गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 33) 10 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र 

🔴 पेट भरने और परिवार के लिये मरते-खपते रहना किसी भी गरिमाशील के लिये पर्याप्त नहीं हो सकता। इस नीति को तो पशु-पक्षी और कीट-पतंग ही अपनाते रहते हैं और मौत के दिन किसी प्रकार पूरे कर लेेते हैं। यदि मनुष्य भी इसी कुचक्र में पिसता और दूसरों को पीसता रहे, तो समझना चाहिये कि उसने मनुष्य जन्म जैसी देव दुर्लभ सम्पदा को कौड़ी मोल गँवा दिया।

🔵 नित्य आत्मविश्लेषण, सुधार, सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन का क्रम यदि जारी रखा जाये तो प्रगति के लक्ष्य उपलब्ध कराने की दिशा में अपने क्रम से बढ़ चलना सम्भव हो जाता है। इन्द्रियसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम और विचारसंयम को व्यवहारिक जीवन की तपश्चर्या माना गया है। तप से सम्पत्ति और सम्पत्ति से सिद्धि प्राप्त होने का तथ्य सर्वविदित है। दुष्प्रवृत्तियों से अपने को बचाते रहने की संयमशीलता किसी को भी सशक्त बना सकने में समर्थ हो सकती है। यह राजमार्ग अपनाकर कोई भी समुन्नत होते हुए अपने आप को देख सकता है।                         

🔴 समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के चार सद्गुण यदि अपने व्यक्तित्व के अंग बनाये जा सकें, उन्हें पुण्य परमार्थ स्तर का माना जा सके तो अपना आपा देखते-देखते इस स्तर का बन जाता है कि अपने सुख बाँटने और दूसरों के दु:ख बँटा लेने की उदार मनोदशा विनिर्मित होने लगे। जीवन साधना इसी आधार पर सधती है। मनुष्य जन्म को सार्थक इन्हीं आधारों को अपनाकर बनाया जा सकता है।     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 6)

👉 प्राणवान् प्रतिभाओं की खोज 🔷 त्रेता में एक ओर रावण का आसुरी आतंक छाया हुआ था, दूसरी ओर रामराज्य वाले सतयुग की वापसी, अपने प्रयास-पुर...