शनिवार, 13 मई 2017

👉 चौथे ऑपरेशन में सूक्ष्म सत्ता का संरक्षण

🔵 मैं गुजरात प्रान्त के बलसाड़ जिले के डुंगरी ग्राम में रहता हूँ। सन् १९६२ से १९६५ तक स्थानीय हाई स्कूल में नॉन टीचिंग स्टाफ के रूप में कार्यरत रहा। इसी दौरान मेरा संपर्क पास के गाँव के गायत्री परिजनों से हुआ। उनकी युग निर्माण योजना की बातें मेरे मन- मस्तिष्क को प्रभावित कर गईं।

🔴 मैं मिशन के काम में रुचि लेने लगा। कुछ ही दिनों बाद मुझे पूज्य गुरुदेव से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनसे मुलाकात क्या हुई कि मैं उन्हीं का होकर रह गया। तब से लेकर आज तक मुझे गुरुवर के अनेक अनुदान- वरदान मिले हैं।

🔵 यह संस्मरण मेरे जीवन के ७१वें वर्ष का है। सन् २००६ में मैं हर समय सिर दर्द से परेशान रहा करता था। यह परेशानी जब बहुत अधिक बढ़ गई, तो मैं डॉक्टर से मिला।

🔴 डॉक्टर ने कई तरह की मशीनों से मेरे सिर की जाँच की। जाँच के बाद वह इस नतीजे पर पहुँचे कि हृदय की कुछ नाड़ियों के ब्लाक हो जाने के कारण ही हमेशा सिर दर्द बना रहता है। उन्होंने कहा कि बाईपास सर्जरी से ही इस रोग का निदान हो सकता है।

🔵 बाईपास सर्जरी की तैयारियाँ शुरू हुईं और २ अगस्त २००६ को नाडियाद, महागुजरात हास्पिटल में ऑपरेशन हुआ। पहले पसलियों को बीचो- बीच काटकर दो हिस्से में बॉँट दिया गया, फिर दिल को पसलियों से बाहर निकालकर उसका ऑपरेशन किया गया।

🔴 ऑपरेशन के बाद कटी हुई पसलियों को तार से जोड़कर पहले जैसा बनाया गया- इसे डॉक्टरों की भाषा में ‘कॉटन बाडी’ बोलते हैं। लेकिन मेरे शरीर ने इस कॉटन बाडी को स्वीकार नहीं किया। फलतः शरीर के अन्दर से रिस- रिसकर मवाद बाहर आने लगा।

🔵 डॉक्टर को दिखाने पर उन्होंने कहा कि कॉटन बाडी के कारण प्रायः ऐसा होता है। चिन्ता की कोई बात नहीं है। कुछ दिनों में अपने- आप ठीक हो जाएगा।

🔴 लेकिन छः महीने बीत जाने के बाद भी मवाद निकलना बन्द नहीं हुआ, तो डॉक्टर ने कहा कि पसली की हड्डियों को तार से बाँधने के कारण इन्फेक्शन हो गया है। अब दुबारा ऑपरेशन करके तार बाहर निकालना पड़ेगा।

🔵 २ अप्रैल २००७ को दूसरी बार ऑपरेशन हुआ। फिर से छाती खोलकर तार निकाला गया। लेकिन इतने दिनों में इन्फेक्शन हड्डियों को प्रभावित कर चुका था, इसलिए मवाद का निकलना बंद नहीं हुआ। थक हार कर अहमदाबाद के बड़े अस्पताल में पहुँचा। वहाँ के डॉक्टरों ने २० जून को तीसरा ऑपरेशन किया। वह भी असफल रहा।
      
🔴 सीनियर डॉक्टर ने मेरे बेटे को बताया कि मेरी मौत अब किसी भी क्षण हो सकती है, फिर भी अन्तिम प्रयास के रूप में एक और ऑपरेशन किया जाना चाहिए।
निराश होकर मैंने सीनियर डॉक्टर से कहा कि आप लोग अपना काम कीजिए, मैं अपना काम करूँगा। एक जूनियर डॉक्टर ने जिज्ञासावश पूछा कि आप क्या करेंगे। मैंने कहा- मैं गुरुदेव का स्मरण करूँगा और उन्होंने जो मंत्र दिया है, उसके जप की संख्या बढ़ा दूँगा। अब मैं अध्यात्म की ताकत को आजमाऊँगा।
      
🔵 ......और मैंने वैसा ही किया। सुबह से शाम तक गायत्री मंत्र का जप और रात में सोते समय गुरुदेव का ध्यान। इसी प्रकार तीन सप्ताह और बीत गए। चौथे सप्ताह में चौथे ऑपरेशन की तारीख तय हुई- १८ जुलाई। सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। मुझे ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया।
      
🔴 ऑपरेशन शुरू होने से पहले मैंने डॉक्टरों से अनुरोध किया कि वे मुझे पाँच मिनट प्रार्थना करने दें। मैंने गुरुदेव का फोटो अपने साथ रखा था। फोटो सामने रखकर उन्हें प्रणाम किया और आँखें बन्द कर मन ही मन उनसे प्रार्थना करने लगा- परम पूज्य गुरुदेव! ये डॉक्टर पता नहीं क्या- कैसे करेंगे। आप सूक्ष्म रूप से आकर इनका मार्गदर्शन कीजिए, जिससे ये सही तरीके से ऑपरेशन कर सकें और इनके सत्प्रयास से मेरी जीवन- रक्षा हो सके फिर मैं जल्दी से स्वस्थ होकर वापस घर पहुँच सकूँ।
      
🔵 तीन- चार दिन पहले श्रद्धेय डॉक्टर साहब (डॉ. प्रणव पण्ड्या)और आदरणीया जीजी (शैलबाला पण्ड्या) को चार पेज का पत्र लिखा था। उनका जवाब आया- ‘‘आपके उत्तम स्वास्थ्य के लिए हम सब प्रार्थना कर रहे हैं। आप चिन्ता मत करिए। पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद से सब कुछ ठीक हो जाएगा।’’
      
🔴 ऑपरेशन ५ घंटे तक चला। चौथी बार हर्ट का ऑपरेशन हो रहा था, इसलिए डॉक्टर्स ने प्लास्टिक सर्जरी की भी पूरी तैयारी कर रखी थी। टीम में प्लास्टिक सर्जरी के दो विशेषज्ञ डॉक्टर भी तैयार खड़े थे। लेकिन गुरुदेव की कृपा से प्लास्टिक सर्जरी करने की नौबत ही नहीं आई।
      
🔵 अगली सुबह जब बड़े डॉक्टर्स मुझे देखने आए, तो उन्होंने कहा- आपका ऑपरेशन बहुत अच्छा हुआ। सच तो यह है कि केस हिस्ट्री और आपकी हालत देखकर मैं अन्दर से घबराया हुआ था, लेकिन लगता है कि ऑपरेशन से पूर्व आपके द्वारा की गई प्रार्थना आपके इष्टदेव ने सुन ली। ऑपरेशन के दौरान मुझे लगा कि कोई बाहरी शक्ति कदम- कदम पर मेरा मार्ग- दर्शन कर रही है, हिम्मत बढ़ा रही है।
      
🔴 इतने बड़े ऑपरेशन के बाद इतनी तेजी से रिकवरी हुई कि १५ दिनों के बाद ही मुझे हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और मैं पूरी तरह से स्वस्थ होकर खुशी- खुशी घर लौट आया। तब से लेकर आज तक गुरुकृपा से मेरा स्वास्थ्य पास- पड़ोस के लोगों के लिए एक उदाहरण बना हुआ है।

🌹  दौलत भाई जीवन जी देसाई, बलसाड़ (गुजरात)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/appa

👉 मृत्यु से जीवन का अंत नहीं होता

🔴 जैसे हम फटे-पुराने या सड़े-गले कपड़ों को छोड़ देते हैं और नए कपड़े धारण करते हैं, वैसे ही पुराने शरीरों को बदलते और नयों को धारण करते रहते हैं। जैसे कपड़ों के उलट फेर का शरीर पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही शरीरों की उलट-पलट का आत्मा पर असर नहीं होता। जब कोई व्यक्ति मर जाता है तो भी वस्तुत: उसका नाश नहीं होता।

🔵 मृत्यु कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसके कारण हमें रोने या डरने की आवश्यकता पड़े। शरीर के लिए रोना वृथा है, क्योंकि वह निर्जीव पदार्थों का बना हुआ है, मरने के बाद भी वह ज्यों का त्यों पड़ा रहता है। कोई चाहे तो मसालों में लपेट कर मुद्द तों तक अपने पास रखे रह सकता है, पर सभी जानते हैं कि देह जड़ है। संबंध तो उस आत्मा से होता है जो शरीर छोड़ देने के बाद भी जीवित रहती है। फिर जो जीवित है, मौजूद है, उसके लिए रोने और शोक करने से क्या प्रयोजन?

🔴 दो जीवनों को जोड़ने वाली ग्रंथि को मृत्यु कहते हैं। वह एक वाहन है जिस पर चढ़कर आत्माएँ इधर से उधर, आती-जाती रहती हैं। जिन्हें हम प्यार करते हैं, वे मृत्यु द्वारा हमसे छीने नहीं जा सकते। वे अदृश्य बन जाते हैं, तो भी उनकी आत्मा में कोई अंतर नहीं आता। हम न दूसरों को मरा हुआ मानें, न अपनी मृत्यु से डरें, क्योंकि मरना एक विश्राम मात्र है, उसे अंत नहीं कहा जा सकता।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1948 पृष्ठ 1   
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/March/v1.1

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 100)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण
🔴 जिन साधनों की नव सृजन के लिए आवश्यकता थी, वे कहाँ से मिले, कहाँ से आएँ? इस प्रश्न के उत्तर में मार्गदर्शक ने हमें हमेशा एक ही तरीका बताया था कि बोओ ओर काटो, मक्का और बाजरा का एक बीज जब पौधा बनकर फलता है तो एक के बदले सौ नहीं वरन् उससे भी अधिक मिलता है। द्रौपदी ने किसी संत को अपनी साड़ी फाड़कर दी थी, जिससे उन्होंने लंगोटी बनाकर अपना काम चलाया था। वही आड़े समय में इतनी बनी कि उन साड़ियों के गट्ठे को सिर पर रखकर भगवान् को स्वयं भाग कर आना पड़ा। ‘‘जो तुझे पाना है, उसे बोना आरम्भ कर दे।’’ यही बीज मंत्र हमें बताया और अपनाया गया, प्रतिफल ठीक वैसा ही निकला जैसा कि संकेत किया गया।

🔵 शरीर, बुद्धि और भावनाएँ स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के साथ भगवान् सबको देते हैं। धन स्व उपार्जित होता है। कोई हाथों-हाथ कमाता है, तो कोई पूर्व संचित सम्पदा को उत्तराधिकार में पाते हैं। हमने कमाया तो नहीं था, पर उत्तराधिकार में अवश्य समुचित मात्रा में पाया। इन सबको बो देने और समय पर काट लेने के लायक गुंजायश थी, सो बिना समय गँवाए उस प्रयोजन में अपने को लगा दिया।

🔴 रात में भगवान् का भजन कर लेना और दिन भर विराट् ब्रह्म के लिए, विश्व मानव के लिए समय और श्रम नियोजित रखना, यह शरीर साधना के रूप में निर्धारित किया गया।

🔵 बुद्धि दिन भर जागने में ही नहीं, रात्रि के सपने में भी लोक मंगल की विधाएँ विनिर्मित करने में लगी रही। अपने निज के लिए सुविधा सम्पदा कमाने का ताना-बाना बुनने की कभी भी इच्छा ही नहीं हुई। अपनी भावनाएँ सदा विराट के लिए लगी रहीं। प्रेम, किसी वस्तु या व्यक्ति से नहीं आदर्शों से किया। गिरों को उठाने और पिछड़ों को बढ़ाने की ही भावनाएँ सतत उमड़ती रहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.6

👉 आज का सद्चिंतन 14 May 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 May 2017


👉 Intercession & its Significance. (Part 3)

🔴 Friends! Ignorance prevails all around in the country in the name of PUJA-PATH as also in the name of spirituality? Spirituality however was meant exclusively for bringing people, out of trap of ignorance. What has happened now? From where, has come this botheration? Ignorance on the contrary! In sharp contrast to its objective, spirituality has given undue space to ignorance. This should not have happened. Then what should be done now?
                                 
🔵 Friends! Everything becomes soft & wet when rain falls then I ask whether a rock too becomes wet or not? No sir, it does not and whether a rock can grow even a leave? No sir, it does not. It means a rock cannot grow even a leave over it simply because it cannot absorb water. That means the rock has to make it favorable to draw any advantage out of water. Things can proceed only when you understand this theory but you are of the view that you do not need to be changed and you should be the same as you are, rather BHAGWAN should change itself, BHAGWAN should change its rules, BHAGWAN should change its system and BHAGWAN should change his conditions. Why? Because what we do is—to order.

🔴 An order means a wish to be fulfilled.  A wish means an order.  You order? Are you a boss of BHAGWAN? Do you intend to order BHAGWAN? Do you wish BHAGWAN to follow you, simply because you recite hanuman-CHALISA daily and daily show incense-stick to hanuman? That is why you want that BHAGWAN should follow your guidelines. It is not possible at all. What is spirituality? Spirituality literally means that we should mould ourselves as per BHAGWAN’s wishes. We should develop such eligibility within us that we become competent enough to receive the grace & mercy of BHAGWAN which keeps raining unabatedly on us like rain from sky but we cannot take its advantage like that rock simply because of absence of eligibility.

 ====== OM SHANTI======

🌹  Finish
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 प्रभु के योग्य स्वयं बनें:-

🔵 एक राजा सायंकाल में महल की छत पर टहल रहा था. अचानक उसकी दृष्टि महल के नीचे बाजार में घूमते हुए एक सन्त पर पड़ी. संत तो संत होते हैं, चाहे हाट बाजार में हों या मंदिर में अपनी धुन में खोए चलते हैं।

🔴 राजा ने महूसस किया वह संत बाजार में इस प्रकार आनंद में भरे चल रहे हैं जैसे वहां उनके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं. न किसी के प्रति कोई राग दिखता है न द्वेष।

🔵 संत की यह मस्ती इतनी भा गई कि तत्काल उनसे मिलने को व्याकुल हो गए।

🔴 उन्होंने सेवकों से कहा इन्हें तत्काल लेकर आओ।

🔵 सेवकों को कुछ न सूझा तो उन्होंने महल के ऊपर ऊपर से ही रस्सा लटका दिया और उन सन्त को उस में फंसाकर ऊपर खींच लिया।

🔴 चंद मिनटों में ही संत राजा के सामने थे. राजा ने सेवकों द्वारा इस प्रकार लाए जाने के लिए सन्त से क्षमा मांगी. संत ने सहज भाव से क्षमा कर दिया और पूछा ऐसी क्या शीघ्रता आ पड़ी महाराज जो रस्सी में ही खिंचवा लिया!

🔵 राजा ने कहा- एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं अचानक ऐसा बेचैन हो गया कि आपको यह कष्ट हुआ।

🔴 संत मुस्कुराए और बोले- ऐसी व्याकुलता थी अर्थात कोई गूढ़ प्रश्न है. बताइए क्या प्रश्न है।

🔵 राजा ने कहा- प्रश्न यह है कि भगवान् शीघ्र कैसे मिलें, मुझे लगता है कि आप ही इसका उत्तर देकर मुझे संतुष्ट कर सकते हैं ? कृपया मार्ग दिखाएं।

🔴 सन्त ने कहा‒‘राजन् ! इस प्रश्न का उत्तर तो तुम भली-भांति जानते ही हो, बस समझ नहीं पा रहे. दृष्टि बड़ी करके सोचो तुम्हें पलभर में उत्तर मिल जाएगा।

🔵 राजा ने कहा‒ यदि मैं सचमुच इस प्रश्न का उत्तर जान रहा होता तो मैं इतना व्याकुल क्यों होता और आपको ऐसा कष्ट कैसे देता. मैं व्यग्र हूं. आप संत हैं. सबको उचित राह बताते हैं।

🔴 राजा एक प्रकार से गिड़गिड़ा रहा था और संत चुपचाप सुन रहे थे जैसे उन्हें उस पर दया ही न आ रही हो. फिर बोल पड़े सुनो अपने उलझन का उत्तर।

🔵 सन्त बोले- सुनो, यदि मेरे मन में तुमसे मिलने का विचार आता तो कई अड़चनें आतीं और बहुत देर भी लगती. मैं आता, तुम्हारे दरबारियों को सूचित करता. वे तुम तक संदेश लेकर जाते।

🔴 तुम यदि फुर्सत में होते तो हम मिल पाते और कोई जरूरी नहीं था कि हमारा मिलना सम्भव भी होता या नहीं।

🔵 परंतु जब तुम्हारे मन में मुझसे मिलने का विचार इतना प्रबल रूप से आया तो सोचो कितनी देर लगी मिलने में?

🔴 तुमने मुझे अपने सामने प्रस्तुत कर देने के पूरे प्रयास किए. इसका परिणाम यह रहा कि घड़ी भर से भी कम समय में तुमने मुझे प्राप्त कर लिया।

🔵 राजा ने पूछा- परंतु भगवान् के मन में हमसे मिलने का विचार आए तो कैसे आए और क्यों आए?

🔴 सन्त बोले- तुम्हारे मन में मुझसे मिलने का विचार कैसे आया?

🔵 राजा ने कहा‒ जब मैंने देखा कि आप एक ही धुन में चले जा रहे हैं और सड़क, बाजार, दूकानें, मकान, मनुष्य आदि किसी की भी तरफ आपका ध्यान नहीं है, उसे देखकर मैं इतना प्रभावित हुआ कि मेरे मन में आपसे तत्काल मिलने का विचार आया।

🔴 सन्त बोले- यही तो तरीका है भगवान को प्राप्त करने का. राजन् ! ऐसे ही तुम एक ही धुन में भगवान् की तरफ लग जाओ, अन्य किसी की भी तरफ मत देखो, उनके बिना रह न सको, तो भगवान् के मन में तुमसे मिलने का विचार आ जायगा और वे तुरन्त मिल भी जायेंगे।

👉 आत्मविश्वास की साधना

🔵 जीवन को उन्मुख होकर संसार की लहरों में बहने दीजिए। कभी लहर आप पर होकर गुजरेगी, कभी आप लहरों पर उतराएँगे। लेकिन समुद्र की गोद में उसकी तरंगों से खेलने का साहस-आत्मविश्वास आप में जाग्रत् होगा। जो अकेलेपन अथवा पानी में डूब जाने के भय से पानी में उतरता ही नहीं, जो इसी सोच-विचार में पड़ा रहता है क्या करूँ? कैसे करूँ? मैं मंजिल तक कैसे पहुँचूँगा? वह कुछ नहीं कर पाता, उसका विश्वास मर जाता है। किसी भी कार्य में लगने से पूर्व जिनके संकल्प अधूरे रहते हैं, जो संशय में पड़े रहते हैं, वे कोई बड़े काम नहीं कर पाते और कुछ करते हैं, तो उसमें असफल ही होते हैं, जिसके कारण उनका रहा-सहा विश्वास भी मर जाता है।

🔴 आत्मविश्वास की ज्योति प्रज्वलित करने के लिए उस कार्य में प्राणपण से जुट जाइए, जो आपको हितकर लगता है। जिसे आप अच्छा समझते हैं, उस काम को अपने जीवन का, स्वभाव का अभिन्न अंग बना लीजिए। इससे आपके विश्वास को बल मिलेगा लेकिन इस मार्ग में एक खतरा है- वह है सफलता-असफलता में अपना सन्तुलन खो बैठना। इसके लिए आवश्यक है कि आप सफलता-असफलता को गौण मानकर उस कार्य को प्रधान मानें। कर्म की यह निरन्तर साधना ही आप में विश्वास का अविरल स्रोत खोज निकालेगी। अपने आपको भाग्यशाली-महत्त्वपूर्ण समझने वालों को संसार भी रास्ता देता है। यह भावना अपने हृदय में कूट-कूट कर भर लें कि आपको किसी महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही धरती पर भेजा गया है। आप अवश्य उस काम को करेंगे। इसी महान् श्रद्धा के बल पर आप क्या से क्या बन सकते हैं। इसी तरह के किसी महान् आदर्श को, मिशन को अपनी श्रद्धा का आधार बना लें। इस तरह की बलवती श्रद्धा आपके विश्वास को परिपुष्ट करेगी। विश्वास उनका मर जाता है, जिनके जीवन में कोई आदर्श नहीं, श्रद्धा का कोई आधार नहीं।
  
🔵 समाज की, संसार की, घर-परिवार, पड़ोस की, राष्ट्र की, किसी महान् कार्य की जो कोई भी जिम्मेदारियाँ आप पर आएँ, उन्हें सहर्ष स्वीकार कीजिए। जिम्मेदारियों को अपने कन्धे पर उठाने का संकल्प ही विश्वास की साधना का आधा काम पूरा कर देता है। स्मरण रखिए, संसार में ऐसा कोई भी काम नहीं, जिसे आप न कर सकते हों। फिर जिम्मेदारियों से क्यों डरते हैं, क्यों झिझकते हैं? इसलिए जिम्मेदारियों को निभाना सीखिए। काम करने से ही अपनी कर्मठता, अपनी शक्तियों पर विश्वास होता है।

🔴 लोगों की आलोचना से तनिक भी विचलित हुए बिना कार्य करते रहना, निर्भय होकर अपने आदर्शों को क्रियान्वित करते चलना ही आपको शोभा देता है। जीवन का आशाभरा रंगीन चित्र अपनी कल्पनाओं के पटल पर बनाइए। ध्यान रखिए-आत्मविश्वास की साधना से सृष्टि का वैभव ही नहीं, स्रष्टा के प्रेम को भी पाया जा सकता है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 67

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 May

🔴 हम अपने आपको प्यार करें ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अन्तःकरण को प्यार से ओत-प्रोत कर लिया, जिसके चिन्तन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ा है ईश्वर का प्यार केवल उसी को मिलेगा, जो दीपक की तरह जलकर प्रकाश उत्पन्न करने को तैयार है, प्रभु की ज्योति का अवतरण उसी पर होगा।” 

🔵 आत्म विश्वास न हो तो व्यक्ति को पराधीनता की ही बात सूझती है। वह दूसरों के ही शिकंजे में कसा रहता है। कठपुतली की तरह जिस-तिस के इशारे पर नाचता रह सकता है। किन्तु जिन्हें अपनी शक्ति का ज्ञान है, अपने ऊपर भरोसा है, उन्हें दूसरों की चिन्ता नहीं करनी पड़ती। वे सहयोग दें या असहयोग करें, साथियों के साथ वह बंधा रहकर या तो उनको अनुकूल बना लेता है या अपने लिए दूसरा रास्ता बना लेता है।                
                                                   
🔴 लोगों की आँखों से हम दूर हो सकते हैं, पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आँखों में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनाएँ हैं, उन सबकी तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जायेंगे और उन देव प्रतिमाओं पर निरन्तर आँसुओं का अध्र्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते उऋण होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा या नहीं, पर यदि मिला तो अपनी इन देवप्रतिमाओं को अलंकृत और सुसज्जित करने में कुछ उठा न रखेंगे। लोग हम भूल सकते हैं, पर हम अपने किसी स्नेही को नहीं भूलेंगे।      

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी की महानता को समझें (अन्तिम भाग)

🔵 राम के जीवन से सीता को निकाल देने पर रामायण पीछे नहीं रहता। द्रौपदी, कुन्ती, गाँधारी आदि का चरित्र काल देने पर महाभारत की महान गाथा कुछ नहीं रहती, पाण्डवों का जीवन संग्राम अपूर्ण रह जाता है। शिवजी के साथ पार्वती, कृष्ण के साथ राधा, राम के साथ सीता, विष्णु के साथ लक्ष्मी का नाम हटा दिया जाय तो इनके लीला, गाथा चरित्र अधूरे रह जाते हैं।

🔴 प्राचीन काल से नारियाँ घर गृहस्थी को ही देखती नहीं आ रही, समाज, राजनीति, धर्म, कानून, न्याय सभी क्षेत्रों में वे पुरुष की संगिनी ही नहीं रही वरन् सहायक, प्रेरक भी रही हैं। उन्हें समाज में पूजनीय स्थान दिया गया है। महाराज मनु ने तो अपनी प्रजा से कहा था।

🔵 ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः।’

जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। क्योंकि समाज में नारी को समान, पूज्य-स्थान देकर जब उसे पुरुष का सहयोगी, सहायक बना लिया जाता है तो ही समृद्धि, यश, वैभव बढ़ते हैं, जिससे सुख, शाँति, आनन्दपूर्ण जीवन बिताया जा सकता है।

🔴 इसमें कोई संदेह नहीं कि नारी का सहयोग मानव जीवन में उन्नति, प्रगति, विकास के लिए आवश्यक है, अनिवार्य है। वह समाज उन्नति नहीं कर सकता, जहाँ स्त्री जो मानव-जीवन का अर्द्धांग ही नहीं एक बहुत बड़ी शक्ति है, को सामाजिक अधिकारों से वंचित कर उसे लुँज-पुँज एवं पद-दलिता बना कर रखा जाता है।

🔵 आवश्यकता इस बात की है कि हम नारी को समाज से वही प्रतिष्ठा दें, जिसकी आज्ञा हमारे ऋषियों ने, मनीषियों ने दी है। उसे जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ावें। हम देखेंगे कि नारी अबला, असहाय न रहकर शक्ति सामर्थ्य की मूर्ति बनेगी। वह जीवन यात्रा में हमारे लिए बोझा न रहकर हमारी सहायक, सहयोगिनी सिद्ध होगी। तब हमें उसके भविष्य के संबंध में चिन्तित न होना पड़ेगा। वह अपनी रक्षा करने में स्वयं समर्थ होगी। अपना निर्वाह करने में समर्थ होगी। हमारे सामाजिक जीवन की यह एक बहुत महत्वपूर्ण माँग है कि सदियों से घर बाहर दीवारी में गंदे पर्दे, बुर्के की ओट में छिपी हुई पराश्रिता, परावलम्बी, अशिक्षित, अन्धविश्वास ग्रस्त, संकीर्ण स्वभाव नारी को वर्तमान दुर्दशा से उभारें। उसे समानता, स्वतंत्रता की मानवोचित सुविधा प्रदान करें। उसे शिक्षित, स्वावलम्बी, सुसंस्कृत एवं योग्य बनावें। तभी वह हमारे विकास में सहायक बन सकेगी। भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करने में योग दे सकेगी।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 40

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 1)

👉 युग निर्माण मिशन का घोषणा-पत्र

🔵 युग निर्माण जिसे लेकर गायत्री परिवार अपनी निष्ठा और तत्परतापूर्वक अग्रसर हो रहा है, उसका बीज सत्संकल्प है। उसी आधार पर हमारी सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम संचालित होते हैं, इसे अपना घोषणा-पत्र भी कहा जा सकता है। हम में से प्रत्येक को एक दैनिक धार्मिक कृत्य की तरह इसे नित्य प्रातःकाल पढ़ना चाहिए और सामूहिक शुभ अवसरों पर एक व्यक्ति उच्चारण करें और शेष लोगों को उसे दुहराने की शैली से पढ़ा जाना चाहिए।

🔴 संकल्प की शक्ति अपार है। यह विशाल ब्रह्माण्ड परमात्मा के एक छोटे संकल्प का ही प्रतिफल है। परमात्मा में इच्छा उठी ‘एकोऽहं बहुस्याम’ मैं अकेला हूँ-बहुत हो जाऊँ, उस संकल्प के फलस्वरूप तीन गुण, पंचतत्त्व उपजे और सारा संसार बनकर तैयार हो गया। मनुष्य के संकल्प द्वारा इस ऊबड़-खाबड़ दुनियाँ को ऐसा सुव्यवस्थित रूप मिला है। यदि ऐसी आकांक्षा न जगी होती, आवश्यकता अनुभव न होती तो कदाचित् मानव प्राणी भी अन्य वन्य पशुओं की भाँति अपनी मौत के दिन पूरे कर रहा होता।

🔵 इच्छा जब बुद्धि द्वारा परिष्कृत होकर दृढ़ निश्चय का रूप धारण कर लेती है, तब वह संकल्प कहलाती है। मन का केन्द्रीकरण जब किसी संकल्प पर हो जाता है, तो उसकी पूर्ति में विशेष कठिनाई नहीं रहती। मन की सामर्थ्य अपार है, तो सफलता के उपकरण अनायास ही जुटते चले जाते हैं। बुरे संकल्पों की पूर्ति के लिए भी जब साधन बन जाते हैं, तो सत्संकल्पों के बारे में तो कहना ही क्या है? धर्म और संस्कृति को जो विशाल भवन मानव जाति के सिर पर छत्रछाया की तरह मौजूद है, उसका कारण ऋषियों का सत्संकल्प ही है। संकल्प इस विश्व की सबसे प्रचंड शक्ति है। विज्ञान की शोध द्वारा अगणित प्राकृतिक शक्तियों पर विजय प्राप्त करके वशवर्ती बना लेने का श्रेय मानव की संकल्प शक्ति को ही है। शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, उद्योग, साहित्य, कला, संगीत आदि विविध दिशाओं में जो प्रगति हुई आज दिखाई पड़ती है, उसके मूल में मानव का संकल्प ही सन्निहित है, इसे प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष कह सकते हैं। आकांक्षा को मूर्त रूप देने के लिए जब मनुष्य किसी दिशा विशेष में अग्रसर होने के लिए दृढ़ निश्चय कर लेता है तो उसकी सफलता में संदेह नहीं रह जाता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी की महानता को समझें (भाग 3)

🔵 नारी की प्रकट कोमलता, सहिष्णुता को पुरुष ने कई बार उसकी निर्बलता का चिन्ह मान लिया है और इसलिए उसे अबला कहा है। किन्तु वह यह नहीं जानता कि कोमलता, सहिष्णुता के अंक में ही मानव जीवन की स्थिति संभव है। क्या माँ के सिवा संसार में ऐसी कोई हस्ती है जो शिशु की सेवा, उसका पालन-पोषण कर सके। संसार में जहाँ-जहाँ भी चेतना साकार रूप में मुखरित हुई है उसका एक मात्र श्रेय नारी को ही है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी समाज की निर्मात्री शक्ति है, वह समाज का धारण, पोषण करती है संवर्धन करती है।

🔴 नारी अपने विभिन्न रूपों में सदैव मानव जाति के लिए त्याग, बलिदान, स्नेह, श्रद्धा, धैर्य, सहिष्णुता का जीवन बिताती है। माता-पिता के लिए आत्मीयता, सेवा की भावना जितनी पुत्री में होती है उतनी पुत्र में नहीं होती। पराये घर जाकर भी पुत्री अपने माँ-बाप से जुदा नहीं हो सकती। उसमें परायापन नहीं आता, उसके हृदय में वही सम्मान, सेवा की भावना भरी रहती है जैसी बचपन में थी। भाई-बहिन का नाता कितना आदर्श, कितना पुण्य-पवित्र है। भाई-भाई परस्पर जुदा हो सकते हैं एक दूसरे का अहित कर सकते हैं किन्तु भाई-बहिन जीवन पर्यन्त कभी विलग नहीं हो सकते। बहन जहाँ भी रहेगी अपने भाई के लिए शुभ कामनायें, उसके भले के लिए प्रयत्न करती रहेगी। माँ तो माँ ही है। पुत्र की हित चिन्ता, उसका भला, लाभ हित सोचने वाली माँ के समान संसार में और कोई नहीं है। संसार के सब लोग मुँह मोड़ लें किन्तु एक माँ ही ऐसी है जो अपने पुत्र के लिए सदा सर्वदा सब कुछ करने के लिए तैयार रहती है।

🔵 पत्नी के रूप में नारी मनुष्य की जीवन संगिनी ही नहीं होती वह सब प्रकार से पुरुष का हित-साधन करती है। शास्त्रकार ने भार्या को छः प्रकार से पुरुष के लिए हित-साधक बतलाया है-

कार्य्येषु मन्त्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, रमणेषु रम्भाः
धर्मानुकूला, क्षमाया धरित्री, भार्या च षड्गुण्यवती च दुर्लभा॥


🔴 ‘कार्य में मंत्री के समान सलाह देने वाली, सेवादि में दासी के समान काम करने वाली, भोजन कराने में माता के समान पथ्य देने वाली, आनन्दोपभोग के लिए रम्भा के समान सरस, धर्म और क्षमा को धारण करने में पृथ्वी के समान-क्षमाशील ऐसे छः गुणों से युक्त स्त्री सचमुच इस विश्व का एक दुर्लभ रत्न है।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 ~अखण्ड ज्योति जून 1964 पृष्ठ 40
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/June/v1.40

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 May

🔴 “ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए। अपने आपसे ही प्रार्थना करें कि कुचाल छोड़े। मन को मना लिया- आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।”

🔵 “गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूले को राह बताना और जो अशान्त हो रहा है, उसे शान्तिदायक स्थान पर पहुँचा देना। यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुःख और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हैं और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं तो समझना चाहिए यह कृत्य ईश्वर के लिए- उसकी प्रसन्नता के लिए ही किये जा रहे हैं। दूसरों की सेवा सहायता अपनी ही सेवा सहायता है।”                  
                                                   
🔴 “प्रार्थना उसी की सार्थक है जो आत्मा को परमात्मा में घुला देने के लिए व्याकुलता लिए हुए हो। जो अपने को परमात्मा जैसा महान बनाने के लिए तड़पता है- जो प्रभु को जीवन के कण-कण में घुला लेने के लिए बेचैन है। जो उसी का होकर जीना चाहता है उसी को भक्त कहना चाहिए। दूसरे तो विदूषक हैं। लेने के लिए किया हुआ भजन वस्तुतः प्रभु प्रेम का निर्मम उपहास है। भक्ति में तो आत्म समर्पण के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। वहाँ देने की ही बात सूझती है लेने की इच्छा ही कहाँ रहती है?” 

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मनुष्य जीवन की सच्ची शोभा

🔵 जमीन फाड़ती है, पत्थरों से टकराती है तब कहीं नदी आगे बढ़ती है और अपने अस्तित्व की रक्षा कर पाती है। मुलायम मिट्टी के बिछौने में पड़ा हुआ बीज यदि ऊपर ढँके ढेलों को ढकेलने की हिम्मत नहीं दिखलाता, तो बीज से वृक्ष बनने का गौरव उसे कैसे मिल पाता? आगे बढ़ने वाली जातियों का इतिहास जिन्होंने भी ध्यानपूर्वक पढ़ा है, तो यही पाया है कि उन्नति के शिखर के लिए उन्हें संघर्ष के बीच बढ़ना और रास्ता बनाना पड़ा और यह सिद्ध करना पड़ा कि बाधाओं के मुकाबले उनका साहस और संघर्ष की शक्ति चुक नहीं सकती। तब कहीं उन्हें सफलता का राजसिंहासन मिल पाया।

🔴 सच्चे अर्थों में जीवित वही है जो अत्याचार से लड़ सकता है। अन्याय और अनीति से टकरा सकता है, रोष प्रदर्शित कर सकता है। सामने अनीति होती रहे और चुपचाप खड़े देखते रहें, यह कायरता का प्रमुख चिह्न है। वीरतापूर्वक जीने की नीति में ही मानवीय प्रगति का आधार छिपा हुआ है। हमें दुनिया की जिन्दादिल कौम की तरह अपना वर्चस्व बनाए रखना है, तो इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं कि हम भीतर और बाहर की बुराइयों से लड़ने के लिए एक तत्पर सिपाही की भाँति अपना प्रत्येक मोर्चा मजबूत बनाएँ और आज से, अभी से अनीति को मिटाने में जुट जाएँ।

🔵 आगे बढ़ने की इच्छा और नए जन्म में कोई अन्तर नहीं है। अन्तरात्मा कहे कि उन्नति करनी चाहिए, तो यह समझना चाहिए कि तुम्हारी जीवनी-शक्ति अदम्य साहस और विश्वास से ओत-प्रोत है। अब एक ही बात शेष रहती है, वह यह कि उठो और बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ चलो। फिर जब तक मंजिल नहीं मिल जाती, संघर्ष का सम्बल मत छोड़ो। वीर और विजयी की भाँति मुश्किलों से टकराते हुए आगे बढ़ते ही चले जाओ।

🔴 साहसी व्यक्तियों को शक्ति उधार नहीं माँगनी पड़ती, उनका अन्तरात्मा ही उन्हें बल प्रदान करता है। नीति के पथ पर बढ़ने वाले को ईश्वर का विश्वास और उसका अनुग्रह काफी है। ऐसा व्यक्ति जब बुराइयों को, अन्धपरम्पराओं को और सामाजिक कुण्ठाओं को रौंदता हुआ आगे बढ़कर चल पड़ता है, तो उसका अनुसरण करने वाले अपने आप उपज पड़ते हैं। फिर संसार की कोई शक्ति उसे पराजित करने में समर्थ नहीं होती।

🔵 एक बात याद रखने की है, वह यह कि सच्चाई और ईमानदारी से प्रेरित संघर्ष ही स्थायी प्रगति का आधार है। अकेला संघर्ष ही काफी नहीं, उसमें सत्य का समन्वय होगा, तो ही भीतरी शक्ति का आशीर्वाद मिलेगा।

🔴 अन्याय एक चुनौती है, जो इन्सान की इन्सानियत को ललकारती है। उसका उत्तर कोई डरपोक और कायर नहीं दे सकता। उस बेचारे को अपने स्वार्थ, अपने प्रलोभनों से ही मुक्ति कहाँ? पर जिनमें मनुष्यता शेष है, वे अनीति और अन्याय के प्रतिकार के लिए जान की बाजी लगाते हैं। मनुष्य जीवन की सच्ची शोभा भी यही है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 13 May 2017


👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...