे दुःखी हो रहा है? कौन है तू? तो वह बोले—हम साधना करने वाले एक व्यक्ति हैं और तेरह वर्ष तक गायत्री की उपासना करते रहे, लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला, हम बहुत खिन्न हैं और यह सोचते हैं कि उपासना से कोई लाभ नहीं है, खासतौर से गायत्री का कोई फल नहीं हो सकता, ऐसे हमारे विचार हैं। महात्मा जी हँसने लगे। उन्होंने कहा—अच्छा एक काम कीजिए, गायत्री के बारे में तो हमारी कोई जानकारी नहीं है, हम तो तान्त्रिक और कापालिक विद्याओं को जानते हैं। तू तान्त्रिक और कापालिक विद्या को सीख ले। एक साल के अन्दर तुझे कुछ चमत्कार दीखने लगेंगे, अनुभव हो जाएगा तथा चमत्कार पर तेरा विश्वास बढ़ जाएगा, इसलिए चमत्कार दिखाने की दृष्टि से तुझे हम एक साल की तान्त्रिक उपासना करने की सलाह देते हैं।

🔶 स्वामी माधवाचार्य जी ने मान लिया। फिर उनको मणिकर्णिका घाट पर तन्त्र सम्बन्धी आवश्यक ज्ञातव्य बताया और यह कहा—एक साल तक तुमको इसी मर्यादा में रहना पड़ेगा। इससे बाहर जाना मना है। इसी में नहाना है, इसी में टट्टी जाना है, इसी में खाना पकाना है, इसी में सोना, उठना, बैठना, किसी भी कीमत पर मरघट की सीमा से बाहर मत जाना। ऐसा ही उन्होंने किया। एक साल तक उनको जो भैरव का मन्त्र बताया गया था, उसको वह जपते रहे। भैरव कभी शेर के रूप में आते, कभी औरत के रूप में आते, कभी डराते, कभी पैसा ले करके आ जाते, लेकिन माधवाचार्य जी से उन्होंने कह दिया था कि तू अपने काम में ही लगे रहना, दुनिया की बातों से प्रभावित मत होना। साधक को दुनिया की बातों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। अपनी साधना को ही सब कुछ मानकर चलना चाहिए। वैसा ही हुआ।

🔷 माधवाचार्य अपने गुरु के कहने के मुताबिक़ सब कुछ करते रहे। जो कोई आते रहे, सबको फटकारते रहे—आप लोग चले जाइए, हम तो साधना कर रहे हैं। एक दिन, साल जब पूरा हो गया, तब भैरव जी ने दर्शन दिए, उन्होंने कहा—जिसका तू जप कर रहा है, वह मैं ही हूँ। हमारा नाम भैरव है और हम आ गए। अब तू हमसे वरदान माँग। उन्होंने कहा कि पहली माँग तो यह कि आप मुझे यह यकीन करा दीजिए कि आप भैरव ही हैं। अब तक पूरे साल में यही खुराफात होती रही है कि कोई शेर बनकर आ गया, तो कोई भूत बनकर आ गया—कोई भैंसा बनकर आ गया, तो कोई औरत बनकर आ गया। रोज यहाँ मेरे साथ में दिल्लगीबाजी होती है। अगर आप भैरव हैं, तो फिर मैं आपकी सूरत देखना चाहता हूँ और यह विश्वास करना चाहता हूँ कि आज मेरे साथ में कोई दगाबाजी तो नहीं हो रही है। आप सामने आइए और प्रगट हो जाइए। पहला वरदान माँगूँगा। आज तो बस इतना ही माँगना है। भैरव ने कहा—हम आपको दर्शन तो नहीं दे पायेंगे, आपकी पीठ पीछे खड़े होकर बात कर सकते हैं, लेकिन आपको दर्शन नहीं दे पायेंगे।

🔶 माधवाचार्य ने सन्देह से पूछा कि दर्शन क्यों नहीं दे पायेंगे? उन्होंने कहा—तेरे चेहरे पर गायत्री की शक्ति और तेजस् के आगे खड़े नहीं हो सकते। इसलिए सामने आने की हमारी हिम्मत नहीं है। पीठ पीछे तू जो कुछ हमसे पूछना चाहता है, वह पूछ! बात तो कर ही रहे हैं, यकीन भी कर ले कि हम भैरव हैं। नहीं महाराज जी मुझे यकीन नहीं होता, सामने आ जाइए। नहीं, सामने तो नहीं आ सकते। फिर वजह क्या है? तुझे बता तो दिया। तेरी आँखों में गायत्री का इतना तेजस्, चेहरे में इतना ओजस् और वर्चस् छाया है कि उसके सामने रह सकना हमारे लिए मुमकिन नहीं है। उनको बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारी आँखों में गायत्री का इतना जबर्दस्त तेज है, जिसकी वजह से भैरव हमारे सामने तक नहीं आ सकते। तो उन्होंने कहा—महाराज फिर एक वरदान और माँगता हूँ मैं आपसे। आप दर्शन नहीं देना चाहते तो मत दीजिए। आप एक इच्छा और पूरी कर दीजिए। क्या? आप यह इच्छा पूरी कर दीजिए कि मेरा गायत्री का तेरह वर्षों का जप और अनुष्ठान क्यों बेकार चला गया?

🔷 तो भैरव ने कहा—तेरे इस सवाल का मतलब हम बता देंगे, चल आँखें बन्द कर। आँखें बन्द कर लीं, फिर उन्होंने एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, तीसरे के बाद चौथा इस तरह तेरह जन्मों का दृश्य दिखाया। उसमें उन्होंने बुरे-बुरे कर्म किये थे। किसी में हत्या, किसी में चोरी, किसी में डाका, किसी में कुछ, किसी में कुछ। उनकी तेरह जन्मों में बड़ी घिनौनी जिन्दगी थी। उन्होंने कहा—देख तेरह वर्ष का जो तेरा उपवास है, अनुष्ठान है, एक-एक वर्ष का उपवास-अनुष्ठान, एक-एक जन्म के लिए पूरे हो गये। अब तू जा, चौदहवीं बार फिर अनुष्ठान कर। अबकी बार तेरा साक्षात्कार होगा। अबकी बार जो गायत्री का लाभ मिलना चाहिए था, मिल जाएगा। माधवाचार्य प्रसन्न हो गए, फिर वह वापस चले आये। अपनी छोड़ी हुई साधना को फिर करने लगे। गायत्री उपासना का चौदहवाँ वर्ष जो उन्होंने किया, उसका परिणाम मिला, गायत्री का साक्षात्कार हुआ, उन्होंने पूछा—क्या वरदान चाहते हो, तो माधवाचार्य ने कहा—मैं कोई अजर-अमर ऐसा काम करके दिखा दूँ, जिससे कि दुनिया मुझे याद करती रहे। उन्होंने फिर ‘माधवनिदान’ नाम का प्रख्यात ग्रन्थ लिखा। इसे गायत्री ने माधवाचार्य के सिर पर अदृश्य रूप में प्रकट होकर लिखवाया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 64)

👉 चेतना के रहस्यों का जानकार होता है सद्गुरु

🔶 उन्हीं सर्वव्यापी गुरुदेव की चेतना के अन्य आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हुए भगवान् भोलेनाथ जगदम्बा पार्वती से कहते हैं-

ज्ञानं विज्ञानसहितं लभ्यते  गुरुभक्तितः। गुरोः परतरं नास्ति ध्येयोऽसौ गुरुमार्गिभिः॥ ८१॥
यस्मात्परतरं नास्ति नेति नेतीति वै श्रुतिः। मनसा वचसा चैव नित्यमाराधयेद् गुरुम्॥ ८२॥
गुरोः कृपाप्रसादेन  ब्रह्मविष्णुसदाशिवाः। समर्थाः  प्रभवादौ च केवलं गुरुसेवया॥ ८३॥
देवकिन्नरगन्धर्वाःपितरो यक्षचारणाः। मुनयोपि न जानन्ति  गुरुशुश्रूषणे विधिम्॥ ८४॥
महाहंकारगर्वेण तपोविद्याबलान्विताः। संसारकुहरावर्ते घटयंत्रे यथा घटाः॥ ८५॥
  
🔷 गुरुदेव की भक्ति से ज्ञान-विज्ञान सहित सब कुछ अपने आप मिल जाता है। उन सद्गुरु से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। इसलिए उन्हीं के बताए मार्ग का ध्यान करना चाहिए॥ ८१॥ श्रुतियों में इन्हीं की पराचेतना को नेति-नेति कहकर निरूपित किया गया है। इसलिए मन और वाणी से इन्हीं सद्गुरु की आराधना नित्य करते रहना चाहिए॥ ८२॥ ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव गुरुकृपा के प्रभाव से ही समर्थ हुए हैं। इसलिए गुरुसेवा को ही अपना कर्तव्य मानना चाहिए॥ ८३॥ हालाँकि गुरु सेवा की ठीक-ठीक विधि कोई भी नहीं जानता। फिर भले ही वह देव, किन्नर, गन्धर्व, पितर, यक्ष, चारण अथवा श्रेष्ठ मुनि ही क्यों न हों॥ ८४॥ तप और विद्या को सब कुछ समझने वाले अहंकारी जन इस संसार चक्र में बारम्बार भटकते रहते हैं, जैसे कि घट यंत्र के चक्र में घट घूमता रहता है॥ ८५॥
  
🔶 गुरुदेव की पराचेतना में सब कुछ है। उन्हीं में सभी लौकिक एवं अलौकिक शक्तियाँ समाहित हैं। इसी सत्य को भगवान् सदाशिव ने आदिमाता पार्वती से कहा है। सद्गुरु अगम एवं अगोचर हैं। वे साकार होते हुए भी निराकार हैं। देहधारी होते हुए भी देहातीत हैं। उन्हीं में अपनी अहंता को विलीन करने से परमज्ञान मिलता है। यह परम सत्य है। भले ही इसे बुद्धि परायण जन समझे अथवा न समझे। हालाँकि इसे समझे बिना तप की कठिन साधनाएँ एवं दुरूह विद्याओं का अभ्यास अज्ञान के अहंकार को ही बढ़ाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 102

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 14 March 2018


👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...