मंगलवार, 21 अगस्त 2018

👉 सुखी कैसे हो

🔶 “स्वार्थी और धनी आदमियों की समझ में न आने वाली एक सबसे रहस्यमयी गुत्थी यह है कि जहाँ उन्होंने सुख पाने की आशा की थी, वहाँ उन्हें सुख क्यों नहीं मिला? धन-दौलत पैदा कर लेने वाले लोगों के सामने जो सबसे बड़ी निराशा आई हैं, वह यह है कि अपनी दौलत से उन्हें जिस सुख की आशा थी, वह या उससे मिलती -जुलती चीज भी उन्हें नहीं मिली। वे देखते है कि भौतिक वस्तुओं से भावनाओं की संतुष्टि नहीं होती, और बड़ी से बड़ी सुख सामग्री के बीच भी हृदय भूखा रहता है। वे देखते है कि धन बहुत से कार्य कर सकता है, पर हृदय की लालसा और हृदय की भूख को तृप्त करने की इसमें कुछ भी शक्ति नहीं हैं। मैं अपनी मेहनत से ऊँचे उठे हुए एक आदमी को जानता हूँ जिसने बड़ी दौलत कमाई थी। उसने मुझे बताया कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी पहेली और निराश यह है कि यद्यपि मैंने लाखों कमाये, पर मैं सुखी नहीं हूँ। वास्तव में कोई भी स्वार्थी जीवन कभी सुखी नहीं हो सकता।”

~ स्वेट मार्डन

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 33)

👉 बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

🔶 मजबूत किलों को बिस्मार करने के लिए अष्टधातु की तोपों की गोलाबारी ही काम आती है। पहाड़ों को समतल बनाने के लिए डायनामाइट की सुरंगों का प्रयोग करना पड़ता है। रेल के डिब्बे पटरी से उतर जाने पर उन्हें उठाने के लिए बड़ी ताकत वाली क्रेन ही अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकती है। कठिन मोरचे जीतने के लिए प्रवीण-पारंगत दुस्साहसी सेनापति ही विजय वरण करते हैं। ऐसे बड़े कामों के लिए छिटपुट साधनों का उपयोग तो निरर्थक ही होता है।
  
🔷 तलवार का वार सहने के लिए गैंडे की खाल वाली ढाल चाहिए। सहस्रों टन भार लाद ले जाने वाले जलयान जो काम करते हैं, वह छोटी डोंगियों से नहीं लिया जा सकता। भयंकर अग्निकांड से निपटने के लिए, बड़े आकार वाले फायर ब्रिगेड चाहिए। उबड़-खाबड़ क्षेत्रों को समतल बनाने के लिए बुलडोजरों से कम में काम नहीं चलता। दलदल में फँसे हाथी को उससे भी बड़े आकार वाला गजराज ही खींचकर किनारे पर लगाता है। नये नगरों और बड़े बाँधों के नक्शे, सूझ-बूझ वाले वरिष्ठ इंजीनियर ही बनाकर देते हैं।
  
🔶 बड़े कामों का दायित्व उठाने और उन्हें करने की जिम्मेदारी असाधारण क्षमता संपन्नों को ही सौंपी जाती है। यों महत्त्व तो टट्टुओं और बकरों का भी है, पर उनकी पीठ पर हाथी बाली अंबारी नहीं रखी जा सकती। सौ खरगोश मिलकर भी एक चीते से दौड़ में आगे नहीं निकल सकते। बड़े कामों के लिए बड़ों की तलाश करनी पड़ती है।

🔷 इन दिनों बड़ी उथल-पुथल होने जा रही है। शताब्दियों से संचित सड़ाँध भरे कचरे को हटाया और ठिकाने लगाया जाना है। कँटीली झाड़ियों वाले जंगल के स्थान पर सुरम्य उद्यान खड़े करना सहज काम नहीं है। धूल भरे, लावे जैसे जलते रेगिस्तान को भी लोगों ने लहलहाती हरियाली से सुरम्य बनाया है, पर इसके लिए पैनी सूझ-बूझ का परिचय देने और विपुल साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ती है। समुद्र को छलांगने और संजीवनी बूटी वाला पर्वत उखाड़कर लाने का चमत्कार हनुमान् ही प्रस्तुत कर सके थे। हर वानर ऐसा दुस्साहस कर दिखाने की हिम्मत नहीं कर सकता। असुरता का व्यापक साम्राज्य ध्वस्त करने और उसके स्थान पर सतयुगी रामराज्य का वातावरण बनाने के लिए बड़ों की बड़ी योजना और उपयुक्त साधन जुटाने की क्षमता ही उद्देश्य पूरा कर सकी थी। ऐसी आशा साधारण जन से नहीं की जा सकती। समुद्र सोखने की चुनौती अगस्त्य ही स्वीकार कर सकते थे। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 43

👉 Freedom of choice - A basic human characteristic

🔶 Human being is endowed with basic freedom of choice. Nature provides him with a variety of options to choose from. It is up to him to exercise this God-given gift either positively or negatively. Thus, he is the maker of his own destiny. This fundamental freedom is a great boon to the human race. However, if used negatively, it can also turn into a bane. It is sad to say that for the vast majority, this freedom proves to be a bane, because they choose to misuse this freedom for destructive rather than constructive purposes. Destruction is far more easier than creation.

🔷 What can be easier than ruining oneself? In fact, doing nothing in the direction of self-upliftment in itself amounts to self-destruction. One who is not consciously progressing in soul-growth, is knowingly or unknowingly sliding down the scale of consciousness into the dungeon of darkness. Once a point was raised in the Satsang-Sabh of Maharshi Raman.

🔶 Some people were saying that a human being is superior most amongst all the creatures, while some others were arguing that a human being is worse than the animals, because sometimes conduct of animals appears to be far nobler than that of humans. Both the sides requested the Maharshi to elucidate. Maharshi said -"The truth is that a human being is a combination of mortal body and immortal consciousness. The one who follows the body and its cravings goes on groping in the darkness and the one who investigates the inner realms of consciousness, ultimately realizes the Supreme Consciousness and thus his real self." This is the Eternal Truth.

📖 Akhand Jyoti, Mar Apr 2003

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग 3)

🔶 यह एक तथ्य है कि किसी व्यक्ति द्वारा किये हुए भले या बुरे कर्म का कुछ भाग उस परिवार के अन्य व्यक्तियों को भी मिलता है। घर का एक व्यक्ति कोई भला काम करे तो उस परिवार के सब लोग अभिमान अनुभव करते हैं और आदर पाते हैं। यदि घर का एक व्यक्ति बुरा काम करता है तो सारे कुटुम्ब को लज्जित होना पड़ता है। एक समय ब्राह्मण लोगों ने बड़े उत्तम ज्ञान का प्रसार करके जनता की सेवा की थी। उनकी सैंकड़ों पीढ़ी के बाद भी आज ब्राह्मणों के गुणों से हीन होने पर भी उनका आदर होता है और वे अभिमानपूर्वक ऋषि मुनियों की संतान कह कर अपना गौरव प्रकट करते हैं।

🔷 ऋषियों का शरीर छूटे हजारों वर्ष हो गये तो भी उनकी संतान उन पूर्वजों के पुण्य का फल, दान दक्षिणा के रूप में अब तक भोग रही हैं। बुरे कर्म करने वालों के कुटुम्बियों और वंशजों को भी इसी प्रकार लज्जित होना पड़ता है। भारत में कुछ कौमें “जरायम पेशा” लिखी जाती हैं। इन कौमों के लोग चोरी आदि अपराध करते हैं। उनमें से जो अपराध नहीं करते वे भी ‘जरायम पेशा” समझे जाते हैं और पुलिस की निगरानी उन पर भी रहती है। सम्मिलित रहने वालों की सम्मिलित जिम्मेदारी भी होती है। वे आपस में एक दूसरे के पाप पुण्य के भागीदार भी होते हैं।

🔶 आजकल समस्त संसार पर जो चतुर्मुखी आपत्तियाँ आई हुई हैं उसका कारण भी यही सम्मिलित जिम्मेदारी है। पूर्वकाल में परिवारों के दायरे छोटे थे इसलिए वहाँ विपत्तियाँ भी थोड़े ही पैमाने पर आती थी। अब सारी दुनिया एक सूत्र में बँधी है तो उसका यह कर्तव्य भी बढ़ गया है कि समस्त देशों में धर्म की वृद्धि और अधर्म का निवारण करने का प्रयत्न करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महायोगी अरविन्द
📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी 1943 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.5

👉 हमारे विचारों और अद्भुत प्रभाव (अन्तिम भाग)

🔶 इसके विपरीत हम जितना अधिक स्वार्थ त्याग और पर उपकार के विचारों का केन्द्र अपने अन्दर बनाते जायेंगे, उतना ही अधिक हम आनन्द और शाँति को प्राप्त होंगे। जो लोग हमसे किसी प्रकार का फायदा उठाते हैं वह ही गुप्त और प्रकट रूप से हमारा कल्याण करने वाले होते हैं। हमें ऐसी तैयारी कर लेनी चाहिये कि हम मन, कर्म, वचन से हर समय दूसरों का भला ही सोचते रहें-ऐसा करने से निश्चय हमारे बुरा चाहने वालों की संख्या कम होकर हमारा भला चाहने वालों की संख्या अधिक हो जाएगी और हम अपने चारों ओर सुखद और शान्तिपूर्ण वातावरण बना सकेंगे। जब मनुष्य का मन क्रोध ईर्ष्यादि बुरे विचारों से रहित हो जाता है तो वह असीम दैवी शक्ति को धारण कर लेता है- उस समय अनेक शत्रु होने पर भी वे उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

🔷 इस प्रकार का अद्भुत शान्तिपूर्ण जीवन बनाने में हमें उन घड़ियों में विशेष सतर्कता पूर्वक धैर्य से काम लेने की जरूरत है। जब कि किसी प्राणी द्वारा हमें हानि पहुँचाई जा रही हो। आध्यात्मिक जीवन में यह समय ही-परीक्षा का समय होता है। भरपूर साहस और दृढ़ता से हमें-ऐसे विचारों को हटाने में असीम शक्ति से काम लेना चाहिये जो उस समय में दूसरों का अकल्याण चाहने को हमारे मन में आते हैं। ऐसे समय में हम मन से उनका अकल्याण न चाहें, पर हाँ! कर्तव्य द्वारा उसका उत्तर देना कोई बुरा नहीं है।

🔶 वास्तव में निष्कपट और सरल हृदय वाले व्यक्ति उत्तम लौकिक और पारलौकिक सुखों के स्वामी होते हैं। दगा फरेब, झूठ, ईर्ष्यादि बुरे विचारों से काम चलाने वाले अल्पकालीन तुच्छ सुखों को प्राप्त होते हैं।

🔷 अतएव मन, कार्य, वाणी से सदैव दूसरों का हित ही विचारना और करना चाहिये और प्रातःकाल बिस्तर त्यागते समय प्रभु का नाम स्मरण करने के बाद इस मन्त्र को भी एक बार अवश्य उच्चारण कीजिये कि- “हे प्रभु! संसार के सभी प्राणियों का कल्याण हो।”

.... समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1943 पृष्ठ 8
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/February/v1.8

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 Aug 2018


👉 अहंकार सत्कर्म का भी बुरा।

🔶 एक बार एक स्त्री पहाड़ पर धान काट रही थी। इतने में एक दुष्ट मनुष्य उधर आया और उसके साथ दुष्टता करने पर उतारू हो गया। पहले तो स्त्री ने आत्मा रक्षा के लिए लड़ाई झगड़ा किया पर शरीर से दुर्बल होने के कारण जब उसे विपत्ति आती दिखी तो पहाड़ से नीचे कूद पड़ी। ईश्वर ने उसकी रक्षा की। उसे जरा भी चोट न लगी और प्रसन्नता पूर्वक घर चली गई।

🔷 अब उसे अपने पतिव्रत का अभिमान हो गया। हर किसी से शेखी मारती कि मैं ऐसी सतवन्ती हूँ कि पहाड़ से गिरने पर भी मेरे चोट नहीं लगती। पड़ोसी इस बात पर अविश्वास करने लगे और कहा ऐसा ही है तो चल हमें आँखों के सामने पहाड़ पर से कूद कर दिखा। दूसरे दिन उस स्त्री ने सारे नगर में मुनादी करा दी कि आज मैं पहाड़ पर से कूदकर अपने सतवन्ती होने को परिचय दूँगी। सभी गाँव इकट्ठा हो गया और उसके साथ चल पड़ा। वह पहाड़ पर से कूदी तो उसकी एक टाँग टूट गई। मरते मरते मुश्किल से बची।

🔵 उस असफलता पर उसे बड़ा दुःख हुआ। और दिन रात खिन्न रहने लगी। उधर से एक ज्ञानी पुरुष निकले तो स्त्री ने अपनी इस असफलता का कारण पूछा। उन्होंने बताया कि पहली बार तू धर्म की रक्षा के लिए कूदी थी, इसलिए धर्म ने तेरी रक्षा की। दूसरी बार तू अपनी प्रशंसा दिखाने और अभिमान प्रकट करने के उद्देश्य से कूदी तो उस यश कामना और अभिमान ने तेरा पैर तोड़ दिया।

🔶 स्त्री की अपनी भूल मालूम हुई और उसने पश्चाताप करके अपनी मानसिक दुर्बलता को छोड़ दिया।

📖 अखण्ड ज्योति मई 1961 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/May/v1.25