सोमवार, 20 नवंबर 2017

👉 अनोखा फैसला

🔷 एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था... कि इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी

🔶 साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया..... शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था.... साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते....

🔷 साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था..... कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी...

🔶 साधु ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की..... फिर आगे चल दिया..... साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था.......

🔷 वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहें है ...... एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी..... बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये.....

🔶 उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई..... इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो से पकड़ कर कहने लगा अंधा है...... तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं.....

🔷 साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था.... जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था..... महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा.... लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई.....

🔶 राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ.... लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा.....

🔷 युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया.. बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़....

🔶 लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है........यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया.... दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया.....

🔷 थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए......वह अपने घर पहुंच गए थे.... वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था....

🔶 बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा.... महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके.....

🔷 लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है....

🔶 अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है..... कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा कि आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे......

🔷 भगवान के भक्त मे रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता ....आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें..... साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया....

🔶 अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया?

🔷 तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा..... हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ

🔶 साधु ने अगला सवाल किया.....मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था? युवा बोला..... नहीं.... लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे

🔷 मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा.. फिर युवक ने मुझे क्यों मारा? युवा कहने लगा...... क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे..... इसलिए उस युवक ने आपको मारा....

🔶 युवा बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया..... तो भगवान की क़सम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है....

🔷 अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और... वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है ....

🔶 उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नही और आवाज भी नही करती लेकिन पडती हैं तों बहुत दर्द देंती हैं।

🔷 हमारें कर्म ही हमें उसकी लाठ़ी से बचातें हैं बस़ कर्म अच्छें होंने चाहीये.....

👉 आज का सद्चिंतन 21 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Nov 2017


👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

🔶 बुद्धिमान व्यक्ति अपने लाभ और हित के लिये हर बात के अच्छे-बुरे दो पहलूओं में से केवल गुण पक्ष पर ही दृष्टि डालता है। क्योंकि वह जानता है, कि विपक्ष पर ध्यान देने, उसको ही देखते रहने से मन को अशाँति के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा, दोष-दृष्टि रखने और दोषान्वेषक करने से घृणा तथा द्वेष का ही प्रादुर्भाव होता है, जिसका परिणाम कलह-क्लेश अथवा अशाँति असन्तोष के सिवाय और कुछ नहीं होता। इससे वस्तु अथवा व्यक्ति की तो कुछ हानि होती नहीं अपना हृदय कलुषित और कलंकित होकर रह जाता है।

🔷 अपने दृष्टि-दोष के कारण प्रायः अच्छी चीजें भी बुरी और गुण भी अवगुण होकर हानिकारक बन जाते हैं। जैसे स्वाँति-जल का ही उदाहरण ले लीजिये। स्वाँति की बूँद जब सीप के मुख में पड़ जाती है, तब मोती बन कर फलीभूत होती है और यदि वही बूँद साँप के मुख में पड़ जाती है तो विष का रूप धारण कर लेती हैं। वस्तु एक ही है किन्तु वह उपयोग और संपर्क के गुण दोष के कारण सर्वथा विपरीत परिणाम में फलीभूत हुई।

🔶 किसी में गुण की कल्पना न कर सकने के कारण दोषदर्शी अविश्वासी भी होता है। वह किसी की सद्भावना एवं सहानुभूति में भी कान खड़े करने लगता है। प्रेम एवं प्रशंसा में भी स्वार्थपूर्ण चाटुकारिता का दोष देखता है। इसलिये संपर्क में आने और स्नेहपूर्ण बरताव करने वाले हर व्यक्ति से भयाकुल और शंकाकुल रहा करता है। उसे विश्वास ही नहीं होता कि संसार में कोई निःस्वार्थ और निर्दोष-भाव से मिल कर हितकारी सिद्ध हो सकता है। विश्वास, आस्था, श्रद्धा, सराहना से रहित व्यक्ति का खिन्न असंतुष्ट और व्यग्र रहना स्वाभाविक ही है, जैसा कि दोष-दर्शी रहता भी है।

🔷 यदि आपको अपने अन्दर इस प्रकार की दुर्बलता दिखी हो तो तुरन्त ही उसे निकालने के लिए और उसके स्थान पर गुण-ग्राहकता का गुण विकसित कीजिये। इस दशा में आपको हर व्यक्ति, वस्तु और वातावरण में आनंद, प्रशंसा अथवा विनोद की कुछ-न-कुछ सामग्री मिल ही जायेगी। दूसरों के गुण-दोषों में से उस हंस की तरह केवल गुण ही ग्रहण कर सकेंगे, जोकि पानी मिले हुए दूध में से केवल दूध-दूध ही ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है।

🔶 दूसरों की अच्छाइयों को खोजने, उनको देख-देख प्रसन्न होने और उनकी सराहना करने का स्वभाव यदि अपने अन्दर विकसित कर लिया जाये तो आज दोष-दर्शन के कारण जो संसार, जो वस्तु और जो व्यक्ति हमें काँटे की तरह चुभते हैं, वे फूल की तरह प्यारे लगने लगें। जिस दिन यह दुनिया हमें प्यारी लगने लगेगी, इसमें दोष, दुर्गुण कम दिखाई देंगे, उस दिन हमारे हृदय से द्वेष एवं घृणा का भाव निकल जायेगा और हमें हर दिशा और हर वातावरण में प्रसन्नता ही आने लगेगी। दुःख, क्लेश और क्षोभ, रोष का कोई कारण ही शेष न रह जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 24

👉 आत्मचिंतन के क्षण 21 Nov 2017

🔶 जो दूसरों को कष्ट में देखकर दया से द्रवित हो जाता है, जो असहायों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहता है, जो संसार के सुख में अपना सुख अनुभव करता है, दूसरों को हानि पहुँचाने की जिसे कभी इच्छा नहीं होती, जिसे पर स्त्री माता के तुल्य है, इन्द्रियों को जो मर्यादा से बाहर नहीं जाने देता, चुगली, निन्दा, ईर्ष्या, एवं कुढ़न से जो दूर रहता है, संयम जिसका व्रत है, प्रेम करना जिसका स्वभाव है, मधुरता जिसके होठों से टपकती है, स्नेह एवं सज्जनता से जिसकी आँखें भरी रहती हैं, जिसके मन में केवल सद्भाव ही निवास करते हैं, ऐसे पवित्र आत्मा व्यक्ति इस लोक के देवता हैं।    

🔷 हर मनुष्य में अपने प्रति पक्षपात करने की दुर्बलता पाई जाती है। आँखें बाहर को देखती हैं, भीतर का कुछ पता नहीं। कान बाहर के शब्द सुनते हैं, अपने हृदय और फेफडों से कितना अनवरत ध्वनि प्रवाह गुंजित होता है, उसे सुन ही नहीं पाते। इसी प्रकार दूसरों के गुण-अवगुण देखने में रुचि भी रहती है और प्रवीणता भी, पर ऐसा अवसर कदाचित ही आता है जब अपने दोषों को निष्पक्ष रूप से देखा और स्वीकारा जा सके। आमतौर से अपने गुण ही गुण दीखते हैं, दोष तो एक भी नजर नहीं आता। कोई दूसरा बताता है तो वह शत्रुवत् प्रतीत होता है। आत्म समीक्षा कोई कब करता है। वस्तुतः दोष दुर्गुणों के सुधर के लिए अपने आपसे संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं।

🔶 जीवन ताश के खेल की तरह है। हमने खेल का आविष्कार नहीं किया है और न ताश के पत्तों के नमूने ही हमने बनाये हैं। हमने इस खेल के नियम भी खुद नहीं बनाये और न हम ताश के पत्तों के बँटवारे पर ही नियंत्रण रख सकते हैं। पत्ते हमें बाँट दिये जाते हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। इस सीमा तक नियतिवाद का शासन है। परन्तु हम खेल को बढ़िया ढंग से या खराब ढंग से खेल सकते हैं। हो सकता है कि किसी कुशल खिलाड़ी के पास खराब पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल में जीत जाये। यह भी संभव है कि किसी खराब खिलाड़ी के पास अच्छे पत्ते आये हों और फिर भी वह खेल का नाश करके रख दे। हमारा जीवन परवशता और स्वतंत्रता, दैवयोग और चुनाव का मिश्रण है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 What is Love?

🔶 To love is to find happiness in making others happy. It is to understand what others think and feel and need. It is to say and do the things that make them eager to be with us and to do these things not in hope of gaining some good, but because doing them is natural for us.

🔷 It is to know their weaknesses yet see them as strong and, because of our high vision and our unfailing faith, to inspire them to be stronger than they are while inspiring us to be stronger too.

🔶 It is to accept others as they are and, if they should fail our aspirations for them or spurn our outstretched hands, to keep open the “door” of our hearts.

🔷 It is to appreciate the importance of others and to help them appreciate their own importance.

🔶 It is to grow into the hearts of others and to become a part of their lives yet not bind their hearts nor limit their lives.

🔷 It is to loose ourselves in something greater, as a small spark loses itself in other sparks and becomes a star.

🔶 Love is like the Sun. It gives out of its own substance and its own self and, by giving itself, becomes a source of life and light.

✍🏻 James Dillet Freeman

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 4)

🔶 सुकरात ने अपने समय में अपने समाज को एक ही दिशा देना शुरू किया, जिसका ताम था ‘दर्शन’। विचार नहीं। विचार तो अखबारों में, गन्दी किताबों में रोज छपते रहते हैं। कितना भ्रामक अज्ञान फैलाने वाले अख़बार रोज निकलते रहते हैं। इनकी बाबत मैं आपसे नहीं कहता। मैं आपसे कहता हूँ—‘दर्शन’ की बाबत। सुकरात का दर्शन जिन दिनों पैदा होने लगा और विद्यार्थियों को पढ़ाया जाने लगा तो हुकूमत काँप उठी। हुकुम दिया गया कि यह आदमी बागी है। इस आदमी को जहर पिला देना चाहिए। डाकू-चोर एक या दो पूरे समाज को हिलाकर रख देता है। दार्शनिक दुनिया को उलट-पलट देता है। ईसा सन्त थे, नहीं दार्शनिक थे।
             
🔷 सन्त तो समाज में ढेर सारे हैं, जो एक पाँव पर खड़े रहते हैं, पानी नहीं पीते, दूध नहीं पीते। बाबाजी की बात नहीं कह रहा मैं। ईसा कौन थे? दार्शनिक थे। उन्होंने अपने समय को बदलने वाला दर्शन दिया था। दर्शन वह, जो आदमी के अन्तरंग को छूने वाला दर्शन जब कभी आता है तो गजब करके रख देता है। लेखक भी, कवि भी ढेर सारे हैं, मालदार आदमी बहुत हुए हैं परन्तु दार्शनिक जब भी कभी हुए हैं तो मजा आ गया है। गजब हो गया हैं, समाज को हिला दिया गया है।
 
🔶 कुछ हवाले दूँ आपको। रूसो नाम का एक दार्शनिक हुआ है, जिसने सबसे पहले एक विचार दिया, अन्तरंग को छूने वाला, आदमी के मस्तिष्क को छूने वाला, समाज की व्यवस्था पर असर डालने वाला। दर्शन दिया रूसो ने जिसे डेमोक्रेसी नाम दिया गया। डेमोक्रेसी के बारे में मजाक उड़ाया गया था। जिन दिनों यह दर्शन प्रस्तुत किया गया, कहा गया कि यह पागलों की बातें हैं। लेकिन पागलों की बात आप देखते हैं? सारी दुनिया में घुमा-फिरा के डेमोक्रेसी आ गई है। यह विचार एक दार्शनिक ने दिया था और उसने सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया और हवाले दूँ आपको। एक नाम है नीत्से। उसका वह हिस्सा तो नहीं बताऊँगा जिसमें उसने यह कहा था कि खुदा खत्म हो गया, खुदा को हमने जमीन में गाड़ दिया पर यह वह आदमी था जिसने कहा था कि आदमी को सुपरमैन बनना चाहिए।

🔷 आदमी को गई-गुजरी स्थिति में नहीं रहना चाहिए। अपने आपका विकसित करना चाहिए और दूसरों को ऊँचा उठाने की अपनी सामर्थ्य एकत्रित करनी चाहिए। यह किसकी फिलॉसफी है? नीत्से की। आपको मैं इतिहास इसीलिए बता रहा हूँ कि आप समझें कि दर्शन कितनी जबर्दस्त चीज है? दर्शन उस चीज का नाम है जो कौमों को बदलकर रख देता है, बिरादरियों को, मुल्कों को, परिस्थितियों को बदल देता है। दर्शन बड़े शानदार होते हैं। वे भले हों अथवा बुरे हों, कितनी ताकत होती है उनमें, यह आपको जानना चाहिए। मैं आपको अपने जीवन की एक घटना सुना दूँ दर्शन की बाबत।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 उदारता और कठोरता

🔷 दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार केवल वे कर सकते है जो अपने प्रति कठोर होते है। जो अपने साथ रियायत चाहते है उन्हें दूसरों के साथ कठोर बनना पड़ता है। तराजू का एक पलड़ा ही झुक सकता है और वह भी तब, जब दूसरा ऊपर उठता है। यदि मनुष्य अपने लिए अधिक सुविधायें चाहेगा तो स्वभावतः उसे दूसरों की उपेक्षा करनी पड़ेगी दूसरों के प्रति जितनी अधिक ममता और करुणा होगी उतनी ही अपनी जरूरतें घटाकर, अपनी सुविधाएँ हटा कर उन्हें जरूरतमन्दों के लिए लगाने का भाव जागेगा उदार हृदय व्यक्ति अन्ततः बिल्कुल खाली हाथ और निरन्तर सेवा परायण हो जाता है। इसलिए उसकी महानता है।

🔶 जब तक आक्रमण की, प्रतिहिंसा की, बदला लेने की या किसी को चोट पहुँचाकर सन्तुष्ट होने की इच्छा जीवित है तब तक हमारे अन्दर असुरता एवं दुष्टता विद्यमान है यह मानना होगा। जब इस दिशा में उत्पन्न होने वाला उत्साह उपेक्षा में बदलने लगे तो समझना चाहिये वह दुष्टता शांत होती जाती है। जब दूसरों की भूलों के प्रति क्षमा का, दूसरों के प्रति करुणा का, और दूसरों के अभावों के प्रति सहानुभूति का भाव उदय होने लगे तो समझना चाहिए कि मानवता विकसित हो रही है। यह विकास इस सीमा तक पहुँच जाय कि हानि पहुँचाने और शत्रुता रखने वालों को भी सुख पहुँचाने का प्रयत्न किया जाय तो समझना चाहिए कि साधुता प्रकट होने लगी।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 गुड़िया

🔷 मैं एक दुकान में खरीददारी कर रहा था, तभी मैंने उस दुकान के कैशियर को एक 5-6 साल की लड़की से बात करते हुए देखा।

🔶 कैशियर बोला :~ "माफ़ करना बेटी, लेकिन इस गुड़िया को खरीदने के लिए तुम्हारे पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं।" फिर उस छोटी सी लड़की ने मेरी ओर मुड़ कर मुझसे पूछा:~ "अंकल, क्या आपको भी यही लगता है कि मेरे पास पूरे पैसे नहीं हैं?''

🔷 मैंने उसके पैसे गिने और उससे कहा:~ "हाँ बेटे, यह सच है कि तुम्हारे पास इस गुड़िया को खरीदने के लिए पूरे पैसे नहीं हैं"।

🔶 वह नन्ही सी लड़की अभी भी अपने हाथों में गुड़िया थामे हुए खड़ी थी। मुझसे रहा नहीं गया। इसके बाद मैंने उसके पास जाकर उससे पूछा कि यह गुड़िया वह किसे
देना चाहती है?

🔷 इस पर उसने उत्तर दिया कि यह वो गुड़िया है, जो उसकी बहन को बहुत प्यारी है। और वह इसे, उसके जन्मदिन के लिए उपहार में देना चाहती है।

🔶 बच्ची ने कहा यह गुड़िया पहले मुझे मेरी मम्मी को देना है, जो कि बाद में मम्मी जाकर मेरी बहन को दे देंगी"।

🔷 यह कहते-कहते उसकी आँखें नम हो आईं थी मेरी बहन भगवान के घर गयी है...

🔶 और मेरे पापा कहते हैं कि मेरी मम्मी भी जल्दी-ही भगवान से मिलने जाने वाली हैं। तो, मैंने सोचा कि क्यों ना वो इस गुड़िया को अपने साथ ले जाकर, मेरी बहन को दे दें...।"

🔷 मेरा दिल धक्क-सा रह गया था। उसने ये सारी बातें एक साँस में ही कह डालीं और फिर मेरी ओर देखकर बोली - "मैंने पापा से कह दिया है कि मम्मी से कहना कि वो अभी ना जाएँ।

🔶 वो मेरा, दुकान से लौटने तक का इंतजार करें।

🔷 फिर उसने मुझे एक बहुत प्यारा- सा फोटो दिखाया जिसमें वह खिलखिला कर हँस रही थी।

🔶 इसके बाद उसने मुझसे कहा:~ "मैं चाहती हूँ कि मेरी मम्मी, मेरी यह फोटो भी अपने साथ ले जायें, ताकि मेरी बहन मुझे भूल नहीं पाए।

🔷 मैं अपनी मम्मी से बहुत प्यार करती हूँ और मुझे नहीं लगता कि वो मुझे ऐसे छोड़ने के लिए राजी होंगी, पर पापा कहते हैं कि मम्मी को मेरी छोटी बहन के साथ रहने के लिए जाना ही पड़ेगा क्योंकि वो बहुत छोटी है, मुझसे भी छोटी है। उसने धीमी आवाज मैं बोला।

🔶 इसके बाद फिर से उसने उस गुड़िया को ग़मगीन आँखों-से खामोशी-से देखा।

🔷 मेरे हाथ जल्दी से अपने बटुए ( पर्स ) तक पहुँचे और मैंने उससे कहा:~

🔶 "चलो एक बार और गिनती करके देखते हैं कि तुम्हारे पास गुड़िया के लिए पर्याप्त पैसे हैं या नहीं?''

🔷 उसने कहा-:"ठीक है। पर मुझे लगता है शायद मेरे पास पूरे पैसे हैं"।

🔶 इसके बाद मैंने उससे नजरें बचाकर कुछ पैसे उसमें जोड़ दिए और फिर हमने उन्हें गिनना शुरू किया।

🔷 ये पैसे उसकी गुड़िया के लिए काफी थे यही नहीं, कुछ पैसे अतिरिक्त बच भी गए थे।

🔶 नन्ही-सी लड़की ने कहा:~ "भगवान का लाख-लाख शुक्र है मुझे इतने सारे पैसे देने के लिए!

🔷 फिर उसने मेरी ओर देख कर कहा कि मैंने कल रात सोने से पहले भगवान् से प्रार्थना की थी कि मुझे इस गुड़िया को खरीदने के लिए पैसे दे देना, ताकि मम्मी इसे
मेरी बहन को दे सकें। और भगवान् ने मेरी बात सुन ली।

🔶 इसके अलावा मुझे मम्मी के लिए एक सफ़ेद गुलाब खरीदने के लिए भी पैसे चाहिए थे, पर मैं भगवान से इतने ज्यादा पैसे मांगने की हिम्मत नहीं कर पायी थी पर भगवान् ने तो मुझे इतने पैसे दे दिए हैं कि अब मैं गुड़िया के साथ-साथ एक सफ़ेद गुलाब भी खरीद सकती हूँ ! मेरी मम्मी को सफेद गुलाब बहुत पसंद हैं|

🔷 "फिर हम वहा से निकल गए। मैं अपने दिमाग से उस छोटी- सी लड़की को निकाल नहीं पा रहा था।

🔶 फिर, मुझे दो दिन पहले स्थानीय समाचार पत्र में छपी एक घटना याद आ गयी जिसमें एक शराबी ट्रक ड्राईवर के बारे में लिखा था।

🔷 जिसने नशे की हालत में मोबाईल फोन पर बात करते हुए एक कार-चालक महिला की कार को टक्कर मार दी थी, जिसमें उसकी 3 साल की बेटी की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गयी थी और वह महिला कोमा में चली गयी थी। अब एक महत्वपूर्ण निर्णय उस परिवार को ये लेना था कि, उस महिला को जीवन रक्षक मशीन पर बनाए रखना है अथवा नहीं?

🔶 क्योंकि वह कोमा से बाहर आकर, स्वस्थ हो सकने की अवस्था में नहीं थी। दोनों पैर, एक हाथ,आधा चेहरा कट चुका था। आॅखें जा चुकी थी। "क्या वह परिवार इसी छोटी-
लड़की का ही था?"

🔷 मेरा मन रोम-रोम काँप उठा। मेरी उस नन्ही लड़की के साथ हुई मुलाक़ात के 2 दिनों बाद मैंने अखबार में पढ़ा कि उस महिला को बचाया नहीं जा सका, मैं अपने आप को रोक नहीं सका और अखबार में दिए पते पर जा पहुँचा, जहाँ उस महिला को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था वह महिला श्वेत धवल कपड़ों में थी- अपने हाथ में एक सफ़ेद गुलाब और उस छोटी-सी लड़की का वही हॅसता हुआ फोटो लिए हुए और उसके सीने पर रखी हुई थी वही गुड़िया।

🔶 मेरी आँखे नम हो गयी। दुकान में मिली बच्ची और सामने मृत ये महिला से मेरा तो कोई वास्ता नही था लेकिन हूं तो इंसान ही। ये सब देखने के बाद अपने आप को सभांलना एक बडी चुनौती थी मैं नम आँखें लेकर वहाँ से लौटा।

🔷 उस नन्ही-सी लड़की का अपनी माँ और उसकी बहन के लिए जो बेपनाह अगाध प्यार था, वह शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

🔶 और ऐसे में, एक शराबी चालक ने अपनी घोर लापरवाही से क्षण-भर में उस लड़की से उसका सब कुछ छीन लिया था....!!!

🔷 ये दुख रोज कितने परिवारों की सच्चाई बनता है हमें पता नहीं!!!!  शायद ये मार्मिक घटना सिर्फ एक पैग़ाम देना चाहती है कि:::::::::::::

🔶 कृपया~ कभी भी शराब पीकर और मोबाइल पर बात करते समय वाहन ना चलायें क्यूँकि आपका आनन्द किसी के लिए श्राप साबित हो सकता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 20 Nov 2017


👉 आज का सद्चिंतन 20 Nov 2017


👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 4)

🔶 किसी मित्र सम्बन्धी अथवा आत्मीयजन ने मानिये जन्म-दिन अथवा किसी अन्य शुभ अवसर पर अपनी योग्यता एवं समाज के अनुसार कोई उपहार दिया अथवा भेजा। कोई भी व्यक्ति इस सम्मान और स्नेह से पुलकित हो उठता और आभार भरा धन्यवाद देते-देते न अघाता। किन्तु दोषदर्शी तो अपने रोग से मजबूर ही रहता है। यद्यपि वह आभार एवं धन्यवाद न प्रकट करने की असभ्यता नहीं करता तथापि और कुछ नहीं उसमें इतना ही शामिल कर देता कि आपने बेकार यह चीज भेजी। यह तो मेरे पास पहले से ही थी और मुझे ऐसा रंग यह डिजाइन पसन्द नहीं है। यह रंग और प्रकार उपहार के रूप में बहुत आम और सस्ते हो गये हैं। इससे अच्छा यह होता कि आप सद्भावना और बधाई के ही दो शब्द दे देते। बात भले ही सही रही हो। किन्तु इस भावना ने, इस दोष-दृष्टि ने उसको स्वयं तो प्रसन्न नहीं ही होने दिया साथ ही अपने मित्र और स्वजन की प्रसन्नता भी छीन ली।

🔷 यही बात नहीं कि दोष-दृष्टा केवल दूसरों में ही बुराई और कमियाँ देखता हो। स्वयं अपने प्रति भी उसका यही अत्याचार रहा करता है। उदाहरण के लिये वह बाजार से अपने लिये कोई वस्तु खरीदने जाती है। पहले तो वह कितनी ही प्रकार की चीजें क्यों न दिखलाई जायें, उसे पसन्द ही नहीं आती, सबमें कोई-न-कोई दोष दिखलाई देता है। वस्तु के निर्दोष होने पर भी वह अपनी और से किसी दोष का आरोपण कर ही लेगा। अपनी इस प्रक्रिया से थक जाने के बाद जब चीज लेकर घर आता है। तब भी उसका पेट अप्रशंसा से भरा नहीं होता। चीज डाली और कहना आरम्भ कर दिया- ‘‘खरीदने को खरीद तो अवश्य लाया लेकिन कुछ पसन्द नहीं आई। यदि पत्नी इस बात को नहीं मानती और चुनाव की प्रशंसा करती है, तो झूठी प्रशंसा का करने का आरोप पाती है। जब तक वह अपनी पसन्द, बाजारदारी, चीज की पहचान के विषय में आलोचना नहीं कर लेता, बुराई नहीं निकाल लेता, अपनी अकल और अनुभव को कोस नहीं लेता चैन नहीं पड़ता। इस प्रकार वह इस प्रसन्नता के छोटे अवसर को भी खिन्नता से कडुआ बना ही लेता है।

🔶 तात्पर्य यह है कि दोष-दर्शी कितने ही सुन्दर स्थान, वस्तु और व्यक्ति के संपर्क में क्यों न आये अपने अवगुण के प्रभाव से उससे मिलने वाले आनन्द से वंचित ही रहता है। निदान इस लम्बे-चौड़े संसार में उसे न तो कहीं आनन्द दीखता है और न किसी वस्तु में सामंजस्य का सुख प्राप्त होता है। उसे हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण अपनी रुचि के साथ असमंजस उत्पन्न करती ही दीखती है। जबकि गुण-ग्राहक हर व्यक्ति, हर वस्तु और हर वातावरण में सामंजस्य और सुन्दरता ही खोज निकालता है। यही कारण है कि गुण-ग्राहक सदैव प्रसन्न और दोषान्वेषक सदा खिन्न बना रहता है।

🔷 वस्तुतः बात यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु गुण-दोषमय ही है। कोई भी वस्तु एवं व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता कि जिसमें या तो गुण-ही-गुण भरे हों अथवा दोष-ही-दोष। अपनी दृष्टि के अनुसार हर व्यक्ति उसमें गुण या दोष देख कर प्रसन्न अथवा खिन्न हुआ करता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, मई 1968, पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1968/May/v1.23

http://literature.awgp.org

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 Nov 2017

🔶 यदि हम क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ आदि असंगत मानसिक दोषों के शिकार होते हुए भी उन्नति पूर्ण स्वस्थ जीवन की कल्पना करते हैं तो यह असम्भव बात का स्वप्र देखना मात्र है। यदि हम वास्तव में अपने जीवन को सुखी एवं उन्नतिशील देखना चाहते हैं तो क्रोध, चिन्ता, ईर्ष्या आदि कुविचारों को घटाने और हटाने के लिए प्रयत्न करना होगा।        

🔷 गलती करना बुरा नहीं है; बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। संसार के महान् पुरुषों ने अनेक प्रकार की गलतियाँ की हैं। रावण जैसा विद्वान् अपने दुष्कृत्यों से राक्षस जैसा बन गया। वाल्मीकि डकैत रहे हैं। सुर, तुलसी, कबीर, मीरा, रसखान आदि सांसारिक जीवन में गलती करते रहे थे, लेकिन इन्होंने गलती को सुधारा और आगे बढ़कर महापुरुष बने। स्मरण रखिए कि एक गलती को सुधारकर आप किसी न किसी क्षेत्र में आगे बढ़ जाते हैं।  

🔶 इस संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्यांकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्यांकन करता है उससे अधिक सफलता उसे कदापित नहीं मिल पाती। प्रत्येक व्यक्ति जो आगे बढ़ने की आकांक्षा रखते हैं, उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त सम्भावनाओं के बीज डाल दिये हैं। इतना ही नहीं, उसके अस्तित्व में सभी सम्भावनाओं के बीज डालने के साथ-साथ उनके अंकुरित होने की क्षमताएँ भी भर दी है। लेकिन प्रायः देखने में यह आता है कि अधिकांश व्यक्ति अपने प्रति ही अविश्वास से भरे होते हैं तथा उन क्षमताओं और सम्भावनाओं के बीजों को विकसित तथा अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही, उनके सम्बन्ध में विचार तक नहीं करना चाहते।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 3)

🔶 आज आदमी की सभ्यता सिर्फ एक है। उसका नाम है दर्शन की भ्रष्टता। उसके पास चीजों की कमी नहीं है। आदमी के पास जरूरत से ज्यादा चीजें हैं, पर मुझे ये लगता है कि आदमी इनको खा भी सकेगा कि नहीं, हजम भी कर सकेगा कि नहीं। आदमी का दर्शन घिनौना हो जाने की वजह से इतनी ज्यादा चीजें होते हुए भी मालूम पड़ता है कि बहुत कम है। गरीबी उसके ऊपर हावी हो गई है। परिस्थितियाँ, दरिद्रता, मुसीबतें उसके दर्शन के कारण उस पर हावी हो गई हैं। दर्शन सारे व्यक्तियों का, सारे समाज का, सारे विश्व का भ्रष्ट होता चला गया है और आदमी दुष्ट होता चला गया है। दुष्टों को पकड़ना, रोकना व मारकर ठीक करना चाहिए। मच्छरों को मारना चाहिए पर एक-एक मच्छर को मारने के पहले उस गन्दगी से निपटना चाहिए जो मच्छर पैदा करती है।
            
🔷 हम मच्छर-मक्खी पर नहीं सकते। हम समस्याओं को कैसे मार पाएँगे? समस्याएँ आदमी के सड़े हुए दिमाग में से पैदा होती हैं, सड़े हुए दिल से पैदा होती हैं। पैसे वाले बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं कि हम गृह-उद्योग बढ़ाएँगे, नहरें खोदेंगे, बाँध बनाएँगे, ये सब ठीक है। आदमी को साक्षर बनाएँगे, हर आदमी को मालदार बनाएँगे। कोई कहता है कि आदमी को पहलवान बनाएँगे, पर इतना सब करने के बाद फिर होगा क्या? जरा विश्लेषण, पोस्टमार्टम करके देखिए कि इस सबके बावजूद विचारों की, दर्शन की भ्रष्टता यदि बनी रही तो वह करता क्या है? वह खुद जलता है, दूसरों को जलाता है। दियासलाई अपने आपको जला के खत्म कर देती है, दूसरों को जला देती है। आज हमारी आपकी जिन्दगियाँ दियासलाई के तरीके से जल रहीं हैं और अनेक को जला रही हैं।
 
🔶 आपने ब्याह कर लिया। बीबी आ गई। हाँ तो ठीक है, अब आप क्या करेंगे उसको जला दीजिए। नहीं साहब बीबी तो बहुत अच्छी मालूम पड़ती है। इसलिए तो कहते हैं कि फुलझड़ी बहुत अच्छी मालूम पड़ती तो आप दियासलाई लेकर के खत्म क्यों नहीं करते? हर चीज को आदमी आज जला रहा है। जिन्दगी को जला रहा है, समाज को जला रहा है। देश को जला रहा है, बच्चों को जला रहा है। भाइयो! आज सारा समाज जिस तरीके से भ्रष्ट-चिन्तन व दुष्ट आचरण करता चला जा रहा है इस सबका मूल कहीं खोजना हो तो एक ही जगह है, वह है आदमी के सोचने व ऊँचा उठाने वाली शैली, तरीका, विद्या जिसे ‘दर्शन’ कहते हैं।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Misers are Unfit for God's Kindness

🔶 This is a story of the times when saint Chedember was famous for granting wishes. One day a woman approached him to bless her with a son. The saint gave him some roasted peanuts and said, "You have come from very far. Have some peanuts and rest in the courtyard. The woman started eating the peanuts. Little children, who were playing there, looked at her and wanted some peanuts too. But, she turned her face away and continued eating. When she went to the saint to receive blessings, he said grimly, "When you can't share some peanuts with the children, how can the God give you the priceless gift of a child?" We must develop generosity to receive God's kindness.

📖 From Pragya Puran

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...