सोमवार, 17 सितंबर 2018

👉 जीवन जीने की कला...

🔷 एक नगर में एक जुलाहा रहता था। वह स्वाभाव से अत्यंत शांत, नम्र तथा वफादार था। उसे क्रोध तो कभी आता ही नहीं था। एक बार कुछ लड़कों को शरारत सूझी। वे सब उस जुलाहे के पास यह सोचकर पहुँचे कि देखें इसे गुस्सा कैसे नहीं आता?

🔶 उन में एक लड़का धनवान माता-पिता का पुत्र था। वहाँ पहुँचकर वह बोला यह साड़ी कितने की दोगे? जुलाहे ने कहा - दस रुपये की।

🔷 तब लडके ने उसे चिढ़ाने के उद्देश्य से साड़ी के दो टुकड़े कर दिये और एक टुकड़ा हाथ में लेकर बोला - मुझे पूरी साड़ी नहीं चाहिए, आधी चाहिए। इसका क्या दाम लोगे?

🔶 जुलाहे ने बड़ी शान्ति से कहा पाँच रुपये। लडके ने उस टुकड़े के भी दो भाग किये और दाम पूछा ?जुलाहे अब भी शांत था। उसने बताया - ढाई रुपये। लड़का इसी प्रकार साड़ी के टुकड़े करता गया। अंत में बोला - अब मुझे यह साड़ी नहीं चाहिए। यह टुकड़े मेरे किस काम के ?

🔷 जुलाहे ने शांत भाव से कहा - बेटे ! अब यह टुकड़े तुम्हारे ही क्या, किसी के भी काम के नहीं रहे। अब लडके को शर्म आई और कहने लगा - मैंने आपका नुकसान किया है। अंतः मैं आपकी साड़ी का दाम दे देता हूँ।

🔶 संत जुलाहे ने कहा कि जब आपने साड़ी ली ही नहीं तब मैं आपसे पैसे कैसे ले सकता हूँ? लडके का अभिमान जागा और वह कहने लगा कि, मैं बहुत अमीर आदमी हूँ। तुम गरीब हो। मैं रुपये दे दूँगा तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर तुम यह घाटा कैसे सहोगे? और नुकसान मैंने किया है तो घाटा भी मुझे ही पूरा करना चाहिए।

🔷 संत जुलाहे मुस्कुराते हुए कहने लगे - तुम यह घाटा पूरा नहीं कर सकते। सोचो, किसान का कितना श्रम लगा तब कपास पैदा हुई। फिर मेरी स्त्री ने अपनी मेहनत से उस कपास को बीना और सूत काता। फिर मैंने उसे रंगा और बुना। इतनी मेहनत तभी सफल हो जब इसे कोई पहनता, इससे लाभ उठाता, इसका उपयोग करता। पर तुमने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। रुपये से यह घाटा कैसे पूरा होगा? जुलाहे की आवाज़ में आक्रोश के स्थान पर अत्यंत दया और सौम्यता थी।

🔶 लड़का शर्म से पानी-पानी हो गया। उसकी आँखे भर आई और वह संत के पैरो में गिर गया।

🔷 जुलाहे ने बड़े प्यार से उसे उठाकर उसकी पीठ पर हाथ फिराते हुए कहा - बेटा, यदि मैं तुम्हारे रुपये ले लेता तो है उस में मेरा काम चल जाता। पर तुम्हारी ज़िन्दगी का वही हाल होता जो उस साड़ी का हुआ। कोई भी उससे लाभ नहीं होता।साड़ी एक गई, मैं दूसरी बना दूँगा। पर तुम्हारी ज़िन्दगी एक बार अहंकार में नष्ट हो गई तो दूसरी कहाँ से लाओगे तुम? तुम्हारा पश्चाताप ही मेरे लिए बहुत कीमती है।

🔶 संत की उँची सोच-समझ ने लडके का जीवन बदल दिया। ये कोई और नहीं ये सन्त थे कबीर दास जी

👉 आज का सद्चिंतन 17 September 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 September 2018


👉 परिवर्तन के महान् क्षण (भाग 13)

👉 लेखक का निजी अनुभव
 

🔷 सत्य और तथ्य को कैसे जाना, परखा जाए? इसके लिए भौतिक क्षेत्र को आदर्शों के साथ जोड़ने पर क्या परिणाम निकल सकता है, इसकी खोजबीन करने का काम दूसरों के जिम्मे छोड़कर इन पंक्तियों के लेखक ने अपनी अभिरुचि, जानकारी एवं रुझान के अनुरूप यही उपयुक्त समझा कि वह अपने छोटे-से जीवन और थोड़े-से समय, साधन का उपयोग इस प्रयोजन विशेष के लिए कर गुजरे कि जब शरीर से प्राण श्रेष्ठ हैं तो फिर भौतिक-सम्पदा की तुलना में प्राण चेतना को वरिष्ठता का गौरव क्यों न प्राप्त होना चाहिए? अगले दिनों सतयुग की वापसी के लिए नए सिरे से नया प्रयत्न क्यों न होना चाहिए? खोज के लिए प्रयोगशाला चाहिए, साधन और उपकरण भी। यह सभी अपने ही काय-कलेवर में उपलब्ध किये जाने चाहिए और देखा जाना चाहिए कि परिष्कृत अध्यात्म व्यक्ति एवं संसार के लिए उपयोगी हो सकता है क्या?
  
🔶 भौतिक विज्ञानियों में से अनेकों ने अपनी अभीष्ट खोज के लिए प्राय: पूरी जिन्दगी लगा दी और लक्ष्य तक पहुँचने में उतावली नहीं बरती, तो परिष्कृत अध्यात्म का स्वरूप खोजने और परिणामों की जाँच-पड़ताल करने के लिए एक व्यक्ति की एक जिन्दगी यदि पूरी तरह लग जाए तो उसे घाटे का सौदा नहीं कहा जा सकता।
  
🔷 इन पंक्तियों का लेखक अपनी जिन्दगी के प्राय: अस्सी बरस पूरे करने जा रहा है। उसने उस पुरातन अध्यात्म को खोज निकालने के लिए अपने चिन्तन, समय, श्रम एवं पुरुषार्थ को मात्र एक केन्द्र पर केन्द्रित किया है कि यदि पुरातन काल का सतयुगी अध्यात्म सत्य है, यदि ऋषियों की उपलब्धियाँ सत्य हैं, तो उनका वास्तविक स्वरूप क्या रहा होगा और उसके प्रयोग से ऋद्धि-सिद्धि जैसे परिणामों का हस्तगत कर सकना क्यों कर सम्भव हुआ होगा? अनुमान था कि कहीं कोई खोट घुस पड़ने पर ही शाश्वत सत्य को झुठलाये जाने का कोई अनर्थ मार्ग में न अड़ गया हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 परिवर्तन के महान् क्षण पृष्ठ 16

👉 Living The Simple Life (Part 3)

🔷 One outfit of clothing is enough. That’s all I’ve owned since my pilgrimage started in 1953. And I take good care of my things. I can always find a wash basin in a public restroom or a nearby stream to wash my clothes, and drying them is even easier: I just put them on and let the energy from the sun evaporate any dampness.

🔶 I wash my skin only with water; soap removes the natural oils. So do the cosmetics and creams most women use. The only footwear I need is an inexpensive pair of blue sneakers. They have soft fabric tops and soft rubber-like soles. I get them one size too large so I can wiggle my toes. I feel as free as though I were barefoot! And I can usually get 1,500 miles to a pair. I wear a pair of navy blue socks. There’s a reason why I chose navy blue for my wearing apparel - it’s a very practical color, doesn’t show dirt, and the color blue does represent peace and spirituality.

🔷 I don’t discard any article of wear until it becomes worn to the extent of being unusable. Once when I was about to leave town a hostess said, ‘‘Peace, I noticed your shoes were in need of repair, and I would have offered to repair them, but I know so much about sewing that I knew they couldn’t be repaired.’’ I said to her, ‘‘It’s a good thing I know so little about sewing that I didn’t know they couldn’t be repaired – so I just finished repairing them.’’

To be continued...

👉 मन को उद्विग्न न कीजिए (अन्तिम भाग)

🔷 महर्षि पातंजली ने व्यवहारिक जीवन में सफलता की कुञ्जी दे दी है:—
मैत्रीकरुणामुदितो पेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य विषयाणां भावनातश्चिप्रसादनम्।
(समाधिपाद 33)

🔶 अर्थात्—हमें चाहिए कि दूसरों से मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा वृत्तियों को काम में लाएँ। सुखी मनुष्यों से प्रेम करें, दुखियों एवं सन्तों के प्रति दया भाव दिखाएँ, पुण्यात्माओं के प्रति प्रसन्नता और पापियों की ओर से उदासीन रहें।

🔷 शान्ति धारण करने का अभ्यास करें। आपका मन, इन्द्रियाँ, भावनाएँ शान्त रहें। वातावरण यदि कोलाहल पूर्ण भी हो तो भी अंतःवृत्तियों को शान्त रखने की चेष्टा करें।
शाँति हमारी आत्मा का गुण है। हमारी सब वृत्तियाँ शाँति में आकर संतुष्ट हो जाती हैं। मन में संकल्प विकल्पों का नाश होता है। निस्वार्थता, अनिच्छा, वैराग्य, निर्मोह, अहं से मुक्ति ईश्वर की ओर वृत्ति, इच्छाओं का संयम हमें आन्तरिक शाँति और मन का संतुलन प्रदान करते हैं।

🔶 यदि हम अपने परिवार, मुहल्ले, शहर, प्राँत और देश भर में शाँति का अभ्यास करायें, और सभी इसके लिए प्रयत्न करने लगें, तो विश्व भर में शाँति स्थापित हो सकती है। प्रार्थना, जप, कीर्तन, चिन्तन और सद्विचारों को फैलाया जाय, उतना ही लाभ हो सकता है।

🔷 शाँति से बोलें, शाँति से चलें, शाँति से कार्य करें। परमेश्वर शाँति का अवतार है। ईश्वरीय तत्वों को मन से निकालें पहले मनुष्य मन में शाँति धारण करे फिर बाह्य परिस्थितियों की शिकायत करे। जितना आप बाह्य पदार्थों से अपना सम्बन्ध तोड़ कर आगे बढ़ेंगे, उतनी ही मनः शान्ति प्राप्त होगी।

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1955 पृष्ठ 14

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1955/February/v1.14

👉 ईश्वर को पाना है तो हम उसकी मर्जी पर चलें

🔷 ईश्वर की प्रप्ति के लिए ऐसा दृष्टिकोण एवं क्रिया- कलाप अपनाना पड़ता है, जिसे प्रभु समर्पित जीवन कहा जा सके ।। जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आत्मिक प्रगति का मार्ग अपनाना पड़ता और वह यह है कि हम प्रभु से प्रेरणा की याचाना करें और उद्देश्य यही है कि मनुष्य अपने लक्ष्य को, इष्ट को समझें और उसे प्राप्त करने के  लिए प्रबल प्रयास करें। उपासना कोई क्रिया कृत्य नहीं है। उसे जादू नहीं समझा जाना चाहिए। आत्म परिष्कार और आत्म विकास का तत्वदर्शन ही अध्यात्म है।

🔶 उपासना उसी मार्ग पर जीवन प्रक्रिया को धकेलने वाली एक शास्त्रानुमोदित ओैर अनुभव प्रतिपादित पद्धति है। इतना समझने पर प्रकाश की ओर चल सकना बन पड़ता  है। जो ऐसा साहस जुटाते हैं, उन्हें निश्चत रूप से ईश्वर मिलता है। अपने को ईश्वर के हाथ बेच देने वाला व्यक्ति ही ईश्वर को खरीद सकने में समर्थ होता है। ईश्वर के संकेतों पर चलने वाले में ही इतनी सामर्थ्य उत्पन्न होती है कि ईश्वर को अपने संकेतों पर चला सके।

🔷 बुद्धिमत्ता इसी में है कि मनुष्य प्रकाश की ओर चले। ज्योति का अबलम्बन ग्रहण करे। ईश्वर की साझेदारी जिस जीवन में बन पड़ेगी, उसमें घटा पड़ने की कोई सम्भावना नहीं है। यह शांति और प्रगति का मार्ग है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...