बुधवार, 8 अगस्त 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 23)

👉 प्रतिभा संवर्धन का मूल्य भी चुकाया जाए
  
🔶 गाँधी युग में जो सत्याग्रही उभरकर आगे आए वे स्वतंत्रता सेनानी कहलाये, यशस्वी बने। ताम्रपत्र, पेंशन और आवागमन के मुफ्त पास प्राप्त करने के लाभों से गौरवान्वित हुए। जो उनमें वरिष्ठ और विशिष्ट थे, वे देश का शासन सूत्र संचालन करने वाले मूर्द्धन्य बने। बापू के संपर्क में रहे नेहरू, पटेल जैसे अनेकों रत्न ऐसे हैं जिनके स्मारकों को नमन किया जाता है। इतिहास के पृष्ठों पर यशोगाथा पढ़कर भाव-विभोर हुआ जाता है। यह उनकी प्रचंड प्रतिभा का प्रतिफल मात्र है। यदि वे संकीर्ण स्वार्थ परायणों की तरह अपने मतलब से ही मतलब रखते, तो मात्र कुछ सुख-साधनों से मन बहला पाते, प्रकाश स्तंभ बनने के सुयोग सौभाग्य से तो उन्हें वंचित ही रहना पड़ता। जो उन दिनों कृपणता धारण किए रहे वे अग्रगामियों के साथ अपनी तुलना करने पर ‘माया मिली न राम’ वाली अपनी मूर्खता पर पश्चाताप ही करते रहते हैं, पर बीता हुआ समय पुनः लौटता कहाँ है?

🔷 बुद्ध, गाँधी, दयानंद, विवेकानंद, बिनोवा जैसों की महान उपलब्धियाँ स्मरण करके हर विचारशील का अंत:करण उमंगता है कि यदि उन्हें ऐसा ही श्रेय मिल सका होता तो कितना अच्छा होता। उस अवसर को गँवाकर वे जिस ललक-लिप्सा की पूर्ति का दिवा-स्वप्न देखते रहते हैं, उसे भी कौन साकार कर पाता है? तृष्णा मरते समय तक प्रौढ़ ही बनी रहती है। शेखचिल्लियों का समुदाय कुबेर जैसा धनाढ्य और इंद्र जैसा प्रतापी बनने के सपने देखता है, पर अब निष्कर्ष की बेला में मात्र इतना ही प्रतीत होता है कि कोल्हू के बैल की तरह पिलते और पिसते हुए समय बीतता गया। श्मशान के भूत-पलीत की तरह डरते और डराते रहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगा।
  
🔶 भाग्यवान वे हैं, जिन्होंने आदर्शों के साथ रिश्ता जोड़ा, महानता का मार्ग अपनाया और ऐसा कुछ कर दिखाया, जिसका अनुकरण करते हुए असंख्यों को गौरव-गरिमा का लक्ष्य प्रदान करने वाला ऊर्जा भरा प्रकाश उपलब्ध होता रहे। मूर्खता और बुद्धिमत्ता के चयन के लिए इसी चौराहे पर सही निर्णय करने का अवसर है। वैसा अवसर सुयोग भी इन्हीं दिनों है, जिसका लाभ भगीरथ और अर्जुन ने अपनी उदात्त साहसिकता के बदले खरीदा था। वरदान अनायास ही किसी को कहाँ मिलते हैं? देवता कुपात्रों और असमर्थों पर कृपा कहाँ करते हैं। पात्रता की गहराई रहने पर ही वर्षा का पानी विशाल जलाशय के रूप में लहराता है।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 30

👉 Two powers influencing human life

🔶 Religion and politics are the two main factors influencing human life at large. One offers zeal and the other awes with authority. One influences the outer worldly life of the masses while the other have an effect on the very depth of their inner being, thus giving them vision and direction. Both are immensely powerful having an extraordinary influence in their own respective field.The aforesaid comparison is not meant to prove or disprove which one of them is weak or strong, useful or useless. Both are in fact complementary to one another. Each one of them can facilitate the success of the other even though they work in their own discreet fields.

🔷 Humanity suffers when both of them happen to be at odds with one another. Harmony between religion and politics can indeed do wonder to humanity. Unfortunately, such harmony is lacking these days.

🔶 Even though both are complementary to each other, religion remains to be of greater importance as it influences the inner core of human being which then produces corresponding outside physical situations. Therefore, we should rely on dharma to educate and bring worthy changes in the hearts and minds of the masses rather than pleading help from the government administration which should be better left alone to get on with its duty of serving people in the physical field. We should utilise dharma more than ever to educate mind of the masses to rouse, guide, improve and excel their thoughts and feelings. The great luminaries who have been able to transform the world actually came from from the world of dharma

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darsana, swarupa va karyakrama Vangmay 66 Page 1.1

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 3)

🔶 यह संसार एक कर्म भूमि है, व्यायामशाला है, विद्यालय है जिसमें प्रविष्ट होकर प्राणी अपनी आन्तरिक प्रतिभा को विकसित करता है और यह विकास ही अन्ततः आत्म कल्याण के रूप में परिणत हो जाता है। यह दुनियाँ भव बन्धन भी है, माया पाश भी है, नरक भी है, पर है उन्हीं के लिए जिनकी मनोभूमि अस्त-व्यस्त है जिनको जिन्दगी जीने की कला का ज्ञान नहीं है। सब के लिए यह दुनियाँ कुरूप नहीं है। दर्पण की तरह यह केवल उन्हें ही कुरूप दिखाई देती है जिनका अपना चेहरा बिगड़ा हुआ है।

🔷 महात्मा इमर्सन कहा करते थे, “मुझे नरक में भेज दो, मैं अपने लिए वही स्वर्ग बना लूँगा।” वे जानते थे कि दुनियाँ में चाहे कितनी ही बुराई और कमी क्यों न हो यदि मनुष्य स्वयं अपने आपको सुसंस्कृत बना ले तो उन बुराइयों की प्रतिक्रिया से बच सकता है। मोटर की कमानी-स्प्रिंग-बढ़िया हो तो सड़क के खड्डे उसको बहुत दचके नहीं देते। कमानी के आधार पर वह उन खड्डों की प्रतिक्रिया को पचा जाता है। सज्जनता में भी ऐसी ही विशेषता है, वह दुर्जनों को नंगे रूप में प्रकट होने का अवसर बहुत कम ही आने देती है। गीली लकड़ी को एक छोटा अंगारा जला नहीं पाता वरन् बुझ जाता है, दुष्टता भी सज्जनता के सामने जाकर हार जाती है।

🔶 फिर सज्जनता में एक दूसरा गुण भी तो है कि कोई परेशानी आ ही जाय तो उसे बिना सन्तुलन खोये, एक तुच्छ सी बात मानकर हँसते खेलते सहन कर लिया जाता है। इन विशेषताओं से जिसने अपने आपको अलंकृत कर लिया है उसका यह दावा करना उचित ही है कि “मुझे नरक में भेज दो मैं अपने लिए वही स्वर्ग बना लूँगा।” सज्जनता अपने प्रभाव से दुर्जनों पर भी सज्जनता की छाप छोड़ती ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून 1961 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.6

👉 मानव-जीवन को प्रभावित करने वाले दो आधार

🔶 धर्मतंत्र और राजतंत्र, दो ही मानव-जीवन को प्रभावित करने वाले आधार हैं। एक उमंग पैदा करता है तो दूसरा आतंक प्रस्तुत करता है। एक जन-साधारण के भौतिक जीवन को प्रभावित करता है और दूसरा अन्त:करण के मर्मस्थल को स्पर्श करके दिशा और दृष्टि का निर्धारण करता है। दोनों की शक्ति असामान्य है। दोनों का प्रभाव अपने-अपने क्षेत्र में अद्भुत है।

🔷 दोनों की तुलना यहाँ इस दृष्टि से नहीं की जा रही कि इसमें कौन कमजोर है; कौन बलवान; कौन महत्त्वपूर्ण है; कौन निरर्थक। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का क्षेत्र बॅंटा हुआ होते हुए भी वस्तुत: एक के द्वारा दूसरे के सफल प्रयोजन होने में सहायता मिलती है।

🔶 दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में चलें तो जनसाधारण को हानि ही उठानी पड़ती है। राज-सत्ता अपने हाथ में नहीं, वह दूसरों के हाथ में है। धर्म और राजनीति का समन्वय हो सका तो उसका परिणाम अति सुखद होता, पर आज की स्थिति में वह कठिन है। भले ही दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, फिर भी धर्मतंत्र का महत्व राजतंत्र से ऊपर ही है, क्योंकि अन्तरंग जीवन के अनुरूप ही भौतिक परिस्थिति में हेर-फेर होता है। अस्तु, भावनात्मक नवनिर्माण के लिए हमें राजसत्ता का सहारा टटोलने की अपेक्षा धर्मसत्ता का ही आश्रय लेना चाहिए। सरकार को अपने अन्य भौतिक उत्तरदायित्व निर्वाहों के लिए छुट्टी देनी चाहिए। हमें जन-मानस को स्पर्श करने के लिए विशेष रूप से धर्म-सत्ता का ही उपयोग करना होगा। उसके माध्यम से जनभावनाओं को जगाया, मोड़ा, सुधारा और उठाया जा सकता है। संसार को पलटकर रख देने वाले महामानव धर्मक्षेत्र के उद्यान में ही उपजे हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-वांग्मय 66 पृष्ठ 1.1

👉 बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही

🔶 कोई भी छोटा-बड़ा काम करो तो तुम ये कभी मत समझना की ये मैं कर रहा हुं या उसे अपने नाम से कभी मत रखना!

🔷 एक धार्मिक स्थान पर एक सेठ जी भंडारा करते थे एक बार एक संत श्री वहाँ प्रसाद ग्रहण करने आये तो उन्होने देखा की सेठजी के मन मे अहंकार का उदय हो रहा है तो उन्होने कहा सेठजी बिना उसकी कृपा के हम कुछ भी नही कर सकते है और तो बहुत दुर की बात जौगर उसकी कृपा न हो तो खिलाना तो बहुत दुर की बात सामने परोसी हुई थाली अरे थाली क्या हाथ मे लिया ग्रास भी हाथ मे रह जाता है

🔶 सेठजी आप यही सोचना की दाने दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम अरे ये तो उसकी महानता है जो कर तो वो रहा है और नाम हमें दे रहा है! सेठजी जो काम रामजी को करना है वो तो वो करेंगे आप तो ये समझना की उन्होने इस धर्म-कर्म के लिये मुझे चुना है यही मेरा परम सौभाग्य है!

🔷 सन्त श्री तो कहकर चले गये पर सेठजी को ये हज़म नही हुआ की दाने दाने पर भी भला खाने वाले का नाम लिखा होता है क्या? सेठजी को भूख लग रही थी वो भण्डार कक्ष मे गये एक थाली मे भोजन लिया और मन मे सोचने लगे की इस भोजन पर मेरा नाम लिखा है देखता हुं की मुझे कौन रोकता है सेठजी ने जैसै ही पहला ग्रास हाथ मे लिया तो दुसरे हाथ मे जो फोन था उसपे घंटी बजी फोन उठाया तो उन्हे सूचना मिली की बेटे का एक्सीडेंट हो गया और वो हॉस्पिटल मे भर्ती है सेठजी तत्काल रवाना हुये।

🔶 हॉस्पिटल मे सेठजी की पत्नी ने कहा की बेटा अब ठीक है बेटे को कुशल मंगल देखकर वही बैठे पत्नी के हाथ में चावल का एक दोना था तो सेठजी भूख से व्याकुल थे उन्होंने दोना लिया और चावल खाने लगे खाने के बाद सेठजी ने पूछा अरे तुमने खाया या नही तो पत्नी ने कहा की लेकर तो मैं अपने लिये ही लाई थी पर शायद इस प्रसाद पर रामजी ने आपका नाम लिखा था!

🔷 अब सेठजी को सन्त श्री की वो सारी बाते याद आई और फिर जीवन मे कभी उन्होने अपने नाम से कुछ भी न चलाया सब रामजी के नाम से चलाया!

🔶 मित्रों, जिन्दगी मे ये सदा याद रखना की यदि कोई अच्छा कार्य, विशेष कार्य अथवा कोई शुभ-कर्म सम्पन्न हो जाये तो ये कभी न सोचना की मैं कर रहा हुं बस यही सोचना की मेरे राम मुझसे करवा रहे है और जिसने भी ये समझने की भुल की कि मैं कर रहा हुं, मैं हुं वो रामजी से दुर हो गया यदि रामजी का सामीप्य चाहते हो तो हमेशा यही समझना कि मैं नही कर रहा हुं मैं नही हुं जो कुछ भी है वो सियाराम है और वही मुझसे करवा रहे है वो मुझे निमित्त बना रहे है और मैं सिर्फ एक निमित्त हुं इससे ज्यादा और कुछ भी नही !

"निज चरणन की भक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
वाणी मे भी शक्ति हॆ नाथ मुझे दे दो
तेरी सेवा मिलती रहे इतनी सी कृपा कर दो "

👉 आज का सद्चिंतन 8 August 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 August 2018


👉 यह भी नहीं रहने वाला 🙏🌹

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका। आनंद ने साध...