शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 55) 18 Feb

🔵 सर्दी से बचने के लिए लोग कितनी तरह के वस्त्रों का उपयोग करते हैं पर रोज ही आंखों के सामने गुजरने वाले बरड (जंगली भेड़) और रीछ के शरीर पर जमे हुए बालों जैसे गरम ऊनी कोट शायद अब तक किसी मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुए। हर छिद्र से हर घड़ी दुर्गन्ध निकालने वाले मनुष्य की हर घड़ी अपने पुष्पों से सुगन्धि बखेरने वाले, लता—गुल्मों से क्या तुलना हो सकती है? साठ-सत्तर वर्ष में जीर्ण-शीर्ण होकर मरखप जाने वाले मनुष्य की इन अजगरों से क्या तुलना की जाय जो चार सौ वर्ष की आयु को हंसी खुशी पूरा कर लेते हैं। वट और पीपल के वृक्ष तो एक हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं।

🔴 कस्तूरी मृग जो सामने वाले पठार पर छलांग मारते रहते हैं, किसी भी मनुष्य को दौड़ में परास्त कर सकते हैं। भूरे बाघों से मल्ल युद्ध में क्या कोई मनुष्य जीत सकता है? चींटी की तरह अधिक परिश्रम करने की सामर्थ्य भला किस आदमी में होगी? शहद की मक्खी की तरह फूलों में से कौन मधु संचय कर सकता है? बिल्ली की तरह रात के घोर अन्धकार में देख सकने वाली दृष्टि किसे प्राप्त है? कुत्तों की तरह घ्राण शक्ति के आधार पर बहुत कुछ पहचान लेने की क्षमता भला किस को होगी? मछली की तरह निरन्तर जल में कौन रह सकता है? हंस के समान नीर-क्षीर विवेक किसे होगा? हाथी के समान बल किसी व्यक्ति में है? इन विशेषताओं युक्त प्राणियों के देखते हुए मनुष्य का यह गर्व करना मिथ्या मालूम पड़ता है कि वही संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है।

🔵 आज के भ्रमण में यही विचार मन में घूमते रहे कि मनुष्य ही सब कुछ नहीं है, सर्वश्रेष्ठ भी नहीं है, सब का नेता भी नहीं है। उसे बुद्धि बल मिला, सही। उसके आधार पर उसने अपने सुख साधन बढ़ाये यह भी सही है। पर साथ ही यह भी सही है कि इसे पाकर उसने अनर्थ ही किया। सृष्टि के अन्य प्राणी जो उसके भाई थे, यह धरती, उनकी भी माता ही थी, उस पर जीवित रहने, फलने फूलने और स्वाधीन रहने का उन्हें भी अधिकार था; पर मनुष्य ने सब को पराधीन बना डाला, सब की सुविधा और स्वतन्त्रता को बुरी तरह पददलित कर डाला।

🔴 पशुओं को जंजीरों से कसकर उससे अत्यधिक श्रम लेने के लिए पैशाचिक उत्पीड़न किया, उनके बच्चों के हक का दूध छीनकर स्वयं पीने लगा, निर्दयता पूर्वक वध करके उनका मांस खाने लगा। पक्षियों और जलचरों के जीवन को भी उसने अपनी स्वाद प्रियता और विलासिता के लिए बुरी तरह नष्ट किया। मांस के लिए, दवाओं के लिए, फैशन के लिए, विनोद के लिए उनके साथ कैसा नृशंस व्यवहार किया है, उस पर विचार करने से दम्भी मनुष्य की सारी नैतिकता मिथ्या ही प्रतीत होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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