गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 Feb 2017


👉 ऐसे थे पूज्य गुरुदेव

🔴 गुरुवर जो कहते उसे पूर्णतया स्वयं के जीवन में करके दिखाते। ‘‘दूसरों के प्रति उदारता स्वयं के प्रति कठोरता’’ उनके जीवन में सतत चरितार्थ तो थी ही, किन्तु उस समय वह चरम अवस्था में पहुँच गई, जब उनकी माता दानकुँवरि बाई का निधन हो गया।

🔵  मथुरा में जब वे अस्वस्थ थीं, उस समय भी आचार्य जी के कार्यक्रम सारे देश में अनवरत चल रहे थे। हर बार तपोभूमि के कार्यकर्ताओं (जिनमें मैं भी शामिल था) को देख- रेख करने की हिदायत देकर जाते थे; पर पता नहीं क्यों इस बार उन्होंने कहा कि यदि कुछ अनहोनी घट गई तो दोनों स्थान पर टेलीग्राम करना। जहाँ कार्यक्रम समाप्त हो व जहाँ प्रारंभ हो। साथ ही आवश्यक निर्देश देकर दौरे पर चले गए।

🔴  द्रष्टा की आँखों से भला कोई बात छिपी कैसे रह सकती है? वही हुआ जिसे समझा गए थे। उस समय छत्तीसगढ़ (पुराना मध्यप्रदेश) के महासमुंद में एक हजार एक कुण्डीय यज्ञ चल रहा था। प्रवचन के बीच में उन्हें टेलीग्राम दिया गया। टेलीग्राम पर नजर पड़ते ही वे सब कुछ समझ गए। एक मिनट के लिए आँखें मूँदकर उन्होंने दिवंगत आत्मा को श्रद्धाञ्जलि दी। पुनः सहज भाव से यथावत् अपनी विवेचना करने लगे। उस समय लोगों को कुछ समझ में नहीं आया, पर बाद में जब सभी ने सुना तो आश्चर्यचकित रह गए। ऐसा समाचार पाकर तनिक भी विचलित न होना, स्थिर भाव से अपना कार्य करते रहना किसी स्थितप्रज्ञ योगी के लिए ही संभव है।  
  
🔵 सबके मन में एक ही आशंका थी कि गुरुदेव मथुरा चले जाएँगे तब यहाँ यज्ञ का क्या होगा? किन्तु उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निश्चिंत करते हुए स्वयं के प्रति कठोर बनकर स्पष्ट कर दिया कि आगे के सभी कार्यक्रम यथावत् होते रहेंगे। हम कहीं नहीं जा रहे, आप सभी के बीच ही रहेंगे। सबने आश्चर्य किया कि ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ?’’ स्वयं की माताजी का श्राद्धकर्म चल रहा हो तो बेटा बाहर कैसे रह सकता है, पर महापुरुषों के सभी कार्य लौकिक नियमों के अनुसार सम्पन्न नहीं होते। उन्होंने तो अपनी ओर से श्राद्धकर्म उस एक मिनट में ही सम्पन्न कर लिया था।
  
🔴 कार्यक्रम आयोजक प्रसन्न थे, क्योंकि इस स्थिति में भी पूज्यवर सभी कार्यक्रमों में उपस्थित रहे। उनका कोई भी कार्यक्रम स्थगित नहीं हुआ। सभी कार्यक्रम यथावत् जारी रहे। अन्तिम संस्कार के सारे लौकिक कृत्य वंदनीया माताजी द्वारा सम्पन्न हुए। इस संबंध में उन्हें सूक्ष्म सम्पर्क से निर्देश मिल गए थे। उनके निर्देशानुसार स्वजनों, परिजनों, आगन्तुकों इष्ट मित्रों की उपस्थिति में अन्त्येष्टि संस्कार सम्पन्न किया गया।
  
🔵 इसके बाद परम वंदनीया माताजी ने कम से कम एक दिन के लिए इस असह्य दुःख में पूज्यवर की उपस्थिति चाही। इसके लिए उन्हें मनाने हेतु मुझे जाने के लिए कहा गया। एक तरफ वन्दनीया माताजी का सजल आग्रह, दूसरी ओर गुरुकार्य के प्रति पूज्यवर की दृढ़निष्ठा- मैं हतप्रभ खड़ा सोच रहा था क्या करूँ? गुरुदेव को उनके निश्चय से डिगाना कठिन ही नहीं असंभव था। उनके सामने जाकर यह बात कहनी पड़ेगी, यह सोचकर ही पसीने छूटने लगे। बचने की कोशिश में मैंने कहा- बलराम जी को भेज दें! पर उन्होंने कहा- ‘‘उन्हें तो मना करेंगे। उनसे आग्रह करना, आने की आवश्यकता बताना उनके वश की बात नहीं, इसलिए तुम्हें ही जाना पड़ेगा।’’ मैं निरुत्तर हो गया।

🔴 महासमुन्द के बाद बालाघाट में कार्यक्रम था। वहाँ यज्ञस्थल में पहुँचा तो देखा पूर्णाहुति चल रही थी। इधर प्रणाम का क्रम भी शुरू हो चुका था। मुझे वहाँ देखकर पूज्यवर सब कुछ समझ गये। बोले- ‘‘रास्ते में बात करेंगे, अभी जाकर नहा- धो लो’’ स्नान- ध्यान के बाद भोजन किया। मथुरा से बालाघाट पहुँचने में दो रात्रि का जागरण था, मगर विश्राम का अवसर नहीं था। क्योंकि अगला कार्यक्रम जबलपुर में था और हमें तत्काल जबलपुर के लिए प्रस्थान करना था। गाड़ी में बैठकर गुरुदेव ने विस्तार से सारी बातें सुनीं।
   
🔵 इसके बाद मैंने माताजी का आग्रह सुनाया और निवेदन किया कि केवल एक दिन के लिए चलें ताकि स्वजनों- परिजनों, इष्ट मित्रों का शिष्टाचार किया जा सके। गुरुदेव कुछ गम्भीर हुए। एक क्षण रुककर बोले- मैंने अपने बच्चों को समय दिया हुआ है। मैं अपने काम के लिए उनको निराश करूँ, यह सम्भव नहीं। रही बात शिष्टाचार की, तो अब ताई जी के बाद घर में सबसे बड़ा मैं ही हूँ। मुझे किसी से शिष्टाचार निभाने की आवश्यकता नहीं। मैं जो कहूँगा उसी को पालन करना सबका कर्तव्य होगा।
   
🔴 मैंने समझाने का प्रयास किया कि किसी कार्यक्रम को स्थगित करने की जरूरत नहीं होगी, जबलपुर के बाद बिलासपुर के निर्धारित कार्यक्रम के बीच एक दिन खाली है। इसलिए जबलपुर का कार्यक्रम सम्पन्न कर तुरन्त मथुरा की ओर प्रस्थान किया जाए तो वहाँ सभी से मिलकर निर्धारित समय पर बिलासपुर पहुँच जाएँगे या एक दिन विलम्ब हो तो भाई लोग मिलकर सँभाल लेंगे। दरअसल इस आशय की सूचना हमने बिलासपुर के कार्यक्रम आयोजक श्री उमाशंकर चतुर्वेदी जी को दे दी थी कि संभव है कि एक दिन विलंब हो जाय। ऐसी परिस्थिति में आप लोग मिलकर संभाल लें लेकिन यह बात मैंने गुरुदेव को नहीं बताई। इधर बालाघाट से रवाना होते समय बिलासपुर से चतुर्वेदी जी भाई साहब के सुपुत्र नरेन्द्र जी आ पहुँचे। वे पूज्यवर को लेने आए थे। उन्हें देखते ही गुरुदेव बोल उठे ‘तू चल, मैं आ जाऊँगा। मुझसे बोले- ‘‘कर दिया न तूने लड़के को परेशान’’ आखिर निराश होकर मुझे अकेले ही लौटना पड़ा।

🌹  वीरेश्वर उपाध्याय
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 33) 10 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र 

🔴 पेट भरने और परिवार के लिये मरते-खपते रहना किसी भी गरिमाशील के लिये पर्याप्त नहीं हो सकता। इस नीति को तो पशु-पक्षी और कीट-पतंग ही अपनाते रहते हैं और मौत के दिन किसी प्रकार पूरे कर लेेते हैं। यदि मनुष्य भी इसी कुचक्र में पिसता और दूसरों को पीसता रहे, तो समझना चाहिये कि उसने मनुष्य जन्म जैसी देव दुर्लभ सम्पदा को कौड़ी मोल गँवा दिया।

🔵 नित्य आत्मविश्लेषण, सुधार, सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन का क्रम यदि जारी रखा जाये तो प्रगति के लक्ष्य उपलब्ध कराने की दिशा में अपने क्रम से बढ़ चलना सम्भव हो जाता है। इन्द्रियसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम और विचारसंयम को व्यवहारिक जीवन की तपश्चर्या माना गया है। तप से सम्पत्ति और सम्पत्ति से सिद्धि प्राप्त होने का तथ्य सर्वविदित है। दुष्प्रवृत्तियों से अपने को बचाते रहने की संयमशीलता किसी को भी सशक्त बना सकने में समर्थ हो सकती है। यह राजमार्ग अपनाकर कोई भी समुन्नत होते हुए अपने आप को देख सकता है।                         

🔴 समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के चार सद्गुण यदि अपने व्यक्तित्व के अंग बनाये जा सकें, उन्हें पुण्य परमार्थ स्तर का माना जा सके तो अपना आपा देखते-देखते इस स्तर का बन जाता है कि अपने सुख बाँटने और दूसरों के दु:ख बँटा लेने की उदार मनोदशा विनिर्मित होने लगे। जीवन साधना इसी आधार पर सधती है। मनुष्य जन्म को सार्थक इन्हीं आधारों को अपनाकर बनाया जा सकता है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जगहित आपनि खोरि कराऊँ

🔴 संत रामानुजाचार्य ने श्रीरंगम के संन्यासी यतिराज से दीक्षा लेकर सन्यास आश्रम में प्रवेश किया। गुरुदेव ने उन्हें अष्टाक्षर नारायण मंत्र का उपदेश दिया और कहा वत्स! यह परम पवित्र मंत्र है। इसके निष्ठापूर्वक जप करने से साधु मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

🔵 श्री यतिराज ने चलते समय यह भी कहा तात! यह मंत्र अधिकारी पात्र को ही दिया जाता है। इसका सस्वर उच्चारण मत करना। जिस किसी के कान में पड़ जाता है, वह पापी हो या पुण्यात्मा सभी पवित्र हो जाते हैं।

🔴 गुरुदेव से विदा होकर रामानुजाचार्य अपनी कुटिया में आए पर यह क्या! आज तो उनके मन में कल वाली शांति भी नहीं थी। मस्तिष्क में अंतर्द्वन्द चल रहा था।

🔵 उन्होंने विचार किया सारा संसार पाप की ज्वाला में जल रहा है। भगवान् की सृष्टि मे अमंगल नाम की कोई वस्तु नही है तो भी लोग पाप और बुरे कर्मो के कारण दुःखी हैं, यदि इन्हें पाप से बचाया जाना संभव हो तो क्यों संसार में किसी को कष्ट हो?

🔴 तभी गुरुदेव के वे शब्द याद आए- 'यह मंत्र जिसके कान में पड़ जाता है वही पवित्र हो जाता है।'' फिर यदि ऐसी शक्ति है इस मंत्र में तो उन्होंने उसे सस्वर उच्चारण के लिये मना क्यों किया। सन्यासी को एकमात्र लोकहित की चिंता होती है; फिर यह मंत्र जिसमें लोकहित का सार छुपा है, उसमें बंधन क्यों लगाया गया?

🔵 देर तक विचारमंथन चलता रहा। यदि गुरुदेव की आज्ञा मानता हूँ तो अपने सन्यास धर्म और संसार को पाप से बचाने के कर्तव्य से गिरता हूए अपनी हानि नहीं-पर लोक हानि होती है। यदि गुरुदेव की बात नहीं मानता तो आज्ञा उल्लंघन क पाप लगता है।

🔴 इस मानसिक संघर्ष में नीद नहीं आई। दो तिहाई रात ऐसे ही अंतर्द्वंद्व में बीती। प्रातःकाल होने को आया तो एकाएक रामानुजाचार्य उठे और मकान की छत पर चढ गये और खडे होकर जोर-जोर से-"ऊँ नमो नारायणाय"- "ऊँ नमो नारायणाय" चिल्लाने लगे। आसपास के सभी लोगों की नींद टूट गई। लोग चौंककर जाग बैठे। रामानुजाचार्य मंत्र भी चिल्लाते जाते थे और यह भी समझाते जाते थे- ''भाइयों! जो भी इस मंत्र का निष्ठापूवक जाप करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।'' एकदूसरे शिष्य को भेजकर गुरु यतिराज ने रामानुज को अपने पास बुलाया। रामानुज अपराधी की भाँति गुरुदेव के समीप जा खडे हुए। रात भर नींद न आने के कारण आँखें सूज रही थी।

🔵 नाराज स्वर मे गुरुदेव ने पूछा- रामानुज! तुझसे मना किया था, यह मंत्र किसी के कान मे नही पडना चाहिये, तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन कैसे किया ?

🔴 देव! रामानुजाचार्य ने विनम्र वाणी मैं कहा आपकी आझा का पालन न करने से मुझे महापातक लगेगा, यह मैं जानता हूँ; किन्तु भगवान के इस सुंदर संसार को पापी और दु़ःखी नही देखा जाता। इस मंत्र से सबका उद्धार हो जाए तो क्या बुरा, मुझे जो यातना मिलेगी वह सब सह लूंगा, पर संसार का तो कल्याण हो जाएगा।

🔵 यतिराज शिष्य क्य इस लोकमंगल की निष्ठा से गद्गगद् हो उठे। रामानुज को छाती से लगाकर उन्होंने कहा- "रामानुज! तू ही मेरा सच्चा शिष्य है। तू निश्चित ही एक दिन सारे संसार को प्रकाश देगा।"

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 19, 20

👉 जडे़ कमजोर थी

🔴 एक रात भयंकर तूफान आया। सैकड़ों विशालकाय वृक्ष धराशायी हो गये। अनेक किशोर वृक्ष भी थे जो बच तो गये थे, पर बुरी तरह सकपकाये खड़े थे।

🔵 प्रात:काल आया, सूर्य ने अपनी रश्मियाँ धरती पर फेंकी। डरे हुए पौधों को देखकर किरणों ने पूछा- 'बालको। तुम इतना सहमे हुए क्यों हो। ' किशोर पौधों ने कहा- देवियो! ऊपर देखो हमारे कितने पुरखे धराशायी पड़े हैं। रात के तूफान ने उन्हें उखाड़ फेंका। न जाने कब यही स्थिति हमारी भी आ बने।

🔴 किरणें हँसी और बच्चों से बोली- तात! आओ इधर देखो- यह वृक्ष तूफान के कारण नहीं जड़ें खोखली हो जाने के कारण गिरे, तुम अपनी जड़ें मजबूत रखना, तूफान तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं पायेंगे।

🔵 मनुष्यों का दीन- हीन होना विचित्र बात है। जब बिना साधनों के जंगल के जानवर स्वस्थ, निरोग और आमोद- प्रमोद का जीवन जी लेते हैं तो मनुष्य दु:खों का रोना क्यों रोये। स्पष्ट है उसकी तृष्णा, वासनायें और अहंता ही उसे श्मशान के भूत की तरह सताती रहती हैं। यदि व्यक्ति अपने दायरे को संकीर्ण न बनाता, इन तृष्णाओं के चंगुल में न फँसता तो दीन- दु:खी जीवन जीने की नौबत ही क्यों आती?

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 1 पृष्ठ 13

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (अंतिम भाग)

🔵 आज जो आदतें पड़ी हुई हैं किसी समय वह भी नई रहीं होगी और उनको अपने पैर जमाने में अपने से पुरानी आदतों के साथ उसी प्रकार संघर्ष करना पड़ा होगा जैसा कि आज नई आदतें डालने की हमारी इच्छा को पुरानी आदतों से संघर्ष करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में निराश होने का कोई कारण नहीं। जब पूर्वकाल में पुरानी आदतों को हटाकर नई आदतें डालने में हम सफल हो चुके हैं तो कोई कारण नहीं कि अब फिर वैसा न किया जा सके।

🔴 ईश्वर का अस्तित्व, जीवन की हर एक स्थिति में, हर जगह और हर समय ध्यान में रखना हमारी एक स्वाभाविक आदत होनी चाहिए और इस आदत का बीजारोपण जीवन के शुरुआत से ही करना चाहिए। क्योंकि यह आदत जीवन की श्रेष्ठतम आदतों में सर्वोपरि महत्व की है।

🔵 जो मनुष्य ईश्वर पर विश्वास करता है, सदैव उसका ध्यान रखता है, हर जगह उसकी सत्ता को देखता है वह पाप कर्म नहीं कर सकता। जो ईश्वर विश्वासी है वह परम निर्भय रहता है, उसे मृत्यु का, हानि का, रोग का, वियोग का, आक्रमण का, ठगी का या किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। ईश्वर भक्त सदा ही निर्भय और निर्बन्ध रहते हैं।

🔴 आप अच्छी आदतें डालिए। क्योंकि आदतों से ही मनुष्य की जीवन धारा का निर्माण होता है। ईश्वर परायणता, आस्तिकता सब से अच्छी आदत है, क्योंकि उसके साथ-साथ वे सभी आदतें अपने आप अपने में आ जाती हैं जो जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए परम आवश्यक हैं।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1949/June.28

👉 एक विशेष समय (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 हममें से प्रत्येक परिजन को कुछ मान्यताएँ अपने मन में गहराई तक उतार लेनी चाहिए, इसलिये कि जिस समय में हम और आप जीवित रह रहे हैं, एक ऐसा समय है, जिसमें युग बदल रहा है और युग परिवर्तन की वेला है। हम में से प्रत्येक साधक को यह मानकर चलना चाहिए कि हमारा व्यक्तित्व विशेष है। हमको भगवान् ने किसी विशेष काम के लिये भेजा है। कीड़े-मकोड़े और दूसरे सामान्य तरह के प्राणी पेट भरने के लिये और औलाद पैदा करने के लिये पैदा होते हैं। मनुष्यों में से भी बहुत सारे ऐसे ही नर-पामर और नरकीटक हैं, उनके जीवन का कोई लेखा-जोखा नहीं, पेट भरने के अलावा और औलाद पैदा करने के अलावा दूसरा कोई काम वो न कर सकेगा, लेकिन कुछ विशेष व्यक्तियों के ऊपर भगवान् विश्वास करते हैं और ये मानकर भेजते हैं कि ये हमारे भी कुछ काम आ सकते हैं, अपने ही गोरख-धंधे में ही नहीं फँसे रहेंगे।

🔵 युग निर्माण परिवार के हर व्यक्ति को अपने बारे में ऐसी मान्यता बनानी चाहिए कि हमको भगवान् ने कोई विशेष काम के लिये भेजा है। ये कोई विशेष समय है और हममें से हर आदमी को यह अनुभव करना चाहिए कि युग की आवश्यकताओं को पूरा करने का उत्तरदायित्व हमारे कंधे पर है। अगर ये विश्वास कर सकें तो आपकी प्रगति का द्वार खुल सकता है और आप महामानवों के रास्ते पर चल सकते हैं और इस अपने परिवार के निर्माण का उद्देश्य आप सफलतापूर्वक पूरा कर सकते हैं। आपको विशिष्ट व्यक्तित्व मिलेगा, जो सामान्य मनुष्यों जैसा नहीं होगा।

🔴 ये विशेष समय है, सामान्य जैसे शान्ति के समय होते हैं, वैसा नहीं। ये आपत्तिकाल जैसा समय है और आपत्तिकाल में आपातकालीन उत्तरदायित्व होते हैं। हमारे ऊपर की जिम्मेदारियाँ, सामान्य जिम्मेदारियाँ नहीं हैं। पेट भरने मात्र की जिम्मेदारियाँ नहीं हैं। इस युग की भी जिम्मेदारियाँ हैं, ये मानकर हमको चलना चाहिए और ये मानकर के चलना चाहिए कि रीछ-वानर जिस तरीके से विशेष भूमिका निभाने के लिये आये थे और ग्वाल-बाल, श्रीकृष्ण भगवान् के साथ में विशेष उत्तरदायित्व निभाने के लिये आये थे। आप लोग इस तरह का अनुभव और विश्वास कर सकें कि आप लोग उसी तरीके से जुड़े हुए हैं और विशेष उत्तरदायित्व महाकाल का सौंपा हुआ है, उसे पूरा करने के लिये हम लोग आये हुए हैं। अगर ये बात मान सके तो फिर आपके सामने नये प्रश्न उत्पन्न होंगे और नई समस्याएँ उत्पन्न होंगी और नये आधार और नये कारण उत्पन्न होंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/ek_vishesh_samay

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Feb 2017

🔵  मनुष्य अपनी वरिष्ठता का कारण अपने वैभव- पुरुषार्थ, बुद्धिबल- धनबल को मानता है, जबकि यह मान्यता नितान्त मिथ्या है। व्यक्तित्व का निर्धारण तो अपना ही स्व- अन्त:करण करता है। निर्णय, निर्धारण यहाँ से होते हैं। मन और शरीर स्वामिभक्त सेवक की तरह अन्त:करण की आकांशा पूरी करने के लिए तत्परता और स्फूर्ति से लगे रस्ते हैं। उन्नति- अवनति का भाग्य- विधान यही लिखा जाता है।

🔴  श्रद्धा अर्थात् सद्भाव, प्रज्ञा अर्थात् सद्ज्ञान एवं निष्ठा अर्थात् सत्कर्म। तीनों का समन्वित स्वरूप ही व्यक्तित्व का निर्माण करता है। श्रद्धा अन्तःकरण से प्रस्फुटित होने वाले आदर्शो के प्रति प्रेम है। इस गंगोत्री से निःसृत होने वाली पवित्र धारा ही सद्ज्ञान और सत्कर्म से मिलकर पतितपावनी गंगा का स्वरुप ले लेती है। इन तीनों का विकास- उत्थान ही मानव की महामानव बनाता है तथा इस क्षेत्र का पतन ही उसे विकृष्ट स्तर का जीवनयापन करने को विवश करता है।

🔵 मनुष्य की वरिष्ठा श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा पर अवलम्बित है। इन्हीं की न्यूनाधिकता से उसका व्यक्तित्व उठता- गिरता है। (व्यक्तित्व) के उठने- गिरने के कारण उत्थानजन्म सुखों और पतनजन्य दुखों का वातावरण बनता है। इन दिनों मनुष्यों ने आन्तरिक वरिष्ठता गँवा दी है। फलत: अपने तथा सबके लिए संकट उत्पन्न कर रहे है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 5)

🌹 सभी मानसिक स्फुरणाएं विचार नहीं

🔴 किन्तु मनुष्य की सभी मानसिक तथा बौद्धिक स्फुरणायें विचार ही नहीं होते। उनमें से कुछ विचार और कुछ मनोविकार तथा बौद्धिक विलास भी होता है। दुष्टता, अपराध तथा ईर्ष्या-द्वेष के मनोभाव, विकार तथा मनोरंजन, हास विलास तथा क्रीड़ा आदि की स्फुरणाएं बौद्धिक विलास मानी गई है। केवल मानसिक स्फुरणाएं ही विचारणीय होती हैं, जिनके पीछे किसी सृजन, किसी उपकार अथवा किसी उन्नति की प्रेरणा क्रियाशील रहती है। साधारण तथा सामान्य गतिविधि के संकल्प-विकल्प अथवा मानसिक प्रेरणायें विचार की कोटि में नहीं आती हैं। वे तो मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियां होती हैं, जो मस्तिष्क में निरन्तर आती रहती हैं।

🔵 यों तो सामान्यतया विचारों में कोई विशेष स्थायित्व नहीं होता । वे जल-तरंगों की भांति मानस में उठते और विलीन होते रहते हैं। दिन में न जाने कितने विचार मानव-मस्तिष्क में उठते और मिटते रहते हैं। चेतन होने के कारण मानव मस्तिष्क की यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। विचार वे ही स्थायी बनते हैं, जिनसे मनुष्य का रागात्मक सम्बन्ध हो जाता है। बहुत से विचारों में से एक दो विचार ऐसे होते हैं, जो मनुष्य को सबसे ज्यादा, प्यारे होते हैं। वह उन्हें छोड़ने की बात तो दूर उनको छोड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकता। 

🔴 यही नहीं, किसी विचार अथवा विचारों के प्रति मनुष्य रागात्मक झुकाव विचार को न केवल स्थायी अपितु अधिक प्रखर तेजस्वी बना देता है। इन विचारों की छाप मनुष्य के व्यक्तित्व तथा कर्तृत्व पर गहराई के साथ पड़ती है। रागात्मक विचार निरन्तर मथित अथवा चिन्तित होकर इतने दृढ़ और अपरिवर्तनशील हो जाते हैं कि वे मनुष्य के विषय व्यक्तित्व के अभिन्न अंग की भांति दूर से ही झलकने लगते हैं। प्रत्येक विचार जो इस सम्बन्ध में संस्कार बन जाता है, वह उसकी क्रियाओं में अनायास ही अभिव्यक्त होने लगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 13)

🌹 दुरुपयोग के रहते अभाव कैसे मिटे

🔵 गए-गुजरे लोग किसी का बहुत भला नहीं कर सकते। उनके लिए अपनी गाड़ी घसीटना ही भारी पड़ता है। वे सब तो दरिद्रता, दुर्बलता और अशिक्षा के दल-दल में धँसे रहने के कारण किसी की कुछ भलाई भी नहीं कर सकते । सेवा सहायता का सुयोग उनसे बन ही नहीं पड़ता । इतने पर भी यह संतोष की बात है कि तथाकथित समर्थों की तरह वे अपनी चिनगारी को दावानल बनाकर, सुविस्तृत वन प्रदेशों को जला डालने की दृष्टता तो नहीं कर पाते।

🔴 लोक चिन्तन को दिग्भ्रान्त करने में जितना साहित्यकारों, कलाकारों, धर्मोपदेशकों, नेतृत्व करने वालों ने सर्वसाधारण को भड़काया है, उतना कदाचित् ही संसार के समस्त अशिक्षित कर सके हों। सम्पत्ति वालों ने, कलाकारों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को अपने पैसे के बल पर खरीदा और कठपुतली की तरह नचाया है। कभी वैज्ञानिकों की स्वतन्त्र सत्ता रही होगी और वे लोकोपयोगी अविष्कार करते रहे होंगे, पर अब तो साधनों के सम्मुख उन्हें भी आत्मसमर्पण कर देना पड़ा है। वे वही सोचते-खोजते हैं, जो उनके अन्नदाता उनसे चाहते हैं। किसी की बुद्धिमत्ता ही नहीं, ईमान खरीद लेने तक का दावा तथाकथित सुसम्पन्न करने लगे हैं। उन्हें देवताओं और भगवानों को भी अपने साधनों के बल पर कुछ भी करने के लिए विवश करने की जुर्रत होने लगी है।  

🔵 साधनों की कमी पड़ने से कठिनाई बढ़ने की बात समझ में आती है, पर यह तथ्य और भी अधिक गम्भीरतापूर्वक समझा जाना चाहिए कि उनका बाहुल्य होने पर भी यदि दुरुपयोग चल पड़े, तो विपत्तियाँ और भी अधिक बढ़ेंगी। चाकू न होने पर शाक तरकारी काटने का काम अन्य किसी उपकरण से भी लिया जा सकता है , पर कोई चमकीला, धारदार तथा कीमती चाकू पेट में घुस पड़े, तो समझना चाहिए अभाव की तुलना में वह उपलब्धि और भी अधिक भारी पड़ी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 99)

🌹 प्रगतिशील जातीय संगठनों की रूपरेखा

🔴 जातियों-संगठनों के वर्तमान स्वरूप और जाति-पांति से उत्पन्न होने वाली बुराइयों को ध्यान में रखते हुए तत्काल तो कोई भी विचारशील व्यक्ति इस प्रकार के प्रयत्नों का विरोध नहीं करेगा। जब उसे हमारे प्रयोजन का पता चलेगा और वस्तु स्थिति पर विचार करेगा तो उसे इसकी सामयिक उपयोगिता एवं आवश्यकता का महत्व भी स्वीकार करना पड़ेगा। कुएं में गिरना एक बात है और कुएं में गिरे हुये को निकालने के लिये कुएं में घुसना दूसरी बात है। जाति वाद की संकीर्णता से लड़ने के लिये और उस बुराई का उन्मूलन करने के लिये बनाये गये जातीय संगठन लहर एक जैसे दीख पड़ सकते हैं, पर वस्तुतः उनमें कुएं में गिरने वाले और निकालने के लिये उतरने वाले की तरह जमीन-आसमान का अन्तर है। हम संकीर्णता फैलाने के लिये नहीं वरन् उसके उन्मूलन के लिये जातीय संगठन बना रहे हैं। अस्तु इसका परिणाम भी हमारी भावना के अनुरूप ही होगा।

🔵 अखण्ड-ज्योति परिवार के लिये लोग अपने जातीय संगठन बनाने और उनके द्वारा आदर्श विचारों का प्रयोजन पूरा करने का प्रयत्न करें। इन संगठनों को अधिक सहायक बनाकर हम सामाजिक क्रान्ति की एक भारी आवश्यकता को पूरा भी कर सकते हैं।

🔴 1. संगठनों का नामकरण:-- इन जातीय संगठनों का निर्माण प्रगतिशीलता बढ़ाने के लिये किया जा रहा है। आज जातिवाद जिन कारणों से बदनाम है, उन्हें हटाना अपना उद्देश्य है। संकीर्णता, वंशगत अहंकार, अपनी जाति वालों के साथ पक्षपात, अपने वर्ग में प्रचलित रूढ़ियों का अन्ध-समर्थन जैसे कारणों से जातिवाद बदनाम हुआ है। हमें इन बातों से तनिक भी लगाव नहीं, अपना उद्देश्य तो जिस क्षेत्र में अपना अधिक परिचय, अधिक प्रभाव एवं अधिक सम्बन्ध रहता है, उसे अधिक सुविकसित, सुसंस्कृत एवं प्रगतिशील बनाना है। इसलिये अपने द्वारा संगठित सभाओं के साथ अनिवार्यतः ‘प्रगतिशील’ शब्द जुड़ा रहना चाहिये। ताकि अपने उद्देश्यों की प्राथमिकता और पुराने ढंग की जातीय सभाओं से अपनी भिन्नता सिद्ध कर सकें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 47)

🌹 ऋषि तंत्र से दुर्गम हिमालय में साक्षात्कार

🔴 मैं गुफा में से निकलकर शीत से काँपते हुए स्वर्णिम हिमालय पर अधर ही अधर गुरुदेव के पीछे-पीछे उनकी पूँछ की तरह सटा हुआ चल रहा था। आज की यात्रा का उद्देश्य पुरातन ऋषियों की तपस्थलियों का दिग्दर्शन करना था। स्थूल शरीर सभी ने त्याग दिए थे, पर सूक्ष्म शरीर उनमें से अधिकांश के बने हुए थे। उन्हें भेदकर किन्हीं-किन्हीं के कारण शरीर भी झलक रहे थे। नतमस्तक और करबद्ध नमन की मुद्रा अनायास ही बन गई। आज मुझे हिमालय पर सूक्ष्म और कारण शरीरों से निवास करने वाले ऋषियों का दर्शन और परिचय कराया जाना था। मेरे लिए आज की रात्रि जीवन भर के सौभाग्यशाली क्षणों में सबसे अधिक महत्त्व की वेला थी|

🔵 उत्तराखण्ड क्षेत्र की कुछ गुफाएँ तो जब तब आते समय यात्रा के दौरान देखीं थीं, पर देखी वही थीं, जो यातायात की दृष्टि से सुलभ थीं। आज जाना कि जितना देखा है, उससे अनदेखा कहीं अधिक है। इनमें जो छोटी थीं, वे तो वन्य पशुओं के काम आती थीं, पर जो बड़ीं थीं, साफ-सुथरी और व्यवस्थित थीं, वे ऋषियों के सूक्ष्म शरीरों के निमित्त थीं। पूर्व अभ्यास के कारण वे अभी भी उनमें यदा-कदा निवास करते हैं।

🔴 वे सभी उस दिन ध्यान मुद्रा में थे। गुरुदेव ने बताया कि वे प्रायः सदा इसी स्थिति में रहते हैं। अकारण ध्यान तोड़ते नहीं। मुझे एक-एक का नाम बताया और सूक्ष्म शरीर का दर्शन कराया गया। यही है सम्पदा, विशिष्टता और विभूति सम्पदा इस क्षेत्र की। गुरुदेव के साथ मेरे आगमन की बात उन सभी को पूर्व से ही विदित थी। सो हम दोनों जहाँ भी जिस-जिस समय पहुँचे, उनके नेत्र खुल गए। चेहरों पर हल्की मुस्कान झलकी और सिर उतना ही झुका, मानों वे अभिवादन का प्रत्युत्तर दे रहे हों। वार्तालाप किसी से कुछ नहीं हुआ। 
🔵 सूक्ष्म शरीर को कुछ कहना होता है, तो वे बैखरी, मध्यमा से नहीं परा और पश्यन्ति वाणी से, कर्ण छिद्रों के माध्यम से नहीं, अन्तःकरण में उठी प्रेरणा के रूप में कहते हैं, पर आज दर्शन मात्र प्रयोजन था। कुछ कहना-सुनना नहीं था। उनकी बिरादरी में एक नया विद्यार्थी भर्ती होने आया, सो उसे जान लेने और जब जैसी सहायता करने की आवश्यकता समझें, तब वैसी उपलब्ध करा देने का सूत्र जोड़ना ही उद्देश्य था। सम्भवतः यह उन्हें पहले ही बताया या चुका होगा कि उनके अधूरे कामों को समय की अनुकूलता के अनुसार पूरा करने के लिए यह स्थूल शरीर धारी बालक अपने ढंग से क्या-क्या कुछ करने वाला है एवं अगले दिनों इसकी भूमिका क्या होग|

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 47)

🌞  हिमालय में प्रवेश (सुनसान की झोंपड़ी)

🔵 लगा कि वह जल धारा कमल पुष्प सी सुन्दर एक देव कन्या के रूप में परिणित होती है। वह अलौकिक शांति, समुद्र सी सौम्य मुद्रा में ऐसी लगती थी मानो इस पृथ्वी की सारी पवित्रता एकत्रित होकर मानुषी शरीर में अवतरित हो रही हो। वह रुकी नहीं, समीप ही उस शिलाखण्ड पर आकर विराजमान हो गई। लगा—मानो जागृत अवस्था में ही यह सब देखा जा रहा हो।

🔴 उस देव कन्या ने धीरे-धीरे अत्यन्त शांत भाव से मुधर वाणी में कुछ कहना आरम्भ किया। मैं मन्त्र मोहित की तरह एकचित्त होकर सुनने लगा। वह बोली—नर तनु धारी आत्मा, तू अपने को इन निर्जन वन में अकेला मन मान। दृष्टि पसार कर देख चारों ओर तू ही बिखरा पड़ा है। मनुष्य तक अपने को सीमित मत मान। इस विशाल सृष्टि में मनुष्य भी एक छोटा-सा प्राणी है। उसका भी एक स्थान है, पर सब कुछ वही नहीं है। जहां मनुष्य नहीं वहां सूना है ऐसा क्यों माना जाय? अन्य जड़ चेतन माने जाने वाले जीव भी विश्वात्मा के वैसे ही प्रिय पुत्र हैं जैसा मनुष्य। तू उन्हें क्यों अपना सहोदर नहीं मानता? उनमें क्यों अपनी आत्मा नहीं देखता? उन्हें क्यों अपना सहचर नहीं समझता? इस निर्जन में मनुष्य नहीं है, पर अन्य अगणित जीवधारी मौजूद हैं। पशु-पक्षियों की, कीट-पतंगों की, वृक्ष वनस्पतियों की, अनेक योनियां इस गिरि कानन में निवास करती हैं। सभी में आत्मा है, सभी में भावना है। यदि तू इन अचेतन समझे जाने वाले चेतनों की आत्मा से अपनी आत्मा को मिला सके तो ए पथिक! तू अपनी खंड-आत्मा को समग्र-आत्मा के रूप में देख सकेगा।’’

🔵 धरती पर अवतरित हुई वह दिव्य सौंदर्य की अद्भुत प्रतिमा देव कन्या बिना रुके कहती ही जा रही थी—‘‘मनुष्य को भगवान् ने बुद्धि दी, पर वह अभागा उसका सुख कहां ले सका? तृष्णा और वासना में उसने इस दैवी वरदान का दुरुपयोग किया और जो आनन्द मिल सकता था उससे वंचित हो गया। वह प्रशंसा के योग्य प्राणी, करुणा का पात्र है। पर सृष्टि के अन्य जीव इस प्रकार की मूर्खता नहीं करते। उनमें चेतन की मात्रा न्यून भले ही हो पर भावना को उनकी भावना के साथ मिला कर तो देख। अकेलापन कहां-कहां है, सभी ही तेरे सहचर हैं। सभी तो तेरे बन्धु-बान्धव हैं।’’

🔴 करवट बदलते ही नींद की झपकी खुल गई। हड़बड़ा कर उठ बैठा। चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो वह अमृत-सा सुन्दर सन्देश सुनाने वाली देव कन्या वहां न थी। लगा मानों वह इसी सरिता में समा गई हो। मानुषी रूप छोड़कर जलधारा में परिणत हो गई हो। वे मनुष्य की भाषा में कहे गये शब्द सुनाई नहीं पड़ते थे, पर हर-हर कल-कल की ध्वनि में भाव वे ही गूंज रहे थे, संदेश वही मौजूद था। ये चमड़े वाले कान उसे सुन तो नहीं पा रहे थे पर कानों की आत्मा उसे अब भी समझ रही थी, ग्रहण कर रही थी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य