शनिवार, 30 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 39):- एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी

शिष्य संजीवनी को शिष्यों ने अजस्र स्रोत के रूप में अनुभव किया है। इसके चिंन्तन्- मनन से उन्हें शिष्यत्व की सुगन्धि और पुष्टि का अहसास होता है। इससे उनकी भावनाएँ न केवल प्रगाढ़ होती हैं, बल्कि पवित्र भी होती हैं। इस क्रम में कइयों के मन में प्रश्र उठना स्वाभाविक है कि आयुर्वेद आदि चिकित्सा शास्त्र के ग्रन्थों में प्रत्येक संजीवनी के साथ अनुपान की विधि क्या है? सचमुच ही यह प्रश्र सार्थक है। प्रश्रकत्ताओं की भावनाओं की सघनता को दर्शाता है। इसके उत्तर में यही कहना है कि जो शिष्य संजीवनी का सेवन कर रहे हैं अथवा करना चाहते हैं, उन्हें इस उत्तम औषधि का सेवन अपनी समर्पित भावनाओं के साथ करना चाहिए। ये समर्पित भावनाएँ ही इस औषधि का अनुपान हैं।

इस अनुपात के साथ यह औषधि अनेकों गुना प्रभावी हो जाती है। इसके शुभ परिणामों में भारी बढ़ोत्तरी हो जाती है। जो इस महासत्य को अनुभव कर रहे हैं, उन्हें अपनी नीरव भावनाओं में उस दिव्य तत्त्व की अनुभूति होती है- जो शिष्यत्व का सार है। यह क्या है? किस तरह है? इसके लिए शिष्य संजीवनी के नवें सूत्र पर चिंन्तन् करना होगा। इसमें शिष्यत्व की साधना करने वाले श्रेष्ठ साधक कहते हैं- ‘समर्पित भावनाओं की प्रगाढ़ता में नीरवता प्रकट होती है। यह नीरवता ही वह परम शान्ति है, जिसकी कामना सभी साधक करते हैं। इस शान्ति से ही परा वाणी की अनुगूंज प्रकट होती है।

वह वाणी अपने परम मौन में शिष्य को कहती है कि काट तो तुम चुके अब तुम्हें बोना चाहिए। यह वाणी- शिष्य के अन्तःकरण की परम शान्ति एवं सघन नीरवता का ही एक रूप है। यह स्वयं तुम्हारे सद्गुरु के स्वर हैं। उन्हें विश्वास है कि तुम उनके आदेश का पालन करोगे। इस अवस्था में तुम अब ऐसे शिष्य हो जो अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। तुम ब्राह्मी चेतना के संकेतों को सुन सकते हो, देख सकते हो, बोल सकते हो। ऐसा इसलिए हो सका है, क्योंकि तुमने अपनी वासनाओं को जीत लिया है और आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/ek

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? (भाग 5)


कौन मना करेगा? कोई नहीं करेगा। खिला हुआ फूल बीबी के हाथ में रख दिया जाय, तो बीबी मना करेगी क्या? नाक से लगाकर सूँघेगी छाती से लगा लेगी और कहेगी कि मेरे प्रियतम ने गुलाब का फूल लाकर के दिया है। मित्रो! फूल को हम क्या करते हैं? उस सुगंध वाले फूल को हम पेड़ से तोड़कर भगवान् के चरणों पर समर्पित कर देते हैं और कहते हैं कि हे परम पिता परमेश्वर! हे शक्ति और भक्ति के स्रोत! हम फूल जैसा अपना जीवन तेरे चरणारविन्दों पर समर्पित करते हैं। यह हमारा फूल, यह हमारा अंतःकरण सब कुछ तेरे ऊपर न्यौछावर है।

हे भगवान्! हम तेरी आरती उतारते हैं और तेरे पर बलि बलि जाते हैं। हे भगवान्! तू धन्य है। सूरज तेरी आरती उतारता है, चाँद तेरी आरती उतारता है। हम भी तेरी आरती उतारेंगे। तेरी महत्ता को समझेंगे, तेरी गरिमा को समझेंगे। तेरे गुणों को समझेंगे और सारे विश्व में तेरे सबसे बड़े अनुदान और शक्ति प्रवाह को समझेंगे। हे भगवान्! हम तेरी आरती उतारते हैं, तेरे स्वरूप को देखते हैं। तेरा आगा देखते हैं, तेरा पीछा देखते हैं, नीचे देखते हैं। सारे मुल्क में देखते हैं। हम शंख बजाते हैं। शंख एक कीड़े की हड्डी का टुकड़ा है और वह पुजारी के मुखमंडल से जा लगा और ध्वनि करने लगा। दूर दूर तक शंख की आवाज पहुँच गयी। हमारा जीवन भी शंख की तरीके से जब पोला हो जाता है।

इसमें से मिट्टी और कीड़ा जो भरा होता है, उसे निकाल देते हैं।जब तक इसे नहीं निकालेंगे, वह नहीं बजेगा मिट्टी को निकाल दिया, कीड़े को निकाल दिया। पोला वाला शंख पुजारी के मुख पर रखा गया और वह बजने लगा। पुजारी ने छोटी आवाज से बजाया, छोटी आवाज बजी। बड़ी आवाज से बजाया, बड़ी आवाज बजी। हमने भगवान् का शंख बजाया और कहा कि मैंने तेरी गीता गाई। भगवान्! तूने सपने में जो संकेत दिये थे, वह सारे के सारे तुझे समर्पित कर रहे हैं। शंख बजाने का क्रियाकलाप मानव प्राणियों के कानों में, मस्तिष्कों में भगवान् की सूक्ष्म इच्छाएँ आकांक्षाएँ फैलाने का प्रशिक्षण करता है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.1

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 4


मित्रो! हमने दीपक जलाया और कहा कि ऐ दीपक! जल और हमको भी सिखा। ऐ कम हैसियत वाले दीपक, एक कानी कौड़ी की बत्ती वाले दीपक, एक छटाँक भर तेल लिए दीपक, एक मिट्टी की ठीकर में पड़े हुए दीपक! तू अंधकार में प्रकाश उत्पन्न कर सकता है। मेरे जप से तेरा संग ज्यादा कीमती है। तेरे प्रकाश से मेरी जीवात्मा प्रकाशवान हो, जिसके साथ में खुशियों के इस विवेक को मूर्तिवान बना सकूँ। शास्त्रों में बताया गया है तमसो मा ज्योतिर्गमय’’। ऐ दीपक! हमने तुझे इसलिए जलाया कि तू हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चले तमसो मा ज्योतिर्गमय अंतरात्मा की भूली हुई पुकार को हमारा अंतःकरण श्रवण कर सके और इसके अनुसार हम अपने जीवन को प्रकाशवान बना सकें।

अपने मस्तिष्क को प्रकाशवान बना सकें।दीपक जलाने का यही उद्देश्य है। सिर्फ भावना का ही दीपक जलाना होता, तो भावना कहती कि दीपक जला लीजिए तो वही बात है, मशाल जला लीजिए तो वही बात है, आग जला लीजिए तो वही बात है। स्टोव को जला लीजिए, बड़ी वाली अँगीठी, अलाव जलाकर रख दीजिए। इससे क्या बनने वाला है और क्या बिगड़ने वाला है? आग जलाने से भगवान् का क्या नुकसान है और दीपक जलाने से भगवान् का क्या बनता है? अतः ऐ दीपक! तू हमें अपनी भावना का उद्घोष करने दे।

साथियो! हम भगवान् के चरणारविन्दों पर फूल चढ़ाते हैं। हम खिला हुआ फूल, हँसता हुआ फूल, सुगंध से भरा हुआ फूल, रंग बिरंगा फूल ले आते हैं। इसमें हमारी जवानी थिरक रही है और हमारा जीवन थिरक रहा है। हमारी योग्यताएँ प्रतिभायें थिरक रही हैं। हमारा हृदयकंद कैसे सुंदर फूल जैसे है। उसे जहाँ कहीं भी रख देंगे, जहाँ कहीं भी भेज देंगे, वहीं स्वागत होगा। उसे कुटुम्बियों को भेज देंगे, वे खुश। जब लड़का कमा कर लाता है। आठ सौ पचास रुपये कमाने वाला इंजीनियर पैसा देता है, तो सोफासेट बनते हुए चले जाते हैं। माया घर में आती हुई चली जाती है।


क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44

शिष्य संजीवनी (भाग 38) : जैविक प्रवृत्तियों को बदल देती है सदगुरु की चेतना

शोर का रूपान्तरण शान्ति में- यह शिष्य की श्रद्धा का सुफल है। यह उसकी भक्ति का सत्परिणाम है। जो इस नीरवता में अविचल भाव से अपने सद्गुरु को पुकारता रहता है। उसे ही मार्ग की सिद्धि मिलती है। यह मार्ग बाहरी दुनिया का मार्ग नहीं है। यह अन्तजर्गत की यात्रा का पथ है। यह ऐसा मार्ग है, जो शिष्य की चेतना को सद्गुरु की चेतना से जोड़ता है। बड़ा दुर्लभ पथ है यह। जिसे मिल चुका है, वे परम सौभाग्यशाली हैं क्योंकि वे सतत्- निरन्तर अपने सद्गुरु के सम्पर्क में रहते हैं। उनकी कृपा वर्षा को अनुभव करते हैं।

इस मार्ग को उपलब्ध करने वाले साधकों का अनुभव यही कहता है कि उनके सद्गुरु इस लोक में हों, या फिर किसी सुदूर लोक में, कोई अन्तर नहीं पड़ता। जिसे मार्ग मिल सका है, उसके कई चिह्न उनके जीवन में प्रकट हो जाते हैं। इन चिह्नों में सबसे महत्त्वपूर्ण चिह्न है, देहभाव का विलीन हो जाना। आचार्य शंकर कहते हैं देहादिभाव परिवर्तयन्त, परिवर्तित हो गए हैं देहभाव जिसके। इसका सार अर्थ इतना ही है कि उस पर बरसने वाली सद्गुरु की कृपा चेतना उसकी जैविक प्रवृत्तियों को आमूल- चूल बदल देती है। सच्चे शिष्य की देह दिखने में तो जस की तस बनी रहती है, पर उसकी प्रवृत्तियाँ घुल जाती हैं, धुल जाती हैं।

जैविक प्रवृत्तियों के रूपान्तरण के साथ ही शिष्य सतत् और निरन्तर अपने सद्गुरु की चेतना के लिए ग्रहणशील होता है। उसमें प्रकट होता है अडिग विश्वास, प्रबल निश्चय और व्यापक आत्मबोध। गुरुदेव उसे अपनी आत्मचेतना में स्वीकार लेते हैं। शिष्य उनकी सर्वव्यापी चेतना का अभिन्न अंश बन जाता है। उसके व्यक्तित्व से ऐसा प्रकाश फूटता है, जिससे कि उससे मिलने वालों का जीवन प्रकाशित हो जाता है। जिन्हें भी इसकी प्राप्ति हो सकी है, उन सभी के अन्तःकरण शान्ति से आप्लावित हो उठते हैं। इस सत्य के भेद और भी हैं। अगला सूत्र इस सत्य के नए आयाम उद्घाटित करेगा। 

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/jaivic

माया क्या है ?

शरीर सुख के लिए अन्य मूल्यवान पदार्थों को खर्च कर देते हैं कारण यही है कि वे मूल्यवान पदार्थ शरीर सुख के मुकाबले में कमतर जँचते हैं। लोग शरीर सुख की आराधना में लगे हुए हैं परन्तु एक बात भूल जाते हैं कि शरीर से भी ऊँची कोई वस्तु है। वस्तुत: आत्मा शरीर से ऊँची है। आत्मा के आनन्द के लिए शरीर या उसे प्राप्त होने वाले सभी सुख तुच्छ हैं। अपने दैनिक जीवन में पग- पग पर मनुष्य 'बहुत के लिये थोड़े का त्याग' की नीति को अपनाता है, परन्तु अन्तिम स्थान पर आकर यह सारी चौकड़ी भूल जाता है। जैसे शरीर सुख के लिए पैसे का त्याग किया जाता है वैसे ही आत्म - सुख के लिए शरीर सुख का त्याग करने में लोग हिचकिचाते हैं, यही माया है।

पाठक इस बात को भली भाँति जानते हैं कि अन्याय, अनीति, स्वार्थ, अत्याचार, व्यभिचार, चोरी, हिंसा, छल, दम्भ, पाखण्ड, असत्य, अहंकार, आदि से कोई व्यक्ति धन इकट्ठा कर सकता है, भोग पदार्थों का संचय कर सकता है, इन्द्रियों को कुछ क्षणों तक गुदगुदा सकता है, परन्तु आत्म-सन्तोष प्राप्त नहीं कर सकता।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
धर्म तत्त्व का दर्शन और मर्म
वांग्मय 53 पृष्ठ- 3.14


Maya - know it to know It

To obtain sense pleasures we spend away our riches, because we value this experience of pleasure more than the possession of material wealth. We are so driven by these desires, running after these sense pleasures that we forget that there exists an entity even greater than our gross body. In reality Atman (soul) is even greater, more special than our body. When compared to the bliss we can experience in our soul all other sense pleasures appear inferior and trivial.

In our day-to-day life we follow the motto of - "give up as little as possible and get as much as possible", but when presented with the ultimate test, we abandon it. We are ready to give up our hard earned wealth when it is for the sake of sense pleasures, but we hesitate to give up our sense pleasures (which are little things) for the bliss of our soul (which is the greatest joy there is) - This is MAYA.

It is a well established fact that any one can obtain wealth, amass material possessions, give the senses some temporary satisfaction by indulging in tyranny, immorality, selfishness, oppression, adultery, theft, violence, deceit, arrogance, hypocrisy, lies, ego, etc. But one can never taste the bliss of self-satisfaction this way.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Dharma Tatwa ka Darshan aur Marm Vangmay 53 Page
-3.14

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी


सूत्र नं० 1
श्लोक-  
योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।
सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

अर्थ- 
हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।

सूत्र –  
धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा। मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।


गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी
सूत्र नं० 2
श्लोक- 
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।।

अर्थ-  
योगरहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावनारहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा।

सूत्र –  
हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है, लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना ( आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।


गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी
सूत्र नं० 3
श्लोक-
विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।

अर्थ-  
जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।

सूत्र – 
यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।


गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी
सूत्र नं० 4
श्लोक- 
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।

अर्थ-  
कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।

सूत्र – 
 बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रुप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।


गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी
सूत्र नं० 5
श्लोक-
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।

अर्थ- 
तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।

सूत्र-  
श्रीकृष्ण अर्जुन को माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने-अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते, उनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है, उसे वो पूरा करना ही चाहिए।


गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी
सूत्र नं० 6
श्लोक- 
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

अर्थ-  
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।

सूत्र- 
 यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।


गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी
सूत्र नं० 7
श्लोक-
 न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।

अर्थ-  
ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही करावे।

सूत्र – 
ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है।


गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी
सूत्र नं० 8
श्लोक- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।

अर्थ- 
हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

सूत्र-  
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।


गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगी
सूत्र नं० 9
श्लोक-  
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

अर्थ-  
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

सूत्र-  
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

शिष्य संजीवनी (भाग 37): जैविक प्रवृत्तियों को बदल देती है सदगुरु की चेतना

शिष्य संजीवनी का यह सूत्र जितना गहन है, उतना ही रहस्यमय भी। इसे सही- सही वही अनुभव कर सकते हैं, जो अपने अन्तःकरण के महारण्य में मार्ग खोजने में लगे हैं। जो इस महत्कार्य में सम्पूर्ण तल्लीनता व तन्मयता से तत्पर हैं, उन्हीं में इस सूत्र से बिखर रही प्रकाश किरणें अवतरित हो पाएँगी। इस सूत्र के पहले जो भी सूत्र बताए गए थे, यह सूत्र उन सभी की अपेक्षा अति विशिष्ट है। इसकी पहली पंक्ति ‘भयंकर आँधी के पश्चात् जो निस्तब्धता छा जाती है, उसी में फूल खिलने की प्रतीक्षा करो, उससे पहले नहीं।’ सभी पंक्तियों का सार है।

हम सभी साधक- जो वर्षों से साधना कर रहे हैं, उनमें से प्रायः सभी को आँधियों का अनुभव है। हम सभी के अन्तर्गगन आँधियों के धूल- गुबार से भरे हुए हैं। संस्कारों, प्रवृत्तियों एवं कर्मों के भयावह जंगल में ये आँधियाँ जोर- शोर से उठती हैं। शुरूआती दौर में हम ज्यों- ज्यों साधना करते हैं, त्यों- त्यों इनका शोर बढ़ता है। आँधी की गर्द- गुबार तेज होती है। कभी- कभी तो इनके बढ़ने की दर साधना के बढ़ने के हिसाब से ही तेज होती है।

बड़ी विकट एवं विपन्न स्थिति होती है इस समय साधक की। ऐसे में उसके लिए गुरुभक्ति का ही सहारा होता है। गुरुभक्ति का रक्षा कवच ही उसे सुरक्षा प्रदान करता है। जो इस सुरक्षा का सम्बल बनाए अन्त तक टिके रहते हैं, उनके जीवन में आँधियों का यह शोर कम हो जाता है और इसका स्थान एक नीरव- निस्तब्धता ले लेती है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 3 ( 26 April 2016)

 
मित्रो! आध्यात्मिक व्यक्ति बनने के लिए पूजा की क्रिया करते- करते हम मर जाते हैं। यह आध्यात्मिक शिक्षण है। यह शिक्षण हमको सिखलाता है कि धूपबत्ती जलाने के साथ साथ में हमको यह विचार करना है कि यह हमारे भीतर प्रकाश उत्पन्न करती है। दीपक लेकर हम बैठ जाते हैं। दीपक जलता रहता है। रात में भगवान् को दिखाई न पड़े, बात कुछ समझ में आती है; लेकिन क्या दिन में भी दिखाई नहीं पड़ता? दिन में भगवान् के आगे दीपक जलाने की क्या जरूरत है? इसकी जरूरत नहीं है।

कौन कहता है कि दीपक जलाइए क्यों हमारा पैसा खर्च कराते हैं? क्यों हमारा घी खर्च कराते हैं। इससे हमारा भी कोई फायदा नहीं और आपका भी कोई फायदा नहीं। आपकी शक्ल हमको भी दिखाई पड़ रही है और बिना दीपक के भी हम आपको देख सकते हैं। आपकी आँखें भी बरकरार हैं; फिर क्यों दीपक जलाते हैं और क्यों पैसा खराब करवाते हैं?

मित्रो! सवाल इतना छोटा सा है, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत गूढ़ हैं। इसका सम्बन्ध भावनात्मक स्तर के विकास से है। दीपक प्रकाश का प्रतीक है। हमारे अंदर में प्रकाश और सारे विश्व में प्रकाश का यह प्रतीक है। अज्ञानता के अंधकार ने हमारे जीवन को आच्छादित कर लिया है। उल्लास और आनन्द से भरा हुआ, भगवान् की सम्पदाओं से भरा हुआ जीवन, जिसमें सब तरफ विनोद और हर्ष छाया रहता है; लेकिन हाय रे अज्ञान की कालिमा! तूने हमारे जीवन को कैसा कलुषित बना दिया? कैसा भ्रान्त बना दिया? स्वयं का सब कुछ होते हुए भी कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

सब कुछ तो हमारे पास है, पर मालूम पड़ता है कि संसार में हम ही सबसे ज्यादा दरिद्र हैं। हमारे पास किसी चीज की कमी है क्या? हमारे मन की एक एक धारा ऐसी निकलती है कि हमको हँसी में बदल देती है; लेकिन हमको हर वक्त रूठे रहने का मौका, नाराज रहने का मौका, शिकायतें करने का मौका, छिद्रान्वेषण करने का मौका, देश घूमने का मौका, विदेश घूमने का मौका ही दिखाई देता है। सारा का सारा जीवन इसी अशांति में निकल गया।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लकड़ी का कटोरा

🔵 एक वृद्ध व्यक्ति अपने बहु – बेटे के यहाँ शहर रहने गया उम्र के इस पड़ाव पर  वह अत्यंत कमजोर हो चुका था, उसके हाथ कांपते थे और दिखाई भी कम  देता था वो एक छोटे से घर में रहते थे, पूरा परिवार और उसका चार वर्षीया पोता एक साथ डिनर टेबल पर खाना खाते थे लेकिन वृद्ध होने के कारण उस व्यक्ति को खाने में बड़ी दिक्कत होती थी कभी मटर के दाने उसकी चम्मच से निकल कर फर्श पे बिखर जाते तो कभी हाँथ से दूध छलक कर मेजपोश पर गिर जाता।

🔴 बहु-बेटे  एक -दो  दिन ये सब  सहन करते  रहे पर अब उन्हें अपने पिता की इस  काम से चिढ होने लगी  हमें इनका कुछ करना पड़ेगा, लड़के ने कहा बहु ने भी हाँ में हाँ मिलाई और बोली, आखिर कब तक हम इनकी वजह से अपने खाने का मजा किरकिरा रहेंगे, और हम इस तरह चीजों का नुक्सान होते हुए भी नहीं देख सकते।

🔵 अगले दिन जब खाने का वक़्त हुआ तो बेटे ने एक पुरानी मेज को कमरे के कोने में लगा दिया, अब बूढ़े पिता को वहीँ अकेले बैठ कर अपना भोजन करना था यहाँ तक की उनके खाने के बर्तनों  की जगह एक लकड़ी का कटोरा दे दिया गया था, ताकि अब और बर्तन ना टूट -फूट सकें बाकी लोग पहले की तरह ही आराम से बैठ कर खाते और जब कभी -कभार उस बुजुर्ग की तरफ देखते तो उनकी आँखों में आंसू दिखाई देते यह देखकर भी बहु-बेटे का मन नहीं पिघलता, वो उनकी छोटी से छोटी गलती पर ढेरों बातें सुना देते वहां बैठा बालक भी यह सब बड़े ध्यान से देखता रहता, और अपने में मस्त  रहता।

🔴 एक रात खाने से पहले, उस छोटे बालक को उसके माता-पिता ने ज़मीन पर बैठ कर कुछ करते हुए देखा, “तुम क्या बना रहे हो ?”  पिता ने पूछा।

🔵 बच्चे ने मासूमियत के साथ उत्तर दिया, अरे मैं तो आप लोगों के लिए एक लकड़ी का कटोरा बना रहा हूँ, ताकि जब मैं बड़ा हो जाऊं तो आप लोग इसमें खा सकें, और वह पुनः अपने काम में लग गया पर इस बात का उसके माता -पिता पर बहुत गहरा असर हुआ, उनके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला और आँखों से आंसू बहने लगे वो दोनों बिना बोले ही समझ चुके थे कि अब उन्हें क्या करना है उस रात वो अपने बूढ़े पिता को  वापस डिनर टेबल पर ले आये, और फिर कभी उनके साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया।

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 2


 
साथियो! आपने हर हाल में समाज की सेवा की; लेकिन जब चुनाव में खड़े हुए, तो एमपी एमएलए के लिए लोगों ने आपको वोट नहीं दिया और दूसरे को दे दिया। इससे आपको बहुत धक्का लगा। आपने कहा कि भाई। हमने तो अटूट सेवा की थी; लेकिन जनता ने चुनाव में जीतने ही नहीं दिया। ऐसी खराब है जनता। भाड़ में जाये, हम तो अपना काम करते हैं। हमें चुनाव नहीं जीतना है।
 
उपासना में भी ऐसी ही निष्ठा की आवश्यकता है। आपने पत्थर की एकांगी उपासना की और एकांगी प्रेम किया। उपासना के लिए, पूजा करने के लिए हम जा बैठते हैं। धूपबत्ती जलाते हैं। धूपबत्ती क्या है? धूपबत्ती एक कैंडिल का नाम है। एक सींक का नाम है। एक लकड़ी का नाम है। वह जलती रहती है और सुगंध फैलाती रहती है।

सुगंध फैलाने में भगवान् को क्या कोई लाभ हो जाता है? हमारा कुछ लाभ हो जाता है क्या? हाँ, हमारा एक लाभ हो जाता है और वह यह कि इससे हमें ख्याल आता है कि धूप बत्ती के तरीके से और कंडी के तरीके से हमको भी जलना होगा और सारे समाज में सुगंध फैलानी होगी। इसलिए हमारा जीवन सुगंध वाला जीवन, खुशबू वाला जीवन होना चाहिए।

धूपबत्ती भी जले और हम भी जलें जलने से सुगंध पैदा होती है। धूपबत्ती को रखा रहने दीजिए और उससे कहिए कि धूपबत्ती सुगंध फैलाएँगी धूपबत्ती कहती है कि मैं तो नहीं फैलाती। क्यों? जलने पर सुगंध फैलाई जा सकती है। जलना होगा। इसीलिए मनुष्य को जीवन में जलना होता है। धूपबत्ती की तरह से सुगंध फैलानी पड़ती है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगीसूत्र नं० 9


श्लोक-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

अर्थ-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

सूत्र –
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

शिष्य संजीवनी (भाग 36) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


 लेकिन जब तक शिष्य का सम्पूर्ण देहभाव विघटित होकर घुल न जाएगा, जब तक समूची अन्तःप्रकृति आत्म सत्ता से पूर्ण हार मानकर उसके अधिकार में न आ जाएगी तब तक महासिद्धि के फूल नहीं खिल सकते। यह पुण्य क्षण तो तब आता है जब एक ऐसी शान्ति का उदय होता है, जो गर्म प्रदेश में भारी वर्षा के पश्चात छाती है। इस गहन और नीरव शान्ति में ही यह रहस्यमय घटना घटित होती है। जो सिद्ध कर देती है कि मार्ग प्राप्ति हो गयी है।

यह क्षण बड़ा मार्मिक है। सिद्धि के ये फूल बड़े अनोखे हैं। इनकी महक भी बड़ी अनूठी है। इन क्षणों के मर्म को वही अनुभव करते हैं जो इन्हें जी रहे हैं। जिनके हृदय अपने सद्गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण की सघनता से भरे हुए हैं। वे ही इस सत्य की संवेदना का स्पर्श कर पाते हैं। क्योंकि यही वे क्षण हैं जब शिष्यत्व का कमल सुविकसित व सुवासित होता है।

इन्हीं क्षणों में शिष्य की ग्रहण शक्ति जाग्रत् होती है। इस जागृति के साथ- साथ विश्वास, बोध और निश्चय भी प्राप्त होते हैं। ध्यान रहे, ज्यों ही शिष्य सीखने के योग्य हो जाता है, त्यों ही वह स्वीकृत हो जाता है। वह शिष्य मान लिया जाता है और परम पूज्य गुरुदेव उसे अपनी आत्म चेतना में ग्रहण कर लेते हैं।
 
यह घटना विरल होने पर भी सुनिश्चित है। क्योंकि जिस किसी शिष्य ने अपने शिष्यत्व का दीप जला लिया है, उसकी धन्यता छुपी नहीं रहती। उसके दीप की सुप्रकाशित ज्योति सब ओर फैले बिना नहीं रहती। अभी तक इस सूत्र के पहले जो भी नियम बताए गए हैं, वे नियम प्रारम्भिक हैं। ये और बाद में बताए जाने वाले अन्य सभी नियम परम- प्रज्ञा के मन्दिर की दीवारों पर लिखे हैं। जो शिष्य हैं- वे अच्छी तरह से जान लें कि जो मांगेंगे उन्हें जरूर मिलेंगे। जो पढ़ना चाहेंगे, वे अवश्य पढ़ेंगे और जो सीखना चाहेंगे, वे निश्चित रूप से सीखेंगे। इस सूत्र को पढ़ने वाले शिष्यों- इस पर गहन मनन करो। इस पर मनन करते हुए तुम्हें अविचल शान्ति प्राप्ति हो।
 
क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/jaivic

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

Mutiny against faith and belief, thy name is corruption



Corruption - is not a thing, it is not an external object. It is an internal flaw in the character of a human being, which shakes up his moral and ethical foundations. It is a mental affliction.

Corruption pierces the boundaries of religion, sect, culture, society, history, clans and shows its presence everywhere. Today government, administration, politics, even our social life nothing is left untouched by corruption.

It has become an incurable epidemic. This is a global problem, it’s not about a country or a society.

Acharya Kautilya has described corruption in his epic work - Arthashastra (Science of means) - in the following way – “It is possible to track the flight of a bird flying high up in the sky, but its impossible to track the activities of people who abduct money from the royal treasury”.

Acharya Kautilya describes eight forms of corruption. They are - Suppression, Use, Behavior, Concealment, Deprivation, Consumption, Alteration and Forfeiture. In other words - pratibaṅdha or creating obstruction, prayoga or inappropriate usage, vyavahara or illicit trading, avastāra or faking accounts, pariahāyana or encouraging tax evasion, upabhoga or misappropriating funds for one’s own use, parivartana or exchange and apahāra or plundering.

General Nejushen has termed corruption as - Cancer of a nation. And according to him corruption is a product of a perverted mind. When a whole society becomes corrupt, it adversely affects the moral gauge of people and organizations. In them instead of honesty and truthfulness, selfishness and deceit flourish.

A Muslim scholar - Ibn Khaldun, 'Abd al-Rahman (1332-1406) has stated, “When a person gives in to consumerism, the desire to earn more than the current wages becomes quite strong”.

To achieve this he wants to break all the moral rules and boundaries and where this happens the "chain reaction" of corruption starts.

The word corruption is used in three contexts - bribes, extortion and favoritism.

All the three are of similar nature. If we analyze them, it would be like so - It always happens between more than one person. When a single person commits this crime its called cheating but when it transpires between a group of people its called corruption.

Chiefly it’s done in secret, behind closed doors. People deliberate between themselves and then for their own vested interests take action. Here, in such a fraud there is no explicit breaking of laws, but the fraud is executed with systematic precision.

Drafting a law cannot be the only option available to eradicate corruption. An individual’s strong moral character, honesty and courage are a must to tackle this vile demon. It requires both inner and outer strength to deal with the evils of corruption.

Therefore, people need to be educated to prevail over their weakness of greed (one’s own personal interest) and attachment (the interest of the near and dear ones) and become brave to act and be strong in character.

The widespread evil of corruption can be eradicated only when such thoughts and intents arise in people’s minds and they act on it.

- Pt. Shriram Sharma Acharya
Akhand Jyoti May 2001 - Page 30

आस्था और विश्वास के प्रति विद्रोह का नाम है भ्रष्टाचार



 
भ्रष्टाचार भौतिक पदार्थ नहीं है। यह मनुष्य की अंतर्निहित चारित्रिक दुर्बलता है। जो मानव के नैतिक मूल्य को डिगा देती है। यह एक मानसिक समस्या है। भ्रष्टाचार धर्म, संप्रदाय, संस्कृति, सभ्यता, समाज, इतिहास एवं जाति की सीमाएँ भेदकर अपनी व्यापकता का परिचय देता है। वर्तमान समय में शासन, प्रशासन, राजनीति एवं सामाजिक जीवनचक्र भी इससे अछूते नहीं हैं। इसने असाध्य महामारी का रूप ग्रहण कर लिया है। यह किसी एक समाज या देश की समस्या नहीं है वरन् समस्त विश्व की है।

आचार्य कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध कृति “अर्थशास्त्र' में भ्रष्टाचार का उल्लेख इस तरह से किया है,” अपि शक्य गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम्| न तु प्रच्छन्नं भवानां युक्तानां चरतां गति। अर्थात् आकाश में रहने वाले पक्षियों की गतिविधि का पता लगाया जा सकता है, किंतु राजकीय धन का अपहरण करने वाले कर्मचारियों की गतिविधि से पार पाना कठिन है। कौटिल्य ने भ्रष्टाचार के आठ प्रकार बताये हैं। ये हैं प्रतिबंध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन एवं अपहार।

जनरल नेजुशन ने भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय कैंसर की मान्यता प्रदान की है। उनके अनुसार यह विकृत मन मस्तिष्क की उपज है। जब समाज भ्रष्ट हो जाता है, तो व्यक्ति और संस्थाओं का मानदंड भी प्रभावित होता है। ईमानदारी और सच्चाई के बदले स्वार्थ और भ्रष्टता फैलती है।

इस्लामी विद्वान् अब्दुल रहमान इबन खाल्दुन (1332-1406) ने कहा, व्यक्ति जब भोगवाद वृत्ति का अनुकरण करता है, तो वह अपनी आय से अधिक प्राप्ति की प्रबल कमाना करता है। इसलिए वह मर्यादा की हर सीमाएँ लाँघ जाना चाहता है और जहाँ ऐसा प्रयास सफल होता है, तो भ्रष्टाचार का 'चेन रिएक्शन' प्रारंभ होता है।

भ्रष्टाचार तीन तरह के अर्थों में प्रयुक्त होता है, रिश्वत, लूट-खसोट और भाई - भतीजावाद। इन तीनों की प्रकृति एक समान होती है। अगर इसके चरित्र का विश्लेषण किया जाए, तो इस तरह होगा, यह सदा एक से अधिक व्यक्तियों के बीच होता है। जब यह दुष्कृत्य एक व्यक्ति द्वारा होता है, तो उसे धोखेबाज कहते हैं और एक से अधिक व्यक्तियों के बीच होता है, तो भ्रष्टाचार कहलाता है। मुख्यतः यह गोपनीय कार्य है। व्यक्ति आपसी मंत्रणा कर अपने निहित स्वार्थ हेतु यह कदम उठाते हैं। इसमें नियम और कानून का खुला उल्लंघन नहीं
किया जाता है, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से जालसाजी की जाती है।

भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु केवल कानून बनाना ही एकमात्र विकल्प नहीं हो सकता। इसके लिए व्यक्ति के अन्दर चारित्रिक सुदृढ़ता, ईमानदारी और साहस होना अनिवार्य है। क्योंकि भ्रष्टाचार रूपी दैत्य से जूझने के लिए अंदर और बाहर दोनों मजबूत होना चाहिए। भ्रष्टाचार की जड़ें इन दोनों क्षेत्रों में गहरी हैं। अतः जागरूकता यह पैदा की जाए कि व्यक्ति को लोभ, मोह को छोड़कर साहस एवं बलशाली होना चाहिए। यह विचार एवं भाव सभी जनों के अंदर से उमगे, तो ही भ्रष्टाचाररूपी महाकुरीति का उन्मूलन संभव है।

- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखंड ज्योति - मई 2001 - पृष्ठ - 30

गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगीसूत्र नं० 8



 
श्लोक-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।

अर्थ-
हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

सूत्र –
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 1




गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥


देवियो भाइयो!

यह दुनिया बड़ी निकम्मी है। पड़ोसी के साथ आपने जरा सी भलाई कर दी, सहायता कर दी, तो वह चाहेगा कि और ज्यादा मदद कर दे। नहीं करेंगे, तो वह नेकी करने वाले की बुराई करेगा। दुनिया का यह कायदा है कि आपने जिस किसी के साथ में जितनी नेकी की होगी, वह आपका उतना ही अधिक बैरी बनेगा। उतना ही अधिक दुश्मन बनेगा; क्योंकि जिस आदमी ने आपसे सौ रुपये पाने की इच्छा की थी और आपने उसे पन्द्रह रुपये दिये। भाई, आज तो तंगी का हाथ है, पंद्रह रुपये हमसे ले जाओ और बाकी कहीं और से काम चला लेना।

पंद्रह रुपये आपने उसे दे दिये और वह आपके बट्टे खाते में गये, क्योंकि आपने पचासी रुपये दिये ही नहीं। इसलिए वह नाराज है कि पचासी रुपये भी दे सकता था, अपना घर बेचकर दे सकता था। कर्ज लेकर दे सकता था अथवा और कहीं से भी लाकर दे सकता था; लेकिन नहीं दिया। वह खून का घूँट पी करके रह जायेगा और कहेगा कि बड़ा चालाक आदमी है।

मित्रो! दुनिया का यही चलन है। दुनिया में आप कहीं भी चले जाइये, दुनिया की ख्वाहिशें बढ़ती चली जाती हैं कि हमको कम दिया गया। हमको ज्यादा चाहिए। असंतोष बढ़ता चला जाता है। और यह असंतोष अन्ततः वैर और रोष के रूप में परिणत हो जाता है। मित्रो, यह ऐसी ही निकम्मी दुनिया है। इस निकम्मी दुनिया में आप सदाचारी कैसे रह सकते हैं? जब कि आपके मन में पत्थर की उपासना करने की विधि न आये। पत्थर की उपासना करने का आनन्द जब आपके जी में आ जायेगा, उस दिन आप समझ जायेंगे कि इससे कोई फल मिलने वाला नहीं है।

कोई प्रशंसा मिलने वाली नहीं है और कोई प्रतिक्रिया होने वाली नहीं है। यह भाव आपके मन में जमता हुआ चला जाय, तो मित्रो! आप अन्तिम समय तक, जीवन की अंतिम साँस तक नेकी और उपकार करते चले जायेंगे, अन्यथा आपकी आस्थाएँ डगमगा जायेंगी।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.2

शिष्य संजीवनी (भाग 35) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


शिष्य संजीवनी के सेवन से शिष्यों को नवप्राण मिलते हैं। उनकी साधना में नया निखार आता है। अन्तःकरण में श्रद्धा व भक्ति की तरंगे उठती हैं। अस्तित्त्व में गुरुकृपा की अजस्र वर्षा होती है। यह ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव है जिसे असंख्यों ने अनुभव किया है, और असंख्य जन अनुभव की राह पर चल रहे हैं। जिन्होंने निरन्तर अध्यात्म साधना के मान सरोवर में अवगाहन किया है, वे जानते हैं कि शिष्यत्व से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है।

शिष्यत्व के मंदराचल से ही अध्यात्म का महासागर मथा जाता है। प्रखरता और सजलता की बलिष्ठ भुजाएँ ही इसे संचालित करती हैं। शिष्य- साधक की जिन्दगी में यदि ऐसा सुयोग बन पाए तो फिर जैसे अध्यात्म के महारत्नों की बाढ़ आ जाती है। शक्तियाँ, सिद्धियाँ और विभूतियाँ ऐसे शिष्य- साधक की चरण- चेरी बनकर रहती हैं।

यह दिव्य अनुभव पाने के लिए प्रत्येक साधक को अपने अन्तःकरण में मार्ग की प्राप्ति करनी होगी। यह महाकर्म आसान नहीं है। जन्म- जन्मान्तर के अनगिनत संस्कारों, प्रवृत्तियों से भरे इस भीषण अरण्य में यह महाकठिन पुरुषार्थ है। यह महापराक्रम किस तरह से किया जाय इसके लिए शिष्य संजीवनी का यह आठवां सूत्र बड़ा ही लाभकारी है।

इसमें शिष्यत्व की महासाधना के परम साधक कहते हैं- ‘भयंकर आँधी के बाद जो नीरव- निस्तब्धता छाती है, उसी में फूलों के खिलने का इन्तजार करो। उससे पहले यह शुभ क्षण नहीं आएगा। क्योंकि जब तक आँधी उठ रही है, बवंडर उठ रहे हैं, महाचक्रवातों का वेग तीव्र है, तब तक तो बस महायुद्ध के प्रचण्ड क्षण हैं। ऐसे में तो केवल साधना का अंकुर फूटेगा, बढ़ेगा। उसमें शाखाएँ और कलियाँ फूटेंगी।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/jaivic

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

माँ: ईश्वर का भेजा फ़रिश्ता



एक समय की बात है, एक बच्चे का जन्म होने वाला था. जन्म से कुछ क्षण पहले उसने भगवान् से पूछा:  मैं इतना छोटा हूँ, खुद से कुछ कर भी नहीं पाता, भला धरती पर मैं कैसे रहूँगा, कृपया मुझे अपने पास ही रहने दीजिये, मैं कहीं नहीं जाना चाहता।

भगवान् बोले,  मेरे पास बहुत से फ़रिश्ते हैं, उन्ही में से एक मैंने तुम्हारे लिए चुन लिया है, वो तुम्हारा ख़याल रखेगा।
 
पर आप मुझे बताइए, यहाँ स्वर्ग में मैं कुछ नहीं करता बस गाता और मुस्कुराता हूँ, मेरे लिए खुश रहने के लिए इतना ही बहुत है।

तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हारे लिए गायेगा और हर रोज़ तुम्हारे लिए मुस्कुराएगा भी. और तुम उसका प्रेम महसूस करोगे और खुश रहोगे।

और जब वहां लोग मुझसे बात करेंगे तो मैं समझूंगा कैसे, मुझे तो उनकी भाषा नहीं आती?

तुम्हारा फ़रिश्ता तुमसे सबसे मधुर और प्यारे शब्दों में बात करेगा, ऐसे शब्द जो तुमने यहाँ भी नहीं सुने होंगे, और बड़े धैर्य और सावधानी के साथ तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे बोलना भी सीखाएगा।

और जब मुझे आपसे बात करनी हो तो मैं क्या करूँगा?

तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करना सीखाएगा, और इस तरह तुम मुझसे बात कर सकोगे।

मैंने सुना है कि धरती पर बुरे लोग भी होते है उनसे मुझे कौन बचाएगा?

तुम्हारा फरिश्ता तुम्हे बचाएगा, भले ही उसकी अपनी जान पर खतरा क्यों ना आ जाये।

लेकिन मैं हमेशा दुखी रहूँगा क्योंकि मैं आपको नहीं देख पाऊंगा।

तुम इसकी चिंता मत करो; तुम्हारा फ़रिश्ता हमेशा तुमसे मेरे बारे में बात करेगा और तुम वापस मेरे पास कैसे आ सकते हो बतायेगा।

उस वक़्त स्वर्ग में असीम शांति थी, पर पृथ्वी से किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी….बच्चा समझ गया कि अब उसे जाना है, और उसने रोते- रोते भगवान् से पूछा, हे ईश्वर, अब तो मैं जाने वाला हूँ, कृपया मुझे उस फ़रिश्ते का नाम बता दीजिये?

भगवान् बोले,  फ़रिश्ते के नाम का कोई महत्त्व नहीं है, बस इतना जानो कि तुम उसे “माँ” कह कर पुकारोगे।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं...