मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

👉 "एक बेटा ऐसा भी"

🔷 " माँ, मुझे कुछ महीने के लिये विदेश जाना पड़ रहा है। तेरे रहने का इन्तजाम मैंने करा दिया है।" तक़रीबन 32 साल के, अविवाहित डॉक्टर सुदीप ने देर रात घर में घुसते ही कहा।

🔶 " बेटा, तेरा विदेश जाना ज़रूरी है क्या ?" माँ की आवाज़ में चिन्ता और घबराहट झलक रही थी। " माँ, मुझे इंग्लैंड जाकर कुछ रिसर्च करनी है। वैसे भी कुछ ही महीनों की तो बात है।" सुदीप ने कहा।

🔷 " जैसी तेरी इच्छा।" मरी से आवाज़ में माँ बोली। और छोड़ आया सुदीप अपनी माँ 'प्रभा देवी' को पड़ोस वाले शहर में स्थित एक वृद्धा-आश्रम में।

🔶 वृद्धा-आश्रम में आने पर शुरू-शुरू में हर बुजुर्ग के चेहरे पर जिन्दगी के प्रति हताशा और निराशा साफ झलकती थी। पर प्रभा देवी के चेहरे पर वृद्धा-आश्रम में आने के बावजूद कोई शिकन तक न थी।

🔷 एक दिन आश्रम में बैठे कुछ बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे। उनमें दो-तीन महिलायें भी थीं। उनमें से एक ने कहा, " डॉक्टर का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं था जो अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया।"

🔶 तो वहाँ बैठी एक महिला बोली, " प्रभा देवी के पति की मौत जवानी में ही हो गयी थी। तब सुदीप कुल चार साल का था। पति की मौत के बाद, प्रभा देवी और उसके बेटे को रहने और खाने के लाले पड़ गये। तब किसी भी रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। प्रभा देवी ने लोगों के कपड़े सिल-सिल कर अपने बेटे को पढ़ाया। बेटा भी पढ़ने में बहुत तेज था, तभी तो वो डॉक्टर बन सका।"

🔷 वृद्धा-आश्रम में करीब 6 महीने गुज़र जाने के बाद एक दिन प्रभा देवी ने आश्रम के संचालक राम किशन शर्मा जी के ऑफिस के फोन से अपने बेटे के मोबाईल नम्बर पर फोन किया, और कहा, " सुदीप तुम हिंदुस्तान आ गये हो या अभी इंग्लैंड में ही हो ?"

🔶 " माँ, अभी तो मैं इंग्लैंड में ही हूँ।" सुदीप का जवाब था।

🔷 तीन-तीन, चार-चार महीने के अंतराल पर प्रभा देवी सुदीप को फ़ोन करती उसका एक ही जवाब होता, " मैं अभी वहीं हूँ, जैसे ही अपने देश आऊँगा तुझे बता दूँगा।"इस तरह तक़रीबन दो साल गुजर गये। अब तो वृद्धा-आश्रम के लोग भी कहने लगे कि देखो कैसा चालाक बेटा निकला, कितने धोखे से अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया। आश्रम के ही किसी बुजुर्ग ने कहा, " मुझे तो लगता नहीं कि डॉक्टर विदेश-पिदेश गया होगा, वो तो बुढ़िया से छुटकारा पाना चाह रहा था।"

🔶 तभी किसी और बुजुर्ग ने कहा, " मगर वो तो शादी-शुदा भी नहीं था।" अरे होगी उसकी कोई 'गर्ल-फ्रेण्ड, जिसने कहा होगा पहले माँ के रहने का अलग इंतजाम करो, तभी मैं तुमसे शादी करुँगी।"

🔷 दो साल आश्रम में रहने के बाद अब प्रभा देवी को भी अपनी नियति का पता चल गया। बेटे का गम उसे अंदर ही अंदर खाने लगा। वो बुरी तरह टूट गयी।

🔶 दो साल आश्रम में और रहने के बाद एक दिन प्रभा देवी की मौत हो गयी। उसकी मौत पर आश्रम के लोगों ने आश्रम के संचालक शर्मा जी से कहा, " इसकी मौत की खबर इसके बेटे को तो दे दो। हमें तो लगता नहीं कि वो विदेश में होगा, वो होगा यहीं कहीं अपने देश में।"

🔷 " इसके बेटे को मैं कैसे खबर करूँ । उसे मरे तो तीन साल हो गये।"* शर्मा जी की यह बात सुन वहाँ पर उपस्थित लोग सनाका खा गये। उनमें से एक बोला, " अगर उसे मरे तीन साल हो गये तो प्रभा देवी से मोबाईल पर कौन बात करता था।"

🔶 "वो मोबाईल तो मेरे पास है, जिसमें उसके बेटे की रिकॉर्डेड आवाज़ है।" शर्मा जी बोले। "पर ऐसा क्यों ?" किसी ने पूछा।

🔷 तब शर्मा जी बोले कि करीब चार साल पहले जब सुदीप अपनी माँ को यहाँ छोड़ने आया तो उसने मुझसे कहा, "शर्मा जी मुझे 'ब्लड कैंसर' हो गया है। और डॉक्टर होने के नाते मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि इसकी आखिरी स्टेज में मुझे बहुत तकलीफ होगी। मेरे मुँह से और मसूड़ों आदि से खून भी आयेगा। मेरी यह तकलीफ़ माँ से देखी न जा सकेगी। वो तो जीते जी ही मर जायेगी। मुझे तो मरना ही है पर मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण मेरे से पहले मेरी माँ मरे। मेरे मरने के बाद दो कमरे का हमारा छोटा सा 'फ्लेट' और जो भी घर का सामान आदि है वो मैं आश्रम को दान कर दूँगा।"

🔶 यह दास्ताँ सुन वहाँ पर उपस्थित लोगों की आँखें झलझला आयीं। प्रभा देवी का अन्तिम संस्कार आश्रम के ही एक हिस्से में कर दिया गया। उनके अन्तिम संस्कार में शर्मा जी ने आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के परिवार वालों को भी बुलाया।

🔷 माँ-बेटे की अनमोल और अटूट प्यार की दास्ताँ का ही असर था कि कुछ बेटे अपने बूढ़े माँ/बाप को वापस अपने घर ले गये।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 7 Feb 2018


👉 प्रेम या अपनत्व

🔷 अपनों के लिए स्वभावत: उनके दोषों को छिपाने और गुणों को प्रकट करने की आदत होती है। कोई भी पिता अपने प्यारे पुत्र के दोषों को नहीं प्रकट करता है। वह तो उसकी प्रशंसा के पुल ही बाँधता रहता है। दुर्गुणी बालक को न तो कोई मार डालता है और न जेल ही पहँुचा देता है, वरन्ï यह प्रयत्न करता है कि किसी सरल उपाय से उसके दुर्गुण दूर हो जाए या कम हो जाए। यदि यही बात अपने परिजनों के साथ हम रखें, तो उनके अंदर जो बुरे तत्त्व वर्तमान हैं, वे घट जायेंगे। डाकू, हत्यारे, ठग, व्यभिचारी आदि क्रूर कर्मी लोग भी अपने स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन आदि के प्रति मधुर व्यवहार ही करते हैं। सिंह अपने बाल-बच्चों को नहीं फाड़ खाता।
  
🔶 प्रेम एक ऐसा गोंद है, जो टूटे हुए हृदय को जोड़ता है। बिछुड़ों को मिलाता है। यदि किसी के साथ हमारा आत्मभाव सच्चा है और नि:स्वार्थ भाव से हम उसके साथ अपनेपन की भावना रखते हों, तो सच मानिये वह हमारा गुलाम बन जायेगा। दोषों से रहित इस संसार में कोई एक भी व्यक्ति नहीं है। किसी की एक बुराई देखकर उस पर आग बबूला हो जाना, सब बुराई की खान मान लेना उचित नहीं है। यदि हम ध्यान से देखेंगे तो मालूम होगा कि उसमें बुराइयों के साथ कुछ अच्छाइयाँ भी हैं।
  
🔷 आत्मोन्नति यही तो है कि अपनेपन के दायरे को छोटे से बड़ा बनाया जाय। जिनका अपनापन केवल अपने शरीर तक ही है, वे कीट, पतंग जैसे नीच श्रेणी के हैं। जो अपनी संतान तक आत्म भाव को बढ़ाते हैं। वे पशु-पक्षी से कुछ ऊँचे हैं। जिनका अपनापन कुटुम्ब तक सीमित है, वे असुर हैं। जिनका अपनापन अपनी संस्था राष्टï्र तक है, वे मनुष्य हैं। जो समस्त मानव जाति को अपनेपन से ओत-प्रोत देखते हैं, वे देवता हैं। जिनकी आत्मीयता चर-अचर तक फैली है, वे जीवनमुक्त परमसिद्ध हैं। जो आत्मभाव का जितना विस्तार करता है, अधिक लोगों को अपना समझता है, दूसरों की सेवा-सहायता करता है, उनके सुख-दु:ख में अपना सुख-दु:ख मानता है, वह ईश्वर के उतना ही निकट है। आत्म विस्तार और ईश्वर आराधना एक ही क्रिया के दो नाम हैं।
  
🔶 एक उदार व्यक्ति पड़ोसी के बच्चों को खिलाकर बिना खर्च  के उतना ही आनन्द प्राप्त कर लेता है, जितना कि बहुत खर्च और कष्टï के साथ अपने बालकों को खिलाने में किया जाता है। अपने हँसते हुए बालकों को देखकर हमारी छाती गुदगुदाने लगती है, पड़ोसी के उससे भी सुन्दर फूल से हँसते हुए बालक को देखकर हमारे दिल की कली नहीं खिलती है? इसका कारण यह है कि हम खुद अपने हाथों अपनी एक निजी दुनिया बसाना चाहते हैं। उसी से संबंध रखना चाहते हैं, उसकी ही उन्नति देखकर प्रसन्न होना चाहते हैं।
  
🔷 हम सदा यही देखते हैं कि लोग क्या करते हैं? यदि हम क्या करते हैं? यह देखने लगें, तो सदैव सुख ही हमारे सामने होगा, क्योंकि अपने को मनमर्जी बनाना हमारे हाथ में है। इसे कौन रोक सकता है कि हम दूसरों को अपना समझें, उन्हें प्यार करें और उस प्यार और अपनेपन के कारण जो आनन्द उपजे, उसका उपभोग करें। स्वर्ग निर्माण की यही कुंजी है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समर्थ और प्रसन्न जीवन की कुँजी (अन्तिम भाग)

🔷 शारीरिक रोगों के मूल्य में भी इन दो को गिना जा सकता है। डरपोक आदमी अपनी भीरुता और कुकल्पना के कारण ही बेमौत मरते है। एक बार ब्रह्माजी ने मौत को दो हजार आदमी मार लाने का आदेश दिया। जब वह वापस लौटी तो चार हजार साथ थे। जवाब तलब किया गया तो मौत ने सफाई दी कि उसने तो दो हजार ही मारे। शेष तो मरने के डर से भयभीत होकर अपने आप मर गये और उसके साथ साथ चल दिये। आवेश ग्रस्तों के बारे में यह बात और भी बढ़ा चढ़ा कर सही जा सकती है।

🔶 ठंडक लगने से जितने समय में मौत होती है आग में झुलसने पर उससे कहीं जल्दी प्राण निकल जाते है। क्रोधी अपने रक्तमांस को ही नहीं जीवनी शक्ति को भी निरन्तर जलता है और अपने को खोखला बनाता रहता है। फिर कोई नाम मात्र का बनाहा मिलने पर बीमारियों से ग्रसित होकर स्वेच्छापूर्वक मौत के मुँह में घुस पड़ता है। ऐसे लोग निश्चित रूप से अकाल मृत्यु मरते हैं। अपने आपको निरंतर जलाते रहने का और क्या परिणाम हो सकता है?

🔷 क्रोधी आदमी समझता है कि वह सत्य का पक्षपाती है। जो लोग गलती करते है, उन पर गुस्सा आता है। यह शब्द कहने सुनने से निर्दोष मालूम पड़ते है, पर है तथ्यों से विपरीत। गलती करने वाले को क्रोध करने से कैसे दंडित किया जा सकता है या सुधारा जा सकता है। सह समझ से परे ही उसके विरोधी बन जाते है। इस प्रकार वह अनायास ही जीती बाजी हारता है।

🔶 जिस कारण क्रोध किया गया था। उसका निराकरण हुआ या नहीं, यह बहुत पीछे की बात है। इससे पहले ही अपने स्वभाव की बदनामी, जीवनी शक्ति की घटोत्तरी और समस्या को सुझा सकने की मानसिक दक्षता में कमी आदि अनेकों हानियाँ पहले ही हो लेती है। इसी प्रकार संकोची, डरपोक व्यक्ति भी अपनी बात स्पष्ट न कर पाने के कारण निर्दोष होते हुए भी दोषी बनते रहते है।

🔷 शरीर की स्थिरता, आर्थिक सुव्यवस्था, परिवार की सुख शान्ति, गुत्थियों का समाधार, प्रगति का सुनियोजन आदि कितनी ही बातें जीवन की सफलता के लिए आवश्यक मानी जाती है। उन सब के मूल में मानसिक संतुलन की आवश्यकता है। हंसती हंसाती आदतें बनाकर ही हम जीवन रथ को प्रगति पथ पर सही रीति से अग्रगामी कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988 पृष्ठ 57
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/March/v1.58

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 6)

🔶 मिर्च-मसालों जैसी स्थिति ही चिकनाई-मिठाई की है। तेल-घी को अलग से निकालकर खाने से वे तत्व अलग हो जाते हैं जो चिकनाई को पचाने में काम आते हैं। तिल, मूँगफली, सोयाबीन आदि को चबा लिया या पीस कर उपयोग किया जाय तो वे उचित मात्रा में होने पर पोषण का प्रयोजन पूरा करेंगे। तेल निकालने पर उसे पचाने वाले तत्व खली में निकल जाते हैं और वह चिकनाई अत्यधिक गरिष्ठ हो जाती है। घी खाने की अपेक्षा दूध दही लेना गनीमत है। वैसे जितनी चिकनाई की शरीर को आवश्यकता है उतनी सन्तुलित आहार में सहज ही मिल जाती है। अन्न, दाल आदि में भी चिकनाई होती है। अलग से उसे लेना आवश्यक नहीं है, पर यदि लेने का मन ही हो तो उसे उन बीजों के रूप में ही लेना चाहिए जिनमें तेल ही नहीं उसको पचाने वाले तत्वों का भी उपयुक्त अनुपात रहता है।

🔷 शक्कर के सम्बन्ध में भी यही बात है। अन्न मुँह में पिसता है तो जीभ से निकलने वाले रस ही उसे ग्लूकोज के रूप में परिवर्तित कर देते हैं। पेट में पहुँचते-पहुँचते वह उपयुक्त मात्रा में शक्कर से भरा-पूरा होता है। फिर सामान्य खाद्य पदार्थों में भी शक्कर का समुचित अनुपात रहता है। उसे अलग से खाने की कोई आवश्यकता नहीं। मीठे फलों में उसका अनुपात पर्याप्त होता है। प्रायः सभी फल मीठे होते हैं। खजूर, अंजीर, दाख आदि में तो उसकी मात्रा बहुत अधिक होती है। शहद की भी प्रशंसा है। यों चीकू से लेकर चुकन्दर तक में उसकी पर्याप्त मात्रा रहती है। मन चले तो गन्ना भी चूसा जा सकता है।

🔶 शक्कर प्राप्त करने की इतनी ही मर्यादा है। चरम सीमा तक पहुँचना हो तो बिना पाउडर के शोधा गया गुड़ या राब तक आगे बढ़ा जा सकता है। सफेद चीनी तो सफेद विष कही गई है। कैल्सियम निकल जाने पर तो वह दाँत, मसूड़े, अस्थि पंजर आदि सभी को गलाती है। मधुमेह, रक्तचाप, यकृत रोग, पेट के कीड़े जैसे रोग उत्पन्न करने में तो उसकी ही करामात काम करती है। यदि सफेद चीनी का उपयोग आहार से हटा दिया जाय तो विष भक्षण, चटोरापन, अपव्यय एवं अधिक खाने जैसे अनेक अभिशापों से सहज छुटकारा मिल सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Essence of Worship-Intercession. (Part 1)

🔶 If man could not develop his eligibility, no RAM-NAM can work. Man generally has a notion in his mind that repeatedly counting of wooden beads with pronunciation of RAM-NAM through tip of his tongue is essence of worship. He keeps repeating RAM-NAM like a parrot uselessly. I do not know if anyone can be benefitted just by counting GAYATRI-mantra over wooden beads. I know millions of people who come complaining to me that their counting of beads is not working. I too, confirm the same that this way no gain was obtained ever nor will be obtained in future.     
                                                 
🔷 But I can assure you that GAYATRI mantra murmured with sincerity, retained in life with right approach and induced in veins, sentiments and thinking process can do miracle and I am the proof & example of that miracle. There are hundreds of secret pages in my life that I have kept sealed so that they could not be opened before I die. So voluminous is the details of helps & services which I have extended to people that no one would believe that a single person can do all that. A man finds it difficult to complete even his own wishes but here another man is competent to help so many people in a diversified way. Yes! I say, it is so and I am that person.
                                     
🔶 Friends! It is a throne and any person cannot sit over it. Only that man is authorized to sit on it who has not confined his GAYATRI to his tongue only, his fingers only rather he went ahead to imbibe GAYATRI to induce his every particle and conscience of heart with GAYATRI’s ambrosia. Only such man is authorized to see the magic of GAYATRI and assure other persons of some share in his PUNYA (GAYATRI) in order to assuage other persons that GAYATRI is a spiritually performed magic for a sure shot gain.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 15)

🔷 मित्रो हमने वह विशेषताएँ खो दीं, जिसके आधार पर हम किसी समय दुनिया के चक्रवर्ती शासक कहलाते थे। वह विशेषताएँ हमने खो दीं, जिसके आधार पर हम किसी जमाने में स्वर्ण-संपदाओं के मालिक कहलाते थे। वह सब विशेषताएँ हमने खो दीं, जिसके आधार पर यहाँ का हर नागरिक देवता कहलाता था और यह देवताओं का देश कहलाता था। यहाँ के निवासियों में जो आध्यात्मिक विशेषताएँ थी वे सब खत्म हो गयीं। नष्ट हो गयीं। भौतिक विशेषताएँ बढ़ीं या नहीं बढ़ीं, मुझे नहीं मालूम। भौतिक विशेषताओं के बारे में जो मैं जानता हूँ, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि भौतिक विशेषताएँ यदि आदमी की बढ़ती हुई चली जायें, तो उससे बर्बादी के अलावा और क्या हासिल हो सकता है? मैं कई बार अमेरिका का उदाहरण दिया करता हूँ।

🔶 बढ़ती हुई भौतिकता के कारण वहाँ के लोगों ने अपनी दिमागी सेहत को गँवा दिया है। वहाँ के अधिकांश आदमी ऐसे हैं, जो कि गोली खा करके सोते हैं; ताकि नींद आ जाये। वहाँ के लोगों ने अपना दाम्पत्य जीवन व पारिवारिक जीवन समाप्त कर दिया। अकेला आदमी कितना डरावना होता है, कितना खौफनाक होता है, आप इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि भूत जंगल में अकेला रहता है। उसका कोई खानदान वाला, कोई मित्र, कोई सगा-संबंधी नहीं होता है। सबसे बड़ा कष्ट, सबसे बड़ा त्रास उसकी जिंदगी का यही है कि वह अकेला रहता है। अमेरिका, रूस ब्रिटेन जैसे संपन्न एवं भौतिकवादी देशों का जीवन कुछ ऐसा ही है, जहाँ आदमी अकेला है और वह किसी से जुड़ा हुआ नहीं है। वह किसी का नहीं है और उसका कोई नहीं है। इस तरह का जीवन जी करके आदमी क्लेश में फँसता हुआ चला जा रहा है और दुनिया तबाही की ओर भागती हुई चली जा रही है।

🔷 मित्रो! आप यहाँ से उस स्थान पर चोट करने के लिए जाना जिसने कि हमारे सारे शरीर को, हमारे मन को और हमारी भावनाओं को डगमगा दिया है। जिसने मानव की सारी आस्था को डगमगा दिया है। आपके जिम्मे जो काम सौंपा गया है, वह सामान्य काम नहीं है। वह असामान्य काम है। आप अपने आपको असामान्य व्यक्ति मानकर चलना और यह मानकर चलना कि जो उत्तरदायित्व आपको सौंपा गया है, वह सामान्य उत्तरदायित्व नहीं है। आप असामान्य उत्तरदायित्व ग्रहण करके चले हैं। आप छोटी चीज लेकर के नहीं चले हैं। आप बहुत बड़ी चीज को लेकर के चले हैं। आप उसका ध्यान रखना और उसे पूरा करने के लिए उतनी गहराई, उतनी ईमानदारी और उतनी जिम्मेदारी के साथ कदम बढ़ाना, जिससे कि जो ख्वाब हमने देखे हैं, जो सपने हमने देखे हैं, उसे पूरा किया जा सके। समूची मानव जाति आपसे जो उम्मीद लगाये बैठी है और आशा लगाये बैठी है, उसके बारे में उसे थोड़ा सा भी प्रकाश मिल सके, आपके जिम्मे हम यह बहुत बड़ा काम सौंप रहे हैं। आप से लोग बहुत उम्मीद लगाये बैठे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 34)

👉 गुरु से बड़ा तीनों लोकों में और कोई नहीं

🔶 गुरु नमन की यह महिमा गुरुतत्त्व के विस्तार की ही भाँति असीम और अनन्त है। इसके अगले क्रम को गुरुगीता के महामंत्रों में प्रकट करते हुए भगवान् सदाशिव -पराम्बा भवानी से कहते हैं-

गुकारं च गुणातीतं रुकारं रूपवर्जितम्। गुणातीत स्वरूपं च यो दद्यात् स गुरुः स्मृतः॥ ४६॥
अ-त्रिनेत्रः सर्वसाक्षी अ-चतुर्बाहुरच्युतः। अ-चतुर्वदनो ब्रह्मा श्री गुरुः कथितः प्रिये॥ ४७॥
अयं मयाञ्जलिर्बद्धो दयासागरवृद्धये। यद् अनुग्रहतो जन्तुŸिवत्र संसार मुक्तिभाक् ॥ ४८॥
श्रीगुरोः परमं रूपं विवेक चक्षुषोऽमृतम्। मन्दभाग्या न पश्यन्ति अन्धाः सूर्योदयं यथा॥ ४९॥
श्रीनाथ चरणद्वन्द्वं यस्यां दिशि विराजते। तस्यै दिशेनमस्कुर्याद् भक्त्या प्रतिदिनं प्रिये॥ ५०॥
  
🔷 गुरुतत्त्व की अनुभूति कराने वाले इन महामंत्रों में आध्यात्मिक जीवन का निष्कर्ष प्रकट है। भगवान् महेश्वर की वाणी शिष्यों के समक्ष इस सत्य को उजागर करती है कि गुरुदेव साकार होते हुए भी निराकार हैं। ‘गुरु ’ शब्द का पहला अक्षर ‘गु’ इस सत्य का बोध कराता है कि त्रिगुणमय कलेवर को धारण करने वाले गुरुदेव सर्वथा गुणातीत हैं। दूसरे अक्षर ‘रु’ में यह सत्य निहित है कि शिष्यों के लिए रूप वाले होते हुए भी गुरुदेव भगवान् रूपातीत हैं। यानि कि गुरुवर की चेतना वास्तव में निर्गुण व निराकार है। शिष्य को आत्मा स्वरूप प्रदान करने वाले गुरुदेव की महिमा अनन्त है॥ ४६॥

🔶 भगवान् सदाशिव के वचन हैं कि तीन आँखों वाले न होने पर भी गुरुदेव साक्षात् शिव हैं। चार भुजाएँ न होने पर भी वे सर्वव्यापी विष्णु हैं। चार मुख न होने पर भी वे सृष्टिकर्त्ता  ब्रह्मा हैं॥ ४७॥

🔷 ऐसे दयासागर गुरुदेव को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। उनकी कृपा से ही जीवों को भेद बुद्धि वाले संसार से मुक्ति मिलती है॥ ४८॥

🔶 श्री सद्गुरु का यह परम रूप उनसे विवेक चक्षु मिलने पर ही दृश्य होता है; तभी उनके अमृत तुल्य रूप का स्पर्श मिलता है। इसके अभाव में जिस तरह अन्धा व्यक्ति सूर्योदय के दृश्य को नहीं देख पाता ॥ ४९॥ उन परम स्थायी सद्गुरु के चरणद्वय जिस दिशा में भी विराजते हैं, उस दिशा में प्रतिदिन नमस्कार करने से शिष्यों का-भक्तों का परम कल्याण होता है॥ ५०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 58

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...