मंगलवार, 16 जून 2026

👉 काम करने से जी न चुराइये (अंतिम भाग)

काम करने से प्रसन्नता, सन्तोष व शान्ति मिलती है। मानसिक या शारीरिक दोनों ही श्रम समान रूप से आवश्यक हैं। दोनों में समन्वय बना रहे तो ही काम चलेगा। किन्तु इनमें में किसी एक को प्राथमिकता देना, दूसरे को गौण मानने की बात न्याय संगत नहीं लगती। खेती का कार्य भी मानवता के विकास में उतना ही उपयोगी है, जितना आफिस के क्लर्क का कार्य। शारीरिक श्रम का महत्व कम नहीं। स्वास्थ्य का सन्तुलन बना रहे, इसके लिए बुद्धि जीवियों को शारीरिक और शारीरिक श्रम करने वालों को बौद्धिक कार्य भी करने चाहिये। दोनों में तालमेल बनाये रखने से ही मनुष्य जीवन के सच्चे आनन्द की उपलब्धि सम्भव है।

लाचारी से, बेमन काम करना एक भारी दुर्गुण है। इससे सफलता का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। वृद्धावस्था में नितान्त निष्क्रिय होकर बैठ जाने की नीति गलत है। ढलती उम्र में भी सक्रिय बने रहने से दुःखद परिस्थितियाँ नहीं टकराती। दार्शनिक सुकरात का कथन है-”मनुष्य की सक्रियता का चरम उत्कर्ष तीसरे प्रहर, अर्थात् जीवन के सन्ध्या काल वृद्धावस्था में होता है। इस समय तक मानसिक शक्तियाँ पूर्ण परिपक्व हो जाती है।” प्रबुद्ध ज्ञान और जीवन के लम्बे अनुभवों के आधार पर महत्वपूर्ण कार्य जीवन के अन्तिम दिनों ही होते हैं। हमारे यहाँ चतुर्थ आश्रम संन्यास का अधिक महत्व इसी दृष्टि से माना गया है। लोक सेवा का यह सब से अच्छा समय होता है।

आज की परिस्थितियों में नैतिक उत्थान की, मानवीय कल्याण की जो-योजनायें चलाई जा रही हैं, उनका पूरा किया जाना तभी सम्भव है जब लोग श्रम की सार्थकता समझें, कर्म के महत्व को पहचाने। श्रम धरती का देवता है। कर्म मनुष्य का आभूषण है। यह वह कसौटी है, जिसमें रगड़ खाकर अनेक सद्गुणों का विकास निखर आता है। श्रम के सहारे धरती से सोना पैदा करते हैं। कर्म से ही यहाँ सुख-शान्ति, समृद्धि और सफलता का अवतरण होता है। धरती में स्वर्ग की-सी परिस्थितियों का निर्माण जिन सद्गुणों से सम्भव है, उनमें से कर्मशीलता प्रमुख है। आइये हम सब मिलकर श्रम-पूर्वक निरन्तर कर्म करने की आदत डालें और व्यक्तिगत जीवन को समृद्ध एवं सामूहिक वातावरण को उल्लासमय बनाने की एक आवश्यक शर्त पूरी करें। ताकि आसमान के स्वर्ग को अपनी वसुन्धरा में उतार कर ले आयें, युग की यही माँग है, होना भी यही है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965 

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👉 इच्छाएँ और उनका सदुपयोग (भाग 2)

इच्छा एक भाव है, जो किसी अभाव, सुख या आत्मतुष्टि के लिये उदित होता है। इस प्रकार की इच्छाओं का सम्बन्ध भौतिक जगत से होता है। इनकी आवश्यकता या उपयोगिता न हो, सो बात नहीं। दैनिक जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन चाहिये ही। सृष्टि संचालन का क्रम बना रहे इसके लिये दाम्पत्य जीवन की उपयोगिता से कौन इनकार करेगा? पर केवल भौतिक सुखों के दाँव-फेर में हम लगे रहें तो हमारा आध्यात्मिक विकास न हो पायेगा।

तब सौमनस्यता व सौहार्दपूर्ण सदिच्छाओं की आवश्यकता दिखाई देती है। प्रेम, आत्मीयता और मैत्री की प्यास किसे नहीं होती। हर कोई दूसरों से स्नेह और सौजन्य की अपेक्षा रखता है। पर इनका प्रसार तो तभी सम्भव है, जब हम भी शुभ इच्छायें जागृत करें। दूसरों से प्रेम करें, उन्हें विश्वास दें और उनके भी सम्मान का ध्यान रखें। इन इच्छाओं के प्रगाढ़ होने से सामाजिक, नैतिक व्यवस्था सुदृढ़, सुखद होती है, पर इनके अभाव में चारों ओर शुष्कता का ही साम्राज्य छाया दिखाई देगा।

मानव जीवन गतिवान् बना रहे, इसके लिये स्व-प्रधान इच्छायें उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है। पर इनके पीछे फलासक्ति की प्रबलता रही तो उसकी तृप्ति न होने पर अत्यधिक दुःखी हो जाना स्वाभाविक है। इच्छाओं के अनुरूप परिस्थितियाँ भी मिल जायेंगी, ऐसी कोई व्यवस्था यहाँ नहीं। कोई लखपति बनना चाहे, पर व्यवसाय में लगाने के लिये कुछ भी पूँजी पास न हो तो इच्छा पूर्ति कैसे होगी। ऐसी स्थिति में दुःखी होना ही निश्चित है। जो भी इच्छायें करें वह पूरी ही होती रहें, यह सम्भव नहीं। इनके साथ ही आवश्यक श्रम, योग्यता एवं परिस्थितियों का भी प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक है। किसी की शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक हो और वह कलक्टर बनना चाहे, तो यह कैसे सम्भव होगा? इच्छाओं के साथ वैसी ही क्षमता भी नितान्त आवश्यक है। विचारवान् व्यक्ति सदैव ऐसी इच्छायें करते हैं, जिनकी पूर्ति के योग्य साधन व परिस्थितियाँ उनके पास होती हैं।

इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम जिन परिस्थितियों में आज हैं, उन्हीं में पड़े रहें। जितनी हमारी क्षमता है, उसी से सन्तोष कर लें, तब तो विकास की गाड़ी एक पग भी आगे न बढ़ेगी। आज जो प्राप्त है उसमें सन्तोष अनुभव करें और कल अपनी क्षमता बड़े इसके लिये प्रयत्नशील हों, तो इसे शुभ परिणिति कहा जायेगा। नैपोलियन बोनापार्ट प्रारम्भ में मामूली सिपाही था। चीन के प्रथम राष्ट्रपति सनयात सेन अपने बाल्यकाल में किसी अस्पताल के मामूली चपरासी थे। इन्होंने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये क्रमिक विकास का रास्ता चुना और अपना लक्ष्य पाने में सफल भी हुये।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1965

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 16 June 2026



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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 June 2026


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