रविवार, 16 अक्तूबर 2016

👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 17 Oct 2016




👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 17 Oct 2016




👉 गहना कर्मणोगति: (भाग 5)

चित्रगुप्त का परिचय

🔴 पिछली पंक्तियों में पाठक पढ़ चुके हैं कि हमारा गुप्त चित्र अंतर्मन ही निरंतर चित्रगुप्त देवता का काम करता रहता है। जो कुछ भले या बुरे काम हम करते हैं, उनका सूक्ष्म चित्र उतार-उतार कर अपने भीतर जमा करता रहता है। सिनेमा की पर्दे पर मनुष्य की बराबर लम्बी-चौड़ी तस्वीर दिखाई देती है, पर उसका फिल्म केवल एक इंच ही चौड़ा होता है। इसी प्रकार पाप-पुण्य का घटनाक्रम तो विस्मृत होता है, पर उसका सूक्ष्म चित्र एक पतली रेखा मात्र के भीतर खिंच जाता है और वह रेखा गुप्त मन के किसी परमाणु पर अदृश्य रूप से जमकर बैठ जाती है। शार्टहैंड लिखने वाले बड़ी बात को थोड़ी सी उल्टी-सीधी लकीरों के इशारे पर जरा से कागज पर लिख देते हैं। कर्मरेखा को ऐसी ही दैवी शार्टहैंड समझा जा सकता है।

🔵 पाठकों को इतनी जानकारी तो बहुत पहले हो चुकी होगी कि मन के दो भाग हैं- एक बहिर्मन, दूसरा अंतर्मन। बाहरी मन तो तर्क-वितर्क करता है, सोचता है, काट-छाँट करता है, निर्णय करता है और अपने इरादों को बदलता रहता है, पर अंर्तमन भोले-भाले किंतु दृढ़ निश्चयी बालक के समान है, वह काट-छाँट नहीं करता वरन् श्रद्धा और विश्वास के आधार पर काम करता है। बाहरी मन तो यह सोच सकता है कि पाप कर्मों की रेखाएँ अपने ऊपर अंकित होने न दूँ और पुण्य कर्मों को बढ़ा-चढ़ाकर अंकित करूँ। जिससे पाप फल न भोगना पड़े और पुण्य फल का भरपूर आनंद प्राप्त हो, परंतु भीतरी मन ऐसा नहीं है।

🔴 यह सत्यनिष्ठ जज की तरह फैसला करता है, कोई लोभ, लालच, भय, स्वार्थ उसे प्रभावित नहीं करता। कहा जाता है कि मनुष्य के अंदर एक ईश्वरीय शक्ति रहती है, दूसरी शैतानी। आप गुप्त मन को ईश्वरीय शक्ति और तर्क, मन, छल-कपट, स्वार्थ, लोभ में रत रहने वाले बाह्य मन को शैतानी शक्ति कह सकते हैं। बाहरी मन धोखेबाजी कर सकता है, परंतु भीतरी मन तो सत्य रूपी आत्मा का तेज है, वह न तो मायावी आचरण करता है, न छल-कपट। निष्पक्ष रहना उसका स्वभाव है। इसलिए ईश्वर ने उसे इतना महत्वपूर्ण कार्य सौंपा है। दुनिया उसे चित्रगुप्त देवता कहती है। यदि वह भी पक्षपात करता, तो भला इतनी ऊँची जज की पदवी कैसे पा सकता था? हमारा गुप्त मन खुफिया जासूस की तरह हर घड़ी साथ-साथ रहता है और जो-जो भले-बुरे काम किए जाते हैं, उनका ऐमालनामा अपनी खुफिया डायरी में दर्ज करता रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/gah/chir.2

👉 मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 5)*

🔴 पहला अध्याय

🔵 आत्मा शरीर से पृथक् है। शरीर और आत्मा के स्वार्थ भी पृथक हैं। शरीर के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व इन्द्रियाँ करती हैं। दस इन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन यह सदा ही शारीरिक दृष्टिकोण से सोचते और कार्य करते हैं। स्वादिष्ट भोजन, बढ़िया वस्त्र, सुन्दर-सुन्दर मनोहर दृश्य, मधुर श्रवण, रूपवती स्त्री, नाना प्रकार के भोग-विलास यह इन्द्रियों की आकांक्षाएँ हैं।

🔴 ऊँचा पद, विपुल धन, दूर-दूर तक यश, रौब, दाब यह सब मन की आकांक्षाएँ हैं। इन्हीं इच्छाओं को तृप्त करने में प्रायः सारा जीवन लगता है। जब यह इच्छाएँ अधिक उग्र हो जाती हैं तो मनुष्य उनकी किसी भी प्रकार से तृप्ति करने की ठान लेता है और उचित-अनुचित का विचार छोड़कर जैसे भी बने स्वार्थ साधने की नीति पर उतर आता है। यही समस्त पापों का मूल केन्द्र बिन्दु है।

🔵 शरीर भाव में जाग्रत रहने वाला मनुष्य यदि आहार, निद्रा, भय, मैथुन के साधारण कार्यक्रम पर चलता रहे तो भी उस पशुवत जीवन में निरर्थकता ही है, सार्थकता कुछ नहीं। यदि उसकी इच्छाएँ जरा अधिक उग्र या आतुर हो जायें तब तो समझिये कि वह पूरा पाप पुंज शैतान बन जाता है, अनीतिपूर्वक स्वार्थ साधने में उसे कुछ भी हिचक नहीं होती। इस दृष्टिकोण के व्यक्ति न तो स्वयं सुखी रहते हैं और न दूसरों को सुखी रहने देते हैं।

🔴 काम और लोभ ऐसे तत्त्व हैं कि कितना ही अधिक से अधिक भोग क्यों न मिले वे तृप्त नहीं होते, जितना ही मिलता है उतनी ही तृष्णा के साथ-साथ अशान्ति, चिन्ता, कामना तथा व्याकुलता भी दिन दूनी और रात चौगुनी होती चलती है। इन भोगों में जितना सुख मिलता है उससे अनेक गुना दुःख भी साथ ही साथ उत्पन्न होता चलता है। इस प्रकार शरीर भावी दृष्टिकोण मनुष्य को पाप, ताप, तृष्णा तथा अशान्ति की ओर घसीट ले जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 58)

🔵 संसार जो अशांति का समुद्र है उसमें एक चट्टान की तरह के रहो। विविधता के इस असीम जंगल में सिंह के समान विचरण करो। सर्वशक्तिमत्ता तुम्हारे पीछे है, किन्तु पहले सांसारिक या केवल भौतिक शक्ति प्राप्ति की सभी इच्छाओं का दमन करो। तुम्हारे मार्ग में आने वाली माया की सभी बाधाओं को वैराग्य के खड्ग से दो टुकडे़ कर डालो। किसी पर शासन न करो।  किसी को तुम पर शासन न करने दो ।

🔴 मृत्यु से न डरो क्योंकि इसी क्षण भी मृत्यु तुम्हारा प्राण हरण कर ले तो भी यह जान रखो कि तुम सही मार्ग पर हो। अत: निर्भय हो कर बढ़ चलो। महत् जीवन में मृत्यु एक घटना मात्र है। मृत्यु के परे भी आध्यात्मिक उन्नति की सुविधायें और संभावनायें हैं। व्यक्ति क्या हो सकता है इसका कोई अन्त नहीं। सब कुछ व्यक्तिगत प्रयत्न पर निर्भर करता हैं। ईश्वर की कृपा तो -सदैव हमारे साथ है ही।

🔵 अपने आसपास की सभी वस्तुओं का अध्ययन करो। और तुम पाओगे कि प्रत्येक वस्तु में तुम्हारे लिये एक आध्यात्मिक सन्देश है। एक की ही सर्वोपरि सत्ता है। वह एक जो अनेक के प्रत्येक पक्ष में विद्यमान है। विविधता अपने विक्षेपकारी भेदों द्वारा भले ही तुम्हें छलती रहे तब भी तुम सर्वव्यापी एकत्व की पूजा करो। आभास छलता है जैसी कि कहावत है। किन्तु मनुष्य का यह कर्त्तव्य है की वह छल को पकड़े तथा सभी आभासों के पीछे के सत्य का दर्शन करे।

🔴 प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों का अभिरक्षक है, प्रत्येक व्यक्ति अपने बंधन को तोड़ने वाला है। प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने लिये सत्य की खोज करनी होगी। दूसरा कोई रास्ता नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही भूमि पर खड़ा है। प्रत्येक को अपना युद्ध स्वयं लड़ना होगा। क्योंकि अनुभूति सदैव पूर्णत: व्यक्तिगत अनुभव ही है। अन्ततोगत्वा प्रत्येक व्यक्ति स्वयं का उद्धारकर्ता तथा स्वामी है। क्योंकि परमात्मा जो सर्वदा वर्तमान है वह पूर्ण एकत्व के रूप में व्यक्तित्व के प्रत्येक अंश में उद्भासित हो उठेगा। यही उपदेश है। इसकी ही अनुभूति करनी है और इसकी अनुभूति होने पर वह महान्- लक्ष्य (ईश्वर दर्शन) भी प्राप्त हो जायेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 17 Oct 2016

🔵 दूसरे को बदनीयत मान बैठना, उसके हर कार्य में द्वेष-दुर्भाव की गंध सूँघना अपनी तुच्छता का प्रतीक है। सद्भावना से भी कोई व्यक्ति अपने से असहमत हो सकता है और अपनी आशाओं के प्रतिकूल उत्तर दे सकता है। इतने मात्र से हमें कु्रद्ध क्यों होना चाहिए। एक दूसरे के प्रति जो गलतफहमी की गाँठें मन में बन जाती हैं, उनके निवारण का उपाय एक ही है कि उससे एकान्त में जी खोलकर बात की जाय और वास्तविकता तथा गलतफहमी का सही रूप से निरूपण कर लिया जाय। इससे द्वेष का सबसे जबरदस्त किला सहज ही ढह सकता है।

🔴 सारे संसार को अपनी इच्छानुकूल बना लेना कठिन है, क्योंकि यह परमात्मा का बनाया हुआ है और अपनी इस कृति को वही बदल सकता है, पर अपनी निज की दुनिया को अपने अनुकूल बदल सकना हममें से हर एक के लिए संभव है। जिस प्रकार ईश्वर का बनाया हुआ एक संसार है, उसी प्रकार हर मनुष्य की बनायी हुई भी उसकी अपनी एक निजी दुनिया होती है, जिसे वह अपने दृष्टिकोण के अनुसार बनाता है। उसी में संतुष्ट-असंतुष्ट, खिन्न-प्रसन्न बना रहता है। यदि कोई चाहे तो अपनी दुनिया को बदल भी सकता है।

🔵 दुनिया किसी को तब बड़ा मानती है, जब वह औसत दर्जे के आदमी से अधिक ऊँचा सिद्ध होता है। जिसका सोचने का तरीका उच्च आदर्शों पर अवलम्बित है, जो किसी मार्ग पर पैर बढ़ाने से पहले सौ बार यह सोचता है कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए यह उचित है या नहीं, वस्तुतः वही बड़प्पन का अधिकारी है।

🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

💎 चार कीमती रत्न 💎

1~ पहला रत्न है: "माफी"🙏
 
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।

2~ दूसरा रत्न है: "भूल जाना"🙂

अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

3~ तीसरा रत्न है: "विश्वास"�

हमेशा अपनी महेनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना। यही सफलता का सूत्र है।

4~ चौथा रत्न है: "वैराग्य"

हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निश्चित ही हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए बिना लिप्त हुवे जीवन का आनंद लेना। वर्तमान में जीना।💫

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प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे! घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो। हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।। अहे सच्चिदानन्द! बह...