रविवार, 7 जनवरी 2018

👉 कुछ तो लोग कहेंगे

🔷 अमेरिकन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के विरोधी, अखबारों में जी-खोलकर उनकी बुराई करते थे। लेकिन, लिंकन इन बातों से विचलित नहीं होते थे और अपने काम मे जुटे रहते थे।

🔷 एक दिन उनके मित्र ने उनसे कहा, 'विरोधी लोग आपके खिलाफ चाहे अनेक ऊल-जलूल बातें अखबारों में प्रकाशित करवाते रहें, उनकी बातों का प्रत्युत्तर आपको भी तो देना चाहिए।

🔷 मित्र की बात सुनकर लिंकन मुस्कुराते हुए बोले, 'दोस्त यदि मैं अपनी आलोचनाओं का उत्तर देने लगूं तो दिनभर में केवल इसी काम को कर पाउंगा, मेरे कार्यालय में फिर कोई अन्य कार्य नहीं होगा। मेरा एक ही उद्देश्य है।

🔷 अपनी सारी योग्यता और शक्ति का उपयोग करते हुए ईमानदारी पूर्वक अपना काम करना। वह मैं करता हूं। और इस पद पर रहने की अंतिम घड़ियों तक करता रहूंगा।'

🔷 यदि में अंत में बुरा सिद्ध होता हूं, तो मैं भले ही लाख सफाई देता रहूं कि में सही था, मेरा रास्ता सही था कोई इस बात को नहीं सुनेगा और यदि में अंत में भला सिद्ध होता हूं तो मेरे विषय में जो प्रलाप किया जा रहा है, वह निश्चित रूप से अनर्गल सिद्द होगा। मुझे इस बात को लेकर न तो चिंता है और न ही भय।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 8 Jan 2018


👉 अभ्यास से क्षमताओं का विकास

🔷 सतत अभ्यास द्वारा शरीर एवं मन को इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है तथा उन्हें असामान्य कार्यों के कर सकने के लिए भी सहमत किया जा सकता है। प्रतिभा-योग्यता के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है, सर्वसमर्थ नहीं। बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी यदि पाठ याद न करे, पहलवान व्यायाम को छोड़ दे, संगीतज्ञ, क्रिकेटर अभ्यास करना छोड़ दें, चित्रकार तूलिका का प्रयोग न करे, कवि भाव संवेदनाओं को सँजोना छोड़ बैठे, तो उसे प्राप्त क्षमता भी क्रमश: क्षीण होती जायेगी और अंतत: लुप्त हो जायेगी, जबकि बुद्धि की दृष्टिï से कम पर सतत अभ्यास में मनोयोगपूर्वक लगे, व्यक्ति अपने अन्दर असामान्य क्षमताएँ विकसित कर लेते हैं। निश्चित समय एवं निर्धारित क्रम में किया गया प्रयास मनुष्य को किसी भी प्रतिभा का स्वामी बना सकता है। जबकि अभ्यास के अभाव में प्रतिभाएँ कुंठित हो जाती हैं, उनसे व्यक्ति अथवा समाज को कोई लाभ नहीं मिल पाता।
  
🔶 मानव शरीर अनगढ़ है और वृत्तियाँ असंयमित। इन्हें सुगढ़ एवं सुसंयमित करना ही अभ्यास का लक्ष्य है। अनगढ़ काया एवं मन अनभ्यस्त होने के कारण सामान्यतया किसी भी नए कार्य को करने के लिए तैयार नहीं होते। उलटे अवरोध खड़ा करते हैं। उन्हें व्यवस्थित करने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है। अभ्यास से ही आदतें बनती हैं और अंतत: संस्कार का रूप लेती हैं। परोक्ष रूप से अभ्यास की यह प्रक्रिया ही व्यक्तित्व का निर्माण  करती है।
  
🔷 कितने ही व्यक्ति किसी भी कार्य को करने में अपने को असमर्थ मानते हैं। उन्हें असंभव जानकर प्रयास नहीं करते हैं। फलस्वरूप कुछ विशेष कार्य नहीं कर पाते, अपनी मान्यताओं के अनुरूप हेय एवं असमर्थ ही बने रहते हैं। जबकि किसी भी कार्य को करने का संकल्प कर लेने एवं आत्मविश्वास जुटा लेने वाले व्यक्ति उसमें अवश्य सफल होते हैं। आत्म विश्वास की कमी एवं प्रयास का अभाव ही मनुष्य को आगे बढऩे से रोकता तथा महत्त्वपूर्ण सफलताओं को पाने से वंचित रहता है।
  
🔶 मानवीय काया परमात्मा की विलक्षण संरचना है। सर्वसमर्थता के बीज उसके अन्दर विद्यमान है।  उसे जैसा चाहे ढलाया, बनाया जा सकता है। सामान्यतया लोग कुछ दिनों तक तो बड़े उत्साह के साथ किसी भी कार्य को करने का प्रयास करते हैं, पर अभीष्टï सफलता तुरन्त न मिलने पर प्रयत्न छोड़ देते हैं। फलस्वरूप अपने प्रयत्नों से असफल सिद्ध होते हैं। जबकि धैर्य एवं मनोयोगपूर्वक सतत अभ्यास में लगे व्यक्ति असामान्य क्षमताएँ तक विकसित कर लेते हैं। अभ्यास आदतों का रूप लेने पर चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करते हैं। अभ्यास की प्रक्रिया द्वारा शारीरिक- मानसिक क्षमताओं का विकास ही नहीं, रोगों का निवारण भी किया जा सकता है।  शरीर एवं मनोभावों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर स्वयं को उपयोगी अभ्यासों के लिए सहमत करता है।
  
🔷 मानवीय काया एवं मन में शक्ति भण्डार छिपे पड़े हैं। विकास की असीम सम्भावनाएँ हैं। निर्धारित लक्ष्य की ओर प्रयास चल पड़े और उसमें धैर्य एवं क्रमबद्धता का समावेश हो जाय, तो असंभव समझे जाने वाले कार्य भी सम्भव हो सकते हैं। पहलवान, विचारवान, कवि, लेखक, वक्ता, चित्रकार, वैज्ञानिक, अध्यापक कोई अकस्मात नहीं बन जाते, वरन्ï उन्हें उसके लिए सतत प्रयास करना पड़ता है। शरीर एवं मन को निर्धारित लक्ष्य के लिए अभ्यस्त करना होता है। प्रयत्न करने पर कोई भी व्यक्ति अपने अनगढ़ शरीर एवं मन को प्रशिक्षित कर सकता है।  अनगढ़ शरीर एवं मन को सुगढ़ एवं व्यवस्थित करने के लिए पूरे धैर्य के साथ सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है।

👉 स्वाध्याय और मनन मानसिक परिष्कार के दो साधन (भाग 2)

🔷 हमें यह ध्यान में रखकर चलना चाहिए कि मन की मलीनता बढ़ाने के लिए कुछ बड़े और लगातार प्रयत्न करने पड़ते हैं तब कही वह काबू में आता है। घोड़े को सही रास्ते पर चलाने के लिए उसके मुँह में लगाम लगानी पड़ती है और हाथ में चाबुक रखना पड़ता है ऐसा ही प्रबन्ध मन के लिए किया जा सके तो ही वह रास्ते पर चलेगा।

🔶 नित्य स्वाध्याय की नियमित व्यवस्था रखनी चाहिए। स्वाध्याय का विशय केवल एक होना चाहिए- आत्म निरीक्षण एवं आत्म परिशोधन का मार्गदर्शन जो पुस्तकें इस प्रयोजन को पूरा करती है, आन्तरिक समस्याओं के समाधान में योगदान करती है केवल उन्हें ही इस प्रयोजन के लिए चुनना चाहिए। कथा पुराणों का उपयोग इस प्रसंग में निरर्थक है। आज की गुत्थियों को- आज की परिस्थितियों में- आज के ढंग में किस तरह सुलझाया जा सकता है- सो उसका दूरदर्शिता पूर्ण हल प्रस्तुत करे वही उपयुक्त स्वाध्याय साहित्य है। ऐसी पुस्तकों को हमें छाँटना और चुनना पड़ेगा उन्हें नित्य नियमित रूप से गंभीरता और एकाग्रतापूर्वक पढ़ने के लिए समय नियत करना पड़ेगा अन्तः करण की भूख बुझने के लिए यह स्वाध्याय साधना नितान्त आवश्यक है।

🔷 स्वाध्याय के बाद आता है मनन- चिंतन। जो पड़ा है उस पर बार-बार कई दृष्टिकोणों से विचार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उस प्रकाश को बढ़ाने का क्या उपाय है? आदर्शों को अपने व्यक्तित्व में घुलाने के प्रसंग पर ऊहापोह करना, मनन और चिंतन का मुख्य उद्देश्य है। कमरे में नित्य झाडू लगाते हैं, स्नान रोज करते हैं, दाँत रोज साफ किये जाते हैं, बर्तन रोज साफ करने पड़ते हैं। मन की मलीनता की आदत से विरत करने के लिए उसे स्वाध्याय और मनन-चिंतन के बन्धन में नित्य बाँधना चाहिए। रास्ते पर चलने के लिए वह तभी सहमत हो सकेगा।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जनवरी 1973 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.44

👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 1)

🔷 मनुष्य जिस स्थिति में रहता है उसी स्थिति में उसे दो प्रकार की शक्तियां मिलती हैं। एक जो उसे प्रेरणा, प्रसन्नता प्रदान करती है और उसका कल्याण चाहती है। दूसरी उसे कष्ट देती है, पतन की ओर ले जाती है। एक शक्ति भलाई की है, दूसरी बुराई की। दोनों का संयोग ही मिलकर सृष्टि के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है।

🔶 यह शक्तियां ही चेतना रूप में मनुष्यों में भरी हुई हैं, उनका कोई स्पष्ट पृथक अस्तित्व नहीं है। संसार में जितने भी प्राणी हैं सभी में कुछ गुण और कुछ दोष रहते हैं। सर्वथा निर्दोष तो परमात्मा ही माना जाता है। शेष सभी में कुछ अंश भलाई है कुछ बुराई। किसी में गुणों का आधिक्य है किसी में बुराई का बाहुल्य, जिसे एकदम अवगुणों का अवतार ही माना जाता है कुछ न कुछ अच्छाइयां उसमें भी अवश्य होती हैं। कंस महा क्रूर शासक था, रावण का अत्याचार जगत विख्यात् है किन्तु दोनों ही पराक्रमी, पुरुषार्थी और साहसी थे। सिकन्दर दूरदर्शी था। हिटलर विचारवान था, चंगेज खां में और कुछ नहीं तो संगठन शक्ति थी। बुरे से बुरे व्यक्तियों में भी प्रेरणा और प्रसन्नता देने वाला कोई न कोई गुण अवश्य होता है। जिस प्रकार संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से अच्छा नहीं, न पूर्णतः बुरा। संसार में पूर्ण कोई नहीं।

🔷 बुराई करनी हो, निन्दा करनी हो तो अपने ही बहुत से गुण खराब होंगे, कई बुरी आदतें पड़ गई होंगी, उनकी की जानी चाहिए पर गुणवान बनने का, सफलता प्राप्त करने का और प्रसन्नता की मात्रा बढ़ाने की—इच्छा हो तो हमारे विचार गुणों में, कल्याण करने वाले दृश्यों, सन्दर्भों और व्यक्तियों पर केन्द्रित रहने चाहिये। ऐसे व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति हमारी विचारधारा केन्द्रित रहेगी तो गुण ग्राहकता हमारा स्वभाव बन जायेगा। हृदय शुद्ध और मन बलवान होता चला जायेगा। अच्छे गुणों और कार्यों को चिन्तन करना आत्म विकास के लिये हितकर ही होता है। अच्छे विचार ही मनुष्य को सफलता और जीवन देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 32

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.32

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.8

👉 Significance of Birthday (Part 1)

🔶 The life of a man is the biggest gift, BHAGWAN can offer. Also no other thing in treasure of BHAGWAN is as precious as a human life that has already been provided to a ZEEV. This precious thing comes out to be useful only when its usefulness is realized and not only this but also to properly put it to some good use. We, because of our ignorance, are unable to see its preciousness. Where does arise a question of putting to good use a thing of which value we have not found out? After all a person, ignorant of a piece of diamond he possesses, cannot be imagined caring about that for he thinks he possesses a piece of stone and not a diamond.
                                             
🔷 We suppose the life to be a useless thing and that it is a burden we have been laden with to bear. Innumerable persons are there who though live, yet in such a way as if some burden would have been put on them, whereas the reality is that they have been bestowed upon such a precious treasure, with which they can live a happy and meaningful life besides fulfilling the specific purpose of BHAGWAN with which he has sent us on this earth.

🔶 BHAGWAN has appointed us as his trustee of this wealth with many expectations to nourish and beautify the world-garden. He expects  us to show the world that we have put his wealth to good use to serve very that purpose. But we can’t do that simply because we remain all our life ignorant about how precious thing we have been offered to use.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 2)

🔷 जिंदगी बाहर नहीं हमारे भीतर है और बुद्धि जिसकी वजह से हम रुपया कमाते हैं, सम्मान कमाते हैं, वह बाहर नहीं हमारे भीतर है जिसकी वजह से हम हर चीज कमा सकते हैं। भीतर हमें दिखाई नहीं पड़ता और हम कहते हैं कि हे भगवान! यह आपने क्या मखौल कर दिया मनुष्य के साथ कि बाहर की चीजों की जानकारी दे दी, पर भीतर की चीजों की नहीं दी। भीतर जो चीजें, संपत्तियाँ, विभूतियाँ, देवत्व और महानता दबी हुई पड़ी हैं, वह हमको दिखाई नहीं पड़तीं। हमको अपना बेटा दिखाई पड़ता है, संपत्ति दिखाई पड़ती है, यह और वह दिखाई पड़ता है और न जाने क्या-क्या दिखाई पड़ता है, पर हमको अपना भविष्य नहीं दिखाई पड़ता, आत्मा दिखाई नहीं पड़ती, परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता।

🔶 यहाँ तक कि हमारे भीतर वाले कलपुर्जे तक दिखाई नहीं पड़ते। आँखें तक दिखाई नहीं पड़ती। भीतर की तो बात कौन कहे बाहर की भी दिखाई नहीं पड़ती। अच्छा बताइए आप की नाक कैसी है? भौहें कैसी है? पलकें कैसी हैं? जब आपको बाहर की चीजें ही नहीं दिखती, केवल-इधर की चीजें ही दिखाई देती हैं तो फिर भीतर की कैसे दिखेंगी? इसीलिए गिरेबान में मुँह डाल करके जब हम भीतर तलाश करते हैं तो उसको ध्यान कहते हैं। अपने भीतर झाँकने का नाम ही ध्यान है।
 
🔷 ध्यान किसका किया जाता है? स्वयं का या भगवान का? बेटे स्वयं तो क्या और भगवान तो क्या दोनों एक ही हैं। स्वयं का विकसित रूप ही भगवान है। हमारा विकसित रूप जो है-'शिवोहं' है 'सच्चिदानंदोहं' 'तत्त्वमसि' 'अयमात्माब्रह्म' 'प्रज्ञानंब्रह्म' है। वेदांत के यह सारे के सारे महावाक्य यह बताते हैं कि हमारा परिष्कृत रूप भगवान है। हमारा भगवान हमारा परिष्कृत रूप ही है। डाइमण्ड क्या है? डाइमण्ड और कोयले में कोई खास फर्क नहीं है। एकाध इसके एलीमेंट्स और एकाध इसके भीतर के जो जर्रे हैं, उनमें फर्क पड़ता है, अन्यथा हीरा और कोयला एक ही हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 11)

👉 परमसिद्धि का राजमार्ग

🔷 सद्गुरु के चरणों की महिमा का बोध कराने वाली यह अनुभूति कथा महान् गुरु योगिराजाधिराज श्री श्यामाचरण लाहिड़ी और उनके विभूतिवान् शिष्य स्वामी प्रणवानन्द के बारे है। स्वामी प्रणवानन्द ने स्वयं अपने मुख से अपनी इस अनुभूति को योगानन्द को सुनाया था। उन्होंने उनसे कहा- गुरु की कृपा कितनी अमूल्य होती है, वह सुनो। मैं उन दिनों नित्यरात्रि को आठ घण्टे ध्यान किया करता था। उस समय मेरा समूचा दिन अपने रेलवे कार्यालय में बीत जाता था। वहाँ मुझे अपने क्लर्क होने का दायित्व निभाना पड़ता था। उन दिनों मेरे लिए यह ड्यूटी बड़ी थकाऊ और उबाऊ थी। फिर भी मैं बड़े ही मनोयोग पूर्वक हर रात को ध्यान करता था। प्रत्येक रात्रि को आठ घण्टे की अविराम साधना मेरी जीवनचर्या का अनिवार्य और अविभाज्य अंग बन गयी।
  
🔶 इसके अद्भुत परिणाम भी मेरे जीवन में आए। विराट् आध्यात्मिक अनुभूति से मेरी समूची अन्तर्चेतना उद्भासित हो उठी; परन्तु अभी भी उस अखण्ड सच्चिदानन्द और मेरे बीच एक झीना परदा हमेशा बना रहता था। यहाँ तक कि अतिमानवी निष्ठा के साथ साधना करने के बावजूद भी मैं ब्रह्मतत्त्व से एकाकार नहीं हो सका। इस बारे में किए गए मेरे सारे प्रयास पुरुषार्थ, निष्फल गए। तभी मुझे ध्यान आया कि साधक के लिए सद्गुरु चरणों की कृपा ही परमपूर्णता का परिचय पर्याय बनती है। यही सोचकर एक दिन सायंकाल मैंने लाहिड़ी महाशय के चरणों का आश्रय ग्रहण किया। उनके आशीष की आकांक्षा के साथ मेरी प्रार्थना चलती रही, ‘गुरुदेव, मेरी ईश्वर में समा जाने की आकांक्षा इतनी तीव्र वेदना का रूप धारण कर चुकी है कि उस परम प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन किए बिना मैं अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता।’
  
🔷 लाहिड़ी महाशय हल्के से मुस्कराए और बोले, भला इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। तुम और गहराई से ध्यान करो। मैने उनके चरण पकड़कर बड़े ही करुण भाव से पुकार की, हे मेरे प्रभु, मेरे स्वामी, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आप इस भौतिक कलेवर में मेरे सम्मुख विद्यमान हैं। अब मेरी प्रार्थना को स्वीकारें, और मुझे आशीर्वाद दें कि मैं आपका आपके अनन्त रूप में दर्शन कर सकूँ। प्रसन्न भाव से शिष्य वत्सल परम सद्गुरु लाहिड़ी महाशय ने अपना हाथ आशीर्वाद मुद्रा में उठाते हुए कहा, जाओ वत्स, अब तुम जाओ और ध्यान करो। मैंने तुम्हारी प्रार्थना परमपिता परमेश्वर परब्रह्म तक पहुँचा दी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 22