रविवार, 13 मई 2018

👉 स्वार्थ-त्याग द्वारा सुधार

🔷 काकेशश के प्रान्त में दो भाई रहते थे। बड़ा भाई ईश्वर भक्त और शुद्ध आचरण था। उसने अपना कर्त्तव्य जान कर यह निश्चय किया कि शिक्षा द्वारा छोटे भाई का जीवन एक आदर्श जीवन बनाये, परन्तु छोटा भाई उसके विचारों से बिलकुल ही विपरीत था। स्कूल से कह भाग आता था और पतंग, जुआ वालो की टोली में अपना समय गंवाता था।

🔶 बड़े भाई ने उसको अन्य और कई कामों में लगाया, पर स्वयं व्यर्थ गया। धीरे-धीरे वह शराबी, जुआरी और चोर बन गया और आधी-2 रात शराब के नशे में चूर वह घर आता था, बड़ा भाई उसको खूब समझाता था। यहाँ तक रो-रो कर प्रार्थना भी करता था कि भाई तू मेरा और अपना जीवन क्यों नष्ट कर रहा है, लेकिन सब समझाना व्यर्थ जाता था,

🔷 एक दिन रात को छोटा भाई दीवार लाँघ कर घर के भीतर आया, उसने बड़े भाई को सोते से जगाया। बड़े भाई ने देखा कि छोटे भाई के सब कपड़े हाथ पाँव खून से तर है। और वह बहुत घबराया हुआ है, कारण पूछा, छोटे भाई ने कहा मुझे कहीं छिपा दे मुझसे एक खून हो गया है पुलिस मेरा पीछा कर रही है।

🔶 कुछ क्षण चुप रह कर बड़ा भाई बोला, यहाँ कहाँ छिपोगे? अच्छा इधर आओ-हाथ मुँह धोओ और खून के सब कपड़े उतार दो और तो यह मेरे साफ कपड़े पहन लो-बड़े भाई ने छोटे भाई के खून से तर सब कपड़े खुद पहन लिए और छोटे भाई को एक अलमारी में बन्द कर लिया और घर का दरवाजा खोल दिया, पुलिस अन्दर आ गई-बड़े भाई के कपड़े खून में रंगे देख कर पुलिस ने उसे ख्नी ठहराया और गिरफ्तार करके जेल भेज दिया।

🔷 सुबह को मजिस्ट्रेट के सामने उसे पेश किया गया, जज ने पूछा-”तुमने खून किया? उसने उत्तर दिया हजूर इस जुर्म की सजा मुझे भोगनी ही पड़ेगी। इसके अलावा मैं और कुछ नहीं कहना चाहता। मजदूर होकर मजिस्ट्रेट ने उसे फाँसी की सजा का हुक्म दिया। फाँसी पर लटकने से पहिले बड़े भाई ने छोटे भाई को एक पत्र लिखने की स्वीकृति माँगी साथ-साथ यह भी प्रार्थना की कि उसके भाई के सिवाय और कोई पत्र को बीच में न खोले, यह सब स्वीकार कर लिया गया- तत्पश्चात् बड़े भाई ने भगवान को स्मरण करके छोटे भाई के लिए अपना जीवन निछावर कर दिया।

🔶 चपरासी लिफाफा लेकर नगर में पहुँचा और छोटे भाई ने लिफाफा खोलकर पढ़ा। लिखा था-प्यारे भाई! कल सुबह फाँसी होगी, मैं बड़ी ख़ुशी और प्रेम से तुम्हारे लिए स्वार्थ त्याग कर रहा हूँ क्योंकि मुझे पूर्ण आशा है की तुम मेरे पीछे ऐसा पवित्र जीवन व्यतीत करोगे की जिससे बड़ो की और हमारी इज्जत होगी और मेरे प्रेम को स्वीकार करते हुए अपने सब दोषों को छोड़कर पवित्र जीवन व्यतीत करोगे।

🔷 पत्र पढ़कर छोटा भाई पृथ्वी पर बड़े से गिर पड़ा और फूट-2 कर रोने लगा ओर अपने को धिक्कारते हुए बोला, हाथ अफसोस! मेरे लिए भाई ने अपनी जान दी- उसी क्षण से उसके जीवन में अद्भुत परिवर्तन होना शुरू हो गया और शनैः शनैः अन्त में वह एक महान् व्यक्ति प्रसिद्ध हुआ।

🔶 इस प्रकार देव पुरुष हमें सुधार का मार्ग सिखाकर ऐसे लोकों को चले जाते वह जहाँ सदैव आनन्द ही रहता है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 May 2018


👉 आज का सद्चिंतन 14 May 2018


👉 Dharmaraj Yudhisthir

🔷 Once a Yadava kin ashed Sri Krishna why he called Yudhisthir “Dharmaraj”. Bhagwan narrated an anecdote. During the Mahabharata war, Yudhisthir used to leave for some place incognito every evening after  the day’s battle was over. The Pandavas were curious and followed him one day. They found that Yudhisthir nursed the wounded soldiers of both the warring sides lying on the battle field.

🔶 The puzzled Pandava brothers enquired of Yudhisthir why did he, rather than giving rest to his battle weary- body, spend the time in serving the enemy side instead, and that too in disguise.  Dharmaraj explained: “Among the wounded are both, the Kauravas and the Pandavas.

🔷 Both are human beings. If I had gone under my real identity theb Kauravas would neither had shared their pain with me nor allow me to tend them. The Pandava soldiers, too, would probably not accept any service from me. Lest I be deprived of this privilege of human service, I had to resort to this camouflage”.

🔶 Having recounted this story, Sri Krishna concluded: “ Cultivating the spirit of human service is the mark of true religion (dharma). He who renders such service and steadfastly adheres to the noblest ideals  of conduct is called “ Dharmaraj” and is always accorded the highest place in religious/ spiritual deliberations.”

📖 From Pragya Puran

👉 यौवन की जिम्मेदारी

🔷 युवावस्था जीवन का वह अंश है, जिसमें उत्साह, स्फूर्ति, उमंग, उन्माद और क्रिया शीलता का तरंगें प्रचण्ड वेग के साथ बहती रहती है। अब तक जितने भी महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं, उसकी नींव यौवन की सुदृढ़ भूमि पर ही रखी गई हैं। बालकों और वृद्धों की शक्ति सीमित होने  के कारण उनसे किसी महान् कार्य की आशा बहुत ही स्वल्प मात्रा में की जा सकती है।

🔶 वृक्ष बसन्त ऋतु में पल्लव, पुष्प और फलों से सुशोभित होते हैं। मनुष्य अपने यौवन काल में पूर्ण आया के साथ विकसित होता है। वृक्षों को कई बसन्त बार-बार प्राप्त होते हैं, पर मनुष्य का यौवन बसन्त केवल एक बार ही आता है, इसके बाद असमर्थता और निराशा से भरी वृद्धावस्था तत्पश्चात् मृत्यु! जिसने यौवन का सदुपयोग नहीं कर पाया, उसको हाथ मल-मल कर पक्ष ताना ही शेष रह जाता है।

🔷 यौवन सब से बड़ी जिम्मेदारी है। यह ईश्वर की दी हुई सब से बड़ी अमानत है, जिसका समय रहते उसमें से उत्तम उपयोग करना चाहिए। किसी भी देश और जाति का भाग्य उसके नव-युवकों के हाथ रहता है। जिस समाज के युवक जागरुक परायण और देश भक्त हैं, वहीं सामूहिक उन्न्ति हो सकती है। जहाँ के युवकों आलस्य, अकर्मण्यता, स्वार्थ परता और दुर्गुणों की भरमार होगी, वह देश जाति कदापि उन्नति के पथ पर अवसर नहीं हो सकती।

🔶 एक समय जो संसार का मुकुट मणि था, वह भारत आज सब प्रकार दीन-हीन, पतित-पराधीन बना हुआ है। पद-दलित भारत माता अपने सपूतों की ओर सजल नेत्रों से देख रही है और चाहती है, कि उसके ननिहाल अपने तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर आगे बढ़ें और अज्ञान, दरिद्र, दुष्ट दुराचार रूपी असुरों को इस पुण्य भूमि से मार भगावें। भारतीय नवयुवक यौवन की जिम्मेदारी को अनुभव करते हुए तुच्छ स्वार्थों को छोड़कर देश सेवा के पथ पर अग्रसर हो इसकी आज ही सबसे बड़ी आवश्यकता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1940 पृष्ठ 16

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 5)

🔷 यदि किसी के शरीर के किसी अंग में घोर पीड़ा हो तो उसके उस अंग को धीरे−धीरे दबाओ और अपने हृदय से प्रार्थना भी करो कि हे भगवान इस मनुष्य का दुःख दूर कर इसको शान्ति में रहने दे और इसका स्वभाव अच्छा हो जावे।

🔶 यदि आप किसी मनुष्य या पशु का खून बहता हुआ देखो तो कपड़े के लिये इधर−उधर मत भागे फिरो, बल्कि अपनी धोती या कमीज में से, कुछ परवा नहीं कितना भी कीमती हो एक टुकड़ा फाड़ कर उसके पट्टी बाँध दो, यदि वह कीमती रेशमी कपड़ा भी है तो भी उसको फाड़ने में शंका मत करो, यह सच्चा कर्मयोग है। यह आपके हृदय को जाँचने के लिये काँटा है, आपमें से कितनों ने इस प्रकार की सेवा की है, यदि अभी तक आपने ऐसा नहीं किया है तो आज से शुरू कर दो।

🔷 जब आपका पड़ौसी या कोई निर्धन आदमी रोगग्रस्त हो तो उसके लिये अस्पताल से दवाई ला दो। सावधानी से उसकी सेवा करो, उसके कपड़े खाने के बर्तन और टट्टी−पेशाब के बर्तन साफ करो, यह अनुभव करो कि उस रोगी मनुष्य के रूप में आप ईश्वर की सेवा कर रहे हो। इस प्रकार आपका मन बहुत ऊँचा उठ जावेगा और दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी, उससे हर्ष−दायक शब्द कहो, उसके पंगग के पास बैठो। उसके स्वस्थ होने के लिए प्रभु से प्रार्थना करो। इस प्रकार के कर्मों से आप में दया और प्रेम की वृद्धि होने में सहायता मिलेगी, इसमें घृणा, द्वेष और शत्रुता का नाश होगा और आप दैवत्व में बदल जाओगे।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 8

👉 भलाई करना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।

🔷 दुष्ट लोग उस मूर्खता से नहीं डरते, जिसे पाप कहते हैं। मगर विवेकवान सदा उस बेवकूफी से दूर रहते हैं। बुराई से बुराई ही पैदा होती है, इसलिए बुराई को अग्नि से भी भयंकर समझ कर उससे डरना और दूर रहना चाहिए। जिस तरह छाया मनुष्य को कभी नहीं छोड़ती वरन् जहाँ-जहाँ वह जाता है उसके पीछे-पीछे लगी रहती है। उसी तरह पाप कर्म भी पापी का पीछा करते हैं और अन्त में उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसलिए सावधान रहिए और बुराई से सदा डरते रहए।

🔶 जो काम बुरे हैं उन्हें मत करो। क्योंकि बुरे काम करने वालों को अन्तरात्मा के शाप की अग्नि में हर घड़ी झुलसना पड़ता है। वस्तुओं को प्रचुर परिमाण में एकत्रित करने की कामना से, इन्द्रिय भोगों की लिप्सा से और अहंकार को तृप्त करने की इच्छा से लोग कुमार्ग में प्रवेश करते हैं। पर यह तीनों ही बातें तुच्छ हैं। इनसे क्षणिक तुष्टि होती है, पर बदले में अपार दुख भोगना पड़ता है। खाँड मिले हुए विष को लोभवश खाने वाला बुद्धिमान नहीं कहा जाता, इसी प्रकार जो तुच्छ लाभ के लिए अपार दुख अपने ऊपर लेता है उसे भी समझदार नहीं कह सकते।

🔷 इस दुनिया में सबसे बड़ा बुद्धिमान, विद्वान, चतुर और समझदार वह है जो अपने को कुविचार और कुकर्मों से बचाकर सत्य को अपनाता है, सत्मार्ग पर चलता है और सत्विचारों को ग्रहण करता है। यही बुद्धिमानी अन्त में लाभदायक ठहरती है और दुष्टता करने वाले अपनी बेवकूफी से होने वाली हानि के कारण सिर धुन-धुन कर पछताते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1943 पृष्ठ 1

👉 गुरुगीता (भाग 108)

👉 ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूप में गुरूगीता

🔷 साधक समुदाय में बंगाल के तारानाथ भट्टाचार्य की बड़े सम्मान से चर्चा की जाती है। इनकी तांत्रिक शक्तियाँ बड़ी आश्चर्यजनक एवं विस्मयकारी थी। तंत्र साधक होने के बावजूद भट्टाचार्य महाशय पंचमकार के स्थूल प्रयोगों से कोसों दूर थे। उन्होंने सारे जीवन में कभी भी मांस, मद्य एवं मीन को नहीं छुआ। सभी स्त्रियों के प्रति उनका मातृभाव था। वह प्रत्येक स्त्री को जगदम्बा का रूप मानते थे और ब्रह्मचर्य में उनकी सम्पूर्ण निष्ठा थी।

🔶 वह श्मशान भी जाते थे और शवसाधना भी करते थे। किन्तु इन दोनों साधनाओं के प्रति भी उनकी विशेष दृष्टि थी। श्मशान वह इसलिए जाते थे, क्योंकि वहाँ बैठने से उन्हें वैराग्य का स्फुरण होता था। भगवान् महाकाल एवं भगवती महाकाली की लय- लीला का प्रत्यक्ष बोध होता था। वह कहा करते थे- श्मशान से अधिक पावन साधनाभूमि भला और कहाँ होगी- जहाँ दैहिक आकार परमाणुओं में रूपान्तरित होते हैं। सृष्टि के विघटन एवं लय की प्रभु लीला को और कहीं बैठकर सही रीति से नहीं जाना जा सकता।

🔷 शव साधना के बारे में उनका कहना था कि सच्चा साधक वह है, जो अपनी देह को शवपीठ के रूप में अनुभव कर ले। सामान्य जीव की देह में तो चाहत एवं वासनाओं का खेल चलता है। पर साधक तो इन सबसे दूर हो जाता हेै। वह अपनी जीवित देह को भी वैराग्य के महातप से शव के रूप में अनुभव करता है। प्रतिफल उसकी यह अनुभूति रहती है कि वह स्वयं शव है और इसमें चल रही चित् शक्ति की महालीला का वह साक्षी है। तारानाथ भट्टाचार्य की जो साधना स्थिति थी, उसे विरले साधक प्राप्त कर पाते हैं। लेकिन स्वयं तारानाथ अपनी सारी शक्तियों एवं सिद्धियों का उद्गम गुरूगीता को मानते थे। इसके काम्य एवं तांत्रिक प्रयोगों में उन्हें विशेषज्ञता हासिल थी।

🔶 ऐसे ही एक प्रसंग में उन्होंने तंत्रदर्शन के महाचार्य प़ं० गोपीनाथ कविराज को एक घटनाक्रम बताया। उन्होंने बताया कि तंत्र साधनाओं में अलग- अलग मूहूर्तों- नियमों एवं तांत्रिक रात्रियों यथा- कालरात्रि, महारात्रि मोहरात्रि एवं दारूणरात्रि आदि अवसरों पर वह गुरूगीता का अलग- अलग रीति से पाठ करते थे। गुरूगीता के स्थितिक्रम, सृष्टि क्रम एवं संहारक्रम से उन्होंने अनेकों अनुष्ठान किए। इन अनुष्ठानों में वह गुरूगीता को भगवती गायत्री के ब्रह्मास्त्र मंत्र के साथ सभी महाविद्याओं के लोम- विलोम सम्पुटीकरण के विलक्षण प्रयोग किए।

🔷 अपने एक अनुभव में उन्होंने बताया कि प्रारम्भिक दिनों में ब्रह्म पिशाच से पीड़ित एक परिवार उनके पास आया। पिशाच खतरनाक था और शक्तिशाली भी। बड़े- बड़े तंत्र साधकों को उसने हैरान बेहाल कर रखा था। इस सम्बन्ध में अचूक समझे जाने वाले प्रयोगों को उसने विफल कर रखा था। जब यह परिवार उनके पास आया, तो परिवार के आने के पहले ही ब्रह्मपिशाच ने उन्हें कई धमकियाँ दे डाली। इन धमकियों की परवाह न करते हुए जब उन्होंने कई मंत्रों के हवन की व्यवस्था की, तो ठीक समय पर वह आकर हवनीय अग्रि बुझा देता। अन्त में उन्होंने गुरूगीता के साथ गायत्री का ब्रह्मास्त्र प्रयोग करने का निश्चय किया। इसे उन्होंने अलग- अलग एवं सम्मिलित रूप से सिद्ध कर रखा था।

🔶 गुरूगीता के संहारक्रम का ब्रह्मास्त्रपुटित अनुष्ठान के पूर्व उन्होंने स्वयं सहित के कल्याण के लिए स्वयं किया। इस अनुष्ठान के पूर्व उन्होंने स्वयं सहित सम्पूर्ण वातावरण को कीलित कर रखा था। अनुष्ठान के बाद जप- हवन का दिन आया, तो ब्रह्मपिशाच के तेवर ढीले पड़ चुके थे। गुरूगीता के सम्पूर्ण मंत्रों के हवन के साथ ब्रह्मपिशाच का अस्तित्त्व खतरे में पड़ता गया और अन्त में पीड़ित परिवार को उस कू्रर पिशाच से छुटकारा मिल गया। तारानाथ भट्टाचार्य ने यह प्रसंग सुनाते हुए कहा कि गुरूगीता के ये प्रयोग कष्ट साध्य तो हैं, पर इनसे सभी असम्भव को सम्भव करने की सम्भावना पूरी है। महादुष्कर कार्य भी इनसे सहज साध्य हो जाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 163

👉 हमारा दर्पण

🔶 प्रत्येक व्यक्ति एक दर्पण है सुबह से सांझ तक इस दर्पण पर धूल जमती है. जो मनुष्य इस धूल को जमते ही जाने देते हैं, वे दर्पण नहीं रह जाते. और जैसा स्वयं का दर्पण होता है, वैसा ही ज्ञान होता है. जो जिस मात्रा में दर्पण है, उस मात्रा में ही सत्य उसमें प्रतिफलित होता है।

🔷 एक साधु से किसी व्यक्ति ने कहा कि विचारों का प्रवाह उसे बहुत परेशान कर रहा है. उस साधु ने उसे निदान और चिकित्सा के लिए अपने एक मित्र साधु के पास भेजा और उससे कहा, “जाओ और उसकी समग्र जीवन-चर्या ध्यान से देखो. उससे ही तुम्हें मार्ग मिलने को है।”

🔶 वह व्यक्ति गया. जिस साधु के पास उसे भेजा गया था, वह सराय में रखवाला था. उसने वहां जाकर कुछ दिन तक उसकी चर्या देखी. लेकिन उसे उसमें कोई खास बात सीखने जैसी दिखाई नहीं पड़ी. वह साधु अत्यंत सामान्य और साधारण व्यक्ति था. उसमें कोई ज्ञान के लक्षण भी दिखाई नहीं पड़ते थे. हां, बहुत सरल था और शिशुओं जैसा निर्दोष मालूम होता था, लेकिन उसकी चर्या में तो कुछ भी न था. उस व्यक्ति ने साधु की पूरी दैनिक चर्या देखी थी, केवल रात्रि में सोने के पहले और सुबह जागने के बाद वह क्या करता था, वही भर उसे ज्ञात नहीं हुआ था. उसने उससे ही पूछा।

🔷 साधु ने कहा, “कुछ भी नहीं. रात्रि को मैं सारे बर्तन मांजता हूं और चूंकि रात्रि भर में उनमें थोड़ी बहुत धूल पुन: जम जाती है, इसलिए सुबह उन्हें फिर धोता हूं. बरतन गंदे और धूल भरे न हों, यह ध्यान रखना आवश्यक है. मैं इस सराय का रखवाला जो हूं।”

🔶 वह व्यक्ति इस साधु के पास से अत्यंत निराश हो अपने गुरु के पास लौटा. उसने साधु की दैनिक चर्या और उससे हुई बातचीत गुरु को बताई।

🔷 उसके गुरु ने कहा, “जो जानने योग्य था, वह तुम सुन और देख आये हो. लेकिन समझ नहीं सके. रात्रि तुम भी अपने मन को मांजो और सुबह उसे पुन: धो डालो. धीरे-धीरे चित्त निर्मल हो जाएगा. सराय के रखवाले को इस सबका ध्यान रखना बहुत आवश्यक है।”

🔶 चित्त की नित्य सफाई अत्यंत आवश्यक है. उसके स्वच्छ होने पर ही समग्र जीवन की स्वच्छता या अस्वच्छता निर्भर है. जो उसे विस्मरण कर देते हैं, वे अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं।

👉 आज का सद्चिंतन 13 May 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 May 2018


👉 तलवार या प्रेम?

🔶 किसी पर विजय प्राप्त करने के लिये मनुष्य के पास दो ही साधन उपलब्ध हो सकते हैं। एक तलवार तथा दूसरा प्रेम।

🔷 तलवार से किसी को अपने वश में किया जा सकता है, उससे अपना आदेश मनवाया जा सकता है। किन्तु यह विजय क्षणिक है, इससे किसी के हृदय पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता है। परास्त मनुष्य तभी तक अपने को परास्त समझता है जब तक वह निर्बल है और उसके पास ईंट का जवाब पत्थर से देने का साधन उपलब्ध नहीं है। वह भीतर ही भीतर ऐसे सुअवसर की प्रतीक्षा में रहता है जब वह अपने शत्रु से बदला लेने में अपने को समर्थ समझ सके। और एक न एक दिन उसे ऐसा अवसर मिल ही जाता है।

🔶 प्रेम से प्राप्त किया हुआ अधिकार स्थायी होता है। विजयी न अपने को विजयी समझता है और न विजित अपने को विजित। वे सदा के लिये सच्चे मित्र बन जाते है। एक के हृदय पर दूसरे का अटल अधिकार हो जाता है।

🔷 शक्तिशाली लोग तलवार का प्रयोग इसलिये करते हैं कि उनकी शक्ति को अपने काम में ला सके। यह कार्य प्रेम से भी हो सकता है। राम के साथ बानरों की असंख्य सेना, ईसा और बुद्ध के अनगित अनुयायी गान्धी के अनेक सत्याग्रही इस बात के साक्षी हैं कि प्रेम का बन्धन तलवार के भय से प्रबल है।

🔶 आप दूसरों को अपना सहायक बनाना चाहते हैं, उनकी शक्ति का उपयोग करना चाहते हैं, यश या ऐश्वर्य चाहते हैं तो प्रेम शस्त्र को अपनाइये यह तलवार की अपेक्षा सैंकड़ों गुनी शक्ति रखता है।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1940 पृष्ठ 16

👉 Paranormal Achievements Through Sadhana

🔶 Human life, with myriads of latent physical, mental and spiritual qualities, may be likened to a garden of sweet fruits.  Even if only a few of these qualities are cultivated systematically, one can relish the fruits of joy. But if the baser tendencies and bodily habits are left undisciplined, they run amuck. Such motiveless life leads to the growth of thorny bushes of misery and suffering in the garden of life. Like a Kalpavriksha (a mythological tree supposed to fulfill every desire of a person sitting beneath it), the human life is potentially full of innumerable precious gifts.  One can benefit from these divine gifts only when life’s energies are properly focused, disciplined and directed towards noble deeds.

🔷 The efforts made towards this end have been called sadhana. Many deities are worshiped and it is believed that they grant suitable boons to their devotee. The underlying truth is that while moving along the path of sadhana, an intrinsic faith has to be developed and the wayward propensities and perversities of the lower self have to be identified, curbed, refined and transformed into divine virtues. Natural adoption of virtuous life is a visible sign of divine grace. Once it is accomplished, people can smoothly move ahead in the direction of the ultimate goal of human endeavour – self-realisation.

📖 From Akhand Jyoti

👉 मृत्यु का भय छोड़ दीजिए।

🔶 बालक मरें, चाहे जवान या बूढ़े मरें, हम इससे भयभीत क्यों हों? कोई पल ऐसा नहीं जाता जब इस जगत में कही किसी का जन्म और कही किसी की मृत्यु होती है। पैदा होने पर खुशियाँ मनाना और मौत से डरना बड़ी मूर्खता है, यह बात हमें अवश्य सदैव अनुभव करनी चाहिए। जो लोग आत्मवादी हैं, - और हममें कौन हिन्दू, मुसलमान या पारसी ऐसा होगा जो आत्मा के अस्तित्व को न मानता होगा? - वे जानते हैं कि आत्मा कभी मरती नहीं।

🔷 यही नहीं, बल्कि जीवित और मृत समस्त प्राणी एक ही हैं, उनके गुण भी एक ही हैं। इस दशा में, जबकि जगत में उत्पत्ति और लय पल पल-पर होता ही रहता है, हम क्यों खुशियाँ मनावें? और किस लिए शोक करें? सारे देश को यदि हम अपना परिवार मानें- देश में जहाँ कहीं किसी का जन्म हुआ हो, उसे अपने यहाँ ही हुआ मानें- तो कितने जन्मोत्सव मनाइयेगा? देश में जहाँ-जहाँ मौतें हों उन सबके लिए यदि हम रोते रहें तो हमारी आँखों के आँसू कभी बन्द ही न हों। यह सोचकर हमें मृत्यु का भय छोड़ देना चाहिए।

🔶 अन्य देशों की अपेक्षा प्रत्येक भारतवासी अधिक ज्ञानी, अधिक आत्मवादी होने का दावा रखता है, तिस पर भी मौत के सामने जितने दीन हम हो जाते हैं उतने और लोग शायद ही होते हों और उनमें भी मेरा खयाल है कि हिन्दू लोग जितने अधीर हो जाते हैं उतने भारत के दूसरे लोग नहीं। अपने यहाँ किसी का जन्म होते ही हमारे घरों में आनन्द मंगल उमड़ पड़ता है और जब कोई मर जाता है तब इतना रोना पीटना मचता है कि आस-पास के लोग भी हैरान हो जाते हैं। हमें इस अज्ञान जन्य हर्ष शोक को छोड़ ही देना चाहिए।

✍🏻 महात्मा गाँधी
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1943 पृष्ठ 6

👉 गुरुगीता (भाग 107)

👉 ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूप में गुरूगीता
🔶 गुरूगीता के इस विस्मयकारी सुफल को भगवान् सदाशिव कहते हैं-

कालमृत्युभयहरं सर्वसंकटनाशनम् ।। यक्षराक्षसभूतानां चौरव्याघ्रभयापहम्॥ १३५॥
महाव्याधिहरं सर्व विभूतिसिद्धिदं भवेत्। अथवा मोहनं वश्यं स्वयमेवं जपेत्सदा॥ १३६॥

🔷 गुरूगीता का जप काल एवं मृत्यु के भय का हरण करने वाला है। इससे सभी संकटों का नाश होता है। इतना ही नहीं, इससे यक्ष, राक्षस, भूत, चोर एवं व्याघ्र आदि के भय का भी हरण होता है॥ १३५॥ इसके जप से सभी व्याधियाँ दूर होती हैं। सभी सिद्धियों एवं अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति होती हैं। यहाँ तक कि इस गीता को स्वयं जपने से सम्मोहन वशीकरण आदि की शक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है॥ १३६॥

🔶 गुरूगीता के दार्शनिक रहस्य, यौगिक रहस्य तो अद्भुत हैं ही इसके काम्य प्रयोग भी विलक्षण हैं। जिनका मूल स्त्रोत है, शिष्य की श्रद्धा, आस्था और उपयुक्त विधि- विधान। शिष्य की श्रद्धा एवं उपयुक्त विधियाँ गुरूगीता के मंत्रों को महासमर्थ बनाती हैं। हालाँकि इसके प्रयोगकर्त्ता विरले एवं विलक्षण ही मिलते हैं। फिर भी इनका सम्पूर्ण अभाव नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 162

👉 कर्मयोग का रहस्य (भाग 4)

🔶 पश्चिम में तथा अमरीका में बहुत से धनी लोग बेशुमार दान करते हैं, वे बड़े बड़े अस्पताल और बड़ी बड़ी संस्थाएँ बनाते हैं। वे यह सब कुछ केवल सहानुभूति और मनुष्य जाति पर दया करने के नाते ही करते हैं, उनके लिए यह सब समाज सेवा है और ईश्वर समाज का आधार है और मनुष्य ईश्वर का व्यक्तित्व प्रकट करता है। वे अभिमान रहित होकर कर्त्तापन की बुद्धि को छोड़ कर और फल की आशा को छोड़कर सेवा नहीं करते, उनके लिए यह सेवायोग (कर्मयोग) नहीं है।

🔷 उनके वास्ते यह सेवा केवल दान विषयक कर्म है, उनके लिए सेवा केवल मनुष्यता का धर्म है, उनमें किसी दर्जे तक मनुष्य−जाति के लिये सहानुभूति इस सेवा के द्वारा बढ़ जाती है, उनको कर्मयोग के अभ्यास से चित्त शुद्धि करके आत्मज्ञान प्राप्त करने का विचार नहीं आता, उनको जीवन के लक्ष्य (उद्देश्य) का कुछ ज्ञान नहीं होता, उनको ईश्वर की सत्ता में भी दृढ़ विश्वास नहीं होता। जो कर्मयोग के सिद्धान्त को समझकर ईश्वर की सत्ता में दृढ़ विश्वास रखते हुए कर्म करते हैं वे अपने लक्ष्य को जल्दी पहुँच जावेंगे।

🔶 कर्मयोग के अभ्यास के लिए बहुत धन होना आवश्यक नहीं है, आप अपने धन और मन से सेवा कर सकते हैं। यदि किसी निर्धन रोगी को सड़क के किनारे पड़ा हुआ देखो तो उसको थोड़ा जल या दूध पीने को दो, मीठे आश्वासन से उसको प्रसन्न करो, उसको ताँगे में बैठाओ और पास के अस्पताल में ले जाओ, यदि तुम्हारे पास ताँगे का किराया देने के लिये पैसा नहीं है तो रोगी को अपनी पीठ पर उठाकर ले जाओ और उसको अस्पताल में दाखिल कराने का इन्तजाम कर दो। यदि तुम इस प्रकार सेवा करोगे तो तुम्हारा चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। निर्धन, निःसहाय मनुष्यों की इस प्रकार की सेवा से परमात्मा ज्यादा खुश होता है, न कि धनी लोगों की शान−शौकत से की हुई सेवा से।

✍🏻 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति, मार्च 1955 पृष्ठ 8

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...