गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

👉 जगहित आपनि खोरि कराऊँ

🔴 संत रामानुजाचार्य ने श्रीरंगम के संन्यासी यतिराज से दीक्षा लेकर सन्यास आश्रम में प्रवेश किया। गुरुदेव ने उन्हें अष्टाक्षर नारायण मंत्र का उपदेश दिया और कहा वत्स! यह परम पवित्र मंत्र है। इसके निष्ठापूर्वक जप करने से साधु मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

🔵 श्री यतिराज ने चलते समय यह भी कहा तात! यह मंत्र अधिकारी पात्र को ही दिया जाता है। इसका सस्वर उच्चारण मत करना। जिस किसी के कान में पड़ जाता है, वह पापी हो या पुण्यात्मा सभी पवित्र हो जाते हैं।

🔴 गुरुदेव से विदा होकर रामानुजाचार्य अपनी कुटिया में आए पर यह क्या! आज तो उनके मन में कल वाली शांति भी नहीं थी। मस्तिष्क में अंतर्द्वन्द चल रहा था।

🔵 उन्होंने विचार किया सारा संसार पाप की ज्वाला में जल रहा है। भगवान् की सृष्टि मे अमंगल नाम की कोई वस्तु नही है तो भी लोग पाप और बुरे कर्मो के कारण दुःखी हैं, यदि इन्हें पाप से बचाया जाना संभव हो तो क्यों संसार में किसी को कष्ट हो?

🔴 तभी गुरुदेव के वे शब्द याद आए- 'यह मंत्र जिसके कान में पड़ जाता है वही पवित्र हो जाता है।'' फिर यदि ऐसी शक्ति है इस मंत्र में तो उन्होंने उसे सस्वर उच्चारण के लिये मना क्यों किया। सन्यासी को एकमात्र लोकहित की चिंता होती है; फिर यह मंत्र जिसमें लोकहित का सार छुपा है, उसमें बंधन क्यों लगाया गया?

🔵 देर तक विचारमंथन चलता रहा। यदि गुरुदेव की आज्ञा मानता हूँ तो अपने सन्यास धर्म और संसार को पाप से बचाने के कर्तव्य से गिरता हूए अपनी हानि नहीं-पर लोक हानि होती है। यदि गुरुदेव की बात नहीं मानता तो आज्ञा उल्लंघन क पाप लगता है।

🔴 इस मानसिक संघर्ष में नीद नहीं आई। दो तिहाई रात ऐसे ही अंतर्द्वंद्व में बीती। प्रातःकाल होने को आया तो एकाएक रामानुजाचार्य उठे और मकान की छत पर चढ गये और खडे होकर जोर-जोर से-"ऊँ नमो नारायणाय"- "ऊँ नमो नारायणाय" चिल्लाने लगे। आसपास के सभी लोगों की नींद टूट गई। लोग चौंककर जाग बैठे। रामानुजाचार्य मंत्र भी चिल्लाते जाते थे और यह भी समझाते जाते थे- ''भाइयों! जो भी इस मंत्र का निष्ठापूवक जाप करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।'' एकदूसरे शिष्य को भेजकर गुरु यतिराज ने रामानुज को अपने पास बुलाया। रामानुज अपराधी की भाँति गुरुदेव के समीप जा खडे हुए। रात भर नींद न आने के कारण आँखें सूज रही थी।

🔵 नाराज स्वर मे गुरुदेव ने पूछा- रामानुज! तुझसे मना किया था, यह मंत्र किसी के कान मे नही पडना चाहिये, तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन कैसे किया ?

🔴 देव! रामानुजाचार्य ने विनम्र वाणी मैं कहा आपकी आझा का पालन न करने से मुझे महापातक लगेगा, यह मैं जानता हूँ; किन्तु भगवान के इस सुंदर संसार को पापी और दु़ःखी नही देखा जाता। इस मंत्र से सबका उद्धार हो जाए तो क्या बुरा, मुझे जो यातना मिलेगी वह सब सह लूंगा, पर संसार का तो कल्याण हो जाएगा।

🔵 यतिराज शिष्य क्य इस लोकमंगल की निष्ठा से गद्गगद् हो उठे। रामानुज को छाती से लगाकर उन्होंने कहा- "रामानुज! तू ही मेरा सच्चा शिष्य है। तू निश्चित ही एक दिन सारे संसार को प्रकाश देगा।"

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 19, 20

👉 धैर्य से काम

🔶 बात उस समय की है जब महात्मा बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे। 🔷 एक ब...