गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 5)

🌹 सभी मानसिक स्फुरणाएं विचार नहीं

🔴 किन्तु मनुष्य की सभी मानसिक तथा बौद्धिक स्फुरणायें विचार ही नहीं होते। उनमें से कुछ विचार और कुछ मनोविकार तथा बौद्धिक विलास भी होता है। दुष्टता, अपराध तथा ईर्ष्या-द्वेष के मनोभाव, विकार तथा मनोरंजन, हास विलास तथा क्रीड़ा आदि की स्फुरणाएं बौद्धिक विलास मानी गई है। केवल मानसिक स्फुरणाएं ही विचारणीय होती हैं, जिनके पीछे किसी सृजन, किसी उपकार अथवा किसी उन्नति की प्रेरणा क्रियाशील रहती है। साधारण तथा सामान्य गतिविधि के संकल्प-विकल्प अथवा मानसिक प्रेरणायें विचार की कोटि में नहीं आती हैं। वे तो मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियां होती हैं, जो मस्तिष्क में निरन्तर आती रहती हैं।

🔵 यों तो सामान्यतया विचारों में कोई विशेष स्थायित्व नहीं होता । वे जल-तरंगों की भांति मानस में उठते और विलीन होते रहते हैं। दिन में न जाने कितने विचार मानव-मस्तिष्क में उठते और मिटते रहते हैं। चेतन होने के कारण मानव मस्तिष्क की यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। विचार वे ही स्थायी बनते हैं, जिनसे मनुष्य का रागात्मक सम्बन्ध हो जाता है। बहुत से विचारों में से एक दो विचार ऐसे होते हैं, जो मनुष्य को सबसे ज्यादा, प्यारे होते हैं। वह उन्हें छोड़ने की बात तो दूर उनको छोड़ने की कल्पना तक नहीं कर सकता। 

🔴 यही नहीं, किसी विचार अथवा विचारों के प्रति मनुष्य रागात्मक झुकाव विचार को न केवल स्थायी अपितु अधिक प्रखर तेजस्वी बना देता है। इन विचारों की छाप मनुष्य के व्यक्तित्व तथा कर्तृत्व पर गहराई के साथ पड़ती है। रागात्मक विचार निरन्तर मथित अथवा चिन्तित होकर इतने दृढ़ और अपरिवर्तनशील हो जाते हैं कि वे मनुष्य के विषय व्यक्तित्व के अभिन्न अंग की भांति दूर से ही झलकने लगते हैं। प्रत्येक विचार जो इस सम्बन्ध में संस्कार बन जाता है, वह उसकी क्रियाओं में अनायास ही अभिव्यक्त होने लगता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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