शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 18 Feb 2017


👉 पल भर में सुनी गई अबला की पुकार

  🔴 उन दिनों मैं सिविल कोर्ट, बलरामपुर में सर्विस कर रही थी। जून में कोर्ट की छुट्टियाँ होने को थीं। सन् २००२ ई. की बात है। इस बार हमने शान्तिकुञ्ज में छुट्टियाँ बिताने की सोची। पहले तो कई लोग आने को तैयार थे, पर बाद में उन सभी ने अलग- अलग कारणों से अपना प्रोग्राम बदल दिया और मैं अकेली रह गई। छुट्टियों के दिन होने के कारण ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिल पाया था। किन्तु मुझे तो किसी भी हाल में शान्तिकुञ्ज पहुँचना ही था। मन में ठान चुकी थी। सो, अकेली ही रवाना हो गई। गोण्डा से ट्रेन से चारबाग स्टेशन, लखनऊ पहुँची, तो शाम के चार बज चुके थे। दून एक्सप्रेस से जाना था। लेकिन, स्टेशन पर यात्रियों की भारी भीड़ देखकर मैं अन्दर से काँप उठी।

🔵 प्लेटफार्म पर पैर रखने की जगह नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि ट्रेन छूट गई। इसके बाद वाली ट्रेन जनता एक्सप्रेस में भी नहीं चढ़ सकी। पता चला कि इसके बाद रात में कोई और ट्रेन नहीं है। मैं स्टेशन पर चिन्तित बैठी थी। सोच रही थी कि काश, यह समाचार झूठा होता, संयोगवश कोई ट्रेन आ जाती।

🔴 रात गहरी होती गयी। स्टेशन पर से भीड़ घटती जा रही थी। मेरा भय लगातार बढ़ता जा रहा था। पूरी रात मैं प्लेटफार्म पर अकेली कैसे रहूँगी? यहाँ किसी को जानती भी नहीं कि उसके घर जाकर रात बिता सकूँ। चोर- उचक्के ही आ जाएँ या अकेली औरत देख किसी पर बदनीयती ही सवार हो जाए, तो क्या करूँगी। मन बार- बार यह कहने लगा कि मुझे अकेले नहीं आना चाहिए था। आए दिन कितनी ही उल्टी सीधी घटनाएँ घटती रहती हैं। अखबारों में रोज ही ऐसी खबरें छपती हैं। दस की भीड़ में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना अलग बात है, पर यहाँ सुनसान रात में अनजान स्टेशन के प्लेटफार्म पर रहना....! यही सब सोचकर मैं अन्दर ही अन्दर काँप रही थी।
  
🔵 इतने में एक आदमी पास आकर खड़ा हो गया। मुझे उसके रंग- ढंग ठीक नहीं लग रहे थे। वह मुझसे पूछने लगा- कहाँ जाना है? मैंने उपेक्षापूर्ण स्वर में कहा- हरिद्वार। उसने बात आगे बढ़ाने की चेष्टा की- मैं रेलवे का इम्प्लाई हूँ। हरिद्वार की आखिरी ट्रेन भी जा चुकी है। अब वहाँ के लिए कोई ट्रेन आपको कल ही मिलेगी। मेरा रहा- सहा होश भी गुम होने लगा। वहाँ से उठकर मैं टी स्टाल के पास वाली बैंच पर बैठ गई। थोड़ी देर बाद वह आदमी मेरे पास आकर बैठ गया और बेमतलब की बातें करने लगा। मैं बुरी तरह डर गई थी। जब और कोई उपाय नहीं दिखा, तो आँखें मूँदकर गुरुदेव का ध्यान करने लगी। मन ही मन उनसे प्रार्थना करती हुई बोली -‘‘हे गुरुदेव, अकेले ही घर से निकलकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है, अब तो आप ही मेरी लाज बचा सकते हैं।’’ मैं परेशान होकर इधर- उधर टहल रही थी। मेरी आँखों में आँसू भरे हुये थे। मैं रोना चाहती थी, किंतु रो नहीं रही थी। मैं टलहते हुए स्टेशन के दूसरे छोर के पास पहुँच गई। मैं एक खंभे के पास खड़ी हो गई। मैं डरी हुई थी। चूँकि वह व्यक्ति आस- पास ही रह रहा था।

🔴 मैंने देखा खम्भे के पास जहाँ थोड़ी जगह होती है वहीं पर एक बूढ़े दम्पत्ति को बैठे हुए देखा। उनके पास दो छोटी- छोटी गठरियाँ थीं उन्हें देखकर मैं उन्हीं के पास खड़ी हो गई। मुझे उनके पास खड़े होने पर लग रहा था जैसे गुरुदेव मेरी करुण पुकार सुनकर स्वयं आ गये हों। मैं भी थोड़ी जगह पर बैठ गई, थोड़ी देर में बात- चीत के क्रम में उन्होंने कहा -‘बेटी क्या बात है? कुछ परेशानी है क्या? ’ मैंने कहा कि बाबा मुझे हरिद्वार जाना है। किंतु हरिद्वार की दोनों रेले जा चुकी हैं मैंने पता किया, तो मालूम हुआ कि हरिद्वार के लिये कोई ट्रेन नहीं है मैं बहुत परेशान हूँ। पूरी रात स्टेशन पर क्या करूँगी? बाबा बोले- इसमें चिंता की क्या बात है? तुम्हें हरिद्वार ही जाना है। अभी एक ट्रेन आयेगी इसी प्लेटफार्म  पर, जो सहारनपुर जायेगी। तुम लक्सर स्टेशन पर उतर जाना, वहाँ से हरिद्वार के लिए कोई न कोई ट्रेन मिल जायेगी। पूरी रात स्टेशन पर बैठने से अच्छा है ट्रेन में रहोगी और सुरक्षित भी रहोगी। उनकी बात मुझे अच्छी लगी किंतु विश्वास नहीं हो रहा था कि ये जो कह रहें हैं वह सही है। चूंकि उनकी वेशभूषा से नहीं लग रहा था कि ज्यादा पढ़े लिखे होंगे। इनको कैसे पता चला कि कौन सी ट्रेन आ रही है? किंतु न जाने क्यों मुझे उनकी बातों में सच्चाई लग रही थी। उनकी वाणी में अजीब सी मिठास एवं अपनापन झलक रहा था। मैंने कहा- बाबा आप सच कह रहे हैं। वो तो मैं सही बोल रहा हूँ, मुझे भी हरिद्वार जाना है। अभी १०.३० बजे ट्रेन आयेगी।

🔵 मैंने सोचा इंतजार करने में क्या हर्ज है अभी सच्चाई तो पता चल ही जायेगी। ३०- ३५ मिनट की बात है लेकिन उस स्थिति में एक- एक मिनट पहाड़ जैसी बीत रही थी। आखिर १०.३० बजे वह ट्रेन आई। मैं अपना बैग लेकर बाबा के साथ चल दी ट्रेन में चढ़ने के लिए। मैंने सोचा कि बाबा बूढ़े हैं इनकी सहायता करनी चाहिए इसलिए मैंने कहा- बाबा, पहले आप चढ़ जाइए तब मैं चढूँगी। तो बाबा बोले- पहले तुम चढ़ो तुम मेरी चिंता मत करो। मैं ट्रेन में चढ़ गई। ट्रेन में काफ भीड़ थी मैंने सोचा बाबा इसी ट्रेन में होंगे लेकिन आस- पास मुझे वह बाबा दिखाई नहीं पड़े। मैं रात भर ट्रेन में बैठी रही। मुझे हल्की झपकी लग जाय, तो मैं जाग जाती थी। चूँकि मुझे लक्सर स्टेशन पर उतरना था। पहली बार स्टेशन का नाम सुना था कि कहीं भूल न जाऊँ। मैंने ट्रेन में बैठे व्यक्तियों से भी स्टेशन के बारे में पूछा। दूसरे दिन मैं लक्सर स्टेशन पर उतर गई। मैंने इन्क्वाइरी में जाकर हरिद्वार के लिये ट्रेन पूछी तो पता लगा अभी एक घंटे बाद ट्रेन आएगी। इस प्रकार गुरुकृपा से हरिद्वार आ गई। जब भी मैं इस घटना के बारे में सोचती हूँ मेरा हृदय गुरुवर के प्रति श्रद्धा से भर जाता है। गुरुदेव की कृपा का कर्ज मैं इस जन्म में नहीं चुका सकती।

🌹  अर्चना सिंह, बलरामपुर (उ.प्र.)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/Wonderfula

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 41)

🌹 आराधना और ज्ञानयज्ञ     
🔴 अन्य कुटीर उद्योग भी इसी श्रेणी में आते हैं। बेरोजगारी दूर करने के साधन खड़े करें प्रकारान्तर से अभावग्रस्तों की सहायता की है। मुफ्तखोरी का बढ़ावा देना दान नहीं है। इससे निठल्लेपन की आदत पड़ती है। प्रमाद और व्यसन पनपते हैं। लेने वाले को हीनता की अनुभूति होती है और देने वाले का अहंकार बढ़ता है। यह दोनों ही प्रवृत्तियाँ दोनों ही पक्षों के लिये अहितकर हैं इसलिये औचित्य और सही परिणाम को दृष्टि में रखते हुए दान किया जाना चाहिये। अन्यथा दान के नाम पर धन का दुरुपयोग ही होता है और उससे स्वावलम्बन का उत्साह घटता है। 

🔵 दोनों में सर्वोपरि ज्ञान दान को माना जाता है। इसे ब्रह्मयज्ञ भी कहते हैं। सद्भावनायें और सत्प्रवृत्तियाँ जिन प्रयत्नों से बढ़ सकें उसी को सच्चा परमार्थ कहना चाहिये। सत् चिन्तन के अभाव में ही लोग अनेकों दुर्गुण अपनाते और पतन-पराभव के गर्त में गिरते हैं। यदि सही चिन्तन कर सकने का पथ प्रशस्त हो सके तो समझना चाहिये कि सर्व-समर्थ मनुष्य को अपनी समस्यायें आप हल करने का मार्ग मिल गया। अपंगों, असमर्थों या दुर्घटनाग्रस्तों को छोड़कर कोई ऐसा नहीं है जो सही चिन्तन करने का मार्ग मिल जाने पर ऊँचा उठ न सकें, आगे न बढ़ सकें, अपनी समस्याओं को आप हल न कर सकें। इसलिये आत्मिक प्रगति के लिये प्रधानता यही नीति अपनानी चाहिये कि लोकमानस के परिष्कार के लिये, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिये अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार भरसक प्रयत्न किया जाये।        
                      
🔴 समय की अपनी समस्यायें हुआ करती हैं और परिस्थितियों के अनुरूप उनके समाधान भी खोजने पड़ते हैं। प्राचीन कथा, पुराणों और धर्मशास्त्रों से युगधर्म का निरूपण नहीं हो सकता उसके लिये आज के प्रवाह प्रचलन और वातावरण को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु युग मनीषियों को ही सदा से मान्यता मिलती रही है। इन दिनों भी इसी प्रक्रिया को अपनाना होगा। इसके लिये युग चेतना का आश्रय लेना होगा। युग मनीषियों के प्रतिपादनों पर ध्यान देना होगा। सद्ज्ञान संवर्द्धन का सही तरीका यही हो सकता है। साक्षरता की तरह ऐसे सद्ज्ञान संवर्द्धन की भी आवश्यकता है जो व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थित समस्याओं के सन्दर्भ में समाधान-कारक सिद्ध हो सकें। आत्मोत्कर्ष के लिये आराधना का सेवा साधना का उपाय इसी आधार पर खोजना होगा। लोकमानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन को सर्वोच्च स्तर का आधार मानते हुए बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में युगधर्म की प्रतिष्ठापना की जानी चाहिये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जाओ करो नहीं आओ करो

🔴 कीचड में फँसे लकडी के लट्ठे उठाकर इमारत तक पहुँचाने थे। एक लकडी़ का लट्ठा काफी वजनदार था। आठ-दस सिपाही अपनी सपूर्ण शक्ति से उठाने का प्रयत्न कर रहे थे। लट्ठा जमीन तो छोडता रहा था पर पूरी तरह उठ नहीं पाता था। सिपाहियों की सम्मिलित शक्ति भी कुछ कर नहीं पा रही थी।

🔵 पास ही खडे़ अफसर ने सिपाहियो को डाँटा- "मूर्खों! इतने लोग लगे हो फिर भी लकडी नहीं उठा पा रहे हो।" सिपाहियों ने पुन पूरा जोर लगाया। लट्ठा पेट तक उठाए रख सकना कठिन हो गया और वह उनक हाथ से बरबस एटकर फिर कीचड में जा गिरा।

🔴 अफसर के रोष का ठिकाना न रहा वह चाहता था कि लट्ठा तुरंत उठ ही जाना चाहिए। यह तो नहीं कि कोई युक्ति सोचता, नई शक्ति जुटाता सिपाहियों के हौसले बढा़ता, उन्हे शाबासी देता? उल्टे आफिसरी का रोब दिखाता रहा। धैर्य और साहस दिखाने की एक शक्ति होती है वह अपने को छोटे सहयोगियों और कर्मचारियों का साहस बढा़ती है और उससे कर्तव्य भावना उद्दीप्त होती है। प्रेम और स्नेह से जो काम कराए जा सकते हैं वह बलपूर्वक नहीं। उससे तो शक्ति टूटती ही है, यह बात उन सब लोगों को याद रखनी चाहिए. जो बडी जिम्मेदारियाँ कंधों पर संभाले हैं। अफसर या प्रशासक हैं।

🔵 सिपाही प्रसन्नता से काम कर रहे होते तो लट्ठा कब का उठ गया होता, पर हुक्म चलाने की दांभिकता ने उनका सारा उत्साह शिथिल कर रखा था। इसलिये खींचातानी करने पर भी वह नही ही उठ पाया। अफसर उन्हें और भी बुरी तरह डाँटने-फटकारने लगा! तभी उधर से घोडे पर चढा़ नवयुवक आता दिखाई दिया। अफसर के पास आकर वह सादे वेष का घुडसवार शांति और धैर्य के साथ नीचे उतरा और गभीर स्वर में बोला भाई! जिस तरह आप इन्हें डॉट रहे है, उस तरह काम नहीं होता थोडा आप भी हाथ लगा देते तो लट्ठा कब का उठ गया होता ? काम से आदमी की शान नही घटती, न आपकी पदवी छोटी हो जाती। इससे सिपाहियों मे आपका सम्मान और स्वामिभक्ति ही बढ़ती।

🔴 देखो "जाओ करो" कहने की अपेक्षा "आओ करें" की शक्ति बडी होती है। उससे अधिक और सुव्यवस्थित काम संपन्न होते है। यह कहकर नवागंतुक ने घोडे की रास वहीं छोड दी और काम करते सिपाहियों में जा मिला फिर हँसकर कहा-देखो भाईयों अब हमारी शक्ति बढ़ गई यह अकेला लट्ठा अपने को बलवान् न कहने पाए। सब सिपाही इस मसखरेपन पर मुस्कराए बिना न रह सके और इसके बाद सबने एक जयकारा लगाकर जो लट्ठे को उठाया तो वह पलक मारते सीधे हाथों आकाश की ओर उठ गया। प्रसन्नता और सफलता से सबके चेहरे खिल उठे। जो काम ३ घंटे से रुका पडा़ था वही काम चंद मिनटो में पूरा हो गया।

🔵 आगुंतक ने पानी में हाथ-पाँव धोए और फिर घोडे़ पर सवार होकर-उस अफसर को संकेत करके बोला देखो भाई काम कराने का असली गुरु मंत्र यह है कि आप को भी सहयोग देकर काम का मूल्य बढा़ना चाहिए और उसके बोझीलेपन को कम करना चाहिए।

🔴 शाम को उस अफसर को पता चला कि नवागुंतक कोई और नहीं था, वरन उन्हीं का सेनापति जार्ज वाशिगटन था। वह अफसर अपनी दांभिकता पर बडा लज्जित हुआ। उसने अनुभव किया कि बडे आदमी पद से नहीं कर्तव्य भावना से बडे होते है, यदि किसी को केवल अमिमान है, तो किसी भी बडे पद में होकर वह बडा नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 35, 36

👉 दो मुँह वाला जुलाहा

🔴 एक जुलाहा का कर्धा टूट गया और उसके लिए लकड़ी काटने वह पास के जंगल में गया। जंगल में सूखा पेड़ एक ही दीखा और वह उसे काटने लगा। उस पेड़ पर एक यक्ष रहता था । उसने कहा- '' इस पर मेरा निवास है, इसे मत काटो। अपना काम चलाने के लिए कोई वरदान माँग लो।  

🔵 जुलाहा कोई लाभदायक वरदान माँगने की बात सोचने लगा । सोचते- सोचते एक बात समझ में आयी, कि दो हाथों की जगह चार हाथ और एक सिर की जगह दो सिर माँग लिए जाँय। चार हाथों से दुगुना कपड़ा बुना जा सकेगा। दो सिरों पर लाद कर हाट तक दूने वजन की पोटली ले जाई जा सकेगी ।

🔴 यक्ष ने मनोरथ पूरा कर दिया । इस विचित्र आकृति को लेकर वह घर लौटा, तो कौतूहल देखने सारा गाँव इकट्ठा हो गया । पत्नी भयभीत होकर छिप गई । मुहल्ले वालों ने उसे भूत- प्रेत समझा और ईंट-पत्थरों से मार डाला ।साधारण स्तर बनाये रहने में ही भलाई है ।

🌹 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 9

👉 आत्मविजेता ही विश्वविजेता

🔵 मानवी व्यक्तित्व का निर्माण मनुष्य की अपनी कलाकारिता, सूझबूझ, एकाग्रता और ऐसे पराक्रम का प्रतिफल है, जो संसार के अन्यान्य उपार्जनों की तुलना में कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण एवं कहीं अधिक प्रयत्नसाध्य है। उसमें संकल्पशक्ति, साहसिकता और दूरदर्शिता का परिचय देना पड़ता है। जनसाधारण द्वारा अपनायी गयी रीति-नीति से ठीक उलटी दिशा में चलना उस मछली के पराक्रम जैसा है जो प्रचण्ड प्रवाह को चीरकर प्रवाह के विपरीत चलती है। आत्म निर्माताओं को जहाँ ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’ की नीति अपनाकर स्वल्प सन्तोषी, अपरिग्रही बनना पड़ता है, वहाँ साथियों के उपहास, असहयोग ही नहीं, विरोध का भी सामना करना पड़ता है।

🔴 जिस किसी ने भी इस आत्मनिर्माण के मोर्चे को फतह कर लिया, वह सस्ती तारीफ से तो वंचित हो सकता है, पर लोकश्रद्धा उसके चरणों पर अपनी पुष्पाञ्जलियाँ अनन्त काल तक चढ़ाती रहती हैं। सघन आत्म-सन्तोष, अनुकरणीय आदर्श परिपालन तथा अनुगामियों के लिए पद चिह्न छोड़े जाने वाली गौरव-गरिमा मात्र इसी क्षेत्र के विजेताओं को हस्तगत होने वाली विभूतियाँ हैं। महानता चिन्तन, चरित्र और प्रयास में आदर्शवादिता घुली रहने पर ही उपलब्ध होती है। आत्म विजेता को विश्व विजेता की उपमा अकारण ही नहीं दी गयी है। दूसरों को उबारने-उछालने, दिशा देने और कुछ से कुछ ढाल देने की क्षमता मात्र इन्हीं लोगों में होती है।

🔵 आत्मनिर्माण-व्यक्तित्व परिष्कार कर लेने वाले व्यक्ति एक दूसरा कदम और उठाते हैं-वह है परिष्कृत व्यक्तित्व का सत्प्रवृत्ति संवर्धन में नियोजन, परमार्थ सँजोना और पुण्य कमाना। महामानवों में से प्रत्येक को लोक मंगल में लगना पड़ा है। शाश्वत सुख-सन्तोष रूपी सौभाग्य मात्र उन्हीं के भाग्य में बदा है, जिनने स्रष्टा के विश्व उद्यान को सुरम्य समुन्नत बनाने के लिए अपनी क्षमता को भावविभोर मनःस्थिति के साथ नियोजित किया है। ऐसे लोगों पर ही सतत दैवी अनुग्रह सहज ही बरसता है। हम सब भी अपना इष्ट कुछ ऐसा ही चुनें।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 18

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 Feb 2017

🔵 आत्म निरीक्षण और विचार पद्धति का कार्य उसी प्रकार चलाना चाहिए जिस प्रकार साहूकार अपनी आय और व्यय का ठीक-ठीक खाता रखते हैं। हमारी दुर्बलताओं और कुचेष्टाओं का खर्च-खाता भी हो और विवेक सत्याचरण तथा आत्म परिष्कार का जमा-खाता भी होना चाहिये। बचत का ठीक-ठीक अनुमान तभी लग सकता है। यदि अपनी जमा अधिक है तो आप सुसंस्कार बढ़ा रहे है। खर्च की अधिकता आप के संस्कारों का दीवालियापन प्रकट करती है। संस्कारों रुची धन एकत्रित करने के लिये सदाचरण की पूँजी बढ़ाना नितान्त आवश्यक है।

🔴 जिसमें पूरी शक्ति से काम करने की दृढ़ लगन है उसके मार्ग में चाहे कितना प्रबल विरोध का प्रवाह आये, वह उसकी गति को अवरुद्ध नहीं कर सकता, पीछे नहीं हटा सकता। आप आगे बढ़ने का प्रयत्न जितनी दृढ़ता के साथ करेंगे। सफलता उतनी ही आपके समीप आती जायगी। पुरुषार्थ सब अभावों की पूर्ति करता है। इसीलिए कहा है- “उद्योगे नास्ति दारिद्रयम्” पुरुषार्थ करने पर दरिद्रता नहीं रहती।

🔵 आप में योग्यता की कितनी ही कमी हो, यदि आप में वह शक्ति है जो किसी भी निर्दिष्ट लक्ष्य से हटना नहीं जानती, जो कार्य आपने शुरू किया है उसे छोड़ना नहीं जानती तो आप एक दिन सफलता की मंजिल तक पहुँच ही जाएँगे। इसके विपरीत काफी योग्यता रखते हुए भी शिथिल प्रयत्न, अधूरे मन से काम में लगने वाले, असफल हों तो इसमें किसी का क्या दोष।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 13)

🌹 अद्भुत उपलब्धियों का आधार
🔴 मनुष्य की विचार पुटी में संसार के सारे श्रेय एवं प्रेय सन्निहित रहते हैं। यही कारण है कि मनुष्य ने न केवल एक अपितु असंख्यों क्षेत्रों में चमत्कार कर दिखाये हैं। जिन विचारों के बल पर मनुष्य साहित्य का सृजन करता है उन्हीं विचारों के बल पर कल-कारखाने चलाता है। जिन विचारों के बल पर आत्मा और परमात्मा की खोज कर लेता है उन्हीं विचारों के बल पर खेती करता और विविध प्रकार के धन-धान्य उत्पन्न करता है, व्यापार और व्यवसाय करता है। यही नहीं जिन विचारों की प्रेरणा से वह निर्दय अपराधी भी बन जाता है। इस प्रकार सहज ही समझा जा सकता है कि मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा कर्तृत्व में उसकी विचार शक्ति ही काम कर रही है।

🔵 एक दिन पशुओं की भांति सारी क्रियाओं में पूर्ण पशु मनुष्य आज इस सभ्यता के उन्नति शिखर पर किस प्रकार पहुंच गया? अपनी विचार-शक्ति की सहायता से विचार शक्ति  की अद्भुत उपलब्धि इस सृष्टि में केवल मानव प्राणी को ही प्राप्त हुई है। यही कारण हैं कि किसी दिन का पशुओं के समकक्ष मनुष्य आज महान उन्नत दशा में पहुंच गया है और अन्य सारे पशु-पक्षी आज भी अपनी आदि स्थिति में उसी प्रकार रह रहे हैं। पशु-पक्षी नीड़ों और निविड़ों में पूर्ववत ही निवास कर रहे हैं किन्तु मनुष्य बड़े-बड़े नगर बनाकर अनन्त सुविधाओं के साथ रह रहा है। यह सब विचार-कला का ही विस्मय है।

🔴 विचारों के बल पर मनुष्य न केवल पशु से मनुष्य बना है वह मनुष्य से देवता भी बन सकता है। और विचार प्रधान ऋषि, मुनि महात्मा और सन्त मनुष्य से देवकोटि में पहुंचे हैं पहुंचते रहेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 21)

🌹 उदारता अपनाई ही जाए  
🔵 भौतिक क्षेत्र की त्रिविध सम्पदाओं को प्रगति का माध्यम कहा गया है। समृद्धि, समर्थता और कुशलता के आधार पर व्यक्ति या समाज के सौभाग्य को सहारा जाता है। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है, बशर्ते कि उन पर नैतिकता, सामाजिकता और सद्भावना का अंकुश ढीला न होने पाए। व्यक्ति कमाये कुछ भी, पर ध्यान इतना अवश्य रखें कि उसमें अनीति का, मुफ्तखोरी का समावेश तो नहीं, हो रहा है? उस उपार्जन को भी निजी स्वामित्व के अन्तर्गत ही समझ लिया जाये। ध्यान इस बात का भी रखा जाये कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसकी आद्योपान्त प्रगति जन सहयोग के आधार पर ही सम्भव हुई है।

🔴 जिससे पाया है, उसे चुकाया भी जाना चाहिए अन्यथा लुटेरेपन की ही तूती बोलने लगेगी। तब ऋण चुकाने, प्रत्युपकार करने या कृतज्ञता जताने का द्वार ही बन्द हो जायेगा। ऐसी दशा में संसार में दो ही वर्ग शेष रहेंगे-एक शोषक, दूसरा शोषित। तब उन स्थापनाओं और विधाओं के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जायेगा, जिनमें सहकारिता, सहभागिता और समानता का संस्थापना पर जोर दिया गया है। 

🔵 यदि जीवन में भाव संवेदना एवं वैचारिक उदारता के लिए स्थान न रह गया, तो वह अराजकता ही दीख पड़ने लगेगी, जिसमें समर्थों के लिए पीसना और असमर्थों के लिए पिसना ही नियति है। ऐसा मत्स्य न्याय ही यदि मनुष्यों के लिए भी परम्परा बन जाये फिर उस श्रेष्ठता के लिए कोई गुञ्जाइश ही न रहेगी, जिसके कारण मनुष्य को देवत्व का उत्तराधिकारी माना गया है। ‘‘कमाने वाला ही खाये’’ की नीति को यदि मान्यता मिल गई तो संसार में अबोधों अविकसितों, अपंगो, असमर्थों को जीवित रहने का कोई अधिकार ही न रह जायेगा।

🔴 उस स्थिति में अर्थ शास्त्र के अनुसार मनुष्यों में से प्राय: आधों को अपने जीवन का अन्त करना होगा। तब बूढ़ों को जीवित रहने देने की हिमायत किस तर्क के आधार पर की जा सकेगी? तब फिर इस संसार में भेड़ियों को भेड़ियों द्वारा ही फाड़ चीर कर खा जाने जैसे दृश्य सर्वत्र उपस्थित होंगे। तब कैसा वीभत्स होगा संसार?     

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 साधक कैसे बनें? (भाग 1)


👉 युग ऋषि की अमृतवाणी
 
🔴 साधकों में से कई व्यक्ति हमसे ये पूछते रहते हैं-क्या करें? क्या करें? मैं उनमें से हरेक से ये कहता हूँ, ये मत पूछो, बल्कि ये पूछो कि क्या बनें? क्या बनें? अगर आप कुछ बन जाते हैं तो करने से भी ज्यादा कीमती है, पर जो कुछ भी आप कर रहे होंगे, वो सब सही हो रहा होगा। आप साँचा बनने की कोशिश करें। अगर आप साँचा बनेंगे, तो जो भी गीली मिट्टी आपके सम्पर्क में आयेगी, आपके तरीके से आपके ढंग की शकल के खिलौने बनते हुए चले जायेंगे। आप सूरज बनें। आप चमकेंगे और चलेंगे। उसका परिणाम क्या होगा? जिन लोगों के लिये आप करना चाहते हैं वो आपके साथ-साथ चलेंगे और चमकेंगे। सूरज के साथ में नवग्रह और बत्तीस उपग्रह हैं, ये सबके सब लोग चमकते हैं और साथ-साथ चलते हैं, क्योंकि सूरज चलता है। हम चलें।

🔵  हम प्रकाशवान् हों। हम देखेंगे, जिस जनता के लिये हम चाहते थे कि ये हमारा अनुगामी बने और हमारी ये नकल करे, आप देखेंगे कि आप चलते हैं तो दूसरे लोग भी चलते हैं। आप स्वयं भी नहीं चलेंगे और ये अपेक्षा करेंगे कि दूसरे आदमी हमारा कहना मानें, ये मुश्किल बात है। आप गलें और वृक्ष बनें और वृक्ष बनकर के अपने जैसे असंख्य बीज आप पायें, अपने भीतर से आप पैदा कर डालें। हमको बीज की जरूरत है, बीज लाइये, बीज बनिए, कहाँ से बीज लायेंगे? आप गलिए, वृक्ष बनिए और अपने भीतर से ही फल पैदा कीजिए और प्रत्येक फल में से ढेरों के ढेरों बीज पैदा कीजिए, लीजिए बन गये तैयार। अपने भीतर से ही क्यों न बीज बनायें?

🔴 मित्रो! जिन लोगों ने अपने आपको बनाया है, उनको ये पूछने की जरूरत न पड़ी ‘क्या करेंगे?’, उनकी प्रत्येक क्रिया इस लायक बन गई, कि वो सब कुछ कर सकने में समर्थ हो गई। उनका व्यक्तित्व ही इतना आकर्षक रहा कि प्रत्येक सफलता को और प्रत्येक महानता को सम्पन्न करने के लिये काफी था। अर्जुनदेव जी थाली, बरतन साफ करते थे। उन्होंने अपने आपको गुरु के अनुशासन में ढालने का प्रयत्न किया था और जब उनके गुरु तलाश करने लगे कि कौन-से शिष्य को उत्तराधिकारी बनाया जाय? सारे विद्वानों की अपेक्षा, सारे नेता और दूसरे गुण वालों की अपेक्षा उन्होंने अर्जुनदेव को चुना। उनके गुरु रामदास जी ने ये कहा, कि अर्जुनदेव ने अपने आपको बनाया है और बाकी आदमी इस कोशिश में लगे रहे कि हम दूसरों से क्या करायें और स्वयं क्या करें, बल्कि होना ये चाहिए था कि अपने आपको बनाना चाहिए था।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/sadhak_kese_bane

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 54)

🌹 भावी रूपरेखा का स्पष्टीकरण
🔴 यह कार्यक्रम देवात्मा गुरुदेव ने ही बनाया था, पर था मेरा इच्छित। इसे मनोकामना की पूर्ति कहना चाहिए। स्वास्थ्य, सत्संग और मनन-चिंतन से यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम हो गया था कि दसों इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष और ग्यारहवीं अदृश्य मन इन सबका निग्रह कर लेने पर बिखराव से छुटकारा मिल जाता है और आत्मसंयम का पराक्रम बन पड़ने पर मनुष्य की दुर्बलताएँ समाप्त हो जाती हैं और विभूतियाँ जग पड़ती हैं। सशरीर सिद्ध पुरुष होने का यही राजमार्ग है। इन्द्रिय निग्रह, अर्थ निग्रह, समय निग्रह और विचार निग्रह यह चार संयम हैं। इन्हें सुधारने वाले महामानव बन जाते हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह इन चारों से मन को उबार लेने पर लौकिक सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती हैं।

🔵 मैं तपश्चर्या करना चाहता था, पर करता कैसे? समर्पित को स्वेच्छा आचरण की सुविधा कहाँ? जो मैं चाहता था, वह गुरुदेव के मुख से आदेश रूप में कहे जाने पर मैं फूला न समाया और उस क्रिया कृत्य के लिए समय निर्धारित होने की प्रतीक्षा करने लगा।

🔴  गुरुदेव बोले-‘‘अब वार्ता समाप्त हुई। तुम गंगोत्री चले जाओ। वहाँ तुम्हारे निवास, आहार आदि की व्यवस्था हमने कर दी है। भागीरथ शिला, गौरी कुण्ड पर बैठकर अपना साधना क्रम आरम्भ कर दो। एक साल पूरा हो जाए, तब अपने घर लौट जाना। हम तुम्हारी देख−भाल नियमित रूप से करते रहेंगे।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 55) 18 Feb

🔵 सर्दी से बचने के लिए लोग कितनी तरह के वस्त्रों का उपयोग करते हैं पर रोज ही आंखों के सामने गुजरने वाले बरड (जंगली भेड़) और रीछ के शरीर पर जमे हुए बालों जैसे गरम ऊनी कोट शायद अब तक किसी मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुए। हर छिद्र से हर घड़ी दुर्गन्ध निकालने वाले मनुष्य की हर घड़ी अपने पुष्पों से सुगन्धि बखेरने वाले, लता—गुल्मों से क्या तुलना हो सकती है? साठ-सत्तर वर्ष में जीर्ण-शीर्ण होकर मरखप जाने वाले मनुष्य की इन अजगरों से क्या तुलना की जाय जो चार सौ वर्ष की आयु को हंसी खुशी पूरा कर लेते हैं। वट और पीपल के वृक्ष तो एक हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं।

🔴 कस्तूरी मृग जो सामने वाले पठार पर छलांग मारते रहते हैं, किसी भी मनुष्य को दौड़ में परास्त कर सकते हैं। भूरे बाघों से मल्ल युद्ध में क्या कोई मनुष्य जीत सकता है? चींटी की तरह अधिक परिश्रम करने की सामर्थ्य भला किस आदमी में होगी? शहद की मक्खी की तरह फूलों में से कौन मधु संचय कर सकता है? बिल्ली की तरह रात के घोर अन्धकार में देख सकने वाली दृष्टि किसे प्राप्त है? कुत्तों की तरह घ्राण शक्ति के आधार पर बहुत कुछ पहचान लेने की क्षमता भला किस को होगी? मछली की तरह निरन्तर जल में कौन रह सकता है? हंस के समान नीर-क्षीर विवेक किसे होगा? हाथी के समान बल किसी व्यक्ति में है? इन विशेषताओं युक्त प्राणियों के देखते हुए मनुष्य का यह गर्व करना मिथ्या मालूम पड़ता है कि वही संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।

🔵 आज के भ्रमण में यही विचार मन में घूमते रहे कि मनुष्य ही सब कुछ नहीं है, सर्वश्रेष्ठ भी नहीं है, सब का नेता भी नहीं है। उसे बुद्धि बल मिला, सही। उसके आधार पर उसने अपने सुख साधन बढ़ाये यह भी सही है। पर साथ ही यह भी सही है कि इसे पाकर उसने अनर्थ ही किया। सृष्टि के अन्य प्राणी जो उसके भाई थे, यह धरती, उनकी भी माता ही थी, उस पर जीवित रहने, फलने फूलने और स्वाधीन रहने का उन्हें भी अधिकार था; पर मनुष्य ने सब को पराधीन बना डाला, सब की सुविधा और स्वतन्त्रता को बुरी तरह पददलित कर डाला।

🔴 पशुओं को जंजीरों से कसकर उससे अत्यधिक श्रम लेने के लिए पैशाचिक उत्पीड़न किया, उनके बच्चों के हक का दूध छीनकर स्वयं पीने लगा, निर्दयता पूर्वक वध करके उनका मांस खाने लगा। पक्षियों और जलचरों के जीवन को भी उसने अपनी स्वाद प्रियता और विलासिता के लिए बुरी तरह नष्ट किया। मांस के लिए, दवाओं के लिए, फैशन के लिए, विनोद के लिए उनके साथ कैसा नृशंस व्यवहार किया है, उस पर विचार करने से दम्भी मनुष्य की सारी नैतिकता मिथ्या ही प्रतीत होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...