सोमवार, 2 मई 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 41) :- एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी

जो शिष्य हैं उनकी समर्पित भावनाओं में तांत्रिक प्रश्र स्वयं ही अपना समाधान पाते जाते हैं। ज्यों- ज्यों प्रश्रों के समाधान होते जाते हैं- त्यों तर्क विलीन हो जाते हैं। तब श्रद्धा का उदय होता है। श्रद्धा तर्क के विलय ही परम भाव दशा है। यहाँ न तो तर्कों का अभाव है और न ही तर्कों की दमन, बल्कि तर्कों की सम्पूर्ण विलीनता है। सघन श्रद्धा में ही नीरवता प्रकट होती है। परम शान्ति अथवा समाधि इसी के अनेकों रूप हैं। भेद शब्दों का है भावों का नहीं। यह सत्य शास्त्र अथवा पण्डित नहीं अनुभवी साधक बताते हैं। श्रद्धा की सम्पूर्णता को समाधि का नाम देना अतिशयोक्ति नहीं अनुभूति है। ईश्वर प्रणिधान की चर्चा करते हुए महिष पतंजलि भी इससे अपनी सांकेतिक सहमति जताते हैं।

इस नीरवता की भावदशा में परम ज्ञान का उदय होता है। यही परम प्रज्ञा के महामंदिर का द्वार है। यहीं साधक का ब्राह्मी चेतना से संवाद होता है। यहीं उसे उसके सद्गुरु का परम ब्रह्म परमेश्वर के रूप में साक्षात्कार होता है। ‘गुरुर्ब्रह्मा, गुरुविष्णु गुरुरेव महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परमब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः’ इस मंत्र के अर्थ की अनुभूति चेतना की इसी अवस्था में होती है। यहीं उससे कहा जाता है कि तुम अब काट चुके अब बोने की तैयारी करो। जिन्दगी के सामन्य क्रियाकलापों में बोने के बाद काटा जाता है। पर यहाँ बड़ी उलटबाँसी है, यहाँ काटने के बाद बोया जाता है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/ek

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 7


लेकिन हाय रे अभागे लोग! जिनको हम केवल कर्मकाण्ड सिखाते रहे और यह सिखाते रहे कि चावल फेंकते रहना, रोली फेंकते रहना, धूप जलाते रहना, फूल चढ़ाते रहना और चंदन चढ़ाते रहना। लेकिन चंदन जैसे सुगंधित जीवन जीने का ख्याल नहीं आया। चंदन हमने सिर पर लगाया था तो जरूर, पर कभी यह ख्याल नहीं आया कि चंदन जैसा जीवन जियें। सारे मस्तक को हम चंदन से लेप लेते हैं, लेकिन यह कभी नहीं सोचते कि तेरी जैसी उपमा, तेरे जैसा जीवन बनाने का शिक्षण हमारे मस्तिष्क को दे।

सुगंध से भरा हुआ चंदन, साँप को छाती से लपेटे रहने वाला चंदन, आस पास उगे हुए छोटे छोटे पौधों को अपने समान बनाने वाला चंदन, घिसे जाने पर भी सुगंध फैलाने वाला चंदन, जलाये जाने पर भी सुगंध देने वाला चंदन, क्या मजाल कि उसे गुस्सा आ जाय। चंदन, हम तो तुम्हें जलायेंगे। जला लो, पर मुझमें तो सुगंध निकलेगी। लेकिन सुगंध न निकली तब? गालियाँ दीं तब? चंदन कहता है कि ऐसा होना बड़ा कठिन है। मैं कैसे गालियाँ दूँगा। गालियाँ मेरे पेट में हैं कहाँ? मेरे पेट में तो केवल सुगंध है। चंदन को हम जलाते रहे, गालियाँ देते रहे और चंदन खुशबू फैलाता रहा। उसको गुस्सा कहाँ आया? उसके मन में क्रोध कहाँ आया? उसके मन में ईर्ष्या कहाँ आई?

मित्रो! ईसा को फाँसी पर चढ़ाया गया। उन्होंने कहा कि ये लोग नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं? हे परमपिता परमात्मा! इन्हें क्षमा करना। ईसामसीह उनके लिए क्षमा की भीख माँगते रहे और उन्हें सूली पर टाँगा जाता रहा। खून टपकता रहा और कीलें गाड़ी जाती रहीं। चंदन जैसे हड्डियों को निचोड़ा जाता रहा। चंदन को भी पत्थर पर घिसा जा रहा था। हमने उस चंदन से पूछा कि तुम्हें दर्द नहीं होता। चंदन ने कहा कि यह तुम्हारा काम है और वह तुमको मुबारक हो।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.2

आत्मचिंतन के क्षण 2 May 2016

सुख-दुःख हमारे अपने ही पैदा किए हुए, हमारी अपनी ही मनोभूमि के परिणाम हैं। हम अपनी मनोभूमि परिष्कृत करें, विचारों को उत्कृष्ट और रचनात्मक बनायें, भावनाएँ शुद्ध करें, इसी शर्त पर जीवन हमें सुख, शान्ति, प्रसन्नता, आनंद प्रदान करेगा, अन्यथा वह सदा असंतुष्ट और रूठा ही बैठा रहेगा और अपने लिए आनंद के द्वार सदैव बंद रखे रहेगा।

शुभ कार्यों में लगने वालों, उन्नति और विकास की ओर बढ़ने वालों के समक्ष एक ही मार्ग है दृढ़ता के साथ अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर गतिशील रहना।  एक बार शुभ लक्ष्य और उत्कृष्ट मार्ग का चुनाव कर फिर उस ओर निरन्तर आगे बढ़ते रहना कर्मवीर के लिए आवश्यक है।

कुछ व्यक्ति कहते हैं कि फिजूलखर्ची समाज कराता है, हम क्या करें? समाज आर्थिक मूल्यों को ही मान्यता देता है। यदि हम बन-ठन कर समाज में दिखावा नहीं करेंगे तो समाज में हमारी कौन पूछ होगी। खरबूजा को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। हम समाज का जैसा रूप देखते हैं, वैसा ही करते हैं-ये तर्क थोथे और सारहीन हैं। फिजूलखर्ची तो एक व्यक्तिगत चीज है। इस गलती का जिम्मेदार व्यक्ति है, समाज नहीं।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

समय नहीं मिलता” कहना छोडें


दुनिया में ऐसा कोई नही जो अपने जीवन में कुछ अच्छा करने की ना सोचता हो या फिर महान बनना ना चाहता हो. लेकिन विडंबना यह है कि हमें उसके लिए वक्त ही नही मिलता. हर दिन हम अपने लिए एक अच्छी रूटीन बनाते है – कि हम आज ऐसा करेंगे, आज उससे मिलेंगे, कुछ नया सीखेंगे या अपने लक्ष्य की तरफ थोड़ा आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे. लेकिन वास्तविकता से आप भी परिचित है, ऐसा कुछ ना कर पाने का हम एक ही बहाना देते है कि ”हमारे पास अभी टाइम ही नही है, फिर कभी कोशिश करेंगे.” यह बात भी हम भली भाती जानते है – हम चाहें आगे बढ़े या ना बढ़े लेकिन समय किसी के लिए नही रुकता. इसलिए सदैव समय का सदुपयोग करें, यह आपके ही हाथ में है.

समय नही मिलता, आपकी इस धारणा को आज हम ऐसे रियल लाइफ कुछ रोचक उदाहरण से दूर करने की कोशिश करेंगे. जिसे पढ़कर आप सच में Inspire होंगे. ये उदाहरण हमें समय की कीमत तो समझाते ही है, साथ में यह भी बताते है कि व्यक्ति चाहें कितना भी व्यस्त क्यों ना हो वह अपने मनपसंद कार्य या लक्ष्य की ओर कैसे आगे बढ़ें.

तो आइये, आपको ऐसे कुछ वास्तविक उदाहरण से रूबरू कराते है –

1. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जब कॉलेज जाते थे तो रास्ते के दुकानदार अपनी घड़ियाँ उन्हें देखकर ठीक करते थे. क्योंकि वे जानते थे कि विद्यासागर समय के बहुत पाबंद थे, वे कभी एक मिनट भी आगे-पीछे नहीं चलते थे।

2. USA के famous Mathematician Charles F ने रोजाना केवल एक घंटा Maths सीखने का नियम बनाया था और उस नियम पर अंत तक डटे रहकर ही उन्होंने Maths में महारथ हासिल कि थी।

3. Gallileo के medical shop होते हुए भी उन्हेंने थोडा-थोडा वक्त बचाकर विज्ञानं के महत्वपूर्ण आविष्कार कर डाले।

4. महात्मा गाँधी दातुन करने से पूर्व शीशे पर गीता का श्लोक चिपका लिया करते थे और दातुन करते समय याद कर लिया करते थे. इस तरह से समय का सदुपयोग करते हुए उन्होंने गीता के 13 अध्याय याद कर लिए।

5. Napolean ऑस्ट्रिया को इसलिए हरा पाया, क्योंकि वहां के सैनिक उसका सामना करने के लिए पाँच मिनट देरी से आये थे।

6. Henry Kirak ने घर से ऑफीस तक पैदल आने-जाने के दौरान समय का सदुपयोग करके Greek सीख ली थी. फौजी डॉक्टर बनने के बाद उनका अधिकांश समय घोड़े की पीठ पर बीतता था. उन्होंने उस समय भी Italian और French भाषा का ज्ञान भी प्राप्त किया।

7. रोज चाय बनाने में जितना समय लगता है, उस दौरान उसमे व्यर्थ न बैठकर लान्गफैले ने इन्फरल ग्रन्थ का अनुवाद कर लिया था।

8. हर घडी उपयोगी कार्य में लगे रहना मोजार्ट ने अपने जीवन का आदर्श बना लिया था. अपने इसी आदर्श पर डटे रहकर उन्होंने रैक्युम नामक फेमस ग्रन्थ को मौत से लड़ते-लड़ते पूरा किया।

आपको यह बहुत ही काल्पनिक लगता होगा पर यह बिल्कुल चौका देने वाले सच है. कोई रोज एक घंटे मात्र पढ़कर एक्सपर्ट बन गया, तो किसी ने पैदल चलने के समय का भी सदुपयोग किया, तो किसी ने चाय बनने के समय का भी उपयोग किया, कोई पाँच मिनट की देरी से हार जाता है, तो कोई ऐसे है कि लोग अपनी घड़ी से ज्यादा उनके समय की पाबंदी पर भरोसा करते थे और कोई ऐसे भी है जो मौत से लड़ते-लड़ते भी ग्रंथ लिख दिया.

जब यह लोग उसी 24 घंटे के समय में इतना कुछ कर सकते हैं तो अब यह प्रश्न उठता है कि आखिर हमारा समय बर्बाद कहां हो रहा है?
 
यकीन मानिए, हमें हमारे लक्ष्य को हासिल करने के लिए जीतने समय कि आवश्यकता है, उससे कहीं ज्यादा समय हमारे पास होता है. बस जरुरत है उस अमूल्य समय को बर्बाद होने से बचाने की. हमेशा इस बात का स्मरण रखे ”समय का सदुपयोग आपके ही हाथ में है!”

यह प्रचलित कहावत तो आपने कई बार सुनी होगी – ”काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में परले होइगी, बहुरि करेगा कब।”

अब समय है उपरोक्त कथन को जीवन में उतारने का.

आपको इन Examples में से जो भी प्रेरणादायक लगे उन्हें चुनकर एक स्लिप पर लिख लें और ऐसी जगह पर चिपका दें, जहाँ आपकी नजर बड़ी आसानी से जा सके, जिससे आप रोज इन्हे पढ़कर Inspire हो सकें. आप चाहें कितने भी Time Management टिप्स पढ़ लें. लेकिन आपको सबसे पहले स्वयं की आदत में बदलाव लाना होगा और वो है किसी काम को टालने की आदत. याद रखिये, किसी काम को समय पर करना उतना तकलीफ नहीं देता जितना उसको टालना. बस इस Tip को फॉलो करते ही आप बन जायेंगे एक Smart Time Manager।

हम मानते है, आप पहले भी समय का सही सदुपयोग करने का अथक प्रयास कर चुके होंगे और सफल भी हुए होंगे. लेकिन जो सफल नही हुए उनके पास हमेशा एक और मौका होता है. इस लिए सुबह उठते ही 10 से 15 मिनट में आप पुरे दिन का एक Time-Table बना लीजिए. अक्सर हम उत्साह में आकर Time-Table को बहुत ही कठिन बना लेते हैं. जिसे हम बहुत लंबे समय तक फॉलो नही कर पाते और अपने लक्ष्य से भटक जाते है. इसलिए हमेशा Time-Table साधारण ही बनाना चाहिए, ताकि आप इसमें Successful होकर खुद को Self-Motivate कर सकें।

दोस्तों, ब्रूस ली ने समय की कीमत को समझते हुए कहा है – ”अगर आप अपनी ज़िन्दगी से प्यार करते हैं तो वक़्त बर्वाद ना करें, क्योंकि वो वक़्त ही है जिससे ज़िन्दगी बनी होती है।”

तो चलिए, एक बार फिर समय के महत्त्व को महत्त्व देते हैं, और ”समय नही मिलता” कहना छोड़ कर उन चीजों के लिए वक़्त निकाले जो सचमुच में ज़रूरी है।

हम हर पल यह प्रयास करते है कि कुछ ऐसे लेख आपको दे जिससे आपको भी अपने जीवन में प्रेरणा मिलें और आप भी आगे बढ़े. आप अपने विचार कॉमेंट के द्वारा शेयर करें. आशा करते है यह लेख आपकी ज़रूर मदद करेगा. आपको यह लेख कैसा लगा? ज़रूर बताएं. आपकी प्रतिक्रिया हमारा उत्साह बढ़ाती है, हमें और भी बेहतर होने में मदद व प्रेरणा देती है।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...