बुधवार, 28 मार्च 2018

👉 मित्रता हो वहाँ संदेह न हो

🔶 एक फकीर बहुत दिनों तक बादशाह के साथ रहा बादशाह का बहुत प्रेम उस फकीर पर हो गया। प्रेम भी इतना कि बादशाह रात को भी उसे अपने कमरे में सुलाता। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।

🔷 एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया। फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, ‘बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया।

🔶 एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, ‘यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।’.और सम्राट ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया।

🔷 मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। राजा बोला, ‘तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?’ उस फकीर का उत्तर था, ‘जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले। दोस्तों जहाँ मित्रता हो वहाँ संदेह न हो।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 29 March 2018

👉 Only Remorse can save from the punishment of wicked acts

🔶 It is fair to say that if we had behaved badly or done something unfair to someone, we cannot just ignore it as if it never happened. It may be possible that the person who was mistreated has gone away and may not be accessible or traceable any more. In such a situation, it may not be possible to make up for what we had done to him/her. However, there is another way to accomplish it. Every person is a part of society. Hence, damage or harm caused to any individual is, in reality, damage caused to society. We can compensate damage we caused to that individual by doing as much good to society. When the amount of good done to society makes up for the amount of harm done to the individual, it can be safely said that we have atoned for the wrongdoing and have come to a point where we can free us from any sense of guilt.

🔷 It is absolutely impossible to set us free from any wrongdoing by means of observing some cheap religious rituals. Reading sacred texts and good thoughts, satasanga (staying in touch with people of great character), listening to discourses and devotional songs, going on pilgrimage, fasting, etc. help us to purify our mind and also enlighten us to restrain, from now on, our tendency to commit anything wrong. The scriptures speak about religious rites and observances having a grand ability to cleanse us from our sins. They only mean to say that the cleansing of the mind (achieved through such observances) may negate any possibility of that individual committing sinful acts in future.

🔶 The inescapable justice system of God directs that anyone who wishes to absolve them from the consequences of their wrongdoing should devote themselves to selfless services to the community that can boost up its goodness or merits. This can help anyone to cleanse him/herself from any past wrongdoings and thus, imparts peace and freedom from guilt and unworthy intentions.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 YUG NIRMAN YOJANA – DARSHAN, SWAROOP AND KARYAKRAM – Vangmay 66 Page 6.18

👉 दुष्कर्मों के दण्ड से प्रायश्चित्त ही छुड़ा सकेगा

🔶 यह ठीक है कि जिस व्यक्ति के साथ अनाचार बरता गया अब उस घटना को बिना हुई नहीं बनाया जा सकता। सम्भव है कि वह व्यक्ति अन्यत्र चला गया हो। ऐसी दशा में उसी आहत व्यक्ति की उसी रूप में क्षति पूर्ति करना सम्भव नहीं। किन्तु दूसरा मार्ग खुला है । हर व्यक्ति समाज का अंग है। व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति वस्तुत: प्रकारान्तर से समाज की ही क्षति है । उस व्यक्ति को हमने दुष्कर्मों से जितनी क्षति पहुँचाई है उसकी पूर्ति तभी होगी जब हम उतने ही वजन के सत्कर्म करके समाज को लाभ पहुँचाये। समाज को इस प्रकार हानि और लाभ का बैलेन्स जब बराबर हो जायेगा तभी यह कहा जायेगा कि पाप का प्रायश्चित हो गया और आत्मग्लानि एवं आत्मप्रताडऩा से छुटकारा पाने की स्थिति बन गई।

सस्ते मूल्य के कर्मकाण्ड करके पापों के फल से छुटकारा पा सकना सर्वथा असम्भव है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन, तीर्थ, व्रत आदि से चित्त में शुद्धता की वृद्धि होना और भविष्य में पाप वृत्तियों पर अंकुश लगाने की बात समझ में आती है। धर्म कृत्यों से पाप नाश के जो माहात्म्य शास्त्रों में बताये गये हैं उनका तात्पर्य इतना ही है कि मनोभूमि का शोधन होने से भविष्य में बन सकने वाले पापों की सम्भावना का नाश हो जाये।

🔶 ईश्वरीय कठोर न्याय व्यवस्था में ऐसा ही विधान है कि पाप परिणामों की आग में जल मरने से जिन्हें बचना हो वे समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने की सेवा-साधना में संलग्न हों और लदे हुए भार से छुटकारा प्राप्त कर शान्ति एवं पवित्रता की स्थिति उपलब्ध कर लें।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- वांग्मय 66 पृष्ठ 6.18

👉 अपने ऊपर विश्वास रखो

🔶 मित्रो ! स्मरण रखिए, रुकावटें और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों का ठीक-ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में रुकावटें नहीं पड़ीं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जिंदगी का स्वाद ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान् आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन कहला सकता है।

🔷 उठो ! उदासीनता त्यागो। प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं। उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा। उन्होंने जो श्रम आपके ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह संसार तभी तक दु:खमय दीखता है, जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही वृक्ष का उद्ïभव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्घ करते हैं।

🔶 सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस विश्वास द्वारा आप सभी कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके सामने ठहर नहीं सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आंतरिक शक्तियों का विकास करेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 29 March

🔶 The true happiness is in which mind becomes one with soul. Mind is operation of brain and soul is purest form of mind or sacred consciousness. In the language of Yoga that is when mind acts as a soul the God consciousness. This is true yoga. This union of soul and mind is known as highest bliss. Salvation, God realization, ultimate the highest pleasure and bliss beyond any imagination of material pleasure of the world.

🔷 We must love our younger and pay our respects and regards to elders. Our attitude can keep your position safe. Every man at the lowest level of society keeps an impression of highest esteem for the self-disrespect of his vices and weakness. A feeling of his own honesty, sacredness, nobility and sincerity always exists in his mind. Really that proves the concept of solid water molecule H2O is always conscious of its purity inside. Remove pollution outside the molecule configuration.

🔶 Your character is reflected in the reaction of people around you. One’s progress depends on this reaction of your sub-ordinates, officers, clients and those who get concerned to you. Because the persons and society observes your all actions and reactions. The true personality is not only your courteous behavior but the personality waves radiate both from your subtler body also, which they read.
                                        
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 8)

🔶 अगर आपने नारी के बारे में विकृत विचार बना रखे हैं, तो नारी आपको काट खायेगी डाकिन की तरह और साँपिन की तरह डस लेगी; आपका स्वास्थ्य खराब कर देगी, आपकी अक्ल को खराब कर देगी, आपके चिन्तन को भ्रष्ट कर देगी और आपको लम्पट बना देगी, अगर आपका दृष्टिकोण गलत है तब। अगर आपने दृष्टिकोण सही कर लिया तब? तब वही नारी आपको देवता की तरह वरदान दिया देगी। शिवाजी को एक नारी ने ही देवता जैसा वरदान दिया था, आपको याद होगा। आप ऐसा नहीं कर सकते? आप चिन्तन को बदलिये, नहीं तो आप यहाँ किसलिए आए हैं? यहाँ भी नहीं करेंगे, तो क्या करेंगे? केवल मात्र चिन्ह-पूजा करते रहेंगे? टाइमपास करते रहेंगे? नहीं, टाइमपास मत कीजिए, चिन्ह-पूजा मत कीजिए। अपने सारे-के चिन्तन को आमूल-चूल परिवर्तन करने की कोशिश कीजिए।

🔷 ब्रह्मचर्य के बारे में विचार और चिन्तन करते रहिए। बीच में जब कभी भी आपकी आँखें खुलें, फालतू समय हो और नारी का विचार आये, तो केवल बेटी की दृष्टि से विचार कीजिए, बहिन की दृष्टि से विचार कीजिए, माता की दृष्टि से विचार कीजिए, यहाँ तक कि अपनी धर्मपत्नी का भी सहकर्मी की दृष्टि से विचार कीजिए। सीताजी और राम वनवास में रहते थे—वह उनकी सहकर्मी थीं और गाँधीजी, कस्तूरबा रहते थे—वह भी सहकर्मी थीं, तो आप ऐसा क्यों नहीं कर सकेंगे? रामकृष्ण परमहंस और उनकी धर्मपत्नी शारदामणि जी साथ-साथ रहे, सारे जीवनभर रहे; लेकिन कभी उन्होंने एक-दूसरे को कामवासना की दृष्टि से नहीं देखा। आप उतना न कर पाएँ, तो कम-से इतना तो कीजिए कि नारियों के प्रति जो आपकी कुदृष्टि जीवनभर रही है, जिससे आपकी आँखों का तेजस् खत्म हो गया है, आप उस तेजस् को फिर से प्राप्त करने की कोशिश कीजिए और अपना चिन्तन बदल दीजिए। आपको यही सब बातें याद करनी हैं।

🔶 आपको यहाँ स्वाध्याय नियमित करने के लिए बताया गया है। आपको यहाँ सत्संग से जोड़कर रखा गया है। आपको कुछ सीखने के लिए और भावी योजनाओं को बनाने के लिए बताया गया है तथा उसके लिए मार्गदर्शन भी किया गया है; उसके लिए आपको तरह-तरह के कार्यक्रम भी दिए गए हैं। आपका यहाँ जो शिक्षण होता है, वह इसी दृष्टि से होता है। आपको रोटी कमाना आता है, नहाना-धोना भी आता है, व्यापार भी आता है, लेन-देन भी आता है, नौकरी करना भी आता है और जो काम नहीं आता, वह हम यहाँ सिखाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 75)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔶 ध्यान की इस भाव भरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् सदाशिव पराम्बा माँ भवानी से कहते हैं-

न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम्।
शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः॥ ९६॥

इदमेव शिवं त्विदमेवशिवं त्विदमेव शिवं त्विदमेव शिवम्।
मम शासनतो मम शासनतो मम शासनतो मम शासनतः॥ ९७॥
  
एवं विधं गुरुं ध्यात्वा ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम्।
तत्सद्गुरुप्रसादेन मुक्तोऽहमिति भावयेत्॥ ९८॥

🔷 गुरुदेव के अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। गुरुदेव से अधिक कुछ नहीं है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है। यह शिव का आदेश है॥ ९६॥ भगवान् शिव कहते हैं- यह गुरु तत्त्व कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह कल्याणकारी है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है। यह मेरा आदेश है॥ ९७॥ इस तरह (पिछली कड़ी में बतायी गयी) विधि से गुरुदेव का ध्यान करने से स्वतः ही ज्ञान उत्पन्न होता है। उन कृपालु सद्गुरु की कृपा से ‘मैं मुक्त हूँ’ ऐसा चिन्तन करना चाहिए॥ ९८॥
  
🔶 गुरुगीता के इन मंत्रों में सद्गुरु के ध्यान की फलश्रुति बतायी गयी है। यह ध्यान प्रक्रिया वही है, जिसकी कथा पिछली कड़ी में कही गयी थी। यह ध्यान अतिविशिष्ट है। इस ध्यान से सद्गुरु के सदाशिव होने का अनुभव मिलता है और यह अनुभव कहता है कि गुरु से अधिक और कुछ नहीं है। यही परम कल्याणकारी है। शिव के इस आदेश व उपदेश की सार्थकता उन्हें अनुभव होती है, जो अपने सद्गुरु के ध्यान में रमे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 117

👉 सबसे बड़ा पुण्य!

🔷 एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था. यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था।

🔶 एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा-

🔷 “महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”

🔶 देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं।”

🔷 राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”

🔶 देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया।

🔷 राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है।”

🔶 उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए।

🔷 कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी।

🔶 राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”

🔷 देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं!”

🔶 राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है?”

🔷 देव महाराज ने बहीखाता खोला, और ये क्या, पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।

🔶 राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ?

🔷 देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है। परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं।

🔶 देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे..”

🔷 अर्थात ‘कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे.’ राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..”

🔶 राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।

🔷 मित्रों, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे।

👉 आज का सद्चिंतन 28 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 March 2018


👉 आस्तिकता की कसौटी

🔷 सन्त प्रवर महात्मा तुलसीदास की अनुभूति है-
उमा जे रामचरन रत बिगत काम मद क्रोध। निल प्रभुमय देखहिं जगत कासन करहिं विरोध॥
🔶 जो भगवान को मानते हैं, उन पर श्रद्धा करते हैं, उनके अस्तित्व में विश्वास रखते हैं उनके न काम होता है, न मद् होता है और न क्रोध। वे संसार के अणु-अणु में प्रभु का दर्शन करते हैं तब उनका विरोध किसके साथ हो? तुलसीदास जी की आस्तिकता की इस परिभाषा पर किन किन आस्तिकों को आज परखा जा सकता है?

🔷 धर्म के नाम पर बड़े बड़े आडंबर करने वालों की आज कमी नहीं है, लेकिन उनके जीवन में प्रभु के दर्शन नहीं होते। ऐसा मालूम होता है जैसे जीवन के अन्य व्यापारों की तरह धर्म का भी वे एक व्यापार कर लेते हैं और सबसे अधिक उसकी कोई कीमत नहीं है।

🔶 भगवान पर मेरा विश्वास है ऐसे कहने वाले भी मिलते हैं लेकिन ये शब्द मुँह से निकलते हैं या हृदय से इसका निर्णय करना कठिन है। उनका व्यवहार रागद्वेष पूर्ण देखा जाता है और स्वयं भी उन्हें अपने विश्वास शब्द का विश्वास नहीं होता। प्रभु आज उपेक्षणीय हो गये हैं लेकिन तब भी हम आस्तिक हैं इसे बड़े जोर से चिल्लाकर कहते लोग पाये जाते हैं।

🔷 जिसके हृदय में प्रभु का निवास है और जो उसका दर्शन करता है उसका जीवन प्रभुमय होता है। उसके जीवन में समत्व होता है। वह संसार को प्रभु का विग्रह केवल मानता ही नहीं, अनुभव भी करता है। प्रभु उसके आचार में, प्रभु उसके जीवन में समा जाते हैं। वह व्यक्ति प्रभु की अर्चना के लिये किसी समय को अपने कार्यक्रम में अलग नहीं रखता। उसके जीवन का कार्यक्रम ही प्रभुमय होता है। उसका खाना पीना सोना जागना चलना फिरना तथा जगत के समस्त व्यवहारों में प्रभु समाये रहते हैं। ऐसे आस्तिक के लिए सम्प्रदायों के अलग नाम नहीं हैं, उसके लिए प्रत्येक घर प्रभु का मन्दिर है। और प्रत्येक शरीर प्रभु का विग्रह वहाँ भेदभाव की गुँजाइश ही नहीं रहती । वह संसार में भगवान की नित्य लीला का रसास्वादन करना है और स्वयं को भी भगवान की लीला का एक पात्र मात्र समझना है।

🔶 आस्तिक की न अपनी कोई कामना होती है, न माँग। वह न किसी से ऊंचा होता है न नीचा, न बड़ा न छोटा, न पवित्र न अपवित्र। उसको किसी प्रकार का अभाव नहीं सताता ।

🔷 आज की दुनिया रागद्वेष से पूर्ण है। ऊंच नीच के भावों से भरी हुई है। यद्यपि मन्दिर मस्जिद और गिरजाघरों की संख्या बराबर बढ़ रही है लेकिन आस्तिकता की सब ओर उपेक्षा की जा रही है। हम कहने को तो आस्तिक बनते हैं लेकिन हृदय में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। इस तरह हमारा जीवन आत्म प्रवञ्चना से भरा हुआ है। हम अपने आपको धोखा दे रहे हैं या अपनी समझ को लेकर हम धोखा खा रहें हैं धोखे का यह जीवन आस्तिक जीवन नहीं है इसे भी समझने वालो की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है।

🔶 भारत के जीवन में जब जब आस्तिकता का जमाना रहा है, वह हमेशा खुशहाल रहा है लेकिन जैसे जैसे उसकी उपेक्षा की जाती रही है उसकी खुशहाली हटती गई है। आज कलह और क्लेशों से भरा हुआ भारत हम सब की आस्तिकता का डिमडिम घोष कर रहा है और फिर भी हम अपने आपको आस्तिक समझे बैठे हैं।

🔷 आस्तिकता अनन्त शान्ति की जननी है। जहाँ आस्तिकता होगी वहाँ अशांति का कोई चिन्ह दृष्टि गोचर नहीं होना चाहिए। ईश्वर का सच्चा विश्वासी पवित्र अन्तःकरण का होता है तदनुसार उसके व्यवहार तथा कर्म परिपाक भी सुमधुर ही होते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति-1950 अप्रैल पृष्ठ 10

👉 तपस्वी बने

🔷 मित्रो! तपस्वी का जीवन जीने के लिए आपको हिम्मत और शक्ति इकठ्ठी करनी चाहिए। तपाने के बाद हर चीज मजबूत हो जाती है। कच्ची मिट्टी को जब हम तपाते हैं तो तपाने के बाद मजबूत ईंट बन जाती है। कच्चा लोहा तपाने के बाद स्टेनलेस स्टील बन जाता है। पारे को जब हकीम लोग तपाते हैं तो पूर्ण चंद्रोदय बन जाता है। पानी को गरम करते हैं तो भाप बन जाता है और उससे रेल के बड़े-बड़े इन्जन चलने लगते हैं।

🔶 कच्चे आम को पकाते हैं तो पका हुआ आम बन जाता है। जब हम वेङ्क्षल्डग करते हैं तो लोहे के दो टुकड़े जुड़ जाते हैं। उस पर जब हम शान धरते हैं तो वह हथियार बन जाता है। बेटे! यह सब गलने की निशानियाँ हैं। आपको अपने ऊपर शान धरनी चाहिए और भगवान के साथ वेङ्क्षल्डग करनी चाहिए। आपको अपने आप को इतना तपाना चाहिए कि आप पानी न होकर स्टीम भाप बन जाएँ। कौन-सी वाली स्टीम? जो रेलगाड़ी को धकेलती हुई चली जाती है। यह गरमी के बिना नहीं हो सकता। आपको तपस्वी बनने के लिए यही करना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 28 March

🔷 It is through self-discipline and self-restrain that one develops control on his treasure mind. A firm believe on the ideality of life develops courage to act on those lines. This self introspection develops respect for others and develops gentlemen ship and responsibility of a good citizen. Without constant vigilance on self. True culture can not develop; only outward show of few courteous words will not hide your true nature for a long time.

🔶 As it is said that man creates his own destiny. It means that every man have given a choice for self-growth in all dimensions. One must select his own ideal goal of life. If others don’t help he should works hard alone. This royal road may create obstructions and resistance but man have power with in to overcome that and attain excellence in any field of life.

🔷 Try to visualize your own thoughts of mind. Analyze them. It’s most sacred form is covered by some evil and polluted coats. Try to work on them. You will be able to find the sacred component and an eternal peace in it. It is something like water; any pollution in water can be separated out as it is always outside the molecule of water. H2O, the Fractional distillation will always remove pollution and clear colorless, tasteless, odorless, specific gravity on water will be collected by cooked steam. The thoughts should be directed towards God- Who is embodiment of truth and ideality. It needs constant vigilance and practice. This is true divine nature of man. Which is true spirituality, religion is sectism which we have created. 
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 7)

🔷 हमारा उदाहरण है आपके सामने। फिजूलखर्ची हमने कानी कौड़ी की भी नहीं की है। जो भी हमारे पास था, उसको बेहतरीन कामों में लगा दिया है, जिसका परिणाम आपने देखा न! देखा होगा। हमारे गाँव में स्कूल बना हुआ है, गायत्री तपोभूमि बनी हुई है, आप देख लीजिए। हमारे पास जमीदारियों के बॉण्ड आए थे; सब खत्म हो गए, सब लगा दिए। आप ऐसा नहीं कर सकते? पैसे को फिजूलखर्चियों में लगाएँगे, औलाद के लिए जमा करेंगे—आप ऐसी योजना नहीं बना सकते। आप यहाँ से जाने के बाद में जो साधन हैं, उन्हीं को बढ़ाते रहेंगे—ऐसा ही सोचते रहेंगे। बढ़ाने की बात मत सोचिए। पहली बात वहाँ से सोचिए कि हम ठीक तरह इनका कैसे इस्तेमाल कर पाएँ। जब ठीक तरीके से इस्तेमाल करेंगे, तब आप यकीन रखिए भगवान आपको दो हाथ से नहीं, चार हाथ से देगा।

🔶 भगवान के चार हाथ भी हैं, इनसान के दो हाथ ही हैं। विष्णु भगवान के देखे हैं न? चार हाथ हैं। सहस्त्रशीर्षा पुरुषः—उसके हजारों हाथ हैं और आपको हजारों हाथों से इतना देगा, जिसे आप सँभाल भी नहीं पाएँगे। हमारा उदाहरण आप देख लीजिए, हमने अपने आपको खाली कर दिया; भगवान की चीज भगवान् को सौंप दी है और भगवान ने अपनी चीजें हमको सौंप दी हैं। क्या आप ऐसी हिम्मत नहीं कर सकते? आप ऐसी दूरदर्शिता नहीं दिखा सकते? आपको ऐसी बुद्धिमानी नहीं आती? आप ऐसी अक्ल से रिश्ता नहीं जोड़ना चाहते? अगर जोड़ना चाहते हो, तो कृपा कीजिये और आप यहाँ संयमशील बनिए। पैसे के बारे में संयमशील, समय के बारे में संयमशील। आपको समय के बारे में अनुशासित किया गया है न? जब घण्टी बजती है, तब आपको आने के बारे में कहा गया है न? सुबह जब आपको प्रज्ञापेय मिलता है, तब घण्टी बजती है और आपसे यह आशा की जाती है कि आप समय पर पहुँच जाइए।

🔷 जब खाने-पीने के लिए घण्टी बजती है, तब आपसे यह आशा की जाती है कि आप बिना समय गँवाये जल्दी पहुँचेंगे। इसी तरह आपको हर टाइम-टेबिल के शिकंजे में कस दिया है। यह अभ्यास है आपका। भावी जीवन में आपको जिस शिकंजे में कसा जा रहा है, उसको आगे भी जारी रखें। केवल यहीं तक यह बातें सीमित नहीं हैं। जीभ को, आपसे संयम के लिए कहा गया है, केवल यहाँ के लिए ही नहीं, बल्कि सारे जीवन के लिए कहा गया है। आप बाहर भी जा करके रहिए। यहाँ एक कमरे में दो आदमियों को रहने की इजाजत नहीं है। अगर स्त्री-पुरुष हैं, तो भी दो कमरों में अलग-अलग रहेंगे; क्योंकि हर आदमी एकाकी बनकर रहे और दूसरी बात यह कि कभी वासनात्मक दृष्टि से एक-दूसरे को न देखें। आप वासनात्मक दृष्टि से मत देखिये। लड़कियाँ कहाँ चली जाएँगी दुनिया से? औरतें क्या मिट जाएँगी और औरतों के लिए मर्द नहीं रहेंगे क्या? मर्द रहेंगे; लेकिन उनके बीच जो जहर है, उस जहर को निकाल दीजिए। जहर निकल जाता है, तो साँप कितना सुन्दर मालूम पड़ता है! देखने में कितना अच्छा लगता है? और जहरीला होता है, तो काट खाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 74)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔷 गुरुगीता के महामंत्रों में सद्गुरु के ध्यान का संगीत है। इसकी सुरीली सरगम से एकाग्रता, स्थिरता, शान्ति एवं पवित्रता की धुनें रची जाती हैं। इसके प्रभाव से व्यक्तित्व की अन्तर्निहित शक्तियों को अपनी सार्थक अभिव्यक्ति मिलती है। शिष्य-साधक ज्यों-ज्यों अपने सद्गुरु के ध्यान में डूबता है, त्यों-त्यों उसकी भाव चेतना गुरुप्रेम में भीगती जाती है। वह अपने प्यारे सद्गुरु के रंग में रँगता चला जाता है। यह अनुभूति ऐसी है, जिसे केवल पाने वाला अनुभव करता है। इसे न तो कहा जा सकता है और न बताया जा सकता है। ध्यान के रूप और रंग कई हैं। इसकी विधियाँ और तकनीकें कई हैं। इनमें से सभी का अपना विशेष प्रभाव है; लेकिन सद्गुरु के ध्यान की भावदशा कुछ और ही है। इसके प्रभाव की रूप छटा के रंग ही निराले हैं।
  
🔶 इन्हीं में से कुछ रंगों की कथा पिछले मंत्रों  में कही गयी है। शिष्यों को यह बोध कराया गया कि गुरुदेव आनन्दमय रूप हैं। उनसे शिष्यों को आनन्द मिलता है। वे प्रभु प्रसन्नमुख एवं ज्ञानमय हैं। वे सदा ही आत्मबोध में निमग्न रहते हैं। योगीजन सदा उनकी स्तुति करते हैं। संसार रोग के एक मात्र वैद्य उन गुरुदेव की स्तुति मैं करता हूँ। उन गुरुदेव को मेरा नित्य नमन है, जिनकी भाव चेतना में उत्पत्ति, स्थिति, ध्वंस, निग्रह एवं अनुग्रह का सिलसिला सदा चलता रहता है। इसी समर्पण भरी भक्ति से अपने सहस्रदल कमल में गुरुदेव का स्मरण, ध्यान करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 116

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...