सोमवार, 6 अगस्त 2018

👉 माता-पिता का साया

🔶 एक पिता ने अपने पुत्र की बहुत अच्छी तरह से परवरिश की! उसे अच्छी तरह से पढ़ाया, लिखाया, तथा उसकी सभी सुकामनांओ की पूर्ती की! कालान्तर में वह पुत्र एक सफल इंसान बना और एक मल्टी नैशनल कंपनी में सी.ई.ओ. बन गया! उच्च पद, अच्छा वेतन, सभी सुख सुविधांए उसे कंपनी की और से प्रदान की गई!

🔷 समय गुजरता गया उसका विवाह एक सुलक्षणा कन्या से हो गया, और उसके बच्चे भी हो गए । उसका अपना परिवार बन गया! पिता अब बूढा हो चला था! एक दिन पिता को पुत्र से मिलने की इच्छा हुई और वो पुत्र से मिलने उसके ऑफिस में गया.....!!!

🔶 वहां उसने देखा कि..... उसका पुत्र एक शानदार ऑफिस का अधिकारी बना  हुआ है, उसके ऑफिस में सैंकड़ो कर्मचारी  उसके अधीन कार्य कर रहे है... ! ये सब देख कर पिता का सीना गर्व से फूल गया! वह बूढ़ा पिता बेटे के चेंबर में  जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया!

🔷 और प्यार से अपने पुत्र से पूछा... "इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है"? पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी"!

🔶 पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया!

🔷 उनकी आँखे छलछला आई! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे! उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???

🔶 पुत्र ने इस बार कहा "पिताजी आप हैैं, इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान "! पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो " ???

🔷 पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते  हुए कहा "पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,

🔶 बोलिए पिताजी" ! पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया !

🔷 सच है जिस के कंधे पर या सिर पर माता-पिता का हाथ होता है, वो इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान होता है!

🔶 सदैव बुजुर्गों का सम्मान करें!!!! हमारी सफलता के पीछे वे ही हैं..

🔷 हमारी तरक्की उन्नति से जब सभी लोग जलते हैं तो केवल माँ बाप ही हैं जो खुश होते हैं।

👉 अतिथि सत्कार की महिमा

🔶 दुर्दान्त नाम का व्याध एक दिन जंगल में शिकार को गया। अनेक व्यक्तियों को मार कर तथा कुछ को पकड़कर वह संध्या समय घर वापस जाने लगा तो अचानक बड़े जोर का तूफान आया और ओलों की वर्षा होने लगी। इस विपत्ति का देखकर वह भागा और बहुत कष्ट सहकर एक पेड़ के नीचे जाकर गिर गया। उसकी दुर्दशा देखकर पेड़ के ऊपर रहने वाले एक कबूतर को तरस आया। उसकी कबूतरी को पहले ही व्याद्या ने पकड़ रखा था। फिर भी कबूतर ने अतिथि धर्म को स्मरण करके उसको ठंड से बचाने के लिए इधर उधर से आग लाकर उसे जला दिया। फिर यह देखकर कि वह भूखा भी है कबूतर और कबूतरी दोनों यह कहकर अग्नि में गिर गये कि आप इस समय हमारे अतिथि हो हम आपकी और कोई सेवा तो कर नहीं सकते, पर आप हमारे शरीर को ग्रहण करके अपनी क्षुधा निवारण करो।

🔷 उनके इस अपूर्व त्याग के प्रभाव से देवताओं का आसन हिल गया और स्वर्ग से एक विमान उनको ले जाने को उतरा। इस घटना को देखकर व्याध भी चकित रह गया और उन दोनों से अपने उद्धार का मार्ग पूछने लगा। कबूतर से कहा अब तुम निर्दयता के कार्ये को त्याग भगवान की आराधना करो और सदैव यथाशक्ति अतिथि सत्कार का ध्यान रखो। जो निःस्वार्थ बुद्धि से अतिथि सेवा में संलग्न रहता है वह अवश्य ही भव सागर से पार होता है।

📖 अखण्ड ज्योति 1961 जुलाई

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 August 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 August 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 22)

👉 युगसृजन के निमित्त प्रतिभाओं को चुनौती
   
🔶 सम्राट अशोक ने जो प्रेरणा पाई थी उसी को अपनाने के लिए अपने सुपुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को परिव्राजक के रूप में धर्मप्रचार के लिए समर्पित कर दिया था। स्वयं बुद्ध भी तो अपने पुत्र राहुल को इसी स्तर की दीक्षा दे चुके थे। बुद्ध परंपरा में आम्रपाली से लेकर कुमारजीव तक ऐसे अनेकों प्रतिभाशाली हुए जो भौतिक सुख, भोगों से कोसों दूर रहकर धर्म प्रयोजनों में ही लगे रहते थे। मध्यपूर्व को भारतीय संस्कृति की छत्रछाया में लाने का श्रेय महाभाग कौडिन्य को जाता है, जिन्होंने उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जीवन भर प्रयास जारी रखा।
  
🔷 उन पुराण ग्रंथियों की गली-कूचों में भरमार है, जिन्होंने वैभव बढ़ाने, सुविधा भोगने, दर्प दिखाने और औलाद के लिए भरे खजाने छोड़कर मरने जैसी सफलताएँ अर्जित कीं। श्रम संभवतः उन्हें भी महापुरुषों से कम न करना पड़ा होगा, पर संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि से ऊँचे न उठने के कारण सुरदुर्लभ जीवन संपदा के व्यर्थ नियोजन पर पश्चाताप करते ही मरे होंगे। इसके विपरीत महर्षि कर्वे, हीरालाल शास्त्री, बाबासाहब आमटे, महामना मालवीय जी, भामाशाह, स्वामी श्रद्धानन्द अहिल्या बाई, सुभाषचंद्र बोस जैसी विभूतियों को प्रात: स्मरणीय समझा जाता है, जिन्होंने स्वयं तो रोटी कपड़े पर निर्वाह किया, पर अपने समूचे वर्चस को परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियोजित कर दिया।

🔶 विदेशी प्रतिभाओं में जापान के गाँधी कागावा, स्काउट आन्दोलन के जन्मदाता बेडेन पॉवेल, रूस के मार्क्स लेनिन आदि को संसार के इतिहास में जगमगाते हीरों की तरह आँका जाता है। वस्तुतः प्रतिभाएँ संसार के हर क्षेत्र में मौजूद हैं। धनाढ्यों, शासनाध्यक्षों, कलाकारों, व्यवसायियों, वैज्ञानिकों और मनीषियों को अपने-अपने ढंग से काम करते हुए देखा जा सकता है। उन्हें जो भी उत्तरदायित्व मिला, उसे उनकी प्रखरता और प्रचंडता ने आश्चर्यजनक सफलता के साथ संपन्न किया है। इन वर्गों को युगचेतना अछूता नहीं छोड़ेगी, उन्हें झकझोरने और समय के अनुरूप बदलने के लिए बाधित करेगी। अब तक वे भले ही स्वार्थपरता और प्रमाद को प्रोत्साहित करते रहे हों, पर आगे उन्हें अपनी क्षमता को मोड़ना मरोड़ना और सृजन प्रयोजनों के लिए नियोजित करना ही होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 27

👉 When is a Prayer Granted?

🔶 Our prayers deserve to be heard by the Almighty only when we take care of making use of the potentials he has already bestowed upon us. Accumulation of negative tendencies of lethargy, dullness, escapism from duties, ignorance, etc makes one hazardous – for his own life – like a balloon full of concentrated acid, which is most likely to explode anytime or ruin due to the acidic burning.

🔷 The rules in the system of God work like a vigilant gardener who uproots the useless and harmful wild growth and carefully nurses the saplings of the useful vegetation. If a field is not ploughed and is full of useless grass or shrubs etc, how can it yield a crop (even if the soil is fertile)? Who will praise a farmer, who lets his field be destroyed without bothering to clean it? The system of God certainly can’t allow its field of Nature to be left unguarded. The rules of the Omnipresent are such that the vices, the evils, the futile, get eliminated continuously so that the perfection and eternal beauty of HIS creation remains unperturbed. If you expect your calls to be heard, you will also have to constantly strive for self-refinement.

🔶 The best way to get the response to your prayers is to awaken your selfconfidence and follow the path of duties. Then alone your inner self will awake.

🔷 The opening to the path to the Light Divine lies deep within the realm of soul and enlightened inner self provides the only bridge to reach this sublime source. Those who don’t have faith in the dignity of their own souls, who keep ignoring the inner voice and hunt in the external world to quench their wishes are lost in the smog of passions and confusions and invite adversities for themselves. Those who scorn their own (inner) selves are also rebuked at God’s end and their prayers evaporate in the void…

📖 Akhand Jyoti, March 1943

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 1)

🔶 जिन्दगी जीना भी एक महत्वपूर्ण विद्या हैं। इसके अभाव में असंख्य लोग रोते-झींकते मौत के दिन तो पूरे कर लेते है पर वह लाभ प्राप्त नहीं कर पाते जिसके लिए यह बहुमूल्य जीवन उपलब्ध हुआ है।

🔷 अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में कीमती मोटर दे दी जाय तो उसकी दुर्गति ही होगी। जिन्दगी एक मोटर है, उसे ठीक प्रकार चलाने के लिए उसका चलाना जानना आवश्यक है। संसार में जितने भी महत्वपूर्ण कार्य है उन्हें आरम्भ करने से पूर्व तत्सम्बन्धी ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। कारखानों में, उद्योगों में, सरकारी नौकरियों में हर जगह ट्रेन्ड आदमियों की ही नियुक्ति होती है। खेद है कि जिन्दगी जीने जैसे महान उत्तरदायित्व को हाथ में लेने वाले उस की ट्रेनिंग आवश्यक नहीं समझते।

🔶 हम सब किसी प्रकार जिन्दगी काटते तो है पर उसमें अव्यवस्था ही भरी होती है। कहते है कि बेताल नाम का पिशाच अपने बालों को बुरी तरह बिखेरे रहता है जिससे उसकी भयंकरता और भी बढ़ जाती है। बहुधा हमारा जीवन क्रम भी बेताल के बालों की तरह फूहड़पन के साथ अस्त-व्यस्त तथा बिखरा होता है। फलस्वरूप न जीने वाले को आनन्द आता है और न उससे संबंधित लोगों को कोई प्रसन्नता होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 5

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.5

👉 No Escape From Our Actions

🔶 We are bound to endure the fruits of our actions – good or bad. Never think that you are spared from the fruits of your past actions even if the result is delayed. It is an eternal law of cause and effect; the result of your actions will certainly catch you tomorrow, if not today. Sometimes we observe delay in the result, because God wants to test whether man has learnt any lesson and realized his own duty to behave with wisdom. The man who always does good and refrains from bad actions, even without fear of punishment, has passed the test and is surely progressing towards piousness.

🔷 An animal can be driven in any direction with the fear of a stick. If God had forced man to choose a specific path, then human intelligence would have never developed to the level of independent thinking, and man would not have been anything more than an animal. But, God bestowed upon man the freedom to choose between good and bad actions, so that he learns to differentiate between the two.

🔶 Thus, he may protect himself from the results of sinful acts and may enjoy the sweet fruits of benevolent and good acts. So, God is quite justified in allotting man the freewill to do good or bad deeds, considering that man is the most wise and responsible creation on the earth. God also wanted to test man’s capability to fulfill this responsibility and to judge how perfect man is. So, according to his system, there can be a delay in justice, but the result is bound to come in the end. So perfect are His balance and plans that one has to be prepared to accept the results of one’s own actions.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana- Darshan, swaroop, va Karyakrma- 66 Page 6.17

👉 कर्म-फल आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा

🔶 यदि कर्म का फल तुरन्त नहीं मिलता तो इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गयें। कर्म-फल एक ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भुगतना अवश्य ही पड़ेगा। कभी-कभी इन परिणामों में देर इसलिये होती है कि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा करना चाहता है कि व्यक्ति अपने कर्त्तव्य -धर्म समझ सकने और निष्ठापूर्वक पालन करने लायक विवेक बुद्धि संचित कर सका या नहीं। जो दण्ड भय से डरे बिना दुष्कर्मों से बचना मनुष्यता का गौरव समझता है और सदा सत्कर्मों तक ही सीमित रहता है, समझना चाहिए कि उसने सज्जनता की परीक्षा पास कर ली और पशुता से देवत्व की और बढऩे का शुभारम्भ कर दिया।

🔷 लाठी के बल पर जानवरों को इस या उस रास्ते पर चलाया जाता है और अगर ईश्वर भी बलपूर्वक अमुक मार्ग पर चलने के लिए विवश करता तो फिर मनुष्य भी पशुओं की श्रेणी में आता, इससे उसकी स्वतंत्र आत्म-चेतना विकसित हुई या नहीं इसका पता ही नहीं चलता। भगवान ने मनुष्य को भले या बुरे कर्म करने की स्वतंत्रता इसीलिए प्रदान की है कि वह अपने विवेक को विकसित करके भले-बुरे का अन्तर करना सीखे और दुष्परिणामों के शोक-संतापों से बचने एवं सत्परिणामों का आनन्द लेने के लिए स्वत: अपना पथ निर्माण कर सकने में समर्थ हो।

🔶 अतएव परमेश्वर के लिए यह उचित ही था कि मनुष्य को अपना सबसे बड़ा बुद्धिमान और सबसे जिम्मेदार बेटा समझकर उसे कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान करे और यह देखे कि वह मनुष्यता का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने मे समर्थ है या नहीं? परीक्षा के बिना वास्तविकता का पता भी कैसे चलता और उसे अपनी इस सर्वश्रप्ठ रचना मनुष्य में कितने श्रम की सार्थकता हुई यह कैसे अनुभव होता। आज नहीं तो कल उसकी व्यवस्था के अनुसार कर्मफल मिलकर ही रहेगा। देर हो सकती है अन्धेर नहीं। ईश्वरीय कठोर व्यवस्था, उचित न्याय और उचित कर्म-फल के आधार पर ही बनी हुई है सो तुरन्त न सही कुछ देर बाद अपने कर्मों का फल भोगने के लिए हर किसी को तैयार रहना चाहिए।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम- वांग्मय 66 पृष्ठ 6.17

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य