शुक्रवार, 3 मई 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 May 2019

👉 आज का सद्चिंतन 3 May 2019


👉 प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता

कोई व्यक्ति जीवनभर प्राइमरी पाठशाला में ही पढ़ते रहने की जिद करे और अगले बड़े स्कूल में जाने के लिए तैयार न हो तो "उसे बाल बुद्धि ही कहा जाएगा।" "प्रेम" का प्रशिक्षण घर-परिवार में हो या किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से प्रारम्भ हो, उसकी स्वाभाविकता समझ में आती है, पर जब कोई उतने तक ही सीमाबद्ध होकर रह जाएगा, "आगे न बढ़ेगा तो रुके हुए पानी की तरह सड़न पैदा हुए बिना न रहेगी।'

जो "प्यार" सीमा बद्ध होकर रह जाता है, उसे "मोह" कहते हैं, "मोह" में पक्षपात जुड़ जाता है, औचित्य का ध्यान नहीं रहता। प्रिय पात्र की त्रुटियों का परिमार्जन करने की इच्छा नहीं होती वरन "उन्हें भी प्रिय मानकर समर्थन किया जाने लगता है।" इससे "प्रेम" की महत्ता ही नष्ट हो जाती है।

"प्रेम" गंगाजल है, जिसे जहाँ छिड़का जाए, वहीं पवित्रता पैदा करे," पर यदि वह गंदे नाले में गिरकर अपनी पवित्रता खो दे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।

"प्रेम" लगाव का पात्र नहीं है और न पक्षपात के अथवा हर प्रकार के समर्थन-सहयोग का। "उसमें आदर्शो की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है।" "आदर्श विहीन प्यार को "मोह" कहेंगे।" "मोह" अपने प्रिय पात्र के अनुचित कार्यों का भी समर्थन करने लगता है, तब उसकी ऊँचा उठने की क्षमता नष्ट हो जाती है "मोह" को "प्रेम" की विकृति ही कह सकते हैं," इसलिए उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती है।

पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी 1972 पृष्ठ 3

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 13)

PHYSICAL SUFFERINGS (Daihik Dukhas):

The cause of congenital deficiencies and genetic diseases is misutilisation of the corresponding organs in the previous life–cycles. After death, the soul discards the physical body but carries forward the astral body (Sookchma Shareer) to the next life. In the succeeding birth, the new body is shaped by this astral body. The astral body carries with it nuclei (seeds) of samskars of earlier physical existence to the next reincarnation. The corresponding components of physical organs, which are immorally used in the previous life, lose their vitality in the astral body but manifest as malfunctioning of those organs in the physical body of the next birth. Thus it is possible for a sexually indulgent person to be born with congenital impotence or with imperfections in sexual organs in the next life (Note that Roman Catholic Church defines indulgence as “a partial remission of the temporal punishment that is still due for sin after absolution). Giving exemplary punishment for over- indulgence in this manner, the divine justice also provides the being an excellent opportunity for self-upliftment.

The temporary period of non-function or malfunctions of the affected faculty serves the purpose of caution as well as rejuvenation for the next life. That is to say whichever organ of the body is recklessly misused for sense gratification is deemed to be engaged in a physical sin. In the next life that organ is either found missing or appears as a congenital defect. Thus congenital physical
deformities or diseases are for remission of sins. (ref. Absolution –Roman Catholic Theory.) The compulsive rest rejuvenates the organ of the body and also relieves the burden of sin from the mind through repentance. When a mental sin is intermixed with a physical sin and it has not been neutralized in the present life by punishment by the state, society or by atonement, it is also carried over to the next life.

However, if the sin is basically physical with little  or no input of mental sin (deliberate intention), the biological system immediately takes care of it. For instance man gets intoxicated and deranged on taking drugs, falls sick because of dietary irregularities or dies on consuming the poison. This is a physical punishment for a physical sin. The body cleans itself of the small physical sins speedily and these are neutralized in this very life. On the other hand, as mentioned earlier, serious physical vices, which are also associated with mental stimuli, are carried over by the astral body for being worked out in the next life.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 24

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 May 2019

★ आज मित्रता की आड़ लेकर शत्रुता बरतने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसे चतुरता, कुशलता समझा जाता है और इस प्रयास में सफल व्यक्ति आत्म-श्लाघा भी बहुत करते हैं। साथी को मित्रता के जाल में फँसाकर उसकी बेखबरी का-भोलेपन का अनुचित लाभ उठा लेना यही आज तथाकथित चतुर लोगों की नीति बनती जा रही है। ऐसी दशा में मित्र और शत्रु की कसौटी को हर घड़ी साथ रखने की आवश्यकता है।

◆ जिसे ईमानदारी का जीवन जीना हो, उसे पूर्व तैयारी मितव्ययी रहने की-सादा जीवन जीने की करनी चाहिए। जो कम में गुजारा करना जानता है, उसी के लिए यह संभव है कि कम आमदनी से संतोषपूर्वक निर्वाह कर ले। ईमानदारी से आय सीमित रहती है-उतनी नहीं हो सकती जितनी बेईमानी अपनाने से। ऐसी दशा में यदि श्रेष्ठ जीवन जीना हो तो अपने खर्च जहाँ तक संभव हो घटाने चाहिए। जिसने खर्च बढ़ा रखे हैं, उन्हें उनकी पूर्ति के लिए बेईमानी का रास्ता ही अपनाना पड़ेगा।

◇ सफलता का पथ निश्चय ही बड़ा कठिन और दुर्गम होता है। उसको सरल और प्रशस्त बनाने में मनुष्य की इच्छा शक्ति  का बड़ा उपयोग है। इच्छा शक्ति की दृढ़ता और प्रबलता मनुष्य को पराक्रमी, पुरुषार्थी और धीर-गंभीर बना देती है। प्रबल इच्छा शक्ति वाला जिस काम में हाथ डालता है, उसे तब तक नहीं छोड़ता जब तक पूरा नहीं कर लेता। वह बाधाओं, विरोधों से साहसपूर्वक लड़ता हुआ बढ़ता रहता है। उन्नति और सफलता का इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है।

■ किसी का सम्मान करने का अर्थ है- बदले में उसका सम्मान पाना। दूसरे कम कीमत में सम्मान पाने की बात बन ही नहीं सकती। सादगी से रहा जाय, शालीनता बरती जाये और दूसरों को संतुष्ट रखकर उन  पर अपना प्रभाव छोड़ने की कला सीखी जाये, इससे बढ़कर अपने आपको बड़ा बनाने-ऊँचा उठाने का कोई श्रेष्ठ उपाय है ही नहीं।

★ विचार एक शक्ति है, विशुद्ध विद्युत् शक्ति। जो इस पर समुचित नियंत्रण कर ठीक दिशा में संचालन कर सकता है वह बिजली की भाँति इससे बड़े-बड़े काम ले सकता है, किन्तु जो इसको ठीक से अनुशासित नहीं कर सकता, वह उलटा इसका शिकार बन जाता है, अपनी ही शक्ति से स्वयं नष्ट हो जाता है, अपनी  ही आग में जलकर भस्म हो जाता है। इसीलिए मनीषियों ने नियंत्रित विचारों को मनुष्य का मित्र और अनियंत्रित विचारों को उसका शत्रु बतलाया है।