बुधवार, 13 नवंबर 2019

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृजनात्मक कदम उठाने की सम्भावना बनती है। खेत में कंकड़, पत्थर, झाड़ झंखाड़ जड़ जमाये बैठे हो तो उपयुक्त बीज बोने पर भी फसल न उगेगी। इस प्रसंग में सर्वप्रथम जोतने, उखाड़ने, बीनने और साफ करने का काम हाथ में लेना होगा। पहलवान बनने से पूर्व बीमारियों से छुटकारा पाना आवश्यक है। बर्तन में पानी भरने का प्रयत्न करने से पूर्व उसके छेद बन्द करने चाहिए। उद्यान लगाने वालों को पौधे चर जाने वाले पशुओं और फल कुतरने वाले पक्षियों से रखवाली का प्रबन्ध भी करना होता हैं।

जीवन साधना में सर्वप्रथम यह देखना होता है कि चिन्तन और व्यवहार में अवांछनीयताओं ने कहाँ-कहाँ अपने घोंसले बना रखे हैं। इन मकड़ जंजालों को सफा करना ही चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व रसोईघर की, पात्र-उपकरणों की सफाई आवश्यक होती है अन्यथा गन्दगी घुस पड़ने से खाद्य सामग्री विषैली हो जायेगी और पोषण के स्थान पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगी।

मलीनता साफ करने के उपरान्त ही बात बनती है। प्रातः उठते ही शौच, स्नान, मंजन, कंघी, साबुन, बुहारी का काम निपटाना पड़ता है तब अगली गतिविधियाँ अपनाने का कदम उठता है। जन्मते ही बालक गन्दगी में लिपटा आता है, सर्वप्रथम उस जंजाल से मुक्त कराने की व्यवस्था बनानी पड़नी है, सुन्दर कपड़े पहनाना उसके बाद होता है। त्यौहार मनाने का पहला काम है साफ सफाई। पूजा उपचार का भी प्रथम चरण यही है। प्रगतिशील स्थापनाओं का एक पक्ष दुष्ट दुरभिसंधियों से निपटना भी है अन्यथा अन्धी पीसे कुत्ता खाय वाली उक्ति चरितार्थ होती रहेगी। पानी खींचने से पहले कुँआ खोदना पड़ता है। नींव खोदना पहला और दीवार चुनना दूसरा काम है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 साधना का सत्य

मनुष्य हर तरफ से शास्त्र और शब्दों से घिरा है। लेकिन संसार के सारे शास्त्र एवं शब्द मिलकर भी साधना के बिना अर्थहीन हैं। शास्त्रों और शब्दों से सत्य के बारे में तो जाना जा सकता है, पर इसे पाया नहीं जा सकता। सत्य की अनुभूति का मार्ग तो केवल साधना है। शब्द से सत्ता नहीं आती है। इसका द्वार तो शून्य है। शब्द से निःशब्द में छलांग लगाने का साहस ही साधना है।
  
विचारों से हमेशा दूसरों को जाना जाता है। इससे ‘स्व’ का ज्ञान नहीं होता। क्योंकि ‘स्व’ सभी विचारों से परे और पूर्व है। ‘स्व’ के सत्य को अनुभव करके ही हम परम सत्ता-परमात्मा से जुड़ते हैं। इस परम भाव दशा की अनुभूति विचारों की उलझन और उधेड़-बुन में नहीं निर्विचार में होती है। जहाँ विचारों की सत्ता नहीं है, जहाँ शास्त्र और शब्द की पहुँच नहीं है, वहीं अपने सत्य स्वरूप का बोध होता है, ब्रह्मचेतना की अनुभूति होती है।
  
इस परम भावदशा के पहले सामान्य जीवन क्रम में चेतना के दो रूप प्रकट होते हैंः १. बाह्य मूर्छित - अन्तः मूर्छित, २. बाह्य जाग्रत् - अन्तः जाग्रत् । इनमें से पहला रूप मूर्छा-अचेतना का है। यह जड़ता का है। यह विचार से पहले की स्थिति है। दूसरा रूप अर्धमूर्छा का है, अर्ध चेतना का है। यह जड़ और चेतन के बीच की स्थिति है। यहीं विचार तरंगित होते हैं। चेतना की इस स्थिति में जो साधना करने का साहस करते हैं, उनके लिए साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता है। यह तीसरा रूप अमूर्छा - पूर्ण चेतना का है। यह पूर्ण चैतन्य है, विचारों से परे है।
  
सत्य की इस अनुभूति के लिए मात्र विचारों का अभाव भर काफी नहीं है। क्योंकि विचारों का अभाव तो नशे और इन्द्रिय भोगों की चरम दशा में भी हो जाता है। लेकिन यहाँ जड़ता के सिवा कुछ भी नहीं है। यह स्थिति मूर्छा की है, जो केवल पलायन है, उपलब्धि नहीं। सत्य को पाने के लिए तो साधना करनी होती है। सत्य की साधना से ही साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२३

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Nov 2019

★ कुशलता पूर्वक कार्य करने का नाम ही योग है, कुशल व्यक्ति संसार में सच्ची प्रगति कर सकता है जीवन का सर्वाेच्च लक्ष्य यही है कि मनुष्य प्रत्येक कार्य को विवेक  पूर्वक करे। इससे मन निर्मल रहता है, आत्मा सजग हो जाता है और मस्तिष्क परिष्कृत रहता है। ऐसे विचारशील व्यक्ति को संशय और मोहग्रस्त होकर भटकना नही पड़ता।

◆ अनासक्ति कर्मयोग का यह अर्थ कदापि नहीं है कि व्यस्थ रहकर कुछ भी अच्छा -बुरा किये जाओ ,कोई भी गुण दोष हमारे लिये नहीं आयेगा। अनासक्ति कर्मयोग का केवल यह अर्थ है कि अपने कर्मों के कर्मफल से प्रभावित होकर कर्म गति में व्यवधान अथवा विराम न आने दें जिससे दिन प्रति दिन अपने कर्मों में सुधार करते हुए परमपद की ओर बढ़ते जायें।

□  गृहस्थाश्रम समाज के संगठन मानवीय मूल्यों की स्थापना, समाज निष्ठ, भौतिक विकास के साथ- साथ मनुष्य के आध्यात्मिक- मानसिक विकास का क्षेत्र है। गृहस्थाश्रम ही समाज के व्यवस्थित स्वरूप का मूलाधार है।
 
■  संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिए असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है, लेकिन एक ऐसी भी चीज है, जिसे एक बार खोने के बाद कभी नहीें पाया जा सकता और वह है समय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 5)

Q.7. Why is Gayatri represented as a deity with five faces?

Ans. Descriptions of deities and characters in mythology showing many heads and arms are common and may appear odd and paganish to a person not familiar with the subtleties of Indian spiritual tradition.  Brahma and Vishnu have been described as having four faces,  Shiva with five, Kartikeya with six, Durga with eight and Ganesha with ten heads. It is said that the demon king  Ravana had ten heads and twenty arms; and sahastrabahu, another demon had a thousand hands.

Here, the numbers do not refer to the physiology, but to characteristics of the divine or evil  attributes of the deities or demons as the case may be.

Indian spirituality frequently mentions five-fold classifications - such as the five basic elements of the cosmos (Tatvas); the five sheaths (Koshas) covering the human soul; the five organs each of perception and action in the human body (Gyanendriyas and Karmendriyas), the five life-forces (Prans); the five types of energies operating in human bodies (Agnis); the five types of Yoga ....etc. The Gayatri Mantra, too is divisible in five parts namely (1) Om (2) Bhurbhuwaha Swaha  (3) Tatsaviturvareniyam (4) Bhargo Devasya Dheemahi (5) Dhiyo Yonaha Prachodayat. Each of these corresponds to the five primary emanation of the supreme spirit: Ganesh, Bhawani, Brahma, Vishnu and Mahesh respectively. The entire super-science of spirituality too is encapsuled in the four Vedas and one Yagya.

The five faces of Gayatri refer to these Divine attributes, which the Sadhak has to deal with in course of Sadhana.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 20

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...