सोमवार, 9 अप्रैल 2018

👉 दानवीर कर्ण

🔷 एक बार भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे, तभी बातों बातों में अर्जुन ने कृष्ण से कहा कि क्यों कर्ण को दानवीर कहा जाता है और उन्हें नहीं। जबकि दान हम भी बहुत करते हैं।

🔶 यह सुन कर कृष्ण ने दो पर्वतों को सोने में बदल दिया, और अर्जुन से कहा कि वे उनका सारा सोना गाँव वालो के बीच बाट दें ।

🔷 तब अर्जुन गाँव गए और सारे लोगों से कहा कि वे पर्वत के पास जमा हो जाएं क्योंकि वे सोना बांटने जा रहे हैं, यह सुन गाँव वालो ने अर्जुन की जय जयकार करनी शुरू कर दी और अर्जुन छाती चौड़ी कर पर्वत की तरफ चल दिए।

🔶 दो दिन और दो रातों तक अर्जुन ने सोने के पर्वतों को खोदा और सोना गाँव वालो में बांटा। पर पर्वत पर कोई असर नहीं हुआ।

🔷 इसी बीच बहुत से गाँव वाले फिर से कतार में खड़े होकर अपनी बारी आने का इंतज़ार करने लगे। अर्जुन अब थक चुके थे लेकिन अपने अहंकार को नहीं छोड़ रहे थे।

🔶 उन्होंने कृष्ण से कहा कि अब वे थोड़ा आराम करना चाहते हैं और इसके बिना वे खुदाई नहीं कर सकेंगे ।

🔷 तब कृष्ण ने कर्ण को बुलाया और कहा कि सोने के पर्वतों को इन गाँव वालों के बीच में बाट दें।

🔶 कर्ण ने सारे गाँव वालों को बुलाया और कहा कि ये दोनों सोने के पर्वत उनके ही हैं और वे आ कर सोना प्राप्त कर लें। आैर एेसा कहकर वह वहां से चले गए।

🔷 अर्जुन भौंचक्के रह गए और सोचने लगे कि यह ख्याल उनके दिमाग में क्यों नहीं आया।

🔶 तब कृष्ण मुस्कुराये और अर्जुन से बोले कि तुम्हें सोने से मोह हो गया था

🔷 और तुम गाँव वालो को उतना ही सोना दे रहे थे जितना तुम्हें लगता था कि उन्हें जरुरत है। इसलिए सोने को दान में कितना देना है इसका आकार तुम तय कर रहे थे।

🔶 लेकिन कर्ण ने इस तरह से नहीं सोचा और दान देने के बाद कर्ण वहां से दूर चले गए। वे नहीं चाहते थे कि कोई उनकी प्रशंसा करे और ना ही उन्हें इस बात से कोई फर्क पड़ता था कि कोई उनके पीछे उनके बारे में क्या बोलता है।

🔷 यह उस व्यक्ति की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हासिल हो चुका है। दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना उपहार नहीं सौदा कहलाता है।
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🔶 अत: यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमें ऐसा बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए ताकि यह हमारा सत्कर्म हो ना कि हमारा अहंकार

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 10 April 2018

👉 मूल्यांकन की कसौटी

🔷 मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी यह होनी चाहिए कि उसके द्वारा मानवीय उच्च मूल्यों का निर्वाह कितना हो सका, उनको कितना प्रोत्साहन दे सका। योग्यताएँ विभूतियाँ तो साधन मात्र हैं। लाठी एवं चाकू स्वयं न तो प्रशंसनीय हैं, न निन्दनीय। उनका प्रयोग पीड़ा पहुँचाने के लिए हुआ या प्राण रक्षा के लिए? इसी आधार पर उनकी भर्त्सना या प्रशंसा की जा सकती है।

🔶 मनुष्य की विभूतियाँ एवं योग्यताएँ भी ऐसे ही साधन हैं। उनका उपयोग कहाँ होता है इसका पता उसके विचारों एवं कार्यों से लगता है। वे यदि सद् हैं तो यह साधन भी सद् हैं पर यदि वे असद् हैं, तो वह साधन भी असद् ही कहे जायेंगे।

🔷 मनुष्यता का गौरव एवं सम्मान इन जड़-साधनों से नहीं उसके प्राणरूप सद्विचारों एवं सद्प्रवृत्तियों से जोड़ा जाना चाहिए। उसी आधार पर सम्मान देने, प्राप्त करने की परम्परा बनायी जानी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (५.१३)

👉 The Criterion for Self-evaluation

🔷 An individual’s goodness should be judged on the basis of the extent to which he/she has been able to live up to eminent human values and has fostered their development. Talents and abilities are just means or tools. A cane and a knife, on their own, are neither praiseworthy nor blameworthy. They can be commended or condemned, depending on whether they were used for defending oneself or to hurt someone.

🔶 Likewise, the talents and capabilities of man are the means only. It is his thoughts and actions which decide and thus, hint at how and where his talents and abilities are being utilized. If his thoughts and actions are honorable, his talents and capabilities would also be honorable. However, if his thoughts and actions are wicked, his talents and abilities would also be wicked.

🔷 Individual’s dignity and honor should not be associated with having such material means (like talents, capabilities, achievements, status, riches, etc.) but with the noble thoughts and noble activities which actually nurture and guide those means. This should be the only criterion for giving or receiving honor.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojna - philosophy, format and program -66 (5.13)

👉 श्रेष्ठ जीवन

🔷 मित्रो ! भगवान के दो हाथ हैं। एक हाथ से वह पीडि़त होकर के माँगता है, पतित होकर के माँगता है। आप पतितों की सहायता कीजिए, पीडि़तों की सहायता कीजिए। पीडि़तों की और पतितों की आप सहायता न करें तब? तब बेटे ! मुश्किल है। तब आपको भगवान मिल पाएगा? भगवान का अनुग्रह आपको मिल जाएगा? मैं सोचता हूँ कि तब भगवान आपको नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि आपके अंदर न करुणा है, न आपके भीतर सदाशयता है।

🔶 आपके भीतर तो केवल हवस काम करती है और इस हवस की आग में आप उन्हें भी जलाना चाहतें हैं, जिसमें आप जल गए; आपका परलोक जल गया; आप का ध्यान जल गया; आपका कुटुंब जल गया। अब कौन रह गया है? अब संतोषी माता और रह गई है और जो कोई भी रह गया है, उसे भी इसी नरक में जला डालिए अभागो! जिसमें कि आप जल रहे हैं। हवसों की आग, ख्वाहिशों की आग, वासनाओं की आग, तृष्णाओं की आग में संतोषी माता को भी भून डालिए।

🔷 अरे अभागो! अपने आप को भूनिए, परंतु उनको तो अपनी जगह पर रहने दीजिए। क्या कीजिए? उदात्त जीवन, श्रेष्ठ जीवन, परोपकारी जीवन, शानदार जीवन, दूसरों के दु:खों में सम्मिलित होने वाला जीवन, संसार में सत्प्रवृत्तियों का संवद्र्धन करने वाला जीवन जिएँ। यही अध्यात्म है। यदि आपको यह सब आ गया तो आप निहाल हो जाएँगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Saint Eknath's Offering to a Donkey

🔷 Once upon a time a group of saints were carrying the pious water of the river Ganga from Prayag in north India, to offer to Lord Shiva at Rameshwaram in the South. It was a long and arduous journey. Saint Eknath was with them. When they were crossing a vast desert, they saw a donkey dying of thirst. Saint Eknath immediately offered his water to the donkey and saved his life.

🔶 The other saints in the group were furious, and considered it an insult to the Lord Shiva, since the water meant for offering to the God had been wasted on a donkey. Saint Eknath explained his act very calmly, "O wise men, you have read again and again in the holy books that God is everywhere. Then, why are you so upset? Any thing that is not utilized at the right moment is useless. The water that this dying donkey drank has reached straight to Lord Shiva in Rameshwaram!"

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 8)

🔷 भगवान क्या है? बताइए आप। एक भगवान तो वह है, जो सारे विश्व में छाया हुआ है, सारे नियमों की व्यवस्था बनाता है। वे एक तरह के नियम हैं, कायदा और कानून हैं, जिसको हम परब्रह्म कहते हैं। एक और भी ब्रह्म है? अँग्रेजी में इसको सुपरकान्शस (सुपर चेतन) कहते हैं। वेदान्त की भाषा में इसको ‘स्व’ कहा गया है, आत्मा कहा गया है। आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यातिसव्यः। अरे लोगो! अपने आप को जानो, अपने आपको समझो, अपने आपको सुधारो, अपने आपको ठीक करो। यह कैसे हो सकता है? अपने आप। अपने आपसे क्या मतलब? अपने आपसे मतलब है—सुपर चेतना से, जो हमारे भीतर है, जिसके बारे में शुरू में बताया गया है। भीतर के अन्तःकरण में व्यक्तित्व है, जिसमें कि गुण, कर्म और स्वभाव भरे पड़े हैं, जिसमें विश्वास और मान्यताएँ भरी पड़ी हैं; जिसमें आदतें भरी पड़ी हैं।

🔶 आदतों को आपको ठीक करना है। अपनी मान्यताओं में, जिसमें घिनौनेपन घुसे बैठे हैं, उनमें आपको सुधार करना है, शुरू से लेकर अन्त तक देख−भाल करनी है, उनको ठीक करना है। आपको आत्मदेव की उपासना करनी है। उपासना के बारे में जो हम कल कह रहे थे, वास्तव में वह आपका आत्मदेव है। अपने आपकी उपासना किया कीजिए। अपने आपकी उपासना जो कर लेते हैं, वह अपने आप ही, अपनी साधना से ही, अपने ही दबाव से भगवान बना लेते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया और एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से पत्थर को काली बना दिया था।

🔷 अपने आपका, व्यक्तित्व का उजागर होना और स्वच्छ, निर्मल होना—ये बहुत बड़ी बात है। इसके लिए आपको क्या करना चाहिए? चौबीसों घण्टे आपको ध्यान रखना चाहिए। क्या ध्यान रखना चाहिए? कि हमारा जीवन किस तरीके से ठीक बन सकता है? आपको अपने कर्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए। आपको अपने ज्ञान को परिष्कृत करना चाहिए और अपनी भक्ति-भावना का विकास करना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 85)

👉 ‘गुरुसेवा’  ही सच्ची साधना

🔷 भगवान् महेश्वर इस कथा के अगले प्रकरण में कहते हैं-

मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम्। स्मृतिवेदार्थवाक्येन गुरुः साक्षात्परं पदम्॥ १०७॥  
श्रुतिस्मृती अविज्ञाय केवलं गुरुसेवकाः। ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः॥ १०८॥

नित्यं ब्रह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत् परम्। सर्व ब्रह्म निराभासं दीपो दीपान्तरं यथा॥ १०९॥
गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामं निरीक्षयेत्। अनेन गुरुमार्गेण स्वात्मज्ञानं प्रवर्त्तते॥ ११०॥

🔶 गुरु ये दो अक्षर अपने में महामंत्र है। यह महामंत्र सभी मंत्रों का राजा है। सभी स्मृतियों एवं वेदवाक्यों का मर्म यही है कि गुरु ही स्वयं परमपद है॥ १०७॥  जो शिष्य अपने गुरुदेव की सेवा में तल्लीन है, वे भले ही श्रुतियों व स्मृतियों को न जानते हों, पर वे हैं सच्चे संन्यासी। इसके विपरीत जो गुरुसेवा से विमुख हैं, वे भले ही संन्यासी का वेष धारण किये हों, पर केवल निरवेषधारी हैं। उनमें कोई आध्यात्मिक तत्त्व नहीं हैं॥ १०८॥ नित्य निराकार, निर्गुण ब्रह्म का बोध केवल गुरु कृपा से मिलता है। जिस तरह दीप से दीप जलता है, उसी तरह से गुरुदेव शिष्य के अन्तस् में ब्रह्मज्ञान की ज्योति जला देते हैं॥ १०९॥ शिष्य को चाहिए कि वह अपनी सद्गुरु कृपा की छाँव में आत्मतत्त्व का चिंतन करे। ऐसा करते रहने पर गुरुदेव के द्वारा दिखाए मार्ग से स्वतः आत्मज्ञान हो जायेगा॥ ११०॥
  
🔷 भगवान् शूलपाणि के इन बोध वचनों में ऐसा अलौकिक प्रकाश है, जो शिष्यों के आध्यात्मिक पथ को प्रशस्त कर देता है। शिष्य के लिए गुरुसेवा ‘साधना’ है। गुरु सेवा का अर्थ है—गुरुदेव जो भी कहें, जैसा भी काम सौपें—वैसा ही करना। कई बार गुरुदेव द्वारा कहे गये कार्य को बड़ी सांसारिक, लौकिक एवं सामाजिक रीति से आँकते हैं और ऐसा करते हुए वे भूल जाते हैं कि गुरुदेव तो संसार की सभी बातों से परे हैं, फिर भला वे सांसारिक कैसे हो सकते हैं?

🔶 वे यदि शिष्य को काँटों भरी डगर से गुजारते हैं, तो केवल इसलिए कि इससे उसका कल्याण होगा। उनके द्वारा दिये गये प्रत्येक कष्ट में भविष्य के अनेकों सुखद् अहसास समाये होते हैं। पर इसे केवल वही समझ पाता, जिसका हृदय भक्ति की भावनाओं से भरा है। ऐसी भावनाएँ जिसकी चेतना में अंकुरित हैं-वह जानता है, गुरुदेव तो केवल अपनी ज्ञान ज्योति से शिष्य में ब्रह्मज्ञान की परम ज्योति जला रहे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 130