रविवार, 17 नवंबर 2019

👉 जीवन जीने की कला

जीवन-जीने की कला में है। जिस किसी भी तरह अनगढ़ तौर-तरीकों से जीते रहने का नाम जीवन नहीं है। दरअसल जो जीने की कला जानते हैं, केवल वही यथार्थ में जीवन जीते हैं। जीवन का क्या अर्थ है? क्या है हमारे होने का अभिप्राय? क्या है मकसद? हम क्या होना और क्या पाना चाहते हैं? इन सवालों के ठीक-ठीक उत्तर में ही जिन्दगी का रहस्य समाया है।
  
यदि जीवन में गन्तव्य का बोध न हो, तो भला गति सही कैसे हो सकती है और यदि कहीं पहुँचना ही न हो, तो संतुष्टि कैसे पायी जा सकती है? जिसके पास सम्पूर्ण जीवन के अर्थ का विचार नहीं है, उसकी दशा उस माली की तरह है, जिसके पास फूल तो हैं और वह उनकी माला भी बनाना चाहता है, लेकिन उसके पास ऐसा धागा नहीं है जो उन्हें जोड़ सके, एक कर सके। आखिरकार वह कभी भी अपने फूलों की माला नहीं बना पायेगा।
  
जो जीवन जीने की कला से वंचित है, समझना चाहिए कि उनके जीवन में न दिशा है और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते हैं। उनसे कभी भी उस ऊर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती है। जीने की कला से वंचित व्यक्ति जीवन के उस समग्र अनुभव से सदा के लिए वंचित रह जाता है, जिसके अभाव में जीना और न जीना बराबर ही हो जाता है।
  
ऐसे व्यक्ति का जीवन उस वृक्ष की भाँति है, जिसमें न तो कभी फूल लग सकते हैं और न कभी फल। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती। क्योंकि आनन्द की अनुभूति तो जीवन को कलात्मक ढंग से जीने पर, उसे समग्रता में अनुभव करने पर होती है। जीवन में यदि आनन्द पाना है, तो जीवन को फूलों की माला बनना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूँथना होगा। जो जीने की इस कला को नहीं जानते हैं, वे सदा के लिए जिन्दगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १२५

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ३)

स्वभाव में कटुता, कर्कशता, उतावली, अधीरता, उत्तेजना की उद्दण्डता भी उतनी ही घातक है जितनी कि दीनता, भीरुता, निराशा, कायरता। यह दोनों ही असन्तुलन भिन्न प्रकार के होते हुए भी हाई ब्लड प्रेशर, लो ब्लड प्रेशर की तरह अपने-अपने ढंग से हानि पहुँचाते हैं। स्वभाव को सहिष्णु, धैर्यवान, गम्भीर, दूरदर्शी, सहनशील बनाने का प्रयत्न यदि निरन्तर जारी रखा जाय तो शिष्टता, सज्जनता के ढाँचे में प्रकृति ढलती जायेगी और हर किसी की दृष्टि में अपना मूल्य बढ़ेगा।

ईमानदारी, सच्चाई, सहकारिता, उदारता, मिल जुलकर रहना, मिल बाँटकर खाना, हँसने-हँसाने की हलकी-फुलकी जिन्दगी जीना जैसी आदतें यदि अपने चरित्र का अंग बन सके तो इसमें घाटा कुछ भी नहीं लाभ ही लाभ है। बेईमान, झूठे, ईर्ष्यालु, स्वार्थान्ध, विद्वेषी, मनहूस प्रकृति के लोग अपनी चतुरता और अहमन्यता का ढिंढोरा भर पीटते हैं। वस्तुतः वे कुछेक चापलूसों और अनाड़ियों को छोड़कर हर समझदार की दृष्टि से ओछे, बचकाने और घिनौने प्रतीत होते हैं। वस्तुतः ऐसे लोग जोकर भर समझे और अप्रामाणिक ठहराये जाते हैं। आमतौर से ऐसे लोग अविश्वस्त और चरित्रहीन समझे जाते हैं। फिजूलखर्ची, बड़प्पन, बेईमानी गरीबी के गर्त में गिरने की पूर्व सूचना है। ऐसी आदतें अपने में थोड़ी मात्रा में भी पनपी हो तो उन्हें छोटी दीखने वाली उस चिनगारी को लात से मसलकर बुझा ही देना चाहिए।

ऐसे-ऐसे और भी अनेकों दोष दुर्गुण हैं जो विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार की अनुपयुक्त आदतों के रूप में प्रकट होते हैं। एक सभ्य सुसंस्कारी मनुष्य की प्रतीक प्रतिमा मन में बसानी चाहिए और उसकी तुलना में अपनी जो भी कमियाँ दीखती हों उन्हें संकल्प और साहस के सहारे उलटने का प्रयत्न करना चाहिए। उलटने का तरीका एक ही है कि अनौचित्य के स्थान पर उसका प्रतिपक्षी औचित्य अपनाया जाय। उसे अपने दैनिक जीवनक्रम में सम्मानित रखते हुए धीरे-धीरे स्वभाव को ही उस ढाँचे में ढाल लिया जाय। बुराई कोसते रहते से नहीं मिट जाती, उसकी प्रतिपक्षी भलाई को प्रयोग में लाने की नियमित कार्य पद्धति अपनानी होती है। काँटे को काँटे से निकालते हैं और दुष्प्रवृत्तियों को हटाने के लिए सत्प्रवृत्तियों को उनसे जूझने के लिए मोर्चे पर खड़े करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 Nov 2019

★ शिखा रखते समय हर व्यक्ति को इसके मूल प्रयोजन का ध्यान रखना चाहिए। मस्तिष्क में उन्हीं विचारणाओं, मान्यताओं और आकांक्षाओं को स्थान मिले, जो विवेकशीलता, नैतिकता, मानवता, सामाजिकता की कसौटी पर खरे उतरते हों। दुर्बुद्धि, दुर्भावना और दुष्टता की जो दुष्प्रवृत्तियाँ चारों ओर फैली हैं, उनका उन्मूलन करने के  लिए हमें शिखा रूपी धर्मध्वजा फहराते हुए एक ऐसा भावनात्मक महाभारत खड़ा करना चाहिए, जिसमें अनौचित्य की कौरवी सेना को परास्त कर औचित्य- अर्जुन के गले में विजय बैजयन्ती पहनाई जा सके।

◆ विचारों की शक्ति और उपयोगिता समझ सकने वाले लोग इस विशाल भीड़ से तलाश किए जाएं। जो स्वयं प्रकाश पूर्ण,बौद्घिक प्रखरता के सुनने- समझने के लिए तैयार नहीं, वे भला और किसी को क्या कुछ कह- सुन सकेंगे और क्या अपने जीवन में प्रखरता ला सकेंगे।

□  हे भगवान् ! यह शरीर तेरा मन्दिर, है अतः इसे मैं हमेशा पवित्र रखूँगा। आपने मुझे यह हृदय दिया है, मैं इसे प्रेम से भर दूँगा, आपने मुझे यह बुद्धि दी है, मैं इस दीपक को हमेशा निर्मल और तेजस्वी बनाये रखूँगा। 
 
■  गुरु- शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत् समझकर, उसे टेढे- मेढ़े मार्गों से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर, गुरु की अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश की अवहेलना करता है। यद्यपि गुरु उसे कुछ भी न कहें, किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए (भाग २)

सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जा...