सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग १) प्राक्कथन

👉 प्राक्कथन

भारतीय इतिहास-पुराणों में ऐसे अगणित उपाख्यान है, जिनसे मनुष्य के सम्मुख आने वाली अगणित समास्याओं के समाधान विघमान है। उन्हीं में से सामयिक परिस्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कुछ का ऐसा चयन किया गया है,जो युग समस्याओं के समाधान में आज की स्थिति के अनुरुप योगदान दे सकें।

सर्ववदित है कि दार्शनिक और विवेचनात्मक प्रवचन-प्रतिपादन उन्हीं के गले उतरते है,जिनकी सुविकसित मनोभूमि है, परंतु कथानकों की यह विशेषता है कि बाल, वृद्ध, नर-नारी, शिक्षित अशिक्षित सभी की समझ में आते है और उनके आधार पर ही किसी निष्कर्ष तक पहूँच सकना सम्भव होता है। लोकरंजन के साथ लोकमंगल का यह सर्वसुलभ लाभ है।

कथा साहित्य की लोकप्रियता के संबंध में कुछ कहना व्यर्थ होगा। प्राचीन काल १८ पुराण लिखे गए। उनसे भी कान न चला तो १८ उपपुराणों की रचना हुई। इन सब में कुल  मिलाकर १०,०००,००० श्लोक है,जबकी चारों वेदों में मात्र बीस हजार मंत्र है। इसके अतिरिक्त भी संसार भर में इतना कथा साहित्य सृजा गया है कि उन सबको तराजू के एक पलड़े पर रखा जाय और अन्य साहित्य को दूसरे पर तो  कथाएँ ही भरी पड़ेगी। फिल्मों की लोकप्रियता का कारण भी उनके कथानक ही है।

समय परिवर्तनशील है। उसकी परिस्थितियों मान्यताएँ, प्रथाएँ,समस्याएँ एवं आवश्यकताऐं भी बदलती रहती है। तदनुरुप ही उसके समाधान खोजने पड़ते है। इस शाश्वत सृष्टिक्रम को ध्यान में रखते हुए ऐसे युग साहित्य की आवश्यकता पड़ती रही है। जिसमें प्रस्तुत प्रसंगों से उपयुक्त प्रकाश एवं मार्गदर्शन उपलब्ध हो सके। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अनुकानेक मन:स्थिति वालों के लिए उनकी परिस्थिति के अनुरुप समाधान ढूँढ़ निकालने में सुविधा दे सकने की दृष्टि से इस ग्रंथ के सृजन का प्रयास किया गया है।

भविष्य का हमारा कार्यक्रम एवं जीवन काल अनिश्चित है। लेखनी तो सतत क्रियाशील रहेगी, चिन्तन हमारा ही सक्रिया रहेगा, हाथ भले ही किन्हीं के भी हों । यदि अवसर मिल सका, तो और भी अनेकों खण्ड प्रकाशित होते चले जायेंगे। कामना तो यह है कि युग पुराण के प्रज्ञा-पुराणों  के भी पुरातन १८ पुराणों की तरह १८ खण्डों का सृजन बन पड़े।

संस्कृत श्लोकों तथा उसके अथों के उपनिषद् पक्ष के साथ उसकी व्याख्या एवं कथानकों के प्रयोजनों का स्पष्टीकरण करने का प्रयास इस पुराण में किया गया है। वस्तुत; इसमें युग दर्शन का मर्म निहित है। सिद्धांतों एवं तथ्यों को महत्व देने वालों के लिए यह अंग भी समाधानकारक होगा। जो संस्कृत नहीं जानते, उनके लिए अर्थ व उसकी व्याख्या पढ़ लेने से भी काम चल सकता है। इन श्लोकों की रचना नवीन है, पर जिन तथ्यों का समावेश किया गया है, वे शाश्वत है।

प्रस्तुत ग्रन्थ का पठन निजी स्वाध्याय के रूप में भी किया जा सकता है और सामूहिक सत्संग के रूप में भी। रात्रि के समय पारिवारिक लोक शिक्षण की दृष्टि से भी इसका उपयोग हो सकता है। बच्चे कथाऐं सुनने को उत्सुक रहते हैं। बड़ों को धर्म परम्पराऐं समझने की इच्छा रहती है। इनकी पूर्ति भी घर में इस आधार पर कथा क्रम और समय निर्धारित करके की जा सकती है।

प्रथम खण्ड में युग समस्याओं के कारण उद्भूत आस्था संकट का विवरण है एवं उससे उबर कर प्रज्ञा युग लाने की प्रक्रिया रूपी अवतार सत्ता द्वारा प्रणीत सन्देश है । भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण से जूझने हेतु अध्यात्म दर्शन को किस तरह व्यावहारिक रूप से अपनाया जाना चाहिए, इसकी विस्तृत व्याख्या है एवं अन्त में महाप्रज्ञा के अवलम्बन से संभावित सतयुगी परिस्थितियों की झाँकी है ।

✍🏻 प्रज्ञा पुराण (भाग १)
📖 श्रीराम शर्मा आचार्य


Sansaar Me Sabhi Tarah Ke Log Hai
Dr Chinmay Pandya
👇👇👇
https://youtu.be/pZ3oeh9CPp0

👉 इंकार,,

एक नदी के किनारे दो पेड़ थे,, उस रास्ते एक छोटी सी चिड़िया गुजरी और,, पहले पेड़ से पूछा,,

बारिश होने वाला है,, क्या मैं, और मेरे बच्चे तुम्हारे टहनी में घोसला बनाकर रह सकते हैं,, लेकिन उस पेड़ ने मना कर दिया,, चिड़िया फिर दूसरे पेड़ के पास गई और वही सवाल पूछा,,

दूसरा पेड़ मान गया,,
चिड़िया अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी दूसरे पेड़ में घोसला बना कर रहने लगी,,

एक दिन इतनी अधिक बारिश हुई कि बारिश की वजह से पहला पेड़ जड़ से उखड़ कर पानी मे बह गया,, जब चिड़िया ने उस पेड़ को बहते हुए देखा तो कहा,,

जब तुमसे मैं और मेरे बच्चे, शरण के लिये आये तब तुमने मना कर दिया था,, अब देखो तुम्हारे उसी रूखे बर्ताव की सजा तुम्हे मिल रही है,,

जिसका उत्तर पेड़ ने मुस्कुराते हुए दिया,, मैं जानता था मेरी जड़ें कमजोर है,, और इस बारिश में मै टिक नहीं पाऊंगा,, मैं तुम्हारी और बच्चे की  जान खतरे में नहीं डालना चाहता था,, मना करने के लिए मुझे क्षमा कर दो,, और ये कहते-कहते पेड़ बह गया,,

किसी के इंकार को, हमेशा उनकी कठोरता न समझे,, 
क्या पता उसके उसी इंकार से आप का भला हो,,
कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाए,,


Adhyatam Ke Sutra
Dr Chinmay Pandya
👇👇👇
https://youtu.be/cWLiKhV9YiM
 

👉 कर सकते थे, किया नहीं

रावण तथा विभीषण एक ही कुल में उत्पन्न हुए सगे भाई थे, दोनों विद्वान- पराक्रमी थे। एक ने अपनी दिशा अलग चुनी व दूसरे ने प्रवाह के विपरीत चलकर अनीति से टकराने का साहस किया। धारा को मोड़ सकने तक की क्षमता भगवान ने मनुष्य को दी ही इसलिए है ताकि वह उसका सहयोगी बन सके।

भगवान ने मनुष्य को इच्छानुसार वरदान माँगने का अधिकार भी दिया है। रावण शिव का भक्त था। उसने अपने इष्ट से वरदान सामर्थ्यवान होने का माँगा पर साथ ही यह भी कि मरूँ तो मनुष्य के हाथों। उसकी अनीति को मिटाने, उसका संहार करने के लिए स्वयं भगवान को राम के रूप में जन्म लेना पड़ा। राम शिव के इष्ट थे। यदि असाधारण अधिकार प्राप्त रावण प्रकाण्ड विद्वान् होते हुए भी अपने इष्ट भगवान शिव से सत्परामर्श लेना नहीं चाहता तो अन्त तो उसका सुनिशित होगा ही। यह भगवान का सहज रूप है जो मनुष्य को स्वतन्त्र इच्छा देकर छोड़ देता है।

जीव विशुद्ध रूप में जल की बूँद के समान इस धरती पर आता है। एक ओर जल की बूँद धरती पर गिरकर कीचड बन जाती हैं व दूसरी ओर जीव माया में लिप्त हो जाता है। यह तो जीव के ऊपर है जो स्वयं को माया से दूर रख समुद्र में पडी बूंद के आत्म विस्तरण की तरह सर्वव्यापी हो मेघ बनकर समाज पर परमार्थ की वर्षा करे अथवा कीचड़ में पड़ा रहे।

मनुष्य को इस विशिष्ट उपलब्धि को देने के बाद विधाता ने यह सोचा भी नहीं होगा कि वह ऊर्ध्वगामी नहीं उर्ध्वगामी मार्ग चुन लेगा। अन्य जीवों, प्राणियों का जहाँ तक सवाल है वे तो बस ईश्वरीय अनुशासन- व्यवस्था के अन्तर्गत अपना प्राकृतिक जीवनक्रम भर पूरा कर पाते हैं। आहार ग्रहण, विसर्जन- प्रजनन यही तक उनका जीवनोद्देश्य सीमित रहता है। परन्तु बहुसंख्य मानव ऐसे होते हैं जो इन्हीं की तरह जीवन बिताते और अदूरदर्शिता का परिचय देते सिर धुन-  धुनकर पछताते देखे जाते हैं। इनकी तुलना चासनी में कूद पड़ने वाली मक्खी से की जा सकती है।

चासनी के कढाव को एक बारगी चट कर जाने के लिए आतुर मक्खी बेतरह उसमें कूदती है और अपने पर- पैर उस जंजाल में लपेट कर बेमौत मरती है। जबकि समझदार मक्खी किनारे पर बैठ कर धीरे- धीरे स्वाद लेती, पेट भरती और उन्मूक्त आकाश में बेखटके बिचरती है। अधीर आतुरता ही मनुष्य को तत्काल कुछ पाने के लिए उत्तेजित करती है और उतने समय तक ठहरने नहीं देती जिसमें कि नीतिपूर्वक उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सरलतापूर्वक सम्भव हो सके।

मछली वंशी में लिपटी आटे की गोली भर को देखती है। उसे उतना अवकाश या धीरज नहीं होता कि यह ढूँढ़- समझ सके कि इसके पीछे कहीं कोई खतरा तो नहीं है। घर बैठे हाथ लगा प्रलोभन उसे इतना सुहाता है कि गोली को निगलते ही बनता है। परिणाम सामने आने में देर नहीं लगती। काँटा आँतों में उलझता है और प्राण लेने के उपरान्त ही निकलता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग १



Hamara Samarpan Kitna Ghara Hai
Dr Chinmay Pandya
👇👇👇
https://youtu.be/rtRzgdg1Wxk

👉 आज का सद्चिंतन 11 Feb 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Feb 2019

अपनी भूलों को स्वीकार कीजिए

जब मनुष्य कोई गलती कर बैठता है, तब उसे अपनी भूल का भय लगता है। वह सोचता है कि दोष को स्वीकार कर लेने पर मैं अपराधी समझा जाऊँगा, लोग मुझे बुरा भला कहेंगे और गलती का दंड भुगतना पड़ेगा। वह सोचता है कि इन सब झंझटों से बचने के लिए यह अच्छा है कि गलती को स्वीकार ही न करूँ, उसे छिपा लूँ या किसी दूसरे के सिर मढ़ दूँ।

इस विचारधारा से प्रेरित होकर काम करने वाले व्यक्ति भारी घाटे में रहते हैं। एक दोष छिपा लेने से बार- बार वैसा करने का साहस होता है और अनेक गलतियों को करने एवं छिपाने की आदत पड़ जाती है। दोषों के भार से अंतःकरण दिन- दिन मैला, भद्दा और दूषित होता जाता है और अंततः: वह दोषों की, भूलों की खान बन जाता है। गलती करना उसके स्वभाव में शामिल हो जाता है।

भूल को स्वीकार करने से मनुष्य की महत्ता कम नहीं होती वरन् उसके महान आध्यात्मिक साहस का पता चलता है। गलती को मानना बहुत बड़ी बहादुरी है। जो लोग अपनी भूल को स्वीकार करते हैं और भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा करते हैं वे क्रमश: सुधरते और आगे बढ़ते जाते हैं। गलती को मानना और उसे सुधारना, यही आत्मोन्नति का सन्मार्ग है। तुम चाहो, तो अपनी गलती स्वीकार कर निर्भय, परम नि:शंक बन सकते हो।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अप्रैल 1946 पृष्ठ 1 


Chalo Phir Se Nirdosh Bante Hai
Dr Pranav Pandya
👇👇👇
https://youtu.be/ytZUHnKAo5k

👉 Scientific Spirituality

Scientific spirituality is a virtuous fusion of scientific outlook and spiritual vision. In the scientific attitude, there is no place for prejudice, traditions, superstitions or dogma. Herein only those thoughts and actions are honored that are logical, appropriate and aim at investigating the truth. Instead of a convention or tradition, only the results of experimental findings are considered authentic. In short, the scientific outlook relies more on discernment than tradition. The seer of Manduka Upnishada declares the same as ‘Satyameva Jayate’ (meaning -Truth alone triumphs).

This scientific outlook is perfected by the refined perception of the spiritual values of life. It is this perception that gives birth to all kinds of noble virtues. Wherever this perception is absent, nobility will also be absent there. Sometimes, due to confusion, the truth and this kind of inner vision are considered irreconcilably opposite. Truth and intuitive vision, like science and spirituality, are not opposite but complementary to each other. The truth makes the perception resolute and the perception makes truth purposeful.

The continuity of the experiments of scientific spirituality keeps the life busy in finding truth without losing the intuitive awareness of reality. It maintains a balance between the genius of a scientist and the intuition of a saint present in a human being. If this practice



Chota Sankalp Bhi Kese Bada Ho Sakta Hai
Dr Chinmay Pandya
👇👇👇
https://youtu.be/h7gipKIQeXQ

👉 तृष्णाएँ छोड़ो

कामनाएँ पूर्ण होने पर भी संतोष नहीं होता, वरन् पहले से भी और अधिक प्यास बढ़ती है। कहते हैं कि मनुष्य अपूर्ण हैं, किंतु यदि वह अपनी वासनाएँ छोड़ दे, तो इसी जीवन में पूर्ण हो सकता है। तृष्णा एक बंधन है, जो आत्मा को जन्म-मरण के जाल में जकड़े हुए हैं। जिसे सांसारिक वस्तुओं की तृष्णा हरदम सताती रहती है, भला वह भवबंधनों से किस प्रकार पार हो सकेगा? प्रपंच का फेरा तभी तब है जब तक कि विभिन्न प्रकार की इच्छाओं ने प्राणी को बाँध रखा है।

जिन्हें मुक्ति की आकांक्षा है, जिन्हें पूर्ण सत्य की खोज करनी है, उनके लिए सर्वोत्तम साधन यह है कि अपनी इच्छा को वश में करें। इस संसार में संतोष से बढ़ कर और कोई धन नहीं है। स्वर्ग में भी कोई संपदा इसकी समता नहीं कर सकती। कोई मनुष्य देखने में कितना ही स्वाधीन क्यों न प्रतीत हो, पर वह बेचारा वास्तव में एक कैदी के समान है, जिसके मन में तृष्णा का डेरा पड़ा हुआ है। चाहे वह कितना ही बड़ा धनी क्यों न हो, भिखारी से ही उसकी तुलना की जा सकती है।

यदि तुम संसार में कुछ श्रेष्ठ कर्म करना चाहते हो तो आवश्यक है कि तृष्णा और वासनाओं का परित्याग कर दो। कर्म करो, अपने कर्त्तव्य में त्रुटि मत रखो, परंतु फल के लिए प्यासे मत फिरो। जो करेगा उसे मिलेगा, किंतु जो पाने के लिए व्याकुल फिरेगा, उसे आपत्तियों के पहाड़ सिर पर उठाने पड़ेंगे।

📖 अखण्ड ज्योति -मार्च 1942


Bachho Jaisa Jivan Jiye
Dr Pranav Pandya
👇👇👇
https://youtu.be/282b7qWexVs

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...