गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 7 Oct 2016




👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 7 Oct 2016



 

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 50)

🔵 शरीर अवस्था से गुरु- देव के उपदेशों तथा सिद्धान्तों की ओर, व्यक्ति से तत्व की ओर, शिष्य को बच्चे के समान प्रशिक्षित करना आवश्यक है। घनिष्ठ संबंधों में, सर्वोपरि घनिष्ठ गुरु शिष्य के संबंध में शरीर और मन का उतना महत्त्व नहीं रह जाता। स्वयं गुरु की आत्मा ही उच्च से उच्चतम अनुभूति के द्वारा शिष्य में प्रविष्ट हो जाती है। गुरु के स्वभाव में शिष्य का व्यक्तित्व अधिकाधिक विलीन होता जाता है और गुरुदेव का व्यक्तित्व अधिकाधिक उस महत्त्व में, जिसका कि गुरुदेव का शरीर भी एक व्यक्त स्वरूप है विलीन होता जाता है और तब उस अत्युदात्त एकत्व की उपलब्धि होती है। 

🔴 गुरु तथा शिष्य के दो व्यक्तित्वों का जल मिलकर असीम -ब्रह्म- समुद्र हो जाता है। उस परम सौंदर्य की उपलब्धि के लिए जहाँ गुरु की आज्ञा होगी क्या तुम वहाँ नहीं जाओगे? उनके लिए यदि उनकी इच्छा हो तो क्या तुम सहस्रों जन्म- मत्यु के चक्र में नहीं पड़ोगे? तुम उनके प्रिय सेवक हो। उनकी इच्छा ही तुम्हारे लिए नियम है। तुम्हारी इच्छा उनकी इच्छा का उपकरण मात्र है। उनका आदेश पालन करना यही धर्म है। जैसा कि शास्त्र कहते हैं, गुरु ही ईश्वर हैं। गुरु ही ब्रह्मा है।.गुरु ही विष्णु हैं। गुरु ही महादेव हैं। वास्तव में वे ही परम ब्रह्म हैं। गुरु से बड़ा और कोई नहीं है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 7 Oct 2016

🔴 बहुत लोग जिस गलत बात को कर रहे हैं, इसलिए हमको भी करना चाहिए, इस प्रकार की विचारधारा उन्हीं लोगों की होती है जिनके पास अपनी बुद्धि का सम्बल नहीं होता। पूरी दुनिया के एक ओर हो जाने पर भी असत्य एवं अहितकर के आगे सिर न झुकाना ही मनुष्यता का गौरव है। लोग बुरा न कहें, अंगुलि न उठायें, इसलिए हमें गलत बात को भी कर डालना चाहिए, यह कोई तर्क नहीं है। विवेक का तकाजा यही है कि उचित को स्वीकार करने में संकोच न करें और अनुचित को अस्वीकार कर दें।

🔵 हमें अपने बारे में अपनी राय आप निर्धारित करनी चाहिए और उसी को सही तथा वजनदार मानना चाहिए। यदि हम अच्छे हैं और सही राह पर चल रहे हैं तो फिर कोई कारण नहीं कि किसी अजनबी या दूरवर्ती की नासमझी से की हुई निन्दा का दुःख माना जाय। इसी प्रकार यदि हम बुरे हैं, ईमान गँवा चुके हैं, गलत रास्ते में चल रहे हैं तो उन चापलूस या गुमराह लोगों की क्या कीमत हो सकती है जो इतने पर भी प्रशंसा करते रहते हैं। ऐसे प्रशंसकों की कीमत धूलि की बराबर भी नहीं समझी जानी चाहिए।

🔴 प्रेरक स्वाध्याय वस्तुतः एक प्रकार की ईश्वर उपासना ही है। यों रूढ़िवादी लकीर पीटकर कूड़े करकट जैसी किन्हीं बूढ़ी, पुरानी, किस्से-कहानियों की किताबों को घोटते रहना भी आज स्वाध्याय के नाम से पुकारा जाता है, पर वास्तविक स्वाध्याय वह है जिसकी एक-एक पंक्ति हमें व्यावहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने की प्रेरणा से ओतप्रोत हो।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुद्धिमत्ता और मूर्खता की कसौटी

🔵 बुद्धिमत्ता की निशानी यह मानी जाती रही है कि उपार्जन बढ़ाया जाय—अपव्यय रोक जाय और संग्रहित बचत के वैभव से अपने वर्चस्व और आनन्द को बढ़ाया जाय। संसार के हर क्षेत्र में इसी कसौटी पर किसी को बुद्धिमान ठहराया जाता है।

🔴 मानव-जीवन की सफलता का लेखा-जोखा लेते हुए भी इसी कसौटी को अपनाया जाना चाहिए। जीवन-व्यवसाय में सद्भावनाओं की—सत्प्रवृत्तियों की पूँजी कितनी मात्रा में संचित की गई? सद्विचारों का, सद्गुणों का, सत्कर्मों का वैभव कितना कमाया गया? इस दृष्टि से अपनी उपलब्धियों को परखा, नापा जाना चाहिए। लगता हो कि व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने वाली इन विभूतियों की संपन्नता बढ़ी है तो निश्चय ही बुद्धिमत्ता की एक परीक्षा में अपने को उत्तीर्ण हुआ समझा जाना चाहिए।

🔵 समय, श्रम, धन, वर्चस्व, चिन्तन मानव-जीवन की बहुमूल्य सम्पदाऐं हैं। इन्हें साहस और पुरुषार्थ पूर्वक सत्प्रयोजन में लगाने की तत्परता बुद्धिमत्ता की दूसरी कसौटी है। जिनने इन ईश्वर-प्रदत्त बहुमूल्य अनुदानों को पेट-प्रजनन में-विलास और अहंकार में खर्च कर डाला, समझना चाहिए वे बहुमूल्य रत्नों के बदले काँच-पत्थर खरीदने वाले उपहासास्पद मनःस्थिति के बाल-बुद्धि लोग हैं। 
 
🔴 वस्तु का सही मूल्यांकन न कर सकने वाले और उपलब्धियों के सदुपयोग में प्रमाद बरतने वाले मूर्ख ही कहे जायेंगे। जीवन-क्षेत्र में हमारी सफलता-असफलता का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते समय यह देखना चाहिए कि कहीं दूरदर्शिता के अभाव से हम सौभाग्य को दुर्भाग्य में तो नहीं बदल रहे हैं? जीवन बहुमूल्य सम्पदा है। यह अनुपम और अद्भुत सौभाग्य है। इस सुअवसर का समुचित लाभ उठाने के सम्बन्ध में हम दूरदर्शिता का परिचय दे, इसी में हमारी सच्ची बुद्धिमत्ता मानी जा सकती हैं।

🌹 चिदानंद परिव्राजक
🌹 अखण्ड ज्योति फरवरी 1974 पृष्ठ 1

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...