रविवार, 14 मई 2017

👉 नारी को समुचित सम्मान एवं उत्थान दीजिए।

🔵 कोई भी समाज नारी-पुरुष के युग्म से बनता है, समाज ही क्यों, सच्ची बात तो यह है कि सृष्टि के क्रम का मूलभूत कारण ही यह जोड़ा है। इसमें भी नारी का स्थान प्रमुख है। क्योंकि संसार एवं सृष्टि क्रम में पुरुष एक साधारण-सा हेतु है, बाकी सारा काम एक मात्र नारी को ही करना पड़ता है।

🔴 सन्तान धारण करने का काम से लेकर उसको जन्म देने और पालन करने का सारा दायित्व एक मात्र नारी ही उठाया करती है। सन्तान का प्रजनन एवं पालन मात्र नारी की कृपा पर ही निर्भर है। घर बसाना, उसे चलाना और उसकी व्यवस्था रखना नारी के हाथ में ही है। यदि वह अपने इस दायित्व से विमुख हो जाये अथवा इसमें उपेक्षा बरतने लगे तो कुछ ही समय में यह व्यवस्थित दिखलाई देने वाला समाज अस्त-व्यस्त और ऊबड़-खाबड़ दिखाई देने लगे। इस प्रकार यदि ध्यान से विचार किया जाये तो पता चलेगा, सृष्टि से लेकर समाज तक का संचालन क्रम मुख्यतः नारी पर निर्भर है। पुरुष तो इसके एक सहायक हेतु है। तब ऐसी नारी निर्मात्री, धात्री और व्यवस्थापिका जैसी पूजा-पत्री का तिरस्कार, अपमान, उपेक्षा अथवा अवहेलना करना कहाँ तक उचित है?

🔵 जो धारिका, धात्री और निर्मात्री है, यदि वह अपने तन-मन से प्रसन्न और प्रफुल्ल रहेगी तो उसकी सृष्टि भी उसी प्रकार की प्रसन्न एवं प्रफुल्ल होगी और यदि वह मलीन रहती है, तो उसका सृजन भी उतना ही मलीन और अयोग्य होगा। इसीलिये बुद्धिमान व्यक्ति , नारी का समुचित आदर करते हुए उसे प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं।

🔴 जब-जब जिन समाजों में नारी का समुचित स्थान रहा है, उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास की व्यवस्था रक्खी गई है, तब तब वे समाज, संसार में समुन्नत होकर आगे बढ़े हैं और जब-जब इसके प्रतिकूल आचरण किया गया है, तब-तब समाजों का पतन होता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/April/v1.27

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