गुरुवार, 18 मई 2017

👉 ...और मुझे दर्शन हो गये

🔵 जब मैं घुटनों के बल चला करती थी, तभी से घर में होने वाले पूजन, हवन तथा मंत्रोच्चार के प्रति मेरे मन में एक जिज्ञासा का भाव था। कुछ और बड़ी होने पर मेरी माँ ने मुझे गायत्री मंत्र का अभ्यास करा दिया था और मैं भी घर के अन्य सदस्यों के साथ हवन में शामिल होने लग गई थी।

🔴 घर के लोग प्रायः शान्तिकुञ्ज तथा पूज्य गुरुदेव के बारे में बातें किया करते थे। मैं जब भी माँ से पूछती कि पूज्य गुरुदेव कौन हैं, तो उनकी तस्वीर की ओर इशारा करके वह हमेशा यही कहती- उनके बारे में मैं तुम्हें क्या बताऊँ? वे कोई आदमी थोड़े ही हैं। वे तो भगवान हैं, भगवान! 

🔵 माँ की ऐसी बातें सुन- सुन कर मेरा मन पूज्य गुरुदेव से मिलने के लिए बेचैन होने लगा। मैं बार- बार शान्तिकुञ्ज आने की जिद करने लगी।
 
🔴 यह उन दिनों की बात है जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी। बहुत जिद करने पर भी घर से अनुमति नहीं मिली और लाख चाहने पर भी मैं गुरुदेव के दर्शन नहीं कर सकी। आठवीं कक्षा में आते- आते मैंने पहली दूसरी कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था।
 
🔵 सन् १९९०ई. में अचानक एक दिन पता चला कि बोकारो शक्तिपीठ से कुछ परिजन शान्तिकुञ्ज जा रहे हैं। गुरुदेव से मिलने की मेरी उत्कंठा अब तक चरम पर पहुँच चुकी थी। मैंने तत्काल शान्तिकुञ्ज जाने का मन बना लिया और वहाँ जाने वाले एक परिजन से मिलकर उनके साथ चलने का कार्यक्रम तय कर लिया। इस बात की मैंने घर में किसी को भनक तक नहीं लगने दी, डर था कि वे सभी फिर मना कर देंगे।
 
🔴 परिजनों की टोली के साथ मैं शान्तिकुञ्ज पहुँची। अगले दिन सुबह से ही मैं यह सोचकर खुशी से पागल हुई जा रही थी कि आज गुरुदेव के दर्शन होंगे। ऊपर के कक्ष में जाकर पहले मैंने माताजी को प्रणाम किया, तो उन्होंने सिर सहलाते हुए आशीर्वाद दिया। इसके बाद गुरुदेव को प्रणाम करने पर उन्होंने मुझे आधा पुष्प देकर आधा स्वयं रख लिया। आधा फूल देने का अर्थ मेरी समझ में नहीं आया। वापसी में सीढ़ियों से उतरती हुई मैं इसी बात पर सोचती जा रही थी कि एक अद्भुत् अनुभूति हुई। ऐसा लगा कि मेरे कानों में कोई कुछ कह रहा है।
 
🔵 मैंने आवाज पहचानने की कोशिश की तो बड़ा आश्चर्य हुआ, वह गुरुदेव की ही आवाज थी। वे मुझसे कह रहे थे- तुम्हें मेरे बहुत सारे काम करने हैं। तुम जब किसी काम के लिए आगे बढ़ोगी तो मैं कदम- कदम पर तुम्हारा काम आसान करता चलूँगा।
पूज्य गुरुदेव द्वारा आधा फूल देकर आधा अपने पास रख लेने का अर्थ अब कुछ- कुछ मेरी समझ में आने लगा था।
 
🔴 अगले ही दिन वसंत पंचमी पर मैंने गुरुदीक्षा ले ली। जब विदाई का समय आया तो वंदनीया माता जी से मिलने गई। सोचकर तो चली थी कि मैं उनसे बहुत कुछ कहूँगी लेकिन कुछ भी नहीं कह सकी। एक ही साथ मन में इतनी बातें आ रही थीं कि कुछ कहते नहीं बना।   इस ऊहापोह में आँखों से आँसू बहने लगे। मेरी सबसे बड़ी चिन्ता तो यह थी कि मैं किसी को बताये बिना घर से चली आई थी। साथ की महिलाओं ने भी मुझे पूरी तरह से डरा रखा था। मन कह रहा था कि अगर माताजी आशीर्वाद दे दें, तो घर पहुँचने पर मुझे कोई कुछ नहीं कहेगा।

🔵 माताजी ने मेरे मन का भाव बिना कुछ कहे समझ लिया। उन्होंने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा- बेटा चिन्ता मत कर, सब कुछ ठीक हो जाएगा, घर के लोग तुम्हें कुछ भी नहीं कहेंगे। .....और आश्चर्य! घर पहुँचते ही डाँट- फटकार और पिटाई की आशंकाएँ निर्मूल सिद्ध हुईं। घर में सबको पहले ही पता चल चुका था कि मैं शान्तिकुञ्ज गई हूँ। माँ- पिताजी ने एक शब्द भी नहीं कहा। उल्टे सभी इस बात को लेकर खुश हो रहे थे कि मैं वन्दनीया माताजी और पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद लेकर लौटी हूँ।
 
🔴 उसी वर्ष जब २ जून को गुरुदेव ने शरीर छोड़ दिया तो हम सभी शोकाकुल हो गए। मेरे माता- पिता दुःखी मन से आपस में बातें कर रहे थे। माँ कह रही थी- हम दोनों से अच्छी किस्मत लेकर तो हमारी अन्जु ही आई है। हम कई सालों तक सोचते ही रह गए और यह लड़की अकेली जाकर भगवान के दर्शन कर आई। पिताजी ने कहा- तुम सच कह रही हो। अन्जु अपनी मर्जी से थोड़े ही गई थी। उसे तो पूज्य गुरुदेव ने शान्तिकुञ्ज बुलाकर स्वयं दर्शन दिए थे। पर, हमारा ऐसा भाग्य कहाँ!

🌹 अंजू उपाध्याय डी. एस. पी. (अरुणांचल प्रदेश
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/aur

👉 प्रेम और परमात्मा

🔵 संतो की उपदेश देने की रीति-नीति भी अनूठी होती है. कई संत अपने पास आने वाले से ही प्रश्न करते है और उसकी जिज्ञासा को जगाते है; और सही-सही मार्गदर्शन कर देते है।

🔴 आचार्य रामानुजाचार्य एक महान संत एवं संप्रदाय-धर्म के आचार्य थे. दूर दूर से लोग उनके दर्शन एवं मार्गदर्शन के लिए आते थे. सहज तथा सरल रीति से वे उपदेश देते थे.

🔵 एक दिन एक युवक उनके पास आया और पैर में वंदना करके बोला। मुझे आपका शिष्य होना है. आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।

🔴 रामानुजाचार्यने कहा : तुझे शिष्य क्यों बनना है? युवक ने कहा: मेरा शिष्य होने का हेतु तो परमात्मा से प्रेम करना है। संत रामानुजाचार्य ने तब कहा: इसका अर्थ है कि तुझे परमात्मा से प्रीति करनी है. परन्तु मुझे एक बात बता दे कि क्या तुझे तेरे घर के किसी व्यक्ति से  प्रेम है?

🔵 युवक ने कहा : ना, किसीसे भी मुझे प्रेम नहीं। तब फिर संतश्री ने पूछा : तुझे तेरे माता-पिता या भाई-बहन पर स्नेह आता है क्या? युवक ने नकारते हुए कहा, मुझे किसी पर भी तनिक मात्र भी स्नेह नहीं आता. पूरी दुनिया स्वार्थपरायण है, ये सब मिथ्या मायाजाल है। इसीलिए तो मै आपकी शरण में आया हूँ।

🔴 तब संत रामानुज ने कहा :बेटा, मेरा और तेरा कोई मेल नहीं. तुझे जो चाहिए वह मै नहीं दे सकता।

🔵 युवक यह सुन स्तब्ध हो गया।

🔴 उसने कहा : संसार को मिथ्या मानकर मैने किसी से प्रीति नहीं की. परमात्मा के लिए मैं इधर-उधर भटका. सब कहते थे कि परमात्मा के साथ प्रीति जोड़ना हो तो संत रामानुज के पास जा; पर आप तो इन्कार कर रहे है।

🔵 संत रामानुज ने कहा : यदि तुझे तेरे परिवार से प्रेम होता, जिन्दगी में तूने तेरे निकट के लोगों में से किसी से भी स्नेह किया होता तो मै उसे विशाल स्वरुप दे सकता था. थोड़ा भी प्रेमभाव होता, तो मैं उसे ही विशाल बना के परमात्मा के चरणों तक पहुँचा सकता था।

🔴 छोटे से बीज में से विशाल वटवृक्ष बनता है. परन्तु बीज तो होना चाहिए. जो पत्थर जैसा कठोर एवं शुष्क हो उस में से प्रेम का झरना कैसे बहा सकता हूँ? यदि बीज ही नहीं तो वटवृक्ष कहाँ से  बना सकता हूँ? तूने किसी से प्रेम किया ही नहीं, तो तेरे भीतर परमात्मा के प्रति प्रेम की गंगा कैसे बहा सकता हूँ?

🔵 कहानी का सार ये है कि जिसे अपने निकट के भाई-बंधुओं से प्रेमभाव नहीं, उसे ईश्वर से प्रेम भाव नहीं हो सकता. हमें अपने आस पास के लोगों और कर्तव्यों से मुंह नहीं मोड़ सकते। यदि हमें आध्यात्मिक कल्याण चाहिए तो अपने धर्म-कर्तव्यों का भी  उत्तम रीति से पालन करना होगा।





👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...