शुक्रवार, 13 मई 2016

👉 क्षुद्र हम, क्षुद्रतम हमारी इच्छाएँ (भाग 1)

🌹 गायत्री मंत्र हमारे साथ- साथ
🌹 ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

👉 मन की साधना कैसे करें?
🔴 देवियो, भाइयो! मैंने आपको शरीर की साधना के दो माध्यम बताए हैं- आहार और विहार। वैसे ही मन की साधना के भी दो माध्यम हैं- एक का नाम है- विवेक और दूसरे का नाम है- साहस। साहस और विवेक- इनकी जितनी मात्रा हम अपने भीतर इकट्ठी करते हुए चले जाते हैं, उतना ही हमारा जीवन विभूतियों से- समृद्धियों से, ऋद्धियों से और सिद्धियों से भरता हुआ चला जाता है। मित्रो! इस सम्बन्ध में मैं आपको इतिहास की बात बताना चाहता हूँ, कुछ घटनाएँ सुनाना चाहता हूँ।

👉 विवेकवान् की रीति−नीति
🔵 समर्थ गुरु रामदास के ब्याह की तैयारियाँ चल रही थीं। बुआ ने कहा कि उनका ब्याह तो जरूर होना चाहिए। अम्मा ने कहा- ‘‘मेरे बेटे का ब्याह नहीं होगा, तो काम कैसे चलेगा?’’ ढोलक बजायी जा रही थी और हल्दी चढ़ाई जा रही थी। घोड़ी चढ़ाने के लिए बारात निकाली और बारात वहाँ जा पहुँची बेटी वालों के यहाँ। बेटी वालों के यहाँ मंडप सजाया गया। समर्थ गुरु रामदास व्याह करने के लिए वहाँ जा पहुँचे। एक पुरोहित ने कहा कि महाराज! यहाँ ब्याह करने पर एक आवाज लगाई जाती है। उन्होंने कहा- ‘‘लड़का लड़की सावधान’’! लड़के ने कहा कि पल भर की देरी है, लेकिन सावधान क्यों कहा गया? अरे! जीवन के मोल का यही अंत? चार छोकरी- चार छोकरे और एक पंडित-  नौ ग्रह, नौ की दुहाई, नौ तरह की बीमारियाँ। मर जायेगा। अरे अभागे! दो तरीके से मारा जायेगा। इसीलिए भगवान् चिल्ला रहा है- सावधान! सावधान! अरे, दोनों तरफ की दिशाएँ क्या देख रहा है? एक तरफ चल और समर्थ गुरु रामदास ये भागे, वो भागे। लोगों ने बाजा बजाना बन्द कर दिया। वह गया, सो गया। बुआ ने कहा- बेवकूफ, अम्मा ने कहा पागल, बाप ने कहा- सिरफिरा, रिश्तेदारों ने कहा कि उल्लू है। सबने जाने क्या- क्या कहा। दुनिया वाले क्या- क्या कहते हैं, लेकिन विवेकवानों की विचार करने की शैली अलग होती है। वे अपना रास्ता अलग बनाते हैं और अपने रास्ते पर आप चला करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/guru3/shudrahumshurdtamhum.1

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 47) :-- गुरु के स्वर को हृदय के संगीत में सुनें

🔴  भले ही अभी यह छिपा हो, ढंका हो और यहाँ अभी केवल शून्यता नजर आती हो, पर है यह अवश्य। इसके स्पर्श मात्र से हृदय श्रद्धा, आशा एवं प्रेम से भर उठेगा। स्थिति इसके उलट भी है, यदि हम अपने हृदय को श्रद्धा, आशा एवं प्रेम से से भर दें, तो भी यह दिव्य संगीत हमारे अन्तस में गुंजने लगेगा। ध्यान रहे यदि हमने भूल से पाप के पथ पर पाँव रख दिए तो फिर इस संगीत को कभी भी न सुना जा सकेगा। क्योंकि जो पाप पथ पर चलता है, वह अपने अन्तस की गहराइयों में कभी नहीं उतर पाता। वह अपने कानों को इस दिव्य संगीत के प्रति मूंद लेता है। अपनी आँखों को वह अपनी आत्मा के प्रकाश के प्रति अंधी कर लेता है। उसे अपनी वासनाओं में लिप्त रहना आसान जान पड़ता है।

🔵  तभी वह ऐसा करता है। दरअसल ऐसा व्यक्ति परम आलसी होता है। वह जीवन की ऊपरी पथरीली सतह को ही सब कुछ मान लेता है। उस बेचारे को नहीं मालुम कि जिन्दगी की इस पथरीली की जमीन के नीचे एक वेगवती धारा बह रही है। समस्त कोलाहल के अन्तस में सुरीला संगीत प्रवाहित हो रहा है। यह अविरल प्रवाह न तो कभी रुकता है और न कभी थमता है। सचमुच ही गहरा स्रोत मौजूद है, उसे खोज निकालो। तुम इतना जान लो कि तुम्हारे अन्दर निःसन्देह वह परम संगीत मौजूद है। उसे ढुंढने में लग जाओ, थको- हारो मत। यदि एक बार भी तुम उसे अपने में सुन सके, तो फिर तुम्हें यह संगीत अपने आस- पास के लोगों के अन्तस में झरता- उफनता नजर आएगा।

🔴  इस सूत्र में साधना का परम स्वर है। इसमें जो कहा गया है, जीवन की परिस्थितियाँ उससे एकदम उलट हैं। हमारे जीवन में संगीत नहीं कोलाहल भरा हुआ है। बाहर भी शोर है और अन्तस में भी शोर मचा हुआ है। चीख, पुकारों के बीच हम जी रहे हैं। ऐसे में जीवन के संगीत की बात अटपटी लगती है। लेकिन इस अटपटे पन के भीतर सच है। पर गहरे में उरतने की जरुरत है। गहरे में उतरा जा सके तो ऊपरी दुनियाँ को भी संवारा जा सकता है, सजाया जा सकता है। सन्त कबीर ने भी यही बात अपने दोहे में कही है-

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठि।
मैं बपुरा बुढ़नडरा, रह किनारे बैठि॥
     
यानि कि जो खोजते हैं, वे पाते हैं। पर उन्हें गहरे में डुबकी लगानी पड़ती है। जो डुबने से डरते है, वे तो बस किनारे बैठे रह जाते हैं। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/gurua

👉 हम राजनीति में भाग क्यों नहीं लेते?



🔴 हम और हमारा संगठन राजनीति में क्यों प्रवेश नहीं करते, इसके सम्बन्ध में लोग हमें उलाहना देते और भूल सुधारने के लिये आग्रह करते हैं। वे जानते हैं कि हम शासन तंत्र में प्रवेश करने में बहुत दूर तक सफल हो सकते हैं। इसलिए उनकी और आतुरता आदि भी अधिक रहती हैं कितनी ही राजनैतिक पार्टियों द्वारा अपनी और आकर्षित करने और प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में सम्मिलित होने के लिए डोरे डाले जाते रहते हैं और उसके बदले ने हमें किस प्रकार सन्तुष्ट कर सकते हैं, इसकी पूछताछ करते रहते हैं यह सिलसिला मुद्दतों से चलता रहा है और जब तक हम विदाई नहीं ले लेते तब तक चलता ही रहेगा और हो सकता है कि यह परिवार वर्तमान क्रम से आगे बढ़ता रहा और सशक्त बनता रहा तो इस प्रकार के दबाव उस पर आगे भी पड़ते रहे।

🔵 इस संदर्भ में हमारा मस्तिष्क बहुत ही साफ है। शीशे की तरह उसमें पूर्ण स्वच्छता है। बहुत चिन्तन और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचें है और मनन के बाद हम एक निष्कर्ष पर पहुँचे है और बिना लाभ-लपेटे, दिपाव व दुराव के अपनी स्वतन्त्र नीति-निर्धारण करने में समर्थ हुए हैं हम सीधे राजनीति को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका संपादित करेंगे और यही अन्त तक करते रहेंगे। अपना संगठन यदि अपने प्रभाव और प्रकाश को सर्वथा तिरस्कृत नहीं कर देता तो उसे भी इसी मार्ग पर चलते रहना होगा।

🔴 भारत की वर्तमान राजनैतिक रीति नीतियों-शासन की गतिविधियों और तंत्र की कार्यप्रणाली पर आमतौर से सभी को असन्तोष है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की लम्बी अवधि में जो हो सकता था वह नहीं हुआ। तथाकथित आर्थिक प्रगति की बात भी विदेशी ऋण और युद्ध स्थिति तथा बढ़ती हुई बेकारी, गरीबों को देखते हुए खोखली है। नैतिक स्तर ऊपर से नीचे तक बुरी तरह गिरा है। विद्वेष और अपराधों कीक प्रवृत्ति बहुत पनपी है-गरीब अधिक गरीब बने है और अमीर अधिक अमीर। शिक्षा की वृद्धि के साथ-साथ जो सत्प्रवृत्तियाँ बढ़नी चाहिए थी, इस दिशा में चोर निराशा ही उत्पन्न हुई है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में देश की साख बढ़ी नहीं घटी है। मित्रों की संख्या घटती और शत्रुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। शासन में कामचोरी और रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति बहुत आगे बढ़ है और भी बहुत कुछ ऐसा ही हुआ है जो आँखों के सामने प्रकाश नहीं अँधेरा ही उत्पन्न करता है। अपनी इस राजनैतिक एवं प्रशासकीय असफलता पर हम में से हर कोई चिन्तित और दुखी है। स्वयं शासक वर्ग भी समय-समय पर अपनी इन असफलताओं की स्वीकार करते रहते हैं। जिन्हें अधिक क्षोभ है, वे उदाहरण प्रस्तुत करके शासनकर्त्ताओं की कटु शब्दों में भर्त्सना करते सुने जाते हैं और अमुक पार्टी को हटाकर अमुक पाटी के हाथ में शासन सौंपने की बात का प्रतिपादन करते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बनें पृष्ठ 3.92

👉 जरा सोचिये !!!

एक बार किसी रेलवे प्लैटफॉर्म पर जब गाड़ी रुकी तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला। ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसे आवाज दी,ऐ लड़के इधर आ!!लड़क...