शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

👉 जाओ करो नहीं आओ करो

🔴 कीचड में फँसे लकडी के लट्ठे उठाकर इमारत तक पहुँचाने थे। एक लकडी़ का लट्ठा काफी वजनदार था। आठ-दस सिपाही अपनी सपूर्ण शक्ति से उठाने का प्रयत्न कर रहे थे। लट्ठा जमीन तो छोडता रहा था पर पूरी तरह उठ नहीं पाता था। सिपाहियों की सम्मिलित शक्ति भी कुछ कर नहीं पा रही थी।

🔵 पास ही खडे़ अफसर ने सिपाहियो को डाँटा- "मूर्खों! इतने लोग लगे हो फिर भी लकडी नहीं उठा पा रहे हो।" सिपाहियों ने पुन पूरा जोर लगाया। लट्ठा पेट तक उठाए रख सकना कठिन हो गया और वह उनक हाथ से बरबस एटकर फिर कीचड में जा गिरा।

🔴 अफसर के रोष का ठिकाना न रहा वह चाहता था कि लट्ठा तुरंत उठ ही जाना चाहिए। यह तो नहीं कि कोई युक्ति सोचता, नई शक्ति जुटाता सिपाहियों के हौसले बढा़ता, उन्हे शाबासी देता? उल्टे आफिसरी का रोब दिखाता रहा। धैर्य और साहस दिखाने की एक शक्ति होती है वह अपने को छोटे सहयोगियों और कर्मचारियों का साहस बढा़ती है और उससे कर्तव्य भावना उद्दीप्त होती है। प्रेम और स्नेह से जो काम कराए जा सकते हैं वह बलपूर्वक नहीं। उससे तो शक्ति टूटती ही है, यह बात उन सब लोगों को याद रखनी चाहिए. जो बडी जिम्मेदारियाँ कंधों पर संभाले हैं। अफसर या प्रशासक हैं।

🔵 सिपाही प्रसन्नता से काम कर रहे होते तो लट्ठा कब का उठ गया होता, पर हुक्म चलाने की दांभिकता ने उनका सारा उत्साह शिथिल कर रखा था। इसलिये खींचातानी करने पर भी वह नही ही उठ पाया। अफसर उन्हें और भी बुरी तरह डाँटने-फटकारने लगा! तभी उधर से घोडे पर चढा़ नवयुवक आता दिखाई दिया। अफसर के पास आकर वह सादे वेष का घुडसवार शांति और धैर्य के साथ नीचे उतरा और गभीर स्वर में बोला भाई! जिस तरह आप इन्हें डॉट रहे है, उस तरह काम नहीं होता थोडा आप भी हाथ लगा देते तो लट्ठा कब का उठ गया होता ? काम से आदमी की शान नही घटती, न आपकी पदवी छोटी हो जाती। इससे सिपाहियों मे आपका सम्मान और स्वामिभक्ति ही बढ़ती।

🔴 देखो "जाओ करो" कहने की अपेक्षा "आओ करें" की शक्ति बडी होती है। उससे अधिक और सुव्यवस्थित काम संपन्न होते है। यह कहकर नवागंतुक ने घोडे की रास वहीं छोड दी और काम करते सिपाहियों में जा मिला फिर हँसकर कहा-देखो भाईयों अब हमारी शक्ति बढ़ गई यह अकेला लट्ठा अपने को बलवान् न कहने पाए। सब सिपाही इस मसखरेपन पर मुस्कराए बिना न रह सके और इसके बाद सबने एक जयकारा लगाकर जो लट्ठे को उठाया तो वह पलक मारते सीधे हाथों आकाश की ओर उठ गया। प्रसन्नता और सफलता से सबके चेहरे खिल उठे। जो काम ३ घंटे से रुका पडा़ था वही काम चंद मिनटो में पूरा हो गया।

🔵 आगुंतक ने पानी में हाथ-पाँव धोए और फिर घोडे़ पर सवार होकर-उस अफसर को संकेत करके बोला देखो भाई काम कराने का असली गुरु मंत्र यह है कि आप को भी सहयोग देकर काम का मूल्य बढा़ना चाहिए और उसके बोझीलेपन को कम करना चाहिए।

🔴 शाम को उस अफसर को पता चला कि नवागुंतक कोई और नहीं था, वरन उन्हीं का सेनापति जार्ज वाशिगटन था। वह अफसर अपनी दांभिकता पर बडा लज्जित हुआ। उसने अनुभव किया कि बडे आदमी पद से नहीं कर्तव्य भावना से बडे होते है, यदि किसी को केवल अमिमान है, तो किसी भी बडे पद में होकर वह बडा नहीं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 35, 36

3 टिप्‍पणियां:

  1. आत्मीय बंधु, आपकी भेजी गयी ये कहानियां और संस्मरण बहुत ही प्रेरणाप्रद होते है, इनको पढ़कर बहुत आत्मसंतोष मिलता है, मैं इसकी सराहना करता हूँ, इसी प्रकार आप इस प्रकार की कहानियों से हम सभी का मार्गदर्शन करते रहें।
    प्रणाम।

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