गुरुवार, 29 नवंबर 2018

👉 जीवन में सफलता चाहते हैं तो माता-पिता का आदर करो

🔷 माता-पिता ने तुम्हारे पालन-पोषण में कितने कष्ट सहे हैं! भूलकर भी कभी अपने माता-पिता का तिरस्कार नहीं करना। वे तुम्हारे लिए आदरणीय हैं। उनका मान-सम्मान करना तुम्हारा कर्तव्य है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवता कहा गया है: मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। भगवान गणेश माता-पिता की परिक्रमा करके ही प्रथम पूज्य हो गये।

🔶 श्रवण कुमार ने माता-पिता की सेवा में अपने कष्टों की जरा भी परवाह न की और अंत में सेवा करते हुए प्राण त्याग दिये।देवव्रत भीष्म ने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया और विश्वप्रसिद्ध हो गये।

🔷 एक पिता अपने छोटे-से पुत्र को गोद में लिये बैठा था। एक कौआ सामने छज्जे पर बैठ गया। पुत्र ने पूछा: ‘‘पापा! यह क्या है?’’ पिता ने बताया: ‘‘कौआ है।’’ पुत्र ने फिर पूछा: ‘‘यह क्या है?’’ पिता ने कहा: ‘‘कौआ है। ’’पुत्र बार-बार पूछता: ‘‘पापा! यह क्या है? ’’पिता स्नेह से बार-बार कहता: ‘‘बेटा! कौआ है कौआ! ’’कई वर्षों के बाद पिता बूढ़ा हो गया। एक दिन पिता चटाई पर बैठा था। घर में कोई उसके पुत्र से मिलने आया। पिता ने पूछा: ‘‘कौन आया है? ’’पुत्र ने नाम बता दिया। थोड़ी देर में कोई और आया तो पिता ने फिर पूछा। पुत्र ने झल्लाकर कहा: ‘‘आप चुपचाप पड़े क्यों नहीं रहते! आपको कुछ करना-धरना तो है नहीं, ‘कौन आया-कौन गया’ दिन भर यह टाँय-टाँय क्यों लगाये रहते हैं?’’

🔶 पिता ने लम्बी सांस खींची, हाथ से सिर पकड़ा। बड़े दुःख भरे स्वर में धीरे-धीरे कहने लगा: ‘‘मेरे एक बार पूछने पर तुम कितना क्रोध करते हो और तुम दसों बार एक ही बात पूछते थे कि यह क्या है? मैंने कभी तुम्हें झिड़का नहीं। मैं बार-बार तुम्हें बताता: बेटा! कौआ है।’’

🔷 माता-पिता ने तुम्हारे पालन-पोषण में कितने कष्ट सहे हैं! कितनी रातें मां ने तुम्हारे लिए गीले में सोकर गुजारी हैं, तुम्हारे जन्म से लेकर अब तक और भी कितने कष्ट तुम्हारे लिए सहन किये हैं, तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। कितने-कितने कष्ट सहकर तुमको बड़ा किया और अब तुमको वृद्ध माता-पिता को प्यार से दो शब्द कहने में कठिनाई लगती है!

🔶 पिता को ‘पिता’ कहने में भी शर्म आती है! अभी कुछ वर्ष पहले की बात है - इलाहाबाद में रहकर एक किसान का बेटा वकालत की पढ़ाई कर रहा था। बेटे को शुद्ध घी, चीज-वस्तु मिले,बेटा स्वस्थ रहे इसलिए पिता घी, गुड़, दाल-चावल आदि सीधा-सामान घर से दे जाते थे। एक बार बेटा अपने दोस्तों के साथ चाय-ब्रेड का नाश्ता कर रहा था। इतने में वह किसान पहुंचा। धोती फटी हुई, चमड़े के जूते, हाथ में डंडा,कमर झुकी हुई... आकर उसने गठरी उतारी।

🔷 बेटे को हुआ, ‘बूढ़ा आ गया है, कहीं मेरी इज्जत न चली जाय!’ इतने में उसके मित्रों ने पूछा: ‘‘यह बूढ़ा कौन है?’’ लड़के ने कहा :यह तो मेरा नौकर है।
लड़के ने धीरे से कहा किंतु पिता ने सुन लिया। वृद्ध किसान ने कहा: ‘‘भाई! मैं नौकर तो जरूर हूँ लेकिन इसका नौकर नहीं हूँ, इसकी मां का नौकर हूँ। इसीलिए यह सामान उठाकर लाया हूँ।’’

🔶 यह अंग्रेजी पढ़ाई का फल है कि अपने पिता को मित्रों के सामने ‘पिता’ कहने में शर्म आ रही है, संकोच हो रहा है! ऐसी अंग्रेजी पढ़ाई और आडम्बर की ऐसी-की-तैसी कर दो, जो तुम्हें तुम्हारी संस्कृति से दूर ले जाय!

🔷 पिता तो आखिर पिता ही होता है, चाहे किसी भी हालत में हो। प्रह्लाद को कष्ट देनेवाले दैत्य हिरण्यकशिपु को भी प्रह्लाद कहता है: ‘पिताश्री!’ और तुम्हारे लिए तनतोड़ मेहनत करके तुम्हारा पालन-पोषण करनेवाले पिता को नौकर बताने में तुम्हें शर्म नहीं आती!

🔶 माता-पिता व गुरुजनों की सेवा करने वाला और उनका आदर करनेवाला स्वयं चिर आदरणीय बन जाता है। जो बच्चे अपने माता-पिता का आदर-सम्मान नहीं करते, वे जीवन में अपने लक्ष्य को कभी प्राप्त नहीं कर सकते।

👉 आज का सद्चिंतन 29 November 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 November 2018

👉 "Avoid Wailing Over Circumstances

🔷 Instead of making big plans, the utilization of available tools and working on whatever small tasks are on our hands, can provide a sound footing for progress. It is far better to plunge into work with minimum available resources, rather than waiting for comfortable situation and abundance of instruments. For any task, small or big, success does not depend on tools and resources, but untiring efforts, perseverance and honesty are the roots for success.

🔶 If we see, all noble rich people of the world have risen from a very ordinary situation to the amazing level. Situations were always unfavorable and tools were limited, but with their sincere efforts and right attitude, they reached the pinnacle of success. Had they kept wailing over circumstances, they would have been sitting idle even today, pampering the mind in imagination of illusive riches.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Aacharya
📖 Not a Big-Shot, Be Super-Human, Page 13

👉 मन निर्मल तो दु:ख काहे को होय

🔷 इस जगत में व्याप्त हर प्राणी अपने आपको सुखी रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन प्रयास व्यर्थ हो जाता है। जब तक हम अपने चंचल मन को वश में नहीं कर लेते तब तक हम सुख की अनुभूति नहीं प्राप्त कर सकते। सुख प्राय: दो तरह के होते हैं, दिव्यानुभूति सुख और आत्मिक सुख। आत्मिक सुख को हम भौतिक सुख के सन्निकट रख सकते हैं। दिव्यानुभूति सुख के लिए इस सांसारिक जगत के मोह से ऊपर उठना होता है, लेकिन भौतिक सुख के लिए मन का संतुलित होना आवश्यक है। खुशी सुखी मन का संवाहक होती है। एक संतुलित मन हमेशा प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है, जो सुख का कारण बनता है। अपने आपको खुश रखने की कोशिश करने वाला इंसान अपने कर्तव्यों और दायित्वों से बंधा होता है। लेकिन, जो इंसान अपने मन को वश में नहीं रखता, वह परिस्थिति में विचलित हो जाता है और विचलित मन खुशी की अनुभूति नहीं कर सकता।

🔶 मन को संतुलित रखने के लिए जीवन में नित्य अभ्यास की जरूरत होती है। अपने मन को कभी-कभी हम इतना भारी कर लेते हैं कि घुटन-सी होने लगती है। प्राकृतिक गुणों के हिसाब से हल्की चीजें सदैव ऊपर होती हैं। जब मन हल्का होने लगता है, तब वह धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ जाता है और मन स्वच्छ एवं निर्मल प्रतीत होने लगता है। निर्मल मन वाला व्यक्ति हर चीज की बारीकियों को इसी तरह समझने लगता है। उसके बाद वह संसार के द्वंद्व से मुक्त हो जाता है और सुख का आभास करने लगता है।

🔷 कभी-कभी बहुत आगे की सोच हमें भयाक्रांत कर देती है। इस क्षणभंगुर दुनिया में जो भी घटता है वह परमात्मा की इच्छानुरूप घटित होता है। इसलिए स्वयं को निमित्तमात्र समझकर अपने कर्त्तव्य-पथ पर चलकर इस सुख का अनुभव कर सकते हैं। भविष्य हमारे हाथ में नहीं होता। रात्रिकाल के बाद सुबह का सूर्य देखना भी परमात्मा के निर्देशानुसार होता है। प्रलय, तूफान, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं और आतंकवादी हमलों जैसी मानवकृत घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि किसी भी पल कुछ भी हो सकता है। मनुष्य चाहे जो करे, लेकिन इन घटनाओं के सामने नि:सहाय हो जाता है। इसलिए सिर्फ अपने कत्र्तव्यों का निर्वाह करते रहना चाहिए।

🔶 अपने जीवन को सुखद बनाने के लिए सबसे पहले अपने आस-पड़ोस के लोगों को सुखी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। आचरण से ही वातावरण का निर्माण होता है। दूसरों को खुशी देकर हम अपनी खुशी को भी कई गुणा बढ़ा लेते हैं। सांसारिक लिप्ता में लिप्त व्यक्तियों के लिए दूसरों की खुशी उसके स्वयं के दुखी होने का कारण बन जाती है। एक  सुंदर कोठी में रहने वाली और स्वयं एक अच्छी नौकरी करने वाली महिला, एक कामवाली को प्रतिदिन ध्यान से देखा करती थी। उस महिला को प्रतिदिन उसका पति छोडऩे के लिए और काम समाप्त होने के बाद उसे लेने के लिए आता था। इसे देखकर कोठी वाली महिला बहुत व्यथित रहती थी। उसे इस बात का दु:ख था कि एक काम करने वाली महिला भी उससे अधिक खुश है। वह सोचती रहती थी इतना धन होने के बावजूद उसके पति के पास उसके लिए समय नहीं है। इस धन-संपदा का क्या अर्थ है, जब अपने पति के साथ अधिकांश समय नहीं गुजार सकती। इस बात को लेकर वह महिला अपने पति के साथ अक्सर झगड़ा करने लगी। एक दिन महिला ने देखा कि काम करने वाली महिला का हाथ टूटा हुआ है। वह अचंभित हुई। दूसरे लोगों से ज्ञात हुआ कि कामवाली महिला का पति उस पर बहुत अत्याचार करता था। उसके पति को डर था कि इसके कारण उसकी पत्नी उसे छोड़कर न चली जाए, इसलिए वह सुबह-शाम उसे लेकर आता और लेकर जाता था। सत्य को जानकर महिला को बहुत पश्चताप हुआ।

🔷 कभी-कभी हम दूसरों को देखकर अपनी स्थिति की तुलना उसके साथ करने लगते हैं। यह भी दुख का कारण बनता है। दरअसल सुख और दुख हमारे मन के ही अंदर होते हैं। सच्चे मन से और दूसरों के साथ प्रेमपूर्वक मिलकर परिश्रम करने वाले इंसान के पास कभी दु:ख पहुंच ही नहीं सकता।

👉 "परिस्थितियों का रोना न रोयें

🔷 लंबी-चौड़ी योजनाएँ बनाने की अपेक्षा अपने पास मौजूद साधनों को लेकर ही छोटे-मोटे कार्यों में जुट जाया जाए तो भी प्रगति का सशक्त आधार बन सकता है। परिस्थितियाँ अनुकूल होंगी - साधनों का बाहुल्य होगा, तब व्यवसाय आरंभ करेंगे, यह सोचते रहने की तुलना में अपने अल्प साधनों को लेकर काम में जुट जाना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। काम छोटा हो अथवा बड़ा उसमें सफलता के कारण, साधन नहीं, अथक पुरुषार्थ, लगन एवं प्रामाणिकता बनते हैं ।

🔶 देखा जाए तो विश्व के सभी मूर्धन्य संपन्न सामान्य स्थिति से उठकर असामान्य तक पहुँचे। साधन एवं परिस्थितियाँ तो प्रतिकूल ही थीं, पर अपनी श्रमनिष्ठा एवं मनोयोग के सहारे सफलता के शिखर पर जा चढ़े। वे यदि परिस्थितियों का रोना रोते रहते तो अन्य व्यक्तियों के समान ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते और संपन्न बनने की कल्पना में मन बहलाते रहते।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृष्ठ 13

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...