शुक्रवार, 29 जून 2018

👉 संतोषी बनो

🔶 आप किसी के लिये कितना भी कुछ कर दीजिये पर यदि सामने वाले के मन मे आत्मसंतुष्टी नही है तो वो कभी सुखी नही रह सकता है वो हमेशा दुःखी का दुःखी ही रहेगा क्योंकि बिना आत्मसंतुष्टी के आत्मशान्ति की प्राप्ति कभी नही हो सकती है!

🔷 एक नगर मे श्री मन नाम के एक सेठजी रहा करते थे बहुत बड़ा व्यापार था उनका और बहुत बड़ी सम्पदा भी थी पर उनके आगे पिछे कोई न था! सन्तों की संगत मिल जाने से धीरे धीरे वो भगवत प्रेम की तरफ बढ़ने लगे निरंतर साधनात्मक जीवन से धीरे धीरे उन्हे संसार से वैराग्य होने लगा!

🔶 और एक दिन उन्होंने अपनी सारी सम्पति परमार्थ के निमित्त दान कर दी और स्वयं गंगा माँ की शरण-स्थली मे जाकर वही साधूओ की सेवा करने लगे और हरी भजन मे डूब गये!

🔷 उनका एक बहुत ही दुर का रिश्तेदार दुर्भागी लाल था उन्होंने उसके लिये अपने एक सेवक के हाथों दस लाख रुपये भिजवायें सेवक वहाँ तक पहुँचा और दुर्भागी को दस लाख रुपये दिये दुर्भागी ने बहुत आदरसत्कार किया और सेठजी के गुणगान करता हुआ नही रुका भोजन के दौरान बातो ही बातो मे सेवक ने सेठजी का सारा वृतान्त सुनाया और जैसै ही दुर्भागी को पता चला की सेठजी ने करोड़ों अरबों की सम्पति दान कर दी और मुझे दस लाख रुपये दिये वो वही पर सेठजी को गाली देने लगा की अरे खुद के आगे पिछे तो कोई न था और मुझे केवल दस लाख रुपये दिये मूरखों की तरह सारी सम्पति लुटाने की क्या जरूरत थी पागल की बुद्धि सटिया गई!

🔶 और इस तरह से उसने धन्यवाद देना तो दुर रहा गालियाँ देने लगा!

🔷 ईश्वर ने हमें जितना दिया क्या वास्तव मे हम उसके उतने लायक है? जब हम ईमानदारी से अपना अवलोकन करे तो हमें हमारे भीतर बहुत गन्दगी दिखेगी और हमारे पापों के विशाल पर्वत है हमें जो उसने दिया वो तो उसने दया करके दिया है हम उसके लायक नही है फिर भी दिया है उस करूणानिधि का आभार प्रकट करना तो दुर और उसे कोसते है!

🔶 ये जितने भी कोसने वाले है वो सब दुर्भागी लाल है उन्हे संतुष्टी नही है और ऐसे असंतुष्टों के लिये आप कितना भी कुछ कर दो वो कभी सुखी नही रह सकते है! जिसने दिल से आभार प्रकट किया उसके दुःख स्वतः ही समाप्त हो गये और जिसने केवल शिकायत की उसके सुख स्वतः ही समाप्त हो गये है!

🔷 सन्तोष से बड़ा कोई सुख नही है और ये कभी न भुलना की संतोषी हर पल सुखी और आनन्द मे जीता है तो असंतोषी हर पल दुःखी ही रहता है!

👉 आज का सद्चिंतन 29 June 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 June 2018


👉 Influence of Bioelectricity on Food Products – Last Part

🔶 1. Manifestation Against the Backdrop of a Dark Curtain:

This simple experiment would demonstrate the presence of the invisible bioelectric field of the body. Keep one of the chairs facing the least illuminated wall of the room and cover its back with the thick black cloth. Place a dimly lighted wick lamp on the chair. The light should not be visible on the cloth from behind the chair. Be seated on the second chair facing the back of the first chair at a distance of about a foot from the cloth. Resting elbows on the arms of chair, keep arms in an upright position with the palms and fingers pressed together (as in traditional Indian salutation `Namastey').  Now start rubbing both palms together vertically, slowly in the beginning, then gradually accelerate.

🔷 A close observation will show a fog-like hazy luminous emission emanating from the palms. The palms may also appear to glow with a couple of sparks flying out of them. Edges of nails would particularly appear luminous.

🔶 2. Sensory Perception of Bioelectric Magnetism: This experiment shows the bioelectric magnetism present in the body. Be seated on a non-conducting chair placed on the insulated floor. Keep body-parts away from any conducting surface (walls, floor or any other conducting body likely to leak the bioelectric charges from the body). Tightly press fingers of both hands together, leaving a little space between the palms. For about a minute keep the hands pressed together in this position. Now keeping the palms together, try to pull the fingers apart. The bioelectric magnetism of the body would resist the effort to separate them. A vibration will be felt in the fingers.

📖 Akhand Jyoti – April 2004 

👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (अन्तिम भाग)

🔶 सन्तुलित मस्तिष्क का तात्पर्य भावना रहित बन जाना नहीं है। भले-बुरे को एक दृष्टि से देखने जैसी समदर्शिता की दुहाई देना भी सन्तुलन नहीं है। बुरे के प्रति सुधार और भले के प्रति उदार रहकर ही सन्तुलन बना रह सकता है। आँखों के सामने तात्कालिक लाभ का पर्दा उठ जाने, शरीर को ही सब कुछ मानकर उसी के परिकर को पोषित करते रहने की मोह माया ही भ्रान्तियों के ऐसे भण्डार जमा करती है जिन्हें विकृतियों का रूप धारण करते देर नहीं लगती। यही वह आँधी और तूफान है जिसके कारण उठने वाले चक्रवात समस्वरता बिगाड़कर रख देते है और ऐसा कर गुजरते हैं जिनके कुचक्र में फँसने के उपरान्त मनुष्य न जीवितों में रहे न मृतकों में, न बुद्धिमानों में गिना जा सके और व विक्षिप्तों में।

🔷 मलीनताएँ हर कहीं कुरूपता उत्पन्न करती है। गन्दगी जहाँ भी जमा होगी वहीं सड़न उत्पन्न करेगी। इस तथ्य को समझने वालों को एक और भी जानकारी नोट करनी चाहिए कि मनःक्षेत्र पर चढ़ी हुई मलीनता जिसे मल, आवरण या कषाय कल्मष के नाम से जाना जाता है, अन्य सभी मलीनताओं की तुलना में अधिक भयावह है। अन्य क्षेत्रों की गन्दगी मात्र पदार्थों को ही प्रभावित करती है, पर मनःक्षेत्र की गन्दगी न केवल मनुष्य को स्वयं दीन दयनीय, पतित और घृणित बनाती है वरन् उसका सम्पर्क क्षेत्र भी विषाक्त होता है। छूत की संक्रामक बीमारियों की तरह चिन्तन की निकृष्टता भी ऐसी है, जो जहाँ उपजती है उसका विनाश करने के अतिरिक्त जहाँ तक उसकी पहुँच है वहाँ भी विनाशकारी वातावरण उत्पन्न करती है।

🔶 मानसिक स्वच्छता के लिए जागरूकता बरती जानी चाहिए और विचारणा को श्रेष्ठ कार्यों में, सदुद्देश्य में नियोजित करने की बात सोचनी चाहिए। इसी में दूरदर्शी और सराहनीय विवेकशीलता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 6)

🔶 विचार प्रायः दो प्रकार के होते हैं (1) शान्त और दृढ़ तथा (2) संशयात्मक और डाँवाडोल। दूसरे प्रकार की स्थिति उद्वेग और शंकाशील है। इसी में क्रोध भी सम्मिलित है। उस उद्विग्न मनः स्थिति में मनुष्य कुछ भी उत्कृष्ट बात नहीं सोच सकता, उन्नति की भावना में संलग्न नहीं हो सकता। उसकी शारीरिक मशीनरी यकायक झंकृत हो उठती है। वह समूचा काँप उठता है।

🔷 धर्म नीति और शिष्टाचार-तीनों ही दृष्टिकोणों से क्रोध निकृष्ट है। क्रोधी मनुष्य धर्म कार्य किस प्रकार कर सकता है? उसमें धर्म निष्ठा, पूजन, मनन कीर्तन, अध्ययन, चिंतन, इत्यादि कैसे आ सकते है? जिसका शरीर और मन वश में नहीं वह नीति के अनुसार सत्-असत् का विवेक किस प्रकार कर सकता है? जिसे क्रोध आता है वह दूसरे के मान अपमान का विचार क्या करेगा।

🔶 एक विद्वान् का विचार है- “एक का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का संचार करता हैं। जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है, वह तत्काल अभाव का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी त्यौरी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है, वह उचित है या अनुचित। इसी से धर्म और नीति में क्रोध के निरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खलों के वचन सहते ही हैं, दुनियादार लोग भी न जाने जितनी ऊँची-नीची पचाते रहते हैं। सभ्यता के व्यवहार में भी क्रोध नहीं तो, क्रोध के चिन्ह दिखाये दबाये जाते हैं। इस प्रकार का प्रतिबन्ध समाज की सुख−शांति के लिए बहुत आवश्यक है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 18
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.18

👉 संयमशील जीवन

🔶 जिह्वा और कामेन्द्रिय की उत्तेजना को यदि साध लें तो स्वास्थ्य रक्षा की प्रक्रिया बड़ी आसानी से पूरी की जा सकती है। भोजन भूख मिटाने या शक्ति प्राप्त करने के लिए करते हैं, जीभ के स्वाद के लिए नहीं। भोगी व्यक्तियों की रुचि स्वादयुक्त व्यंजनों में बनी रहती है, किंतु संयमशील व्यक्ति का आहार केवल जीवन धारण किये रहने के लिए होता है, जिसमें स्वाद, चटपटे मसालों, विविध व्यंजनों की राई-रत्तीभर भी गुँजाइश नहीं होती। शराब, माँस और दूसरे मादक द्रव्यों का सेवन हानिकारक होता है। ये पदार्थ व्यक्ति की विवेक बुद्धि को समाप्त कर देते है।

🔷 जो सदैव ईर्ष्या-द्वेष, परछिद्रान्वेषण के विचारों में डूबे रहते है, वे अकारण ही अपनी मानसिक शक्तियों का अपव्यय करते रहते हैं। उन्हें न तो किसी प्रकार का भौतिक सुख मिलता है, न आध्यात्मिक लाभ। सामाजिक-कलह अव्यवस्था का कारण भी ऐसे ही लोग होते है, जिनके विचार संयमित नहीं होते।

🔶 शारीरिक और मानसिक शक्तियों का नियन्त्रण कर लें तो सामाजिक नियन्त्रणों की बात अपने आप पूरी हो जाती है। इन दोनों का मिश्रित रूप ही समाज की व्यवस्था का कारण बनता है। व्यक्ति से ही समाज बनता है। जिस समाज के व्यक्तियों में भले विचार होंगे, वहाँ शांति व सुव्यवस्था अवश्य होगी। अनियंत्रित स्वेच्छाचारी मनुष्य ही स्थान-स्थान पर कलह व कटुता उत्पन्न करते हैं। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नियन्त्रण की आवश्यकता है, इसी से शक्ति सन्तुलन व सुव्यवस्था बनी रह सकती है। इस पुण्य प्रक्रिया का प्रारम्भ आत्म संयम से ही करना होगा। पीछे इसके लाभों को देखते हुए दूसरे भी चल पड़ेंगे, पर पहले हमें यह पग स्वयं बढ़ाना पड़ेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1965 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.17

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...