शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

👉 अविवेकी प्रगतिशीलता

🔷 कस्बे में दो पडौसी थे, सोचविहारी और जडसुधारी, दोनो के घर एक दिवार से जुडे हुए,दोनो के घर के आगे बडा सा दालान। दोनो के बीच सम्वाद प्राय: काम आवश्यक संक्षिप्त सा होता था। बाकी बातें वे मन ही मन में सोच लिया करते थे।जाडे के दिन थे, आज रात उनकी अलाव तापने की इच्छा थी, दोनो ने लकडहारे से जलावन लकडी मंगा रखी थी।

🔶 देर शाम ठंडी के बढते ही दोनों ने अपने अपने यहाँ अलाव जलाने की तैयारियाँ शुरू की। सोचविहारी लकडीयां चुननें लगे, लकडियां चुनने में सोचविहारी को ज्यादा समय लगाते देख जडसुधारी ने पुछा- इतना समय क्यों लगा रहे है। सोचविहारी नें कहा- लकडियां गीली भी है और सूखी भी, मैं सूखी ढूंढ रहा हूँ। जडसुधारी बोले-गीली हो या सूखी जलाना ही तो है, सूखी के साथ गीली भी जल जायेगी। सोचविहारी नें संक्षिप्त में समझाने का प्रयास किया- सूखी जरा आराम से जल जाती है।

🔷 जडसुधारी नें तो अपने यहां, आनन फ़ानन में एक-मुस्त लकडियां लाई और नीचे सूखी घास का गुच्छा रखकर चिनगारी देते सोचने लगा- कैसे कैसे रूढ होते है, गीली लकडी में जान थोडे ही है जो छांटने बैठा है, सोचना क्या जब जलाने बैठे तो क्या गीली और क्या सूखी?लकडी बस लकडी ही तो है।

🔶 उधर सोचविहारी सूखी लकडी को चेताते सोचने लगा- अब इसे सारे कारण कम शब्दों में कैसे समझाउं गीली और सूखी साथ जलेगी तो ताप भी सही न देगी, भले कटी लकडी निर्जीव हो पर उसपर कीट आदि के आश्रय की सम्भावना है, मात्र थोडे परिश्रम के आलष्य में क्यों उन्हें जलाएं। और गीली जलेगी कम और धुंआ अधिक देगी। कैसे समझाएं, और समझाने गये तो समझ नाम से ही बिदक जायेगा। वह स्वयं को थोडे ही कम समझदार समझता है?

🔷 दोनो के अलाव चेत चुके थे। सोचविहारी मध्यम उज्ज्वल अग्नी में आराम से अलाव तापने लगे, उधर जडसुधारी जी अग्नी में फूंके मार मार कर हांफ़ रहे थे, जरा सी आग लग रही थी पर बेतहासा धुंआ उठ रहा था। तापना तो दूर धुंए में बैठना दूभर था।

🔶 जडसुधारी के अलाव का धुंआ, आनन्द से ताप रहे सोचविहारी के घर तक पहूंच रहा था और उन्हें भी परेशान विचलित किये दे रहा था। सोचविहारी चिल्लाए- मै न कहता था सूखी जलाओ…

🔷 जडसुधारी को लगा कि यह सोचविहारी हावी होने का प्रयास कर रहे है। वे भी गुर्राए- समझते नहीं, सदियों की जमी ठंड है,गर्म होने में समय लगता है। सब्र और श्रम होना चाहिए। सब कुछ चुट्कियों में नहीं हो जाता। आग होगी तो धुंआ भी होगा। देखना देर सबेर अलाव अवश्य जलेगा। कहकर जडसुधारी, धुंए और सोचविहारी के प्रश्नों से दूर रज़ाई में जा दुबके।

👉  प्रतीक:

🔷 सोचविहारी: परंपरा संस्कृति और विकास सुधार को सोच समझकर संतुलित कर चलने वाला व्यक्तित्व।

🔶 जडसुधारी: रूढि विकृति और संस्कृति को एक भाव नष्ट कर प्रगतिशील बनने वाला व्यक्तित्व।

🔷 अलाव: सभ्यता,विकास।

🔶 गीली लकडी: रूढियां, अंधविश्वास।

🔷 सूखी लकडी: सुसंस्कृति, आस्थाएं।

🔶 धुंआ : अपसंस्कृति का अंधकार

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 23 Dec 2017

👉 सत्य की किरण

🔶 सत्य की किरण भी पर्याप्त है। ग्रन्थों के अम्बार अपनी लाख कोशिशों के बावजूद जो नहीं कर पाते, सत्य की एक झलक आसानी से वह कर दिखाती है। अंधेरे में उजाला करने के लिए प्रकाश के ऊपर लिखे गए बड़े-बड़े ग्रन्थ किसी काम के नहीं, एक मिट्टी का छोटा सा दीया जलाना ही काफी है।

🔷 स्वामी विवेकानन्द की वार्त्ताओं और व्याख्यानों में एक अपढ़ बूढ़ा निरन्तर देखा जाता था। देखने वालों को हैरानी हुई। उनमें से कइयों ने सोचा कि भला एक अनपढ़ गरीब वृद्ध व्यक्ति स्वामी जी की गम्भीर वेदान्त चर्चा को भला क्या समझता होगा। एक ने आखिर में उससे पूछ ही लिया- बाबा, तुम्हारी समझ में कुछ आता भी है या फिर यूं ही अपना समय बर्बाद करते रहते हो?

🔶 उस गरीब वृद्ध व्यक्ति ने जो भी उत्तर दिया, वह अद्भुत था। उसने कहा- जो बातें मुझे नहीं समझ में आतीं, अब उनके बारे में मैं क्या बताऊँ। लेकिन एक बात मैं बखूबी समझ गया हूँ और पता नहीं दूसरे लोग उसे समझे भी हैं अथवा नहीं। फिर मैं तो अनपढ़-गंवार हूँ, बूढ़ा भी हूँ, मुझे बहुत सारी बातों से प्रयोजन भी क्या? मेरे लिए तो बस वह एक ही बात काफी है। और उस बात ने मेरा सारा जीवन ही बदल दिया है। अब न तो मुझे भय डराता है और न चिन्ताएँ सताती हैं। न तो अतीत की कोई कसक है, न वर्तमान की कोई परेशानी और न ही भविष्य की कोई चिन्ता बची है। बस आनन्द ही आनन्द है।

🔷 लोगों की जिज्ञासा बढ़ी- आखिर वह बात है क्या? उस वृद्ध व्यक्ति ने बताया, वह बात है कि मैं भी प्रभु से दूर नहीं हूँ। एक दरिद्र अज्ञानी बूढ़े से भी प्रभु दूर नहीं हैं। प्रभु निकट हैं- निकट ही नहीं स्वयं में हैं- इतने निकट कि हम दोनों बस एक ही हैं। यह छोटा सा सत्य मेरी नजर में आ गया है। और अब मैं नहीं समझता कि इससे भी बड़ा कोई सच हो सकता है।

🔶 सच भी यही है, जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, बल्कि सत्य की एक छोटी सी अनुभूति से ही बदल जाता है। जो बहुत जानने में लगे रहते हैं, वे प्रायः सत्य की उस छोटी सी चिनगारी को गवाँ बैठते हैं, जो प्रकाश और परिवर्तन लाती है। और जिससे जीवन में बोध के नए आयाम खुलते हैं।

✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 102

👉 दुःखों का कारण और निवारण (अन्तिम भाग)

🔷 ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः, सर्वे भडारिक पश्यन्तु या कश्चिद्दुःख भाग्वेत्’’—का ऋषि सिद्धान्त लेकर चलने वालों को संसार में किसी प्रकार दुःख शेष नहीं रह जाता। इस सार्वभौमिक भाव से मनुष्य की स्वार्थपूर्ण संकीर्णता विस्तृत एवं व्यापक हो जाती है। वह अपने को पीछे रख कर दूसरों के हित के लिए सोचता है, दूसरों के लाभ के लिए काम करता है और दूसरों के कल्याण के लिए जीता है। हृदय में जब अपनत्व का स्थान सर्वत्व ले लेता है तो मनुष्य की अनुभूतियां भी उसकी नहीं रह जातीं। वह दूसरे के दुःख से दुःखी और दूसरे के सुख से सुखी होने लगता है। ऐसी दशा में परदुःख से कातर मनुष्य को उस कष्ट उस क्लेश में भी एक आध्यात्मिक सुख आध्यात्मिक सन्तोष मिला करता है। अपने को समष्टि में मिला देने पर तो दुःख का सर्वथा अभाव ही हो जाता है।

🔶 तथापि बहुत से लोगों यह प्रक्रिया कठिन तथा दुरूह दिखलाई दे सकती है। उनकी मनोभूमि इस योग्य न होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा हो सकता है। अस्तु मध्यम मनोभूमि वाले व्यक्तियों को मध्यम मार्ग का अवलम्बन ले ही लेना चाहिये। वह मध्यम मार्ग इस प्रकार का हो सकता है। अपनी स्थिति, शक्ति और अधिकार सीमा में रहकर वांछाएं की जायें। उन्हें पूरा करने का प्रयत्न किया जाये। फिर भी यदि उनमें से कोई अपूर्ण रह जायें तो इसे संसार की एक साधारण प्रक्रिया मानकर सन्तोष किया जाये। अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों अवस्थाओं में तटस्थ रहकर अपना कर्तव्य किया जाए और किसी वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति आसक्ति रखकर कोई अपेक्षा न की जाये। दुःख से बचने का यह मध्यम उपाय ऐसा नहीं है जो साधारण मनोभूमि वालों के लिए कठिन हो।

🔷 सामान्य मध्यम अथवा उच्च जो भी उपाय किया जा सके दुःख से बचने के लिए करना ही चाहिए—क्योंकि दुःखी रहना शैतान का काम है, मनुष्य का नहीं। हमारे लिये मानवोचित रीति-नीति अपनाकर ही चलना बुद्धिमानी भी है और कल्याणकारी भी।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1971 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/August/v1.15

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.4

👉 Amrit Chintan 23 Dec

🔶 There is always a purest and sacred most conciouness in every human body . This can also be called pure soul or a divine light or even God. This always guide one on the righteous path. This toven of divine light is always availably for every one. Unless one suppress is by his constant evil actions. This light is also known as ‘Ritambhara Pragya’.

🔷 Our aim and duties in this life can only be evaluated correctly when we know. What am I? Why we have come in this world and what for? We should always keep in our mind this question and work hard and sincerely to get answer for action believe on self is the key to get the solution your brave character and continuous efforts with a strong will one day surely you will attain the goal of life.

🔶 Good actions and service to downtrodden is that which shapes your future for realization of soul one has to free himself from the sins of his life and earn virtues. We should plan our way of life that what good or service we can do to others. Without serving the humanity and adopting ideality of life, realization is not possible.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के तीन चरण (भाग 6)

🔶 बादलों को ईश्वर के उद्यान में उगे हुए सुरभित पुष्प माना जाय और उन्हें माली तरह सींचा, सँभाला जाय। अपनी संपदा, बुढ़ापे की लकड़ी वंश चलाने वाले उत्तराधिकारी, मात्र प्रियपात्र यदि उन्हें माना समझा जायेगा तो वे ही बालक बंधन रूप सिद्ध होंगे और लोक-परलोक में विविध विधि दुर्गति का करण बनेंगे। दृष्टिकोण का अंतर रहने के कारण एक व्यक्ति के लिए शिशु पोषण, परिवार पालन अपार उद्वेग उत्पन्न करेगा जब कि परिष्कृत चिंतन शैली से की गई परिवार सेवा-गृहस्थयोग साधना बन जाती है। पिता-माता भाई-बहिन आदि का भरा-पूरा कुटुंब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है।
                  
🔷 इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बनाना एक छोटे राज्य का सुशासन चलाने के समान है। नेतृत्व, सुसंचालन, सुव्यवस्था की दिशा में किसने कितनी योग्यता प्राप्त की उसकी परीक्षा पारिवारिक जीवन में बरती गई रीति-नीति से होती है। जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं उन्हें भगवान अधिक बड़े क्षेत्र का-अधिक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए परिवार के लिए उपार्जन एवं सुविधा व्यवस्था में लगने वाला अधिकांश समय तथा मनोयोग नियोजित किया जाय तो घर ही तपोवन बन सकता है ऐसे लोगों को तपोवन में घर बनाने की आवश्यकता नहीं है।
    
🔶 शरीर को भगवान का मंदिर-भगवान के प्रयोजनों में काम आने वाला वाहन माना जाय और उसे स्वस्थ सुव्यवस्थित बनाने वाले क्रिया-कलाप अपनाये जाये तो शरीर यात्रा के लिए किया गया पुरुषार्थ प्रकाराँतर से ईश्वर की सेवा, पूजा स्तर का ही रहेगा। उपार्जन में यदि ईमानदारी, उचित लाभ, जनता की आवश्यकता पूर्ति, परिवार व्यवस्था के लिए श्रम एवं साधना के रूप में किया जाय तो वही व्यापार, नौकरी, कृषि, शिल्प, वृद्धि, श्रम आदि एक प्रकार से कर्मयोग का क्रिया-कृत्य ही माना जाएगा शरीर को यदि वासना, प्रदर्शन, अहंकार, अनाचार के लिए अनीति और उच्छृंखलता पूर्वक सजाया पोषा और बलिष्ठ कारक स्वार्थपरता की श्रेणी में गिना जाएगा भोजन यदि भगवान का प्रसाद, शरीर इंजन का ईंधन, क्षुधा रोग की औषधि की तरह किया जा रहा है तो वह परमार्थ है किंतु यदि चटोरेपन की लालसा से अनुपयुक्त आहार किया जा रहा है तो वही सामान्य दीखने वाली प्रक्रिया पाप परिणाम प्रस्तुत करेगी।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1973 पृष्ठ 6
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1973/January/v1.6

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...