शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

👉 आस्था

🔴 यात्रियों से खचाखच भरी एक बस अपने गंतव्य की ओर जा रही थी। अचानक मौसम बहुत खराब हो गया।तेज आंधी और बारिश से चारों ओर अँधेरा सा छा गया। ड्राइवर को रास्ता दिखना भी बहुत मुश्किल हो रहा था। ड्राइवर ईश्वर पर बहुत आस्था रखने वाला व्यक्ति था। उसने किसी तरह सड़क किनारे एक पेड़ के पास गाड़ी रोक दी और यात्रियों से बोला कि मुझे इस बात पर पूरा यकीन है कि इस बस में एक पापी व्यक्ति बैठा हुआ है जिस कारण हम सब पर यह आफत आयी है। इसकी पहचान का एक सरल तरीका है।

🔵 हर आदमी बारी बारी से बस से उतरकर इस पेड़ को छूकर वापस बस में आकर बैठे। जो आदमी पापी होगा उसके छूते ही पेड़ पर बिजली गिर जाएगी और बस के बाकी यात्री सुरक्षित बच जाएँगे। सबसे पहले उसने खुद ऐसा ही किया और यात्रियों से भी ऐसा करने का दबाब बनाने लगा।

🔴 उसके ऐसा करने पर हर यात्री एक दूसरे को ऐसा करने को बोलने लगा। बाकी यात्रियों के दबाब पर एक यात्री बस से उतरा और पेड़ को छूकर जल्दी से बस में अपनी सीट पर आकर बैठ गया। इस तरह एक एक कर सभी यात्रियों ने ऐसा ही किया। अंत में केवल एक यात्री ऐसा करने से बचा रह गया। जब वह पेड़ को छूने के लिए जाने लगा तो सभी उसे ही वह पापी समझकर घृणा से उसे देखने लगे। उस व्यक्ति ने जैसे ही पेड़ को छुआ आकाश में तेज गड़गड़ाहट हुई और बस पर बिजली गिर गयी। बस धू धू कर जलने लगी और कोई भी जीवित नहीं बचा।उधर वह यात्री जिसे सभी पापी समझ रहे थे वह बिल्कुल सुरक्षित था।

*Moral of the story*

🔵 जीवन में कोई भी मुसीबत आने पर हम सभी सबसे पहले ईश्वर को कोसना शुरू कर देते हैं, उसे ही त्याग देते हैं। ये नहीं समझने की कोशिश करते कि उसी ईश्वर के कारण आज हम जिंदा हैं ठीक उसी तरह जैसे कोई भी यात्री यह समझने को तैयार नहीं था कि एक उस यात्री के कारण सबकी जान बची हुई थी। उस यात्री को जैसे ही सबने अपने से अलग किया सभी की जान चली गयी।

🔴 ईश्वर उसी को मुसीबत देता है जिसे वह इस काबिल समझता है कि वह इससे पार पा लेगा। अतः हम पर जब भी कोई मुसीबत आये,चाहे वह मुसीबत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, हमें ईश्वर का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने हमें कम से कम जिंदा तो रखा। अगर जान चली जाती तो न तो हम ईश्वर को कोस पाते और न ही धन्यवाद दे पाते। उसने हमें जिंदा बचाये रखा केवल इसलिए कि हम उसके इस एहसान को स्वीकार करें और अपनी भूल सुधार कर उस मुसीबत से पार पाने का उपाय ढ़ूँढ़ सकें। मुसीबत के समय ईश्वर को कोसने से हमारी मुसीबत कम नहीं हो सकती उलटा।

🔵 अतः मुसीबत के समय ईश्वर को कोसने की बजाय अपनी जान बख्शने के लिए उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें इस मुसीबत को सहने की शक्ति देने के साथ ही इससे बाहर निकालने का रास्ता दिखायें।

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 13)

🌞 पहला अध्याय

🔴 काम, क्रोध, लोभ, मोहादि विकार और इन्द्रिय वासनाएँ मनुष्य के आनन्द में बाधक बनकर उसे दुःखजाल में डाले हुए हैं। पाप और बन्धन की यह मूल हैं। पतन इन्हीं के द्वारा होता है और क्रमशः नीच श्रेणी में इनके द्वारा जीव घसीटा जाता रहता है। विभिन्न अध्यात्म पन्थों की विराट साधनाएँ इन्हीं दुष्ट शत्रुओं को पराजित करने के चक्रव्यूह हैं। अर्जुन रूपी मन को इसी महाभारत में प्रवृत्त करने का भगवान का उपदेश है।

🔴 इस पुस्तक के अगले अध्यायों में आत्म दर्शन के लिए जिन सरल साधनों को बताया गया है, उनकी साधना करने से हम उस स्थान तक ऊँचे उठ सकते हैं, जहाँ सांसारिक प्रवृत्तियों की पहुँच नहीं हो सकती। जब बुराई न रहेगी, तो जो शेष रह जाय, वह भलाई होगी। इस प्रकार आत्मदर्शन का स्वाभाविक फल दैवी सम्पत्ति को प्राप्त करना है। आत्म-स्वरूप का, अहंभाव का आत्यन्तिक विस्तार होते-होते रबड़ के थैले के समान बन्धन टूट जाते हैं और आत्मा-परमात्मा में जा मिलता है।

🔵 इस भावार्थ को जानकर कई व्यक्ति निराश होंगे और कहेंगे-यह तो संन्यासियों का मार्ग है। जो ईश्वर में लीन होना चाहते हैं या परमार्थ साधना करना चाहते हैं, उनके लिए यह साधन उपयोगी हो सकता है। इसका लाभ केवल पारलौकिक है, किन्तु हमारे जीवन का सारा कार्यक्रम इहलौकिक है। हमारा जो दैनिक कार्यक्रम व्यवसाय, नौकरी, ज्ञान-सम्पादन, द्रव्य-उपार्जन, मनोरंजन आदि का है, उसमें से थोड़ा समय पारलौकिक कार्यों के लिए निकाल सकते हैं, परन्तु अधिकांश जीवनचर्या हमारी सांसारिक कार्यों में निहित है। इसलिए अपने अधिकांश जीवन के कार्यक्रम में हम इसका क्या लाभ उठा सकेंगे?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 29 Oct 2016


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 Oct 2016


👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 1)

सन 1958 में परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखित पुस्तक!!
 
🌹 निवेदन!

🔵 आत्म-निर्माण परिवार निर्माण और समाज निर्माण का उद्देश्य लेकर युग-निर्माण योजना नामक एक आध्यात्मिक प्रक्रिया ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों द्वारा जून सन् 63 से आरम्भ की गई है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की अभिनव रचना का लक्ष्य पूरा करने के लिये विगत एक वर्ष से यह आन्दोलन सफलतापूर्वक चल रहा है।

🔴 आन्दोलन के आरम्भ में जन साधारण को उसका स्वरूप समझाने के लिये जो लेख लिखे गये थे उनका संग्रह इस पुस्तक में है। इसलिये पाठकों को ऐसा प्रतीत होगा मानो यह कोई विचाराधीन योजना या किसी भावी कार्यक्रम की कल्पना है। पर वस्तु-स्थिति ऐसी नहीं। गत एक वर्ष से यह पुस्तक छपने तक इस शतसूत्री योजना के यह सभी कार्यक्रम तीन हजार शाखाओं से संगठित परिवार के तीस हजार सदस्यों द्वारा बड़े उत्साहपूर्वक कार्यान्वित किये जा रहे हैं।

🔵 प्रगति जिस आशाजनक और उत्साह पूर्ण कार्यक्रम से हो रही है, उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि किसी समय का यह स्वप्न अगले कुछ ही समय में एक विशाल वृक्ष का रूप धारण करने जा रहा है और युग-निर्माण की बात जो अत्युक्ति जैसी लगती थी अगले दिनों एक सुनिश्चित तथ्य के रूप में मूर्तिमान होने वाली है।

🔴 नव-निर्माण का यह अभिनव आन्दोलन समय की एक अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण पुकार है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के लिये यह योजना अपनाये जाने योग्य है। आशा यही है कि पाठक इस शतसूत्री योजना को न्यूनाधिक रूप में अपनाने का प्रयत्न करेंगे। विज्ञजनों से इन संदर्भ में आवश्यक परामर्श सहयोग, मार्ग-दर्शन एवं आशीर्वाद देने की प्रार्थना है, ताकि आन्दोलन को और भी अधिक सुचारु रूप से चलाया जा सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 28 Oct 2016

🔴 अहंकार  एक विषैले सर्प की तरह  अंतःकरण में ही छिपा बैठा रहता है और अवसर पाते ही आघात कर देता हे। इसके दंश से मनुष्य की सद्बुद्धि मूर्छित हो जाती है और तब वह न करने योग्य काम करता हुआ अपने आपको आपत्तियों में डाल लेता है। अहंकार एक नहीं, हजारों आपत्तियों की मूल है।

🔵 धर्म की स्थापना में राजनीति का सहयोग आवश्यक है और राजनीति के मदोन्मत्त हाथी पर धर्म का अंकुश रहना चाहिए। दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। दोनों में उपेक्षा या असहयोग की प्रवृत्ति नहीं, वरन् घनिष्ठता एवं परिपोषण का तारतम्य जुड़ा रहना चाहिए।

🔴 मनुष्य अपना शिल्पी आप है। वह स्वयं ही आपना निर्माण करता है। आत्म तत्त्व की रक्षा ही सर्वोत्कृष्ट निर्माण माना गया है। इस निर्माण के लिए मनुष्य को सत्य तथा वास्तविक नीति का अवलम्बन करना चाहिए। सत्य मानव जीवन की सफलता के लिए सर्वोत्तम नीति है। इसको अपनाकर चलने वाले किसी भी दिशा और किसी भी क्षेत्र में अपना स्थान बनाकर अंत में परम पद के अधिकारी बनते हैं।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...