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गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 21 से 23

पिप्पलाद उवाच
महाभाग! न ते प्रश्न: केवलं दीपयत्यहो।
अध्यात्मतत्वज्ञानस्य सारतथ्यात्युतापि तु ॥२१॥
लोककल्याणकृच्चापि, श्रीष्यज्येनं तु ये जना:।
सत्यं ज्ञास्यन्ति यास्यन्ति श्रेयो मार्गेऽविपत्तया ॥२२॥
भवन्त: सर्व एतस्या: समस्यायास्तु कारणम्।
समाधानं च शृण्वन्तु सावधानेन चेतसा ॥२३॥

टीका- हे महाभाग! आपका प्रश्न न केवल अध्यात्म तत्वज्ञान के सार तथ्यों पर प्रकाश डालता है, वरन् लोक कल्याणकारी भी है। जो इस शंका समाधान को सुनेंगे, वे सभी सत्य को समझेंगे, विपत्ति से बचेंगे और श्रेय-पथ पर चल सकने में समर्थ होंगे। आप सब लोग इस समस्या का कारण और समाधान ध्यानपूर्वक सुनें ॥२१-२३॥

व्याख्या- महाप्राज्ञ पिप्पलाद प्रश्न की गम्भीरता को अनुभव करते हुए कहते हैं कि ऐसी जिज्ञासा का समाधान हर सुनने वाले को सत्य का बोध कराता है। वस्तुत: सुनते तो अनेक हैं पर वे अन्दर तक उसमें प्रवेश कर उसे जीवन में कहाँ उतार पाते हैं। सुनने वाले जिज्ञासु साधक वृत्ति के हों, जन कल्याण ही जिनका उद्देश्य हो, वे कथा श्रवण कर उसे सार्थक कर देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 41

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 16 से 20

साश्चर्यस्यासमञ्जस्य कारणं किं भवेदहो।
न सामान्यं धियामेतज्ज्ञातव्यं तु प्रतीयते ॥१६॥
हेतुना सरहस्येन भवितव्यमिह ध्रुवम्।
हेतुमेनं तु विज्ञातुमिच्छास्माकं प्रजायते ॥१७॥
महाप्राज्ञो भवाँस्तत्ववेत्ता कालत्रयस्य च।
द्रष्टाऽमिवज्ञातगुह्यानां ज्ञाता ग्रन्थिं विमोचय ॥१८॥
इदं ज्ञातुं वयं सर्वे त्वातुराश्च समुत्सुका:।
अष्टावक्रस्य जिज्ञासां श्रुत्वा तु ब्रह्मज्ञानिन: ॥१९॥
महाप्राज्ञ: पिप्पलाद: गम्भीरं प्रश्नमन्वभूत्।
प्रशशंस च प्रश्नेऽस्मिन्नवदच्च ततःस्वयम्॥२०॥

टीका- इस आश्चर्य भरे असमंजस का क्या कारण हो सकता है, यह सामान्य बुद्धि की समझ से बाहर की बात है। इसके पीछे कोई रहस्यमय कारण होना चाहिए। इस कारण को जानने की हम सबको बड़ी इच्छा है। आप महाप्राज्ञ है, तत्ववेत्ता है त्रिकालदर्शी हैं अविज्ञात रहस्यों को समझने वाले हैं। कृपया इस गुत्थी को सुलझाइये। हम सब यह जानने के लिए आतुरतापूर्वक इच्छुक हैं। ब्रह्मज्ञानी अष्टावक्र जी की जिज्ञासा सुनकर महाप्राज्ञ पिप्पलाद ने प्रश्न की गम्भीरता अनुभव की। प्रश्न उभारने के लिए उन्हें सराहा और कहा॥१६-२०॥

व्याख्या- यदि यह प्रकरण सामान्य चर्चा से सुलझने जैसा होता तो प्रज्ञासत्र में इस जिज्ञासा को उठाये जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। यह ऋषि-कालीन परम्परा है कि ऐसे असाधारण-मानवी गरिमा से जुड़े प्रश्नों पर तत्वज्ञान के मर्मज्ञ महाप्राज्ञों से समाधान पूछे जाते रहे हैं एवं तदनुसार अदृश्य, सूक्ष्म जगत में वातावरण बजाया जाता रहा है। जनक एवं याज्ञवस्थ्य तथा काकभुशुण्डि एवं गरुड़ सम्वाद भी इसी प्रयोजन से सम्पन्न हुए हैं। सूत-शौनक सम्वाद के माध्यम से आर्ष ग्रन्थकार ने कथोपकथन से अनेकानेक समस्याएँ उभारी व सुलझाई हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 40

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 14 से 15

उच्चादर्शाय संसृष्टौ मानवो यदि जीवति।
तिरश्चां प्राणिनां हेयस्तरेण मनसा तथा ॥१४॥
अनात्माचरणं कुर्यान्सृष्टिसन्तुलनं तथा।
विकुर्याद् महदाश्चर्यं चिन्ताया विषयस्तथा॥१५॥

टीका- उच्च प्रयोजनों के लिए सृजा गया मनुष्य तिर्यक् योनियों में रहने वाले प्राणियों सभी अधिक हेय स्तर की मनःस्थिति रखे, अनात्म आचरण करे और सृष्टि सन्तुलन बिगाड़े तो सचमुच ही यह बड़े आश्चर्य और चिन्ता की बात है ॥१४-१५॥

व्याख्या- सोचा यह था कि मनुष्य अपने को श्रेष्ठता से जोड़े रहेगा, अन्य जीवधारियों के लिए एक आदर्श उदाहरण बनेगा पर स्थिति कुछ विचित्र एवं चिन्ताजनक भी है।

विवेक चूड़ामणि में यह स्पष्ट करते हुए कि मनुष्य भ्रष्ट आचरण की ओर कब प्रवृत्त होता है, संकेत करते हुए कहा गया है-

शब्दादिभि: पञ्चभिरेव पञ्च, पञ्चत्वमापु: स्वगुणेनबद्धा:।
कुरंगमातंगपतंगमीनभृंग नर: पञ्चभिरञ्चित: किम्॥

अर्थात्- 'हिरण, हाथी, पतिंगा, मछली और भौंरा-ये अपने-अपने स्वभाव के कारण शब्दादि पाँच विषयों में से केवल एक-एक से आसक्त होने के कारण मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो फिर इन पाँचों विषयों में जकड़ा हुआ, असंयमी पुरुष कैसे बच सकता है। उसकी तो दुर्गति सुनिश्चित ही है।

अन्य जीवधारियों के समान यदि मनुष्य भी शिश्नोदर परायण रहकर अपना आचरण व चिन्तन बिगाड़ ले तो फिर यह मानना चाहिए कि वह धरती पर इस योनि में अवतरित होकर भी दुर्भाग्यशाली ही बना रहा। आज मानव की उपभोग की ललक व सुख साधना अर्जित करने की एकांगी घुड़दौड़ ने यह भुला दिया कि इस तथाकथित प्रगति और सभ्यता का सृष्टि संतुलन पर क्या असर पडे़गा। उच्छृंखल भौतिकवाद अनियन्त्रित दानव की तरह अपने पालने वाले का ही वह भक्षण कर रहा है। पर्यावरण, असंतुलन और अदृश्य जगत में संव्याप्त हाहाकार मानव की स्वयं की संरचना है जो आस्था संकट के रूप में प्रकट हुआ है और जिसकी प्रतिक्रिया विभिन्न विभीषिकाओं के रूप में मानव जाति को भुगतनी पड़ रही है। इतिहास का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि ऐसे उदाहरण पहले भी हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 39

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 9 से 13

सत्ये युगे नरा: सर्वे सुसंस्कृतसमुन्नतम्।
देवजीवनपद्धत्या जीवन्ति स्म, धरामिमाम्॥९॥
स्वर्ग्येणैव तु दिव्येन वातावरणकेन ते।
भरितां विदधानाश्च विचरन्ति, कथं पुन:?॥१०॥
कारणं किं समुत्पन्नं पातगर्ते यथाऽपतन्।
साम्प्रतीकीं स्थितिं दीनां गता: सर्वे यतो मुने॥११॥
दुर्धर्षायां विपत्तौ तु विग्रहे वाप्युस्थिते।
उत्पद्यते विवशता नैतदस्ति तु साम्प्रतम्॥१२॥
सामान्यं दिनचर्याया: क्रमश्चलति मानवा:।
शक्तिसाधनसम्पन्ना: पातगर्ते पतन्ति किम्?॥१३॥

टीका- सतयुग में सभी मनुष्य समुन्नत सुसंस्कृत स्तर का देव जीवन जीते थे और इस धरती को स्वर्ग जैसे दिव्य वातावरण से भरा-पूरा रखते थे। फिर क्या कारण हुआ जिससे लोग पतन के गर्त में गिरे और आज जैसी दयनीय स्थिति में जा पहुँचे। कोई दुर्धर्ष-विपत्ति-विग्रह आने पर विवशता उत्पन्न हो सकती है किन्तु सामान्य-क्रम चलते रहने पर भी शक्ति-साधनों से सम्पन्न मनुष्य अधःपतन के गर्त में क्यों गिरते जा रहे है

व्याख्या- ऐसी बात नहीं कि जब से मनुष्य को यह जन्म मिला हैं-सृष्टि की उत्पत्ति व विकास हुआ है-यह हेय स्तर का ही जीवन जीता आया है। मानव सतयुग में सभ्य-सुसंस्कृत जीवन भी जी चुका है। श्रेष्ठता की उसे ऊँचाई पर पहुँचकर फिर जीचे गिर पड़ना कहाँ तक उचित माना जायेगा? होना तो यह था कि आज स्थिति सतयुग से भी श्रेष्ठ स्तर की स्वर्गोपम होती। परन्तु ऋषि पाते हैं कि प्रस्तुत परिस्थितियाँ तो नारकीय स्थिति से भी गयी बीती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 39

रविवार, 7 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 7 से 8

सामर्थ्यन्यूनतायां तु साधनाभाव एव वा।
प्रतिकूलस्थितौ वापि नरस्त्वसफलो भवेत्॥७॥
यत्रैतन्नास्ति तन्नापि सृष्टिरत्नं नर: कथम् ?
दैन्येन ग्लपितेनाथ जीवतीह घृणास्पद: ॥८॥

टीका-  सामर्थ्य की न्यूनता, साधनों का अभाव, प्रतिकूल परिस्थितियाँ होने पर तो सफल न हो सकने की बात समझ में आती है किन्तु जहाँ ऐसा कुछ भी न हो, वहाँ मनुष्य जैसा सृष्टि का मुकुटमणि हेय स्तर का जीवन क्यों जिये? और क्यों घृणास्पद बने? ॥७-८॥

व्याख्या- यदि वह सब न होता जिससे मानव समृद्ध-सम्पन्न बन सका है तो मानव के उपरोक्त दो प्रयोजनों, सृष्टि उत्पत्ति, सृष्टि संचालन में असफल रहने की बात स्वीकार्य भी होती, पर ऐसा तो कुछ है नहीं। इसके स्थान पर जन्म देने के बाद उसे तो साधन, सामर्थ्य एवं सहयोगकारी परिस्थितियों का अनुदान भी परम पिता ने दिया है। फिर वह सदैव प्रतिकूलताओं का रोना क्यों रोता है? यह ब्रह्मज्ञानी जिज्ञासु के लिए एक ऊहापोह बना हुआ है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 38

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 5 से 6

अष्टावक्र उवाच

ईश्वर: भूपति: साक्षाद् ब्रह्माण्डस्य महाने।
मानवं राजपुत्रं स्वं कर्तुं सर्वगुणान्वितम् ॥५॥
विभूती: स्वा अदाद् बीजरूपे सर्वा मुदान्वित:
सृष्टि संचालकोऽप्येष श्रेयसा रहित: कथम्?॥६॥

टीका- ब्रह्माण्ड के सम्राट् ईश्वर ने मनुष्य को सर्वगुण सम्पन्न उत्तराधिकारी राजकुमार बनाया। अपनी समस्त विभूतियाँ उसे बीजरूप में प्रसन्नतापूर्वक प्रदान कीं। उसे सुष्टि संचालन में सहयोगी बन सकने के योग्य बनाया, फिर भी वह उस श्रेय से, गौरव से वंचित क्यों रहता है? ॥५-६॥

व्याख्या- ब्रह्मज्ञानी अष्टावक्र की जिज्ञासा मानव मात्र से सम्बन्धित है। नित्य देखने में आता है ईश्वर का मुकुटमणि कहलाने वाला, सुर दुर्लभ मानव योनि पाने वाला यह सौभाग्यशाली जीव अपने परम पिता से दो विशेष विभूतियाँ पाने के बावुजूद दिग्भ्रान्त हो दीन-हीन जैसा जीवन जीता है। ये दो विभूतियाँ  हैं-बीज रूप में ईश्वर के समस्त गुण तथा सृष्टि को सुव्यवस्थित बनाने में उसकी ईश्वर के साथ साझेदार जैसी भूमिका। बीज फलता है तब मृदा को स्वरूप लेता है। इसका बहिरंग स्वरूप उसी जाति का होता है जिस जाति का वह स्वयं है। लघु से महान्, अणु से विभु बनने की महत् सामर्थ्य अपने आपमें एक अलभ्य विरासत है। इसे पाने के लिए उसे न जाने कितनी योनियों में कष्ट भोगना पड़ा।

सहयोग-सहकार भी सुसंचालन के लिए न कि संतुलन को बिगाड़ने के लिए। ऐसे में जब मुण कर्म रूपी बीज भी गलने से इन्कार कर दे एवं मानव संतुलन-व्यवस्था के स्थान पर विग्रह-असहयोग करने लगे तो असमंजस होना स्वाभाविक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 37

बुधवार, 3 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1 द्वितीयोSध्याय) श्लोक 83 से 85


अध्यात्म दर्शन प्रकरण 

एकदा तु हिमाच्छन्ने ह्मत्तराखण्डमण्डने।
अभयारण्यके ताण्ड्यशमीकोद्दालकास्तथा॥१॥
ऋषय: ऐतरेयश्च ब्रह्मविद्या विचक्षणा:।
तत्वजिज्ञासवो ब्रह्मविद्याया: संगता: समे॥२॥
तत्वचर्चारतानां तु प्रश्न एक उपस्थित:।
महत्वपूर्ण स प्रश्न: सर्वेषां मन आहरत्॥३॥
पिप्पलादं पप्रच्छातो महाप्राज्ञमृषीश्वरम्।
अष्टावक्रो ब्रह्मज्ञानी लोककल्याणहेतवे॥४॥

टीका- हिमाच्छादित उत्तराखण्ड के अंभयारण्यक में एक बार ताण्ड्य, शमीक, उद्दालक तथा ऐतरेय आदि ऋषि ब्रह्म-विद्या के गहन तत्व पर विचार करने के उद्देश्य से एकत्र हुए। तत्व-दर्शन के अनेकानेक प्रसंगों पर विचार करते-करते एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया। उसकी महत्ता ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। महाप्राज्ञ ऋषि पिप्पलाद से लोक-कल्याण की दृष्टि से ब्रह्मज्ञानी अष्टाज्ञानी ने पूछा ॥१-४॥

व्याख्या- ऋषि धर्मतन्त्र के प्रहरी माने जाते हैं, सदैव जागरुक एवं सामयिक मानवी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने व उन्हें जन-जन तक पहुँचाने वाले।

ब्रह्मज्ञान को जन-मानस तक पहुँचाने के उद्देश्य से ही कुम्भ मेलों एवं अन्य पर्वों पर ऋषिगण एकत्र होते व परस्पर परामर्श द्वारा दैनन्दिन समस्याओं का हल निकालते थे। सूत-शौनक, शिवजी-काकभुशुण्डि, जनक-याज्ञवल्क्य भरद्वाज-याज्ञवल्क्य सम्वाद इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं।

ऐसे समागम, सत्संग, ज्ञान गोष्ठियों में सदा-सदा से महामानवों के कृत्यों-आचरणों को आधार बनाकर जीवन-क्रम की रूपरेखा बनाई जाती रही है। परस्मर चर्चा में मात्र ब्रह्म विद्या के गूढ़ तात्विक विवेचन को ही स्थान न देकर ऋषिगण हर ऐसी जिज्ञासा में रुचि लेते थे जो उस समय की परिस्थितियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो, भले ही वह साधारण जन-मानस से सम्बन्धित चर्चा क्यों न हो। हर मनीषी उसमें उतनी ही रुचि रखता था, जितनी कि मुक्ति, योग, साधना जैसे विषयों में।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 37

मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 83 से 85

भगवन्तं ततो नत्वा वांछा साम्यं विचार्य च।
प्रज्ञापुराणसन्देशमुपदेष्टं जनं जनमू ॥८३॥
जागृतात्मन प्रज्ञाभियान मार्गे नियोजितुम्।
संकल्प्य धरणीमायात् प्रसन्नहृदयस्तदा ॥८४॥
सप्तर्षीणां तपोभूमौ विरम्याथ गतक्लम:।
युगान्तरचिते रूपे विश्वव्यापी बभूव च ॥८५॥

टीका:- नारद ने भगवान् को नमन किया और उनकी इच्छा में अपनी इच्छा मिलाते हुए जन-जन को 'प्रज्ञा पुराण' का सन्देश सुनाने, जागृत-आत्माओं को प्रज्ञा-अभियान प्रयासों में लगाने कौ संकल्प लेकर, प्रसन्न हृदय धरती पर उतरे। सप्त ऋषियों की तपोभूमि मे थोड़ा विराम-विश्राम करके वे युगान्तरीय-चेतना के रूप में विश्वव्यापी बन गये ॥८३-८५॥

व्याख्या"- भक्त की स्वयं की कोई इच्छा नहीं होती। वह भगवान का काम करने का संकल्प लेकर जन्मता है व अपने 'स्व' को चेतन शक्ति में घुला देता है। देवर्षि नारद ने अपनी इच्छा को भगवान की प्रेरणा के साथ मिलाया। एक बार नारद स्वयं मोह में पड़े थे और अपने अहंकार के मद में प्रभु प्रेरणा को समझने में असफल रहे। भगवान ने उनका मोह भंग किया, उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया। तब से उन्होंने संकल्प ले लिया कि अब आगे से कभी भी अपनी इच्छा को प्रभु से अलग नहीं रखेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 35-36

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 81 से 82

साहसादर्शरूपा ये चेतनामुच्चभूमिकाम्।
निजेन बलिदानेन त्यागेनोद्भावयन्ति ये ॥८१॥
आत्मसन्तोषमासाद्य लोकसम्मानमेव च।
दैवानुग्रहलाभं च कृतकृत्या भवन्ति ते ॥८२॥

टीका- आदर्श और साहस के धनी अपने त्याग-बलिदान से उच्चस्तरीय चेतना उत्पन्न करते हैं और आत्म-सन्तोष लोक-सम्मान तथा दैवी-अनुग्रह के तीन लाभ एक साथ प्राप्त करते तथा धन्य बनते है ॥८१-८२॥

व्याख्या- नव-सृजन में अपना सब कुछ लुटा देने वाले कभी घाटे में नहीं रहते। भगवान के काम में लग जाने वाले तीन असामान्य लाभ सहज पा लेते हैं जो एक दूसरे की प्रतिक्रियाएँ ही हैं। जागृत आत्माएँ आदर्शवादिता अपनाकर सत्साहस दिखाती हैं और अन्त: में सन्तोष, बहिरंग में सम्मान-सहयोग पाती हैं और ऐसों पर ही दैवी अनुदान बरसते हैं, जो उन्हें कृतकृत्य कर जाते हैं। पेड़ अपने पत्ते गिराते, जमीन को खाद देते और बदले में जड़ों के लिए उपयुक्त खुराक उपलब्ध करते हैं। फल-फूलों से दूसरों को लाभानित करते हैं। यह परमार्थ व्रत आज की चिन्तन धारा के अनुसार तो मूर्खता ही ठहराया जायगा और व्यंग्य-उपहास का ही कारण बनेगा। किन्तु पर्यवेक्षकों को इस निष्कर्ष पर पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि विश्व-व्यवस्था में ऐसी परिपूर्ण गुंजायश है कि परमार्थ परायणों को लोक सम्मान ही नहीं दैवी अनुदान भी अजस्र परिमाण में मिलते रहें। पेड़ों को बार-बार नये पल्लव और नये फल-फूल देते रहने में प्रकृति कोताही नहीं बरतती। उदारमना घाटा उठाते लगते भर हैं। वस्तुत: वे जो देते हैं उसे ब्याज समेत वसूल कर लेते हैं।

इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित महामानवों में से प्रत्येक ने परमार्थ-परायणता की दूरदर्शितापूर्ण नीति अपनाई है। वे बीज की तरह गले और वृक्ष की तरह बढ़े हैं, इस मार्ग पर चलने के लिए उन्हें प्राथमिक पराक्रम यह करना पड़ा कि संचित कुसंस्कारों की पशु-प्रवृत्तियों से जूझे और उन्हें सुसंस्कारी बनने के लिए पूरी तरह दबाया-दबोचा और तब छोड़ा जब वे ची बोल गईं और संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचे उठकर आदर्शवादी परमार्थ प्रवृत्ति को अंगीकार करने के लिए सहमत हो गईं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 34

शनिवार, 30 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 78 से 80

जागृतात्मवतामेतं सन्देशं प्रापयास्तु मे।
नोपेक्ष्मोऽनुपम: काल: क्रियतां साहसं महत्॥७८॥
महान्तं प्रतिफलं लब्ध्वा कृतकृत्या भवन्तु ते।
जन्मन इदमेवास्ति फलमुद्देश्यरूपकम्॥७१॥
अग्रगामिन एवात्र प्रज्ञासंस्थान निर्मिती।
प्रज्ञाभियान सूत्राणां योग्या: संचालने सदा॥८०॥

टीका- अस्तु जागृत आत्माओं तक मेरा यह सन्देश पहुँचाना कि वे इस अनुपम अवसर की उपेक्षा न करें बड़ा साहस करें, बड़ा प्रतिफल अर्जित करके कृतकृत्य बनें। यही उनके जन्म का उद्देश्य है। जो अग्रगामी हों उन्हें प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण तथा प्रज्ञा-अभियान के सूत्र संचालन में जुटाना ॥७८-८०॥

व्याख्या- जागृत आत्माएँ कभी अवसर नहीं चूकतीं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता। जागृत वे जो अदृश्य जगत में बह रहे प्रकृति प्रवाह को पहचानते हैं, परिवर्तन में सहायक बनते हैं। दूसरे जब आगे चलकर उन परिणामों को देखते हैं तो पछताते हैं कि हमने अवसर की उपेक्षा क्यों कर दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 33

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 72 से 75

प्रज्ञापीठस्वरूपेषु युगदेवालया भुवि।
भवन्तु तत एतासां सृज्यानामथ नारद ॥७२॥
सूत्रं संस्कारयोग्यानां प्रवृत्तीनां च सञ्चलेत्।
नृणां येन स्वरूपं च भविष्यत्संस्कृतं भवेत् ॥७३॥
सहैव पृष्ठभूमिश्च परिवर्तनहेतवे।
निर्मिता स्याद् युगस्यास्तु संधिकालस्तु विंशति: ॥७४॥
वर्षाणां, सुप्रभातस्य वेलाऽऽवर्तनं हेतुका।
अवाञ्छनीयताग्लानि: सदाशयविनिर्मिति" ॥७५॥

टीका- हे नारद ! युग देवालय, प्रज्ञापीठों के रूप में बनें। वहाँ से सृजनात्मक और सुधारात्मक सभी प्रवृत्तियों का सूत्र-संचालन हो, जिससे मनुष्य का स्वरूप एवं भविष्य सुधरे, साथ ही महान् परिवर्तन के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि भी बनने लगे। युग-सन्धि के ये वर्ष प्रभात की परिवर्तन बेला की तरह है। इसमें अवाञ्छनीयता की गलाई और सदाशयता की ढलाई होगी।

व्याख्या- नये युग में इन्हीं प्रज्ञा की अधिष्ठात्री गायत्री के मन्दिर और यज्ञ शालाएँ बननी चाहिए। उन्हीं के माध्यम से रचनात्मक कार्य चलने चाहिए। महामना मदनमोहन मालवीय कहा करते थे-

ग्रामें ग्रामे सभाकार्या: ग्रामेग्रामे कथाशभा:। पाठशाला, मल्लशला, प्रतिपर्वा महोत्सवा:॥

अर्थात् गाँव-गाँव ऐसे देवमन्दिर रहे जहाँ से न्याय, पर्व-संस्कार मनाने, विद्याध्ययन, आरोग्य सम्वर्धन के क्रिया कृत्य चलते रहें। केवल मन्दिरों से काम चलेगा नहीं।

आद्य शंकराचार्य ने जब मान्धाता से यही बात कही तो उन्होंने चार धामों की स्थापना के लिए अपना अंदाय भण्डार खोल दिया। इन तीर्थो के माध्यम से धर्म-धारणा विस्तार की कितनी बड़ी सेवा हुई है-
इसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

मन्दिर मात्र पलायनवादी श्रद्धा नहीं, कर्म योगी निष्ठा जगायें तो ही उनकी सार्थकता है।

जब इन देवालयों से, जनजागृति केन्द्रों के माध्यम से सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की गतिविधियाँ चलने लगेंगी, तो जन-जन में प्रखरता का उदय होगा तथा परिवर्तन के दृश्य सुनिश्चित रूप से दिखाई पड़ने लयोंगे। प्रस्तुत समय संधिवेला का है। आज संसार के सभी विद्धान, ज्योतिर्विद, अतीन्द्रिय दृष्टा इस सम्बन्ध में एक मत हैं कि युग परिवर्तन का समय आ पहुँचा। परिस्थितियों की विषमता अपनी चरम सीमा पर है। ऐसे में इन युग देवालयों की भूमिका अपनी जगह बड़ी महत्वपूर्ण है।

सूरदास ने लिखा है-
'एक सहस्र नौ सौ के ऊपर ऐसी योग परै। सहस्र वर्ष लौं सतयुग बीते धर्म की बेलि बढ़े ॥'

अर्थात् ११ वीं शताब्दी के अन्त में ऐसा ही परिवर्तन होगा जिसके बाद सहस्रों वर्षों के लिए धर्म का, सुख-शांति का राज्य स्थापित होगा।

संक्रमण वेला में किस प्रकार की परिस्थितियाँ बनती और कैसे घटनाक्रम घटित होते हैं, इसका उल्लेख महाभारत के वन पर्व में इस प्रकार आता है-

ततस्तु भूले संघाते वर्तमाने युग क्षये। यदा चन्द्रस्य सूर्यस्य तया तस्य बृहस्पति: ॥ एकराशौ समेष्यन्ति प्रयत्स्यति तदा कृतम्। कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च ॥ क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम्॥

अर्थात्- जब एक युग समाप्त होकर दूसरे युग का प्रारम्भ होने को होता है, तब संसार में संघर्ष और तीव्र हलचल उत्पन्न हो जाती है। जब चन्द्र, सूर्य, बृहस्पति तथा पुष्य नक्षत्र एक राशि पर जायेंगे तब सतयुग का शुभारम्भ होगा। इसके बाद शुभ नक्षत्रों की कृपा वर्षा होगी। पदार्थो की वृद्धि से सुख-समृद्धि, लोग स्वस्थ और प्रसन्न होने लगेंगे।

इस प्रकार का ग्रह योग अभी कुछ समय पहले ही आ चुका है। अन्याय गणनाओं के आधार पर भी यही समय है।

विशिष्ट अवसरों को आपत्तिकाल कहते हैं और उन दिनों आपत्ति धर्म निभाने की आवश्यकता पड़ती है। अग्निकाण्ड, दुर्घटना, दुर्भिदा, बाढ़, भूकम्प, युद्ध, महामारी जैसे अवसरों पर सामान्य कार्य छोड़कर भी सहायता के लिए दौड़ना पढ़ता है। छप्पर उठाने, धान रोपने, शादी-खुशी में साथ रहने, सत्प्रयोजनों का समर्थन करने के लिए भी निजी काम छोड़कर उन प्रयोजनों में हाथ बँटाना आवश्यक होता है। युग सन्धि में जागरूकों को युग धर्म निभाना चाहिए। व्यक्तिगत लोभ, मोह को गौण रखकर विश्व संकट की इन घड़ियों में उधस्तरीय कर्त्तव्यों के परिपालन को प्रमुख प्राथमिकता देनी चाहिए। यही है परिवर्तन की इस प्रभात वेला में दिव्य प्रेरणा, जिसे अपनाने में हर दृष्टि से हर किसी का कल्याण है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 31

गुरुवार, 28 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 69 से 71


धर्मस्य चेतनां भूयो जीवितां कर्तुमद्य तु।
अधिष्ठात्रीं युगस्यास्य महाप्रज्ञामृतम्भराम्॥६९॥
गायत्रीं लोकचित्ते तां कुरु पूर्णाप्रतिष्ठिताम् ।
पराक्रमं च प्रखरं कर्तुं सर्वत्र नारद ॥७०॥
पवित्रतोदारतां तु यज्ञजां च प्रचण्डताम्।
प्रखरां कर्तुमेवाद्यानिवार्यं मन्यतां त्वया ॥७१॥

टीका- आज धर्मचेतना को पुनर्जीवित करने के लिए इस युग की अधिष्ठात्री महाप्रज्ञा ऋतम्भरा गायत्री को लोकमानस में प्रतिष्ठित किया जाय। हे नारद! पराक्रम की प्रखरता के लिए सर्वत्र यज्ञीय पवित्रतार उदारता एवं प्रचंडता को प्रखर करने की आवश्यकता है॥६९-७१॥

व्याख्या- महाप्रज्ञा को अध्यात्म की भाषा में गायत्री कहते हैं, इसके दो पथ हैं-एक दर्शन अर्थात् तत्वचिंतन-अध्यात्म, दूसरा व्यवहार अर्थात् शालीनता युक्त आचरण-धर्म। महाप्रज्ञा की परिणति अन्त:क्षेत्र में प्रतिष्ठित होने पर साधक के व्यक्तित्व में आमूल-चूल परिवर्तन ला देती है। आत्मिक विभूतियाँ-ऋद्धियाँ तथा लोक व्यवहार में प्राप्त सम्पदा-सिद्धियाँ इसी के तत्व चिन्तन का प्रतिफल हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 26-27

बुधवार, 27 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 65 से 68

उवाच विष्णुर्ज्ञानार्थं कथा प्रज्ञापुराणजा।
विवेच्या, कर्मणे प्रज्ञाभियानस्य विधिष्वलम्॥६५॥
विधयोऽस्य च स्वीकर्तुं प्रगल्भान्प्रेरयानिशम्।
युगस्य सृजने सर्वे सहयोगं ददत्वलम् ॥६६॥
यथातथा विवोध्यास्ते भावुका अंशदायिन।
समयस्य च दातार: सोत्साहा उस्फुरन्तु यत् ॥६७॥
संयुक्तशक्त्या श्रेष्ठानां दुर्गावतरणोज्ज्वला।
प्रचण्डता समुत्पन्ना समस्या दूरयिष्यति॥६८॥

टीका- विष्णु भगवान् ने कह-ज्ञान के लिए प्रज्ञा पुराण का कथा विवेचन उचित होगा और कर्म के लिए प्रज्ञा अभियान की बहुमुखी गतिविधियों में से प्रगल्भों को उन्हें अपनाने की प्रेरणा निरन्तर देनी चाहिए। युग सृजन में सहयोग करने के लिए सभी भावनाशीलों में समय दान, अंशदान की उमंग उभारनी चाहिए। वरिष्ठों की इस संयुक्त शक्ति से ही दुर्गावतरण जैसी प्रचण्डता उत्पन्न होगी और युग समस्याओं के निराकरण में समर्थ होगी॥६५-६८॥

व्याख्या- युग चेतना को व्यापक करने के बाद कर्म में प्रवृत्त होने के लिए भगवान प्रगल्भों की चर्चा करते हैं। प्रगल्भ अर्थात् साहसी। ऐसे शूरवीर जो सत्प्रयोजनों के लिए कमर कस कर तैयार हो जायें।

अवतारों में उच्चस्तरीय वे ही माने जाते हैं जिनमें सन्त सी पवित्रता, सुधारक सी प्रखरता के साथ ऋषियों जैसी तत्व दृष्टि होती है। वे उत्कृष्टता को समर्पित होते हैं। अहंता के परिपोषण में लगने वाली शक्ति समर्पण के बाद उनके पास इतनी अधिक मात्रा में बच जाती है जिसके आधार पर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य काम कर दिखाते हैं। भगवान कृष्ण, राम, ईसा, दयानन्द, गाँधी, गुरुगोविन्दसिंह, बुद्ध, मीरा, शंकराचार्य, ज्ञानेश्वर, समर्थ रामदास ऐसे जीते जागते प्रमाणों में से हैं, जिन्होंने प्रतिकूलता से जूझने का साहस दिखाया व सत्प्रयोजन में लगने के लिए असंख्यों को प्रेरित किया।

ऐसे व्यक्तियों का संगठन तो वह प्रचण्ड चमत्कार कर दिखाता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 26-27

सोमवार, 25 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 63 से 64

उवाच नारदो देव ! वाच्य: श्राव्यस्लयं मत:।
ज्ञानपक्ष: पूरकं तं कर्मपक्षं विवोधय॥६३॥
कर्त्तव्यं यद्यदन्यैश्चाप्यनुष्ठेयं, समग्रता ।
उत्पद्यते द्वयोर्ज्ञानकर्मणोस्तु समन्वयात्॥६४॥

टीका- नारद बोले-'यह ज्ञान पक्ष हुआ, जिसे कहा या सुना जाता है। अब इसका पूरक कर्मपक्ष बताइये, जो करना और कराना पड़ेगा। ज्ञान और कर्म के समन्वय से ही समग्रता उत्पन्न होती है ॥६३-६४॥'

व्याख्या- कोई सिद्धान्त अपने आप में अकेला पूर्ण नहीं। प्रयोगपक्ष जाने बिना सारा ज्ञान अधूरा हैं। फिर क्रिया पक्ष, ज्ञान पक्ष का पूरक है। ब्रह्म ज्ञान-तत्व चिन्तन अपनी जगह है, अनिवार्य भी है, परन्तु उसका व्यवहार पदा जिसे साधना-तपश्चर्या के रूप में जाने बिना एक मात्र मानसिक श्रम और ज्ञान वृद्धि तक ही सीमित रहने से उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। चिकित्सकों को अध्ययन भी करना होता है एवं व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त करना होता है। यह समग्रता लाये बिना वे चिकित्सक की पात्रता-पदवी नहीं पाते।

ऐसा अधूरापन अध्यात्म क्षेत्र में बड़े व्यापक रूप में देखने को मिलता है। ब्रह्म की, सद्मुणों की, आदर्शवादिता की चर्चा तो काफी लोग करते पाये जाते हैं परन्तु उसे व्यवहार में उतारने, जीवन का अंग बना लेने वाले कम ही होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 26

रविवार, 24 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 60 से 62





समाधिस्थो नारदोऽभूत्तस्मिन्नेव क्षणे प्रभु:।
प्रज्ञापुराणमेतत्तद्हृदयस्थम कारयत् ॥६०॥
उवाच च महामेघमण्डलीव समन्तत:।
कुरू त्वं मूसलाधारं वर्षां तां युगचेतनाम्॥६१॥
अनास्थाऽऽतपश्रष्कां च महर्षे धर्मधारणाम् ।
जीवयैतदिदं कार्यं प्रथमं ते व्यवस्थितम् ॥६२॥

टीका- नारद समाधिस्थ हो गये। भगवान् ने उस समय प्रज्ञापुराण कण्ठस्थ करा दिया और कहा-'इस युगचेतना की वर्षा मेघों की तरह सर्वत्र बरसाओ। अनास्था के आतप से सूखी धर्म-धारणा को फिर से हरी-भरी बना-दो तुम्हारा प्रथम काम यही है॥६०-६२॥

व्याख्या- बादलों का काम है बरसना तथा जल अभिसिंचन द्वारा सारी विश्व मानवता को तृप्त करना। जहाँ अकाल पड़ा हो वहाँ वर्षा की थोड़ी-सी बूंदें गिरते ही चारों और प्रसन्नता का साम्राज्य छा जाता है-कुछ ही समय में हरियाली फैली दिखाई पड़ती है। समुद्र सें उठने वाली भाप जब बादल बनती है तो उसका एक ही उद्देश्य रहता हैं-वनस्पति जगत तथा सारे जीव जगत में प्राण भर देना।

चेतना विस्तार की यही भूमिका अवतार, महामानव, अग्रदूत, जागृत आत्माएँ निभाती हैं। उनका उद्देश्य भी यही होता है। आस्था संकट का जो मूल उद्गम है-अन्त:करण, वहाँ वे व्यक्ति-व्यक्ति तक पहुँचकर उसके अन्दर हलचल मचाते हैं। मरुस्थल बन गये अन्तस्थल में संवेदनाएँ उभारते हैं, आदर्शवादी उत्कृष्टता के प्रति-समर्पण की भविष्य-जगाते हैं। अवतार की प्रक्रिया यही है। भगवान ने नारद ऋषि को वही काम सौंपा ताकि प्रस्तुत परिस्थितियों में परिव्रज्या द्वारा वे जन-जन में प्रज्ञावतार की प्रेरणा भर सकें। परिवर्तन-विचारणा में परिष्कार तथा संवेदनाओं में उत्कृष्टता परायण उभार की ही परिणति है। युग परिवर्तन की प्रक्रिया जो अगले दिनों सम्पादित होने जा रही है, उसका प्रथम चरण यही है।

महाकाल ने हमेशा बीज रूप में उपयुक्त पात्र को यह संदेश दिया हैं, वही कालान्तर में फला और मेघ की भूमिका उसनें निभाई है। इसी तथ्य को रामायणकार ने इस तरह समझाया है-

'राम सिंधु धन सज्जन धीरा । चन्दन तरु हरि सन्त समीरा॥'

अर्थात्- 'भगवान समुद्र हैं तो सज्जन व्यक्ति बादल के समान । चन्दन वृक्ष यदि भगवान है तो सन्त पवन की तरह मलयज सुगन्ध को फैलाने वाले। ' भगवान से अर्थ है आदर्शवादिता का समुचय। मेघ व पवन की ही भाँति संत व सज्जन उस युगचेतना को विस्तारित करते हैं, असंख्यों को धन्य बनाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 24-25

शनिवार, 23 मार्च 2019

👉 जीवन वीणा बजे तो ही सार्थक

मन्दिर के जिस प्रकोष्ठ में भगवान् सुब्रह्मण्यम की मूर्ति थी, उसी के सामने वाले भाग में एक सुन्दर वीणा रखी हुई थी। मन्दिर में कई लोग तो वीणा के दर्शन कर लेते और चले जाते। कुछ उसे बजाने की इच्छा करते, पर वहाँ बैठा हुआ मन्दिर का रक्षक उनसे मना करता और वे वहाँ से चल देते है।। इस प्रकार सुन्दर स्वरों वाली यह वीणा जहाँ थी वहीं रखी रहती थी, उसका कभी कोई उपयोग न होता था।

एक दिन एक व्यक्ति आया। उसने वीणा बजाने की इच्छा व्यक्त की, पर उस व्यक्ति ने उसे भी मना कर दिया। वह व्यक्ति वही चुपचाप खड़ा रहा। थोड़ी देर में सब लोग मन्दिर से निकल कर बाहर चेले गये तो उस व्यक्ति ने वीणा उठाली और उसका लयपूर्वक वादन करने लगा। वीणा का मधुर स्वर लोगों के कानों तक पहुँचा तो लोग पीछे लौटने लगे और उस मधुर संगीत का रसास्वादन करने लगे। वाद्य घण्टों चला और लोग मन्त्र मुग्ध सुनते रहे। जब वह बन्द हुआ तब भी लोग ईश्वरीय आनन्द की अनुभूति करते रहे। लोगों ने कहा- ''आज वीणा सार्थक हो गई।''

भावार्थ यह है कि भगवान् काया तो सबको देता है पर कुछ लोग अज्ञानवश व कुछ अभिमान वश इस वीणा रूपी यन्त्र का सदुपयोग नहीं कर पाते। यदि इन दो दोषों से दूर रहकर कोई शरीररूपी वीणा से मधुर लहरियाँ निकाले तो उस आनन्द से न केवल वह स्वयं वरन् सम्पर्क के सैकड़ों लोग उसमें ईश्वरीय आनन्द की झलक पाते है। ऐसी जीवन- वीणा सभी बजा सकें यही तत्ववेत्ताओं का निर्देश है, महामानवों का उपदेश है एवं प्रत्यक्ष अनुभत सत्य है। पर दूसरा पक्ष भी ऐसा हठी है कि उस पर काबू पाना, अन्त : की दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष कर जीवन रूपी मणि का उपयोग कर पाना हर किसी के लिए सम्भव नहीं हो पाता।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

शुक्रवार, 22 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 52 से 59

नारद उवाच-

पप्रच्छ नारदो भगवन् स्पष्टतो विस्तरादपि।
किं नु कार्यं मया ब्रूहि मानवै: कारयामि किम्॥५२॥

श्री भगवानुवाच-
उवाच भगवाँस्तात ! हिमाच्छादित एकदा।
उत्तराखण्ड संशोभिन्यारण्यक शुभस्थले॥५३॥
तत्वावधाने प्राज्ञस्य पिप्पलादस्य नारद।
प्रज्ञासत्रसमारम्भो जात: पञ्चदिनात्मक:॥५४॥
अष्टावक्र : श्वेतकेतुरुद्दालकशृङ्गिणौ।
दुर्वासाश्चेति जिज्ञासा: पञ्चाकुर्वन् क्रमादिमे॥५५॥
तत्वदर्शी महाप्राज्ञस्तेषां संमुख एव स:।
संक्षिप्तं ब्रह्मविद्याया: प्रास्तौत्सारं सममृषि:॥५६॥
सर्वसाधारणोऽप्येनं ज्ञातुं बोधयितुं क्षम:।
इह लोके परे चायमृद्धिसिद्धिप्रद: स्मृत:॥५७॥
तं प्रसङ्ग स्मारयामि ध्यानेन हृदये कुरु।
प्रज्ञा पुरगारूपे च योजितं यन्त्रतस्तु तम्॥५८॥
वरिष्ठानामात्मानं तु पूर्व साधारणस्य च।
हृदयगंममेनं त्वं कारयाद्य महामुने ॥५९॥

टीका:- नारद ने पूछा-"भगवन्! और भी स्पष्ट करें कि क्या करना और क्या कराना है। "
भगवान् बोले-"हे तात्! एक बार उत्तराखण्ड के हिमाच्छादित एक शुभ आरण्यक में महाप्राज्ञ पिप्पलाद के तत्वाधान में पाँच दिवसीय 'प्रज्ञा-सत्र' हुआ था। उसमें क्रमश: अष्टावक्र, श्वेतकेतु, शृंगी, उद्दालक और दुर्वासा ने पाँच जिज्ञासाएँ की थीं। तत्वदर्शी महाप्राज्ञ ऋषि ने उनके समक्ष ब्रह्मविद्या का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया था वह सर्वसाधारण के समझने-समझाने योग्य है साथ ही लोक- परलोक में उभय-पक्षीय ऋद्धि-सिद्धियाँ प्रदान करने वाला भी है। उस प्रसंग का तुम्हें स्मरण दिलाता हूँ। ध्यान-मग्न होकर हृदयंगम करो सुनियोजित करो और 'प्रज्ञा पुराण' के रूप में सर्वप्रथम वरिष्ठ आत्माओं को तदुपरान्त सर्वसाधारण को हृदयंगम कराओ॥५२-५९॥

व्याख्या:- अध्यात्म विज्ञान के व्यावहारिक शिक्षण की विस्तृत कार्य प्रणाली जानने को उत्सुक देवर्षि को भगवान् एक विशिष्ट प्रज्ञासत्र का स्मरण दिलाते हैं। यह ऋषि प्रणाली है कि किसी भी तथ्य का समर्थन, प्रतिपादन प्रत्यक्ष उदाहरणों द्वारा किया जाय। ध्यान मग्न नारद को भगवान ने ज्ञान सत्रों में हुई चर्चा को संक्षेप में अपनी परावाणी, विचार सम्प्रेषण द्वारा समझा दिया एवं अग्रदूतों तक इसे पहुँचाने, उन्हें इस ज्ञान आलोक से प्रकाशित करने का निर्देश भी दिया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 24

मंगलवार, 19 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 48 से 51

उवाच भगवांस्तात! दिग्भ्रान्तान् दर्शयाग्रत: ।
यथार्थताया आलोकं सन्मार्गे गन्तुमेव च॥४८॥
तर्कतथ्ययुतं मार्गं त्वं प्रदर्शय साम्प्रतम् ।
उपायं च द्वितीयं सं तदाधारसमुद्भवम्॥ ४९॥
उत्साहं सरले कार्ये योजयाभ्यस्ततां यत: ।
परिचितिं युगधर्में च गच्छेयुर्मानवा: समे॥५०॥
चरणौ द्वाविमौ पूर्णावाधारं प्रगतेर्मम ।
अवतारक्रियाकर्त्ता चेतना सा युगान्तरा॥५१॥

टीका- भगवान् बोले- हे तात्? सर्वप्रथम दिग्भ्रान्तों को यथार्थता का आलोक दिखाना और सन्मार्ग अपनाने के लिए तर्क और तथ्यों सहित मार्गदर्शन करना है, दूसरा उपाय इस आधार पर उभरे हुए उत्साह को किसी सरल कार्यक्रम में जुटा देना है ताकि युग धर्म से वे परिचित और अभ्यस्त हो सकें? इन दो चरणों के उठ जाने पर आगे की प्रगति का आधार मेरी अवतरण प्रक्रिया-युगान्तरीय चेतना स्वयमेव सम्पन्न कर लेगी॥४८-५१॥

व्याख्या- युग परिवर्तन का कार्य योजनाबद्ध ढंग से ही किया जा सकता है। सबसे पहले तो सुधारकों, अग्रगामियों को अपने सहायक ढूँढ़ने के लिए निकलना होता है, उन्हें उँगली पकड़कर चलना सिखाना पड़ता है। जब वे अपनी दिशा समझ लेते हैं, उच्चस्तरीय पथ पर चलने के लिए वे सहमत हो जाते हैं, तब उन्हें सुनियोजित कार्य पद्धति समझाकर उनके उत्साह को क्रियारूप देना होता है। यही नीति हर अवतार की रही है। इतना बन पड़ने पर शेष कार्य वह चेतन-सत्ता स्वयं कर लेती है।

समस्या तब उठ खड़ी होती है, जब व्यक्ति ईश्वरीय सत्ता की इच्छा-आकांशा जानते हुए भी व्यामोह में फँसे दिशा भूले की तरह जीवन बिताते हैं अथवा उद्देश्य को जानते हुए भी अपने उत्साह को सही नियोजित नहीं कर पाते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 22

शनिवार, 16 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 46 से 47

प्राह नारद इच्छाया: स्वकीयाया भवान् मम।
जिज्ञासायाश्च प्रस्तौति यं समन्वयमद्भुतम॥४६॥

आत्मा मे पुलकितस्तेन स्पष्टं निर्दिश भूतले।
प्रतिगत्य च किं कार्यं येन सिद्धयेत्प्रयोजनम्॥४७॥

टीका- नारद ने कहा-है देव! अपनी इच्छा और मेरी जिज्ञासा का आप जो अद्भुत समन्वय प्रस्तुत कर रहे हैं उससे मेरी अन्तरात्मा पुलकित हो रही है । कृपया स्पष्ट निर्देश कीजिए किं पुन: मृत्युलोक में वापस जाकर मुझे क्या करना चाहिए, ताकि आपका प्रयोजन पूर्ण हो॥४६-४७॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 22

गुरुवार, 14 मार्च 2019

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 40 से 45

गायत्री ब्रह्म विद्या है। उसी को कामधेनु कहते हैं। स्वर्ग के देवता इसी का पयपान करके सोमपान का आनन्द लेते और सदा निरोग, परिपुष्ट एवं युवा बने रहते हैं। गायत्री को कल्पवृक्ष कहा गया है। इसका आश्रय लेने वाला अभावग्रस्त नहीं रहता। गायत्री ही पारस है। जिसका आश्रय, सान्निध्य लेने वाला लोहे जैसी कठोरता, कालिमा खोकर स्वर्ण जैसी आभा और गरिमा उपलब्ध करता है। गायत्री ही अमृत है। इसे अन्तराल में उतारने वाला अजर-अमर बनता है। स्वर्ग और मुक्ति को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। यह दोनों ही गायत्री द्वारा साधक को अजस्र- अनुदान के रूप में अनायास ही मिलते हैं। मान्यता है कि गायत्री माता का सच्चे मन से आंचल पकड़ने वाला कभी कोई निराश नहीं रहता। संकट की घड़ी में वह तरण-तारिणी बनती है। उत्थान के प्रयोजनों में उसका समुचित वरदान मिलता है। अज्ञान के अन्धकार में भटकाव दूर करके और सन्मार्ग का सही रास्ता प्राप्त करके चरम प्रगति के लक्ष्य तक जा पहुँचना गायत्री माता का आश्रय लेने पर सहज सम्भव होता है।

प्रज्ञा व्यक्तिगत जीवन को अनुप्राणित करती है, इसे 'ऋतम्भरा' अर्थात् श्रेष्ठ में ही रमण करने वाली कहते हैं। महाप्रज्ञा इस ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। उसे दूरदर्शिता, विवेकशीलता, न्यायनिष्ठा, सद्भावना, उदारता के रूप में प्राणियों पर अनुकम्पा बरसाते और पदार्थो को गतिशील, सुव्यवस्थित एवं सौन्दर्य युक्त बनाते देखा जा सकता है। परब्रह्म की वह धारा जो मात्र मनुष्य के काम आती एवं आगे बढ़ाने, ऊँचा उठाने की भूमिका निभाती है- 'महाप्रज्ञा' है। ईश्वरीय अगणित विशेषताओं एवं क्षमताओं से प्राणि-जगत एवं पदार्थ-जगत उपकृत होते हैं, किन्तु मनुष्य को जिस आधार पर ऊर्ध्वगामी बनने-परमलक्ष्य तक पहुँचने का अवसर मिलता है, उसे महाप्रज्ञा ही समझा जाना चाहिए। इसका जितना अंश जिसे, जिस प्रकार भी उपलब्ध हो जाता है वह उतने ही अंश में कृत-कृत्य बनता है।

मनुष्य में देवत्व का, दिव्य क्षमताओं का उदय-उद्भव मात्र एक ही बात पर अवलम्बित है कि महाप्रज्ञा की अवधारणा उसके लिए कितनी मात्रा में संभव हो सकी। महाप्रज्ञा का ब्रह्म विद्या पक्ष अन्त:करण को उच्चस्तरीय आस्थाओं से आनन्दविभोर करने के काम आता है। दूसरा पक्ष साधना है, जिसे विज्ञान या पराक्रम कह सकते हैं, इसके अन्तर्गत आस्था को उछाला और परिपुष्ट किया जाता है। मात्र ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। कर्म के आधार पर उसे संस्कार, स्वभाव, अभ्यास के स्तर तक पहुँचाना होता है। साधना का प्रयोजन श्रद्धा को निष्ठा में-निर्धारण की-अभ्यास की-स्थिति में पहुँचाना है। इसलिए अग्रदूतों, तत्वज्ञानियों, जीवनमुक्तों एवं जागृत आत्माओं को भी साधना का अभ्यास क्रम नियमित रूप से चलाना होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 20

👉 सुख और दुःख दृष्टिकोण मात्र हैं। (भाग 1)

सब कुछ साधन सम्पन्न और सूक्ष्म होने पर भी एक नहीं असंख्यों व्यक्ति संसार में चिन्तित और उद्विग्न दिखाई देते हैं। यदि और अधिक गहराई से देखा ज...