शनिवार, 23 अप्रैल 2016

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 2


 
साथियो! आपने हर हाल में समाज की सेवा की; लेकिन जब चुनाव में खड़े हुए, तो एमपी एमएलए के लिए लोगों ने आपको वोट नहीं दिया और दूसरे को दे दिया। इससे आपको बहुत धक्का लगा। आपने कहा कि भाई। हमने तो अटूट सेवा की थी; लेकिन जनता ने चुनाव में जीतने ही नहीं दिया। ऐसी खराब है जनता। भाड़ में जाये, हम तो अपना काम करते हैं। हमें चुनाव नहीं जीतना है।
 
उपासना में भी ऐसी ही निष्ठा की आवश्यकता है। आपने पत्थर की एकांगी उपासना की और एकांगी प्रेम किया। उपासना के लिए, पूजा करने के लिए हम जा बैठते हैं। धूपबत्ती जलाते हैं। धूपबत्ती क्या है? धूपबत्ती एक कैंडिल का नाम है। एक सींक का नाम है। एक लकड़ी का नाम है। वह जलती रहती है और सुगंध फैलाती रहती है।

सुगंध फैलाने में भगवान् को क्या कोई लाभ हो जाता है? हमारा कुछ लाभ हो जाता है क्या? हाँ, हमारा एक लाभ हो जाता है और वह यह कि इससे हमें ख्याल आता है कि धूप बत्ती के तरीके से और कंडी के तरीके से हमको भी जलना होगा और सारे समाज में सुगंध फैलानी होगी। इसलिए हमारा जीवन सुगंध वाला जीवन, खुशबू वाला जीवन होना चाहिए।

धूपबत्ती भी जले और हम भी जलें जलने से सुगंध पैदा होती है। धूपबत्ती को रखा रहने दीजिए और उससे कहिए कि धूपबत्ती सुगंध फैलाएँगी धूपबत्ती कहती है कि मैं तो नहीं फैलाती। क्यों? जलने पर सुगंध फैलाई जा सकती है। जलना होगा। इसीलिए मनुष्य को जीवन में जलना होता है। धूपबत्ती की तरह से सुगंध फैलानी पड़ती है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गीता के ये नौ सूत्र याद रखें, जीवन में कभी असफलता नहीं मिलेगीसूत्र नं० 9


श्लोक-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

अर्थ-
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।

सूत्र –
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

शिष्य संजीवनी (भाग 36) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


 लेकिन जब तक शिष्य का सम्पूर्ण देहभाव विघटित होकर घुल न जाएगा, जब तक समूची अन्तःप्रकृति आत्म सत्ता से पूर्ण हार मानकर उसके अधिकार में न आ जाएगी तब तक महासिद्धि के फूल नहीं खिल सकते। यह पुण्य क्षण तो तब आता है जब एक ऐसी शान्ति का उदय होता है, जो गर्म प्रदेश में भारी वर्षा के पश्चात छाती है। इस गहन और नीरव शान्ति में ही यह रहस्यमय घटना घटित होती है। जो सिद्ध कर देती है कि मार्ग प्राप्ति हो गयी है।

यह क्षण बड़ा मार्मिक है। सिद्धि के ये फूल बड़े अनोखे हैं। इनकी महक भी बड़ी अनूठी है। इन क्षणों के मर्म को वही अनुभव करते हैं जो इन्हें जी रहे हैं। जिनके हृदय अपने सद्गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण की सघनता से भरे हुए हैं। वे ही इस सत्य की संवेदना का स्पर्श कर पाते हैं। क्योंकि यही वे क्षण हैं जब शिष्यत्व का कमल सुविकसित व सुवासित होता है।

इन्हीं क्षणों में शिष्य की ग्रहण शक्ति जाग्रत् होती है। इस जागृति के साथ- साथ विश्वास, बोध और निश्चय भी प्राप्त होते हैं। ध्यान रहे, ज्यों ही शिष्य सीखने के योग्य हो जाता है, त्यों ही वह स्वीकृत हो जाता है। वह शिष्य मान लिया जाता है और परम पूज्य गुरुदेव उसे अपनी आत्म चेतना में ग्रहण कर लेते हैं।
 
यह घटना विरल होने पर भी सुनिश्चित है। क्योंकि जिस किसी शिष्य ने अपने शिष्यत्व का दीप जला लिया है, उसकी धन्यता छुपी नहीं रहती। उसके दीप की सुप्रकाशित ज्योति सब ओर फैले बिना नहीं रहती। अभी तक इस सूत्र के पहले जो भी नियम बताए गए हैं, वे नियम प्रारम्भिक हैं। ये और बाद में बताए जाने वाले अन्य सभी नियम परम- प्रज्ञा के मन्दिर की दीवारों पर लिखे हैं। जो शिष्य हैं- वे अच्छी तरह से जान लें कि जो मांगेंगे उन्हें जरूर मिलेंगे। जो पढ़ना चाहेंगे, वे अवश्य पढ़ेंगे और जो सीखना चाहेंगे, वे निश्चित रूप से सीखेंगे। इस सूत्र को पढ़ने वाले शिष्यों- इस पर गहन मनन करो। इस पर मनन करते हुए तुम्हें अविचल शान्ति प्राप्ति हो।
 
क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/jaivic

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