रविवार, 14 मई 2017

👉 अन्जान रास्ते में मिले आत्मीय बंधु

🔵 घटना उस समय की है जब मैं पटन्डा ब्लाँक के देहात बोडाम में को- ऑपरेटिव एक्सटेन्शन अफसर था। मैं टाटानगर से रोज आना- जाना करता था। उस दिन शाम चार बजे बोडाम से अपनी राजदूत मोटर साइकिल से टाटा जा रहा था।

🔴 रास्ते में पहाड़ी है, सड़क काफी टूटी हुई थी। सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा था। मैं किसी तरह से रोड क्रास कर रहा था फिर भी करीब आधा फर्लांग रह गया जिसे मैं पार नहीं कर सका। मैंने देखा कि दूर से सामने साईड से एक जीप भी आ रही थी। उसे भी वही अड़चन थी। रास्ता क्रास करने के प्रयास में वे लोग भी थे। कुछ देर बाद मैंने देखा कि उसने अपनी जीप वहीं से वापस मोड़ ली। मैं सोच में पड़ गया कि क्या करूँ? जाना तो था ही। साहस नहीं हो रहा था कि आगे रास्ता मिल पाएगा कि नहीं। मैं घर कैसे पहुँचूँगा। चिन्ता की रेखाएँ मन मस्तिष्क पर छा गईं। अतः मैंने भी मन ही मन गुरुदेव को याद करते हुए अपनी बाइक खेतों के रास्ते की ओर बढ़ा दी।

🔵 खेतों की मेढ़ों के ऊपर चल रहा था। मुझे बहुत घबराहट हो रही थी। दिमाग कुछ सोचने करने की स्थिति में नहीं था। उसी हड़बड़ाहट की स्थिति में मेरा दिमाग से कण्ट्रोल हट गया। गेयर लगाना चाहिए था, पर गलती से न्यूट्रल लग गया। नीचे गहरी खाई थी। मैं खाई में गिर गया। उसके पश्चात् मेरे ऊपर मोटर साइकिल गिर गई। उस समय वहाँ पर कोई नहीं था। मैंने पूरी तरह सोच लिया कि आज मेरा अन्त निश्चित है। जब व्यक्ति चारों तरफ से हताश एवं निराश होता है इस समय केवल भगवान को याद करता है। मैं मन ही मन अपने आराध्य गुरुदेव से प्रार्थना करने लगा।

🔴 इतने में मेरा ध्यान टूटा। मुझे जीप की आवाज सुनाई दी। मुझे लगा गुरुदेव ने मेरी प्रार्थना सुन ली। जीप में बैठे सारे लोग बाहर निकल आए और मुझे देखा। वे खाई में उतरे और पूछा ‘आपको निकाल दें खाई से?’ मेरे लिए उनके ये शब्द किसी वरदान से कम न थे। मैंने बिना समय गँवाये झट से हाँ कर दी। वे चार लोग थे, चारों ने मिलकर पहले मोटर साइकिल उठाई और किनारे कर दी फिर मुझे सहारा देकर उठा कर ऊपर लाए। मैं अपने आप उठ गया, लगा कि मुझे अधिक चोट नहीं आई है। मैंने देखा कि मैं ठीक हूँ। मैंने उन लोगों को धन्यवाद दिया।

🔵 उन लोगों ने कहा- कोई बात नहीं भाई साहब। हम लोग भी आपकी तरह रास्ता ढूँढ़ते इधर आए हैं। चलिए, आपको घर तक छोड़ देते हैं। मुझे लगा गुरुदेव ने इन लोगों को हमारे लिए ही भेजा है नहीं तो आजकल सहायता माँगने पर लोग अनसुना करके चले जाते हैं, ये लोग बिना कहे- सुने इस वीरान सुनसान स्थान पर मेरी रक्षा करने आ पहुँचे।

🔴 मैंने कहा ‘मैं खुद ही चला जाऊँगा’ तब उन लोगों ने कहा ‘पहले गाड़ी स्टार्ट करके तो देखिए’। मुझे भी लगा शायद ये लोग सही कह रहे हैं। मैंने गाड़ी स्टार्ट किया तो गाड़ी स्टार्ट हो गई। उन लोगों ने फिर कहा कि भाई साहब आपको चोट लगी होगी, जीप में चलिए। मैंने धन्यवाद करते हुए स्वयं चले जाने की बात कही। उसके बावजूद उन लोगों ने कहा- अच्छा आप बाइक से चलिए हम आपके पीछे चलते हैं।

🔵 इस प्रकार उन लोगों ने मुझे समीप के एक गाँव बहादुर- डीह तक पहुँचाया। जब उन्होंने देख लिया मैं ठीक तरीके से जा रहा हूँ, वे अपनी दिशा में वापस लौट गए। मैं गुरुसत्ता की असीम कृपा से अन्दर ही अन्दर प्रफुल्लित हो रहा था कि अनजान व्यक्तियों ने परिवार से अधिक आत्मीयता दिखाई एवं खाई से निकालकर एक गाँव तक सकुशल पहुँचाया। आज के समय में यह शायद संभव नहीं। मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि गुरुदेव ने दूत भेजकर मेरे जीवन को संकट से मुक्त कराया। अगर गुरुदेव की कृपा नहीं होती तो मेरी जीवन रक्षा न हो पाती। यह सोचकर आज भी मैं रोमांचित हो उठता हूँ।

🌹 सिद्धेश्वर प्रसाद राँची (झारखण्ड)
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Samsarn/a/najan

👉 आध्यात्मिकता की कसौटी

🔴 कोई भी मनुष्य इसलिए बड़ा नहीं कि वह अधिक से अधिक सांसारिक पदार्थों का उपभोग कर सकता है। अधिक से अधिक ऐश्वर्य जुटाने वाले तो बहुधा लुटेरे होते हैं। वे संसार को जितना देते हैं, उससे कहीं अधिक उससे छीन लेते हैं।

🔵 हम मनुष्य की सेवा-शक्ति को दृष्टि में रख कर ही उसे महान नहीं कह सकते। उसकी महानता की कसौटी यह नहीं हो सकती, क्योंकि इसके द्वारा परखे जाने पर तो अनेक पशु-पक्षी भी उसकी श्रेणी में आ विराजेंगे। सभी जानते हैं कि चूहे, शृगाल, सुअर, कुत्ते, कौए, गिद्ध आदि पशु-पक्षी भी सड़े-गले और मल-मूत्रादि पदार्थों को खाकर वातावरण को शुद्ध कर देते हैं। यह भी प्रकट है कि सड़े-गले पदार्थों को शीघ्र ही हटा देने का जो उत्साह इन पशु-पक्षियों में पाया जाता है, वह प्राय: हम मनुष्य कहलाने वालों में भी नहीं पाया जाता। अतएव न तो कर्म का परिणाम और न कर्मोत्साह ही महानता की कसौटी हो सकता है।

🔴 अत: मनुष्य की परख उसके कार्य के परिणाम से नहीं, किन्तु उस कार्य को प्रेरणा देने वाली भावनाओं से की जानी चाहिए। जैसा मनुष्य का भाव हो, उसे वैसा ही समझना चाहिए। भगवान कृष्ण ने भी तो कहा है कि `सभी मनुष्यों की भावना (श्रद्धा) उनके अंत:करण के अनुरूप होती है। इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।’

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1948 पृष्ठ 17   
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/March/v1.17

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 101)

🌹 तीसरी हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण

🔴 इस विराट् को ही हमने अपना भगवान् माना। अर्जुन के दिव्य चक्षु ने इसी विराट् के दर्शन किए थे। यशोदा ने कृष्ण के मुख में स्रष्टा का यही स्वरूप देखा था। राम ने पालने में पड़े-पड़े माता कौशल्या को अपना यही रूप दिखाया था और काकभुशुण्डि इसी स्वरूप की झाँकी करके धन्य हुए थे।

🔵 हमने भी अपने पास जो कुछ था, उसी विराट ब्रह्म को-विश्व मानव को सौंप दिया। बोने के लिए इससे उर्वर खेत दूसरा कोई हो नहीं सकता था। वह समयानुसार फला-फूला। हमारे कोठे भर दिए, सौंपे गए दो कामों के लिए जितने साधनों की जरूरत थी, वे उसी में जुट गए।

🔴 शरीर जन्मजात दुर्बल था। शारीरिक बनावट की दृष्टि से उसे दुर्बल कह सकते हैं, जीवन शक्ति तो प्रचंड थी ही। जवानी में बिना शाक, घी, दूध के २४ वर्ष तक जौ की रोटी और छाछ लेते रहने से वह और कृश हो गया था, पर जब बोने-काटने की विधा अपनाई तो पिचहत्तर वर्ष की इस उम्र में वह इतना सुदृढ़ है कि कुछ ही दिन पूर्व उसने एक बिगड़ैल साँड़ को कंधे का सहारा देकर चित्त पटक दिया और उससे भागते ही बना।

🔵 सर्वविदित है कि अनीति एवं आतंक के पक्षधर किराए के हत्यारे ने एक वर्ष पूर्व पाँच बोर की रिवाल्वर से लगातार हम पर फायर किए और उसकी सभी गोलियाँ नलियों में उलझी रह गईं। रिवाल्वर उससे भय के मारे वहीं गिर गई। अब की बार वह छुरेबाजी पर उतर आया। छुरे चलते रहे। खून बहता रहा, पर भोंके गए सारे प्रहार शरीर में सीधे न घुसकर तिरछे फिसलकर निकल गए। डाक्टरों ने जख्म सी दिए और कुछ ही सप्ताह में शरीर ज्यों का त्यों हो गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/3.6

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 May 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 May 2017


👉 पंडित जी और नाविक

 🔵 आज गंगा पार होनेके लिए कई लोग एक नौकामें बैठे, धीरे-धीरे नौका सवारियों के साथ सामने वाले किनारे की ओर बढ़ रही थी, एक पंडित जी भी उसमें सवार थे। पंडित जी ने नाविक से पूछा “क्या तुमने भूगोल पढ़ी है?”

🔴 भोला- भाला नाविक बोला “भूगोल क्या है इसका मुझे कुछ पता नहीं।”

🔵 पंडितजी ने पंडिताई का प्रदर्शन करते कहा, “तुम्हारी पाव भर जिंदगी पानी में गई।”

🔴 फिर पंडित जी ने दूसरा प्रश्न किया, “क्या इतिहास जानते हो? महारानी लक्ष्मीबाई कब और कहाँ हुई तथा उन्होंने कैसे लडाई की ?”

🔵 नाविक ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की तो  पंडित जी ने विजयीमुद्रा में कहा “ ये भी नहीं जानते तुम्हारी तो आधी जिंदगी पानी में गई।”

🔴 फिर विद्या के मद में पंडित जी ने तीसरा प्रश्न पूछा “महाभारत का भीष्म-नाविक संवाद या रामायण का केवट और भगवान श्रीराम का संवाद जानते हो?”

🔵 अनपढ़ नाविक क्या कहे, उसने इशारे में ना कहा, तब पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले “तुम्हारी तो पौनी जिंदगी पानी में गई।”

🔴 तभी अचानक गंगा में प्रवाह तीव्र होने लगा। नाविक ने सभी को तूफान की चेतावनी दी, और पंडितजी से पूछा “नौका तो तूफान में डूब सकती है, क्या आपको तैरना आता है?”

🔵 पंडित जी गभराहट में बोले “मुझे तो तैरना-वैरना नहीं आता है ?”

🔴 नाविक ने स्थिति भांपते हुए कहा ,“तब तो समझो आपकी पूरी जिंदगी पानी में गयी।”

🔵 कुछ ही देर में नौका पलट गई। और पंडित जी बह गए।

🔴 मित्रों, विद्या वाद-विवाद के लिए नहीं है और ना ही दूसरों को नीचा दिखाने के लिए है। लेकिन कभी-कभी ज्ञान के अभिमान में कुछ लोग इस बात को भूल जाते हैं और दूसरों का अपमान कर बैठते हैं। याद रखिये शाश्त्रों का ज्ञान समस्याओं के समाधान में प्रयोग होना चाहिए शश्त्र बना कर हिंसा करने के लिए नहीं।

🔵 कहा भी गया है, जो पेड़ फलों से लदा होता है उसकी डालियाँ झुक जाती हैं। धन प्राप्ति होने पर सज्जनों में शालीनता आ जाती है। इसी तरह, विद्या जब विनयी के पास आती है तो वह शोभित हो जाती है। इसीलिए संस्कृत में कहा गया है, ‘विद्या विनयेन शोभते।’

👉 गीत तो बहुत गा लिए - अब गीता गाएँ

🔵 गीत हमें अच्छे लगते हैं। अपनी मनःस्थिति के अनुकूल गीत गाते रहते हैं। कहते हैं गीत गाने से मन हलका होता है। चित्त शान्त होता है, उत्साह बढ़ता है। लेकिन गीत तो बहुत गा लिए। गीतों के साथ संगति देने वाले, स्वर में स्वर मिलाने वाले भी मिल गए, पर कुछ हुआ नहीं। मन भारी का भारी, चित्त चंचल-अशान्त, उत्साह शिथिल और इन सबके कारण वही दुर्गति....न ऊपर उठे, न आगे बढ़े। संतुलन की स्थिति चित्त को न मिली, उत्साह न आ सका। किसी ने कहा, प्रभु को पुकारो, अपनी शक्ति काम नहीं करती, तो उसे बुलाओ। प्रभु हमारी पुकार सुनेंगे, तो उबार लेंगे। हम भक्ति के गीत गाने लगे-पर विश्वास हिल उठा, गला बैठने लगा, लेकिन स्थिति बदली नहीं। आखिर क्यों? क्या वह सुनता नहीं....?

🔴 अरे नहीं, वह सुनता है और देखता भी है। हम ही हैं अभागे, जो देखते भी नहीं और सुनते भी नहीं। अपने गीत गाने में इतने खो गए हैं कि उसकी गीता के स्वर सुनाई ही नहीं देते। कानों पर से हाथ हटाएँ, कोलाहल के बीच उभरती हुई उसकी वाणी सुनें.....। वह तो उद्बोधन के लिए सदा तैयार है.. ही ‘‘करिष्ये वचनं तव’’ का भाव नहीं उभरता।
  
🔵 अब अपनी अलापना बन्द करें, उसकी सुनें। गाना है तो हम भी गीता ही गाएँ। लेकिन गीता भला कैसे गाएँ, वह तो भगवान् गाते हैं। हम तो उसकी सुनें। गीता के स्वर वही जानता है, पर स्वर-में-स्वर हम भी मिला सकते हैं। गीता वह अपने लिए थोड़े ही गाता है? हम सबमें प्राण संचार के लिए गाता है, गति देने के लिए गाता है। उन स्वरों को सुनें, अंतर में झंकृत होने दें। फिर अपने आप एक सिहरन उठेगी, होंठ फड़केंगे, पाँव थिरकेंगे। यह कोई सामान्य गीत नहीं, यह तो अभियान गीत है। उस पर तबले की नहीं, कदमों की ताल दी जाती है। संगति के लिए अलाप नहीं, क्रियाकलाप सँभालने पड़ते हैं।

🔴 गीता वह अकेले नहीं गाता, बहुतों को साथ लेकर गाता है। उसका साथ देना, जो सीख ले, वही संगति दे पाता है। उसका ढंग ही कुछ निराला है। अर्जुन ने संगति दी-तानपूरे का तार चढ़ाकर नहीं-गाण्डीव की प्रत्यंचा से, गुरुगोविंदसिंह ने मँजीरे नहीं तलवारें खनखनायी। उसकी संगति में विवेकानन्द ने स्वर अलापा और विनोबा के पग थिरके। हर युग में उसकी गति के अलग ढंग बनते हैं। ‘‘करिष्ये वचनं तव’’ का संकल्प जगते ही उसका ढंग अपने आप समझ में आ जाता है।

🔵 पर हम गीता गाना कहाँ चाहते हैं? वह गीता कहाँ सुनना चाहते हैं, जिससे जीवन फड़क उठे और धन्य हो जाए। लेकिन जिस आनन्द की लहरें उठाने के लिए हम गीत गाने का असफल प्रयोग करते रहे हैं, वह तो गीता गाने से मिलेगा। आओ इसी क्षण अपने गीत की सीमा से आगे बढ़ें, उसकी गीता गाएँ।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 69

👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 May

🔴 प्रसन्नता और आनन्द में मौलिक अन्तर है। प्रसन्नता इच्छित भौतिक वस्तुओं की उपलब्धि पर होती है। पर वह देर तक टिकती नहीं। क्योंकि उससे भी बड़ी उपलब्धि की उत्कण्ठा तत्काल आ दबोचती है। सौ रुपये का लाभ हुआ। क्षण भर प्रसन्नता हुई। दूसरे ही क्षण, हजार की लालसा जग पड़ी और वे सौ रुपये अपर्याप्त लगने लगे। असन्तोष उत्पन्न करने लगे। साथ ही उन सौ रुपयों की रखवाली का नया ताना-बाना बुनना पड़ा। इतना ही नहीं जब उनके खर्च का हाथ बढ़ता है तो मुफ्त का या अनीति उपार्जित धन मात्र कुमार्ग में जाने के लिए रास्ता बनाता है। नशा, जुआ, शृंगार, व्यभिचार, ठाट-बाट बनाने जैसी बातें सूझती हैं। क्षण भर की प्रसन्नता कुछ ही क्षणों में नई चिन्ताओं और हैरानियों का बोझ लाद देती है।

🔵 सन्तोषी, प्रसन्नचित्त, कर्तव्यपरायण, सज्जन, समझदार, ईमानदार, जिम्मेदार और बहादुर मनुष्य जिसके प्रौढ़ और परिपक्व मन:स्थिति में रहते हैं उसे स्वर्ग कहते हैं। कठिनाइयां उनके सामने भी आती रहती हैं, पर वे उन्हें अपनी परीक्षा मानते हैं कि समाधान खोजने या सहने का पराक्रम या साहस उदय हुआ या नहीं। ऐसी आत्माएं स्वर्गलोक में काम करती हैं। उनकी प्रसन्नता, प्रफुल्लता को कोई छीन नहीं सकता है।                  
                                                     
🔴 मुक्ति भव-बन्धनों से छुटकारे को कहते हैं। भव-बन्धनों में हथकड़ी, बेड़ी और गले की तौक की तुलना दी गई है। पर इन्हें क्रूर, दुर्धर्ष अपराधियों को बन्दीगृहों में ही पहनाया जाता है। सामान्य लोग तो खुले हुए भी फिरते हैं। इस बन्धन अलंकार का तात्पर्य लोभ, मोह और अहंकार से है। उन्हें मनुष्य स्वयं ही अपने ऊपर लादता और मकड़ी के जाले की तरह उनमें स्वयं ही फंसता है। वह चाहे तो उस जाल-जंजाल को विवेक दृष्टि अपनाकर आसानी से समेट भी सकता है।       

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 नारी को समुचित सम्मान एवं उत्थान दीजिए।

🔵 कोई भी समाज नारी-पुरुष के युग्म से बनता है, समाज ही क्यों, सच्ची बात तो यह है कि सृष्टि के क्रम का मूलभूत कारण ही यह जोड़ा है। इसमें भी नारी का स्थान प्रमुख है। क्योंकि संसार एवं सृष्टि क्रम में पुरुष एक साधारण-सा हेतु है, बाकी सारा काम एक मात्र नारी को ही करना पड़ता है।

🔴 सन्तान धारण करने का काम से लेकर उसको जन्म देने और पालन करने का सारा दायित्व एक मात्र नारी ही उठाया करती है। सन्तान का प्रजनन एवं पालन मात्र नारी की कृपा पर ही निर्भर है। घर बसाना, उसे चलाना और उसकी व्यवस्था रखना नारी के हाथ में ही है। यदि वह अपने इस दायित्व से विमुख हो जाये अथवा इसमें उपेक्षा बरतने लगे तो कुछ ही समय में यह व्यवस्थित दिखलाई देने वाला समाज अस्त-व्यस्त और ऊबड़-खाबड़ दिखाई देने लगे। इस प्रकार यदि ध्यान से विचार किया जाये तो पता चलेगा, सृष्टि से लेकर समाज तक का संचालन क्रम मुख्यतः नारी पर निर्भर है। पुरुष तो इसके एक सहायक हेतु है। तब ऐसी नारी निर्मात्री, धात्री और व्यवस्थापिका जैसी पूजा-पत्री का तिरस्कार, अपमान, उपेक्षा अथवा अवहेलना करना कहाँ तक उचित है?

🔵 जो धारिका, धात्री और निर्मात्री है, यदि वह अपने तन-मन से प्रसन्न और प्रफुल्ल रहेगी तो उसकी सृष्टि भी उसी प्रकार की प्रसन्न एवं प्रफुल्ल होगी और यदि वह मलीन रहती है, तो उसका सृजन भी उतना ही मलीन और अयोग्य होगा। इसीलिये बुद्धिमान व्यक्ति , नारी का समुचित आदर करते हुए उसे प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं।

🔴 जब-जब जिन समाजों में नारी का समुचित स्थान रहा है, उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास की व्यवस्था रक्खी गई है, तब तब वे समाज, संसार में समुन्नत होकर आगे बढ़े हैं और जब-जब इसके प्रतिकूल आचरण किया गया है, तब-तब समाजों का पतन होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/April/v1.27

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 2)

🌹 युग निर्माण मिशन का घोषणा-पत्र

🔵 आज प्रत्येक विचारशील व्यक्ति यह अनुभव करता है कि मानवीय चेतना में वे दुर्गुण पर्याप्त मात्रा में बढ़ चले हैं, जिनके कारण अशान्ति और अव्यवस्था छाई रहती है। इस स्थिति में परिवर्तन की आवश्यकता अनिवार्य रूप से प्रतीत होती है, पर यह कार्य केवल आकांक्षा मात्र से पूर्ण न हो सकेगा, इसके लिए एक सुनिश्चित दिशा निर्धारित करनी होगी और उसके लिए सक्रिय रूप से संगठित कदम बढ़ाने होंगे। इसके बिना हमारी चाहना एक कल्पना मात्र बनी रहेगी।

🔴 युग निर्माण सत्संकल्प उसी दिशा में एक सुनिश्चित कदम है। इस घोषणापत्र में सभी भावनाएँ धर्म और शास्त्र की आदर्श परंपरा के अनुरूप एक व्यवस्थित ढंग से सरल भाषा में संक्षिप्त शब्दों में रख दी गई और चिंतन करें तथा यह निश्चय करें कि हमें अपना जीवन इसी ढाँचे में ढालना है। दूसरों को उपदेश करने की अपेक्षा इस संकल्प पत्र में आत्म-निर्माण पर सारा ध्यान केंद्रित किया गया है। दूसरों को कुछ करने के लिए कहने का सबसे प्रभावशाली तरीका एक ही है कि हम वैसा करने लगें। अपना निर्माण ही युग निर्माण का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है। बूँद-बूँद जल के मिलने से ही समुद्र बना है। एक-एक अच्छा मनुष्य मिलकर ही अच्छा समाज बनेगा। व्यक्ति निर्माण का व्यापक स्वरूप ही युग निर्माण के रूप में परिलक्षित होगा।

🔵 प्रस्तुत युग निर्माण सत्संकल्प की भावनाओं का स्पष्टीकरण और विवेचन पाठक इसी पुस्तक के अगले लेखों में पढ़ेंगे। इस भावनाओं को गहराई से अपने अंतःकरणों में जब हम जान लेंगे, तो उसका सामूहिक स्वरूप एक युग आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत होगा और उसकी पूर्ति के लिए अनेक देवता, अनेक महामानव, नर तन में नारायण रूप धारण करके प्रगट हो पड़ेंगे। युग परिवर्तन के लिए जिस अवतार की आवश्यकता है, वह पहले आकांक्षा के रूप में ही अवतरित होगा। इसी अवतार का सूक्ष्म स्वरूप यह युग निर्माण सत्संकल्प है, इसके महत्त्व का मूल्यांकन हमें गंभीरतापूर्वक ही करना चाहिए। युग निर्माण सत्संकल्प का प्रारूप निम्न प्रकार है—

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.4
 

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...