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सोमवार, 24 जुलाई 2023

कृत्रिम पैरों से एवरेस्ट पर फतह, अरुणिमा के हौसले को सलाम...

भारत सरकार ने ६६ वें गणतंत्र दिवस पर जिन लोगों के नामों की घोषणा पद्म पुरस्कारों के लिये की उनमें एक नाम अरुणिमा सिन्हा का भी है। उत्तरप्रदेश की अरुणिमा सिन्हा को "पद्मश्री" के लिये चुना गया। "पद्मश्री" भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाला चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। भारत रत्न, पद्मविभूषण और पद्मभूषण के बाद पद्म श्री ही सबसे बड़ा सम्मान है। किसी भी क्षेत्र में असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए पद्म सम्मान दिए जाते हैं। खेल-कूद के क्षेत्र में असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए अरुणिमा सिन्हा को "पद्म श्री" देने का ऐलान किया गया। अरुणिमा सिन्हा दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करने वाली दुनिया की पहली विकलांग महिला हैं। २१ मई, २०१३ की सुबह १०. ५५ मिनट पर अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर २६ साल की उम्र में विश्व की पहली विकलांग पर्वतारोही बनने का गौरव हासिल किया। खेलकूद के क्षेत्र में जिस तरह अरुणिमा की कामयाबी असाधारण है उसी तरह उनकी ज़िंदगी भी असाधारण ही है।


अरूणिमा को कुछ बदमाशों ने चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया था। अरुणिमा ने इन बदमाशों को अपनी चेन छीनने नहीं दिया था जिससे नाराज़ बदमाशों से उन्हें चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया। इस हादसे में बुरी तरह ज़ख़्मी अरुणिमा की जान तो बच गयी थी लेकिन उन्हें ज़िंदा रखने ले लिए डाक्टरों को उनकी बायीं टांग काटनी पड़ी। अपना एक पैर गँवा देने के बावजूद राष्ट्रीय स्टार पर वॉलीबाल खेलने वाली अरुणिमा ने हार नहीं मानी और हमेशा अपना जोश बनाये रखा। 

भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह और देश के सबसे युवा पर्वतारोही अर्जुन वाजपेयी के बारे में पढ़कर अरुणिमा ने उनसे प्रेरणा ली। फिर माउंट एवरेस्ट पर फतह पाने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल से मदद और प्रशिक्षण लेकर एवरेस्ट पर विजय हासिल की।


अरुणिमा ने एवरेस्ट पर फतह करने से पहले ज़िंदगी में कई उतार चढ़ाव देखे। कई मुसीबतों का सामना किया । कई बार अपमान सहा । बदमाशों और शरारती तत्वों के गंदे और भद्दे आरोप सहे । मौत से भी संघर्ष किया। कई विपरीत परिस्थितियों का सामना किया । लेकिन, कभी हार नहीं मानी । कमज़ोरी को भी अपनी ताकत बनाया। मजबूत इच्छा-शक्ति, मेहनत, संघर्ष और हार न मानने वाले ज़ज़्बे से असाधारण कामयाबी हासिल की। दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पर पहुँच कर अरुणिमा ने साबित किया कि हौसले बुलंद हो तो ऊंचाई मायने नहीं रखती, इंसान अपने दृढ़ संकल्प, तेज़ बुद्धि और मेहनत से बड़ी से बड़ी कामयाबी हासिल कर सकता है। अरुणिमा सिन्हा अपने संघर्ष और कामयाबी की वजह से दुनिया-भर में कई लोगों के लिए प्रेरणा बन गयी हैं। किसी महिला या युवती की ज़िंदगी की तरह साधारण नहीं अरुणिमा की ज़िंदगी की कई घटनाएं।

बहादुरी की अद्भुत मिसाल पेश करने वाली अरुणिमा का परिवार मूलतः बिहार से है। उनके पिता भारतीय सेना में थे। स्वाभाविक तौर पर उनके तबादले होते रहते थे। इन्हीं तबादलों के सिलसिले में उन्हें उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर आना पड़ा था। लेकिन, सुल्तानपुर में अरुणिमा के परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। अरुणिमा के पिता का निधन हो गया। हँसते-खेलते परिवार में मातम छा गया।
 
 पिता की मृत्यु के समय अरुणिमा की उम्र महज़ साल थी। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और देखभाल की सारी ज़िम्मदेारी माँ पर आ पड़ी। माँ ने मुश्किलों से भरे इस दौर में हिम्मत नहीं हारी और मजबूत फैसले लिए। माँ अपने तीनों बच्चों- अरुणिमा, उसकी बड़ी बहन लक्ष्मी और छोटे भाई को लेकर सुल्तानपुर से अम्बेडकरनगर आ गयीं। अम्बेडकरनगर में माँ को स्वास्थ विभाग में नौकरी मिल गयी, जिसकी वजह से बच्चों का पालन-पोषण ठीक तरह से होने लगा। बहन और भाई के साथ अरुणिमा भी स्कूल जाने लगी। स्कूल में अरुणिमा का मन पढ़ाई में कम और खेल-कूद में ज्यादा लगने लगा था। दिनब दिन खेल-कूद में उसकी दिलचस्पी बढ़ती गयी। वो चैंपियन बनने का सपना देखने लगी।
   जान-पहचान के लोगों ने अरुणिमा के खेल-कूद पर आपत्ति जताई, लेकिन माँ और बड़ी बहन ने अरुणिमा को अपने मन की इच्छा के मुताबिक काम करने दिया। अरुणिमा को फुटबॉल, वॉलीबॉल और हॉकी खेलने में ज्यादा दिलचस्पी थी। जब कभी मौका मिलता वो मैदान चली जाती और खूब खेलती। अरुणिमा का मैदान में खेलना आस-पड़ोस के कुछ लड़कों को खूब अखरता। वो अरुणिमा पर तरह-तरह की टिपाणियां करते। अरुणिमा को छेड़ने की कोशिश करते। लेकिन, अरुणिमा शुरू से ही तेज़ थी और माँ के लालन-पालन की वजह से विद्रोही स्वभाव भी उसमें था। वो लड़कों को अपनी मन-मानी करने नहीं देती ।
     अरुणिमा ने इस दौरान कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और अपनी प्रतिभा से कईयों को प्रभावित किया। उसने खूब वॉलीबॉल-फुटबॉल खेला, कई पुरस्कार भी जीते। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी खेलना का मौका मिला।  इसी बीच अरुणिमा की बड़ी बहन की शादी हो गई। शादी के बाद भी बड़ी बहन ने अरुणिमा का काफी ख्याल रखा। बड़ी बहन की मदद और प्रोत्साहन की वजह से ही अरुणिमा ने खेल-कूद के साथ साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। उसके कानून की पढ़ाई की और एलएलबी की परीक्षा भी पास कर ली। घर-परिवार चलाने में माँ की मदद करने के मकसद ने अरुणिमा ने अब नौकरी करने की सोची। नौकरी के लिए उसने कई जगह अर्ज़ियाँ दाखिल कीं।
     इसी दौरान उसे केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल यानी सीआईएसएफ के दफ्तर से बुलावा आया। अफसरों से मिलने वो नॉएडा के लिए रवाना हो गयी। अरुणिमा पद्मावत एक्सप्रेस पर सवार हुई और एक जनरल डिब्बे में खिड़की के किनारे एक सीट पर बैठ गयी। कुछ ही दर बाद कुछ बदमाश लड़के अरुणिमा के पास आये और इनमें से एक ने अरुणिमा के गले में मौजूद चेन पर झपट्टा मारा। अरुणिमा को गुस्सा आ आया और वो लड़के पर झपट पड़ी। दूसरे बदमाश साथी उस लड़के की मदद के लिए आगे आये और अरुणिमा को दबोच लिया। लेकिन, अरुणिमा ने हार नहीं मानी और लड़कों से झूझती रही। लेकिन , उन बदमाश लड़कों ने अरुणिमा को हावी होने नहीं दिया। इतने में ही कुछ बदमाशों ने अरुणिमा को इतनी ज़ोर से लात मारी की कि वो चलती ट्रेन से बाहर गिर गयी। अरुणिमा का एक पाँव ट्रेन की चपेट में आ गया। और वो वहीं बेहोश हो गयी। रात-भर अरुणिमा ट्रेन की पटरियों के पास ही पड़ी रही। सुबह जब कुछ गाँव वालों ने उसे इस हालत में देखा तो वो उसे अस्पताल ले गए। जान बचाने के लिए डाक्टरों को अस्पताल में अरुणिमा की बायीं टांग काटनी पड़ी।
जैसे ही इस घटना की जानकारी मीडियावालों को हुई, ट्रेन की ये घटना अखबारों और न्यूज़ चैनलों की सुर्ख़ियों में आ गयी। मीडिया और महिला संगठनों के दबाव में सरकार को बेहतर इलाज के लिए अरुणिमा को लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराना पड़ा
          अस्पताल में इलाज के दौरान समय काटने के लिए अरुणिमा ने अखबारें पढ़ना शुरू किया । एक दिन जब वह अखबार पढ़ रही थी।उसकी नज़र एक खबर पर गयी। खबर थी कि नोएडा के रहने वाले 17 वर्षीय अर्जुन वाजपेयी ने देश के सबसे युवा पर्वतारोही बनने का कीर्तिमान हासिल किया है। इस खबर ने अरुणिमा के मन में एक नए विचार को जन्म दिया। खबर ने उसके मन में एक नया जोश भी भरा था। अरुणिमा के मन में विचार आया कि जब 17 साल का युवक माउंट एवरेस्ट पर विजय पा सकता है तो वह क्यों नहीं?
    उसे एक पल के लिए लगा कि उसकी विकलांगता अड़चन बन सकती हैं। लेकिन उसने ठान लिया कि वो किसी भी सूरतोहाल माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर की रहेगी। उसने अखबारों में क्रिकेटर युवराज सिंह के कैंसर से संघर्ष के बाद फिर मैदान में फिर से उतरने की खबर भी पढ़ी। उसका इरादा अब बुलंद हो गया।
      लेकिन, कृतिम टांग लगने के बावजूद कुछ दिनों तक अरुणिमा की मुश्किलें जारी रहीं। विकलांगता का प्रमाण पत्र होने बावजूद लोग अरुणिमा पर शक करते। एक बार तो रेलवे सुरक्षा बल के एक जवान ने अरुणिमा की कृतिम टांग खुलवाकर देखा कि वो विकलांग है या नहीं। ऐसे ही कई जगह अरुणिमा को अपमान सहने पड़े।
वैसे तो ट्रेन वाली घटना के बाद रेल मंत्री ममता बनर्जी ने नौकरी देने की घोषणा की थी, लेकिन रेल अधिकारियों ने इस घोषणा पर कोई कार्यवाही नहीं की और हर बार अरुणिमा को अपने दफ्तरों से निराश ही लौटाया । अरुणिमा कई कोशिशों के बावजूद रेल मंत्री से भी नहीं मिल पाई , लेकिन अरुणिमा ने हौसले बुलंद रखे और जो अस्पताल मैं फैसला लिया था उसे पूरा करने के लिए काम चालू कर दिया।
    अरुणिमा ने किसी तरह बछेंद्री पाल से संपर्क किया। बछेंद्री पाल माउंट एवरेस्ट पर फतह पाने वाली पहली भारतीय महिला थीं। बछेंद्री पाल से मिलने अरुणिमा जमशेदपुर गयीं। बछेंद्री पाल ने अरुणिमा को निराश नहीं किया। अरुणिमा को हर मुमकिन मदद दी और हमेशा प्रोत्साहित किया।
    अरुणिमा ने उत्तराखंड स्थित नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनरिंग (एनआइएम) से पर्वतारोहण का २८ दिन का प्रशिक्षण लिया।उसके बाद इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन यानी आइएमएफ ने उसे हिमालय पर चढ़ने की इजाजत दे दी। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद ३१ मार्च, २०१२ को अरुणिमा का मिशन एवरेस्ट शुरु हुआ। अरुणिमा के एवरेस्ट अभियान को टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन ने प्रायोजित किया । फाउंडेशन ने अभियान के आयोजन और मार्गदर्शन के लिए २०१२ में एशियन ट्रेकिंग कंपनी से संपर्क किया था।
    एशियन ट्रेकिंग कंपनी ने २०१२ के वसंत में अरुणिमा को नेपाल की आइलैंड चोटी पर प्रशिक्षण दिया। ५२ दिनों के पर्वतारोहण के बाद २१ मई, २०१३ की सुबह १०. ५५ मिनट पर अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया और २६ साल की उम्र में विश्व की पहली विकलांग पर्वतारोही बनीं।
      कृत्रिम पैर के सहारे माउंट एवरेस्ट पर पहुँचने वाली अरुणिमा सिन्हा यहीं नहीं रुकना चाहती हैं। वो और भी बड़ी कामयाबियां हासिल करने का इरादा रखती हैं। उनकी इच्छा ये भी है कि वे शारीरिक रूप से विकलांग लोगों को कुछ इस तरह की मदद करें कि वे भी आसाधारण कामयाबियां हासिल करें और समाज में सम्मान से जियें।

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रविवार, 2 जुलाई 2023

👉 गुरु पूर्णिमा-प्रेरणा

पूर्णिमा पर पूर्ण-गुरु की वंदना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥1॥

पूर्ण के प्रतिनिधि ‘गुरु’ हैं, बताती गुरुपूर्णिमा। सृजन पोषण और रक्षण में, निरत तप-साधना

‘गुरु’ ब्रह्मा, विष्णु, शिव हैं अर्चना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥2॥

शिष्य-अनगढ़ को बनाती सुगढ़, उनकी साधना। स्नेह का अमृत पिलाती, भव्य उनकी भावना॥

अमंगल के शत्रु-शिव की साधना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥3॥

काटते अज्ञान-तम को, ज्ञान-गुरुता से सदा-ज्ञान-किरणें प्रस्फुटित हैं, देव-सविता से सदा॥

ज्योति के चिरपुँज की आराधना की लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥4॥

ग्रसित हो अज्ञान-तम से, भटकती है मनुजता। दाँव ऐसे में लगाती है मनुज पर, दनुजता॥

मनुजता की मुक्ति की संवेदना कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥5॥

प्रज्वलित कर प्राण-दीपक ज्योति को चिरपुँज से। शाँति का संदेश लेकर, शाँति के गुरु-कुँज से॥

अमावस्या को पतन की, पूर्णिमा कर लीजिये॥ ‘पूर्णिमा’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥6॥

ज्ञानमय की ले मशालें, सँवारें उज्ज्वल-भविष्य-लोक मंगल-यज्ञ में गुरुदक्षिणा में दे हविष्य।

गुरुकृपा से ‘स्वर्ग’ की अवतरण कर लीजिये। ‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥7॥

- मंगल विजय ‘विजय वर्गीय’

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शनिवार, 25 मार्च 2023

👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान

🔴 नवरात्रि साधना को दो भागें में बाँटा जा सकता है : एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार- विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है। 

🔵 जप संख्या के बारे में विधान यह है कि ९ दिनों में २४ हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। कारण २४ हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन २७ माला जप करने से ९ दिन में २४० मालायें अथवा २४०० मंत्र जप पूरा हो जाता है। माला में यों १०८ दाने होते हैं पर ८ अशुद्ध उच्चारण अथवा भूल- चूक का हिसाब छोड़ कर गणना १०० की ही की जाती है। इसलिये प्रतिदिन २७ माला का क्रम रखा जाता है। मोटा अनुपात घण्टे में ११- ११ माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः २(१/२) घण्टे इस जप में लग जाते हैं। चूंकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से ४५ मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। अस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है। 

🔴 आजकल हर बात में नकलीपन की भरमार है। मालाएँ भी बाजार में नकली लकड़ी की बिकती हैं। अच्छा यह है कि उसमें छल- कपट न हो जिस चीज की है उसी की जानी और बताई जाय। कुछ के बदले में कुछ मिलने का भ्रम न रहे। तुलसी, चन्दन और रूद्राक्ष की मालाएँ अधिक पवित्र मानी गई हैं। इनमें से प्रायः चन्दन की ही आसानी से मिल सकती हैं। गायत्री तप मे तुलसी की माला को प्रधान माना गया है, पर वह अपने यहाँ बोई हुई सूखी लकड़ी की हो और अपने सामने बने तो ही कुछ विश्वास की बात हो सकती है। बाजार में अरहर की लकड़ी ही तुलसी के नाम पर हर दिन टनों की तादाद में बनती और बिकती देखी जाती है। हमें चन्दन की माला ही आसानी से मिल सकेगी यों उसमें भी लकड़ी पर चन्दन का सेन्ट चुपड़ का धोखे बाजी खूब चलती है। सावधानी बरतने पर सह समस्या आसानी से हल हो सकती है और असली चन्दन की माला मिल सकती है। 

🔵 एक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारणतया एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। अनुष्ठान में २७ मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती है। देखा जाय किएक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारणतया एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। 

🔴 अनुष्ठान में २७ मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती है। देखा जाय कि अपनी गति से इतना जप करने में कितना समय लगेगा। यह हिसाब लग जाने पर यह सोचना होगा कि प्रातः इतना समय मिलता है या नहीं। उसी अवधि में यह विधान पूरा हो सके प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए। पर यदि अन्य अनिवार्य कार्य करने हैं तो समय का विभाजन प्रातः और सायं दो बार में किया जा सकता है। उन दिनों प्रायः ६ बजे सूर्योदय होता है। दो घण्टा पूर्व अर्थातृ ४ बजे से जप आरम्भ किया जा सकता है सूर्योदय से तीन घण्टे बाद तक अर्थात् ९ बजे तक यह समाप्त हो जाना चाहिए। इन पाँच घण्टों के भीतर ही अपने जप में जो २ (१/२) -३ घण्टे लगेंगे वे पूरे हो जाने चाहिए। यदि प्रातः पर्याप्त समय न हो तो सायंकाल सूर्यास्त से १ घण्टा पहले से लेकर २ घण्टे बाद तक अर्थात् ५ से ८ तक के तीन घण्टों में सवेरे का शेष जप पूरा कर लेना चाहिए। प्रातः ९ बजे बाद और रात्रि को ८ के बाद की नवरात्रि तपश्चर्या निषिद्ध है। यों सामान्य साधना तो कभी भी हो सकती है और मौन मानसिक जप में तो समय, स्थान, संख्या, स्नान आदि का भी बन्धन नहीं है। उसे किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। यह अनुष्ठान के बारे में वैसा नहीं है। उसके लिए विशेष नियमों का कठोरता पूर्वक पालन करना पड़ता है।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2022

👉 स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग शिष्टाचार

🔶 स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि– विश्व में अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते हैं, क्योंकि उनमें समय पर साहस का संचार नही हो पाता और वे भयभीत हो उठते हैं।

🔷 स्वामीजी की कही सभी बातें हमें उनके जीवन काल की घटनाओं में सजीव दिखाई देती हैं। उपरोक्त लिखे वाक्य को शिकागो की एक घटना ने सजीव कर दिया, किस तरह विपरीत परिस्थिति में भी उन्होने भारत को गौरवान्वित किया। हमें बहुत गर्व होता है कि हम इस देश के निवासी हैं जहाँ विवेकानंद जी जैसे महान संतो का मार्ग- दशर्न मिला। आज मैं आपके साथ शिकागो धर्म सम्मेलन से सम्बन्धित एक छोटा सा वृत्तान्त बता रही हूँ जो भारतीय संस्कृति में समाहित शिष्टाचार की ओर इंगित करता है|

🔶 1893 में शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन चल रहा था। स्वामी विवेकानंद भी उसमें बोलने के लिए गये हुए थे।11सितंबर को स्वामी जी का व्याखान होना था। मंच पर ब्लैक बोर्ड पर लिखा हुआ था- हिन्दू धर्म – मुर्दा धर्म। कोई साधारण व्यक्ति इसे देखकर क्रोधित हो सकता था, पर स्वामी जी भला ऐसा कैसे कर सकते थे| वह बोलने के लिये खङे हुए और उन्होने सबसे पहले (अमरीकावासी बहिनों और भाईयों) शब्दों के साथ श्रोताओं को संबोधित किया। स्वामीजी के शब्द ने जादू कर दिया, पूरी सभा ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया।

🔷 इस हर्ष का कारण था, स्त्रियों को पहला स्थान देना। स्वामी जी ने सारी वसुधा को अपना कुटुबं मानकर सबका स्वागत किया था। भारतीय संस्कृति में निहित शिष्टाचार का यह तरीका किसी को न सूझा था। इस बात का अच्छा प्रभाव पङा। श्रोता मंत्र मुग्ध उनको सुनते रहे, निर्धारित 5 मिनट कब बीत गया पता ही न चला। अध्यक्ष कार्डिनल गिबन्स ने और आगे बोलने का अनुरोध किया। स्वामीजी 20 मिनट से भी अधिक देर तक बोलते रहे|

🔶 स्वामीजी की धूम सारे अमेरिका में मच गई। देखते ही देखते हजारों लोग उनके शिष्य बन गए। और तो और, सम्मेलन में कभी शोर मचता तो यह कहकर श्रोताओं को शान्त कराया जाता कि यदि आप चुप रहेंगे तो स्वामी विवेकानंद जी का व्याख्यान सुनने का अवसर दिया जायेगा। सुनते ही सारी जनता शान्त हो कर बैठ जाती।

🔷 अपने व्याख्यान से स्वामीजी ने यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दू धर्म भी श्रेष्ठ है, जिसमें सभी धर्मो को अपने अंदर समाहित करने की क्षमता है। भारतीय संस्कृति, किसी की अवमानना या निंदा नही करती। इस तरह स्वामी विवेकानन्द जी ने सात समंदर पार भारतीय संस्कृति की ध्वजा फहराई।

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

👉 आप पढ़े-लिखे लोगों तक हमारी आवाज पहुंचा दीजिए

हमारे विचारों को आप पढ़िए और हमारी आग की चिनगारी को लोगों में फैला दीजिए। आप जीवन की वास्तविकता के सिद्धान्तों को समझिए। ख्याली दुनियां में से निकलिए। आपके नजदीक जितने भी आदमी हैं उनमें आप हमारे विचारों को फैला दीजिए। यह काम आप अपने काम के साथ-साथ भी कर सकते हैं। आप युग साहित्य लेकर अपने पड़ोसियों को पढ़ाना शुरू कर दीजिए। उनको हमारे विचार दीजिए। हमको आगे बढ़ने दीजिए, सम्पर्क बनाने दीजिए ताकि हम उन विचारशीलों के पास, शिक्षितों के पास जाने में सफल हो सकें। इससे कम में हमारा काम बनने वाला नहीं।

जो हमारा विचार पढ़ेगा-समझेगा, वही हमारा शिष्य है। हमारे विचार बड़े पैने हैं। दुनियां को हम पलट देने का दावा जो करते हैं वह सिद्धान्तों से नहीं, बल्कि अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप इन विचारों को फैलाने में हमारी सहायता कीजिए।
अब हमको नई पीढ़ी चाहिए। इसके लिए आप पढ़े-लिखे विचारशीलों में जाइए। उनकी खुशामद कीजिए, दरवाजा खटखटाइए और किसी भी तरह हमारी विचारधारा उन तक पहुंचाइए। हमने सारे विश्व को अपना कार्यक्षेत्र बनाया है। विचार क्रान्ति अभियान आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस युग की सभी समस्याएं इसलिए पैदा हुई हैं कि आदमी की अक्ल खराब हो गई है।

न पैसा कम है, न कोई चीज कम है, बस अक्ल खराब है। बस इस अक्ल को ठीक करने के लिए ही हमें विचार क्रान्ति में हिस्सा लेना चाहिए। व्यक्ति, समाज, देश, धर्म और संस्कृति के विकास एवं विस्तार करने तथा मानवीय भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए ज्ञान यज्ञ का विस्तार करना चाहिए। आप घर-घर में जाइए, जन-जन के पास जाइए। अलख जगाइए। नवयुग का सन्देश सुनाइए। हमारा साहित्य पढ़वाइए। अगर आपने यह किया तो हमारा दावा है कि युग अवश्य बदलेगा।

~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
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मंगलवार, 8 मार्च 2022

👉 बुढ़ापा

"मम्मा ये बताओ, दादा दादी आपको बहुत परेशान करते हैं ना.."
"हाँ बेटा पर क्या कर सकते हैं.. अब हैं यहाँ तो झेलना ही पड़ेगा |"
"पर क्यूँ मम्मा... क्यूँ झेलना पड़ेगा"

"तुम नही समझोगे रहने दो"

"एक काम करते हैं मम्मा, इन दोनो को चाचा चाची के घर भेज देते हैं"
"वो वहाँ दो दिन भी नही रह पायेंगे बेटा.. चाची तो दादी को देखते ही तुनक जाती है और चाचा तो तुम्हारे चाची के पल्ले से ऐसे बँधे हैं कि वो उतना ही सुनते हैं जितना चाची कहती है | वहाँ इनका कोई गुज़ारा नही होने वाला | "

"तो बुआ को बोल दो ना ये उनके भी तो माँ पापा हैं ना , वो ही ले जायें कुछ दिनों के लिए इन दोनो को| "

"तुम भी ना बड़े भोले हो बेटा.. वहाँ नही जायेंगे दादा दादी.. ढकोसला करेंगे कि हम तो बेटी के घर का पानी भी नही पी सकते तो वहाँ जा कर रहेंगे कैसे और अगर रहने को तैयार हो भी गये तो तुम्हारी बुआ के पचासों बहाने निकल आयेंगे | वो कम थोड़े ना है, वो भी तो अपनी माँ पर ही गयी है | "

"क्या मम्मा मतलब कोई इन्हे अपने साथ नही रखना चाहता | एक काम करो मम्मा इन्हे वहाँ पहुँचा दो... वो मैने टीवी पर देखा था कुछ ओल्ड ऐज होम टाइप से है.. अरे वो जो उस दिन मूवी में आ रहा था | "

"वृद्धाआश्रम कहते हैं उसे ... मैं भी थक जाती हूँ काम कर के.. सुबह उठने से सोने तक इनके नखरे झेलना... तौबा तौबा... कब तक आखिर .. मैं भी कुछ दिन और देख रही हूँ..नहीं तो तुम्हारे पापा से बात करूँगी कि वो इन दोनो को वहीं छोड़ आये |"

"हाँ यही ठीक रहेगा.. दादी दिन भर टोकती रहती है.. टीवी मत देखो, मोबाइल मत खेलो..... मैं बच्चा थोड़े ना हूँ.. बड़ा हो रहा हूँ मैं... समझदार हो रहा हूँ.. ये भी कोई बात हुयी भला. .. हुँ...ह |"

"अरे मेरा राजा बेटा...इतना गुस्सा.... दस साल के ही हो अभी.. मेरी आँखो के तारे हो तुम.... इतनी जल्दी बड़े हो जाओगे कभी सोचा ही नही था | अब देखो तुम बड़े होते जाओगे और हम बूढ़े होते जाएँगे | फिर तुम्हारी शादी करेंगे.. प्यारी सी दुल्हनियाँ लायेंगे | "

"नहीं मम्मा प्लीज़.... मैं तो बड़ा हो रहा हूँ पर आप लोग प्लीज़ बूढ़े मत होना |"
"हा हा हा क्यूँ बेटा.. बूढ़ा तो सबको ही होना है एक दिन "

"पर मम्मा आप लोग बूढ़े हो जाओगे और मेरी वाइफ आयेगी तो उसे भी ऐसे ही परेशान होना पड़ेगा ना.. वो भी तरह तरह के आईडिया सोचेगी कि कैसे आप लोगों को यहाँ से हटाया जाये..  नो मम्मा प्लीज़ नो..आप भी दादी की तरह हो जाओगी और मेरी वाइफ को परेशान करोगी .... . मैं ऐसा नही होने दूँगा... एक काम करूँगा.. मैं मेरी शादी होते ही आप दोनों के लिए ओल्ड ऐज होम बुक करवा दूँगा जहाँ आप लोग रह सकोगे और मैं और मेरी वाइफ भी चैन से रह लेंगे |"

"हुँ...ह.. हमारा घर है हमारे पास... तुम रहना अपने घर में अपनी वाइफ को लेकर | यही करोगे तुम... पाल पोस कर बड़ा कर रहे हैं और तुम हमें वृद्धा आश्रम भेजने की तैयारी कर रहे हो | वाह बेटा वाह... | "

"मम्मा.. मैं कहाँ कुछ गलत कह रहा हूँ | दादा दादी ने भी तो पापा बुआ को पाला पोसा ही होगा ना...सभी माँ बाप पालते हैं अपने बच्चों को, उसमें क्या नया है... . पर अब जब सब बड़े हो गये हैं तो कोई बूढ़े लोगों को अपने पास नही रखना चाहता तो भला मैं क्यूँ रखूँगा, परेशानी बढ़ाते हैं ये बूढ़े लोग | मैं भी नही रखूँगा और साइंटिस्ट बन कर कोई ऐसी दवा बनाऊँगा जिससे कि मैं कभी बूढ़ा ही ना हो पाऊँ और मेरे बच्चों को कोई ओल्ड ऐज होम ना ढूँढना पड़े |"

अपने बेटे की बातें सुन माँ के शरीर में सिहरन सी दौड़ गयी और जिन आँखो में कुछ देर पहले परेशानी, व्यथा, गुस्सा दिख रहा था उन्ही आँखो में अब शर्म पानी का रूप ले चुका थी |

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शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

रानी लक्ष्मी बाई


मोरोपंत और भागीरथी की, मणिकर्णिका दुलारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु  दुर्गा अवतारी थी।।   

बाजीराव के राज सभा में, बचपन उनका बीता था।
शास्त्रों की ज्ञाता थीं उनको, प्रिय रामायण गीता था।।
दरबारी बचपन से थी तो, राज काज में दक्ष रहीं ।
प्रजाहित की समझ उसे थी, न्याय हेतु निष्पक्ष रहीं।।
शिवा थे आदर्श मनु के, समर भूमि फुलवारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु दुर्गा अवतारी थी।।   

शस्त्र चलाना बचपन से ही, बड़े  चाव से सीखा था।
भाला बरछा तलवारों से, मनु से न कोई जीता था।।
तीर कमान समशीर सदा, हाथों में शोभा पाते थे।
बड़े बड़े योद्धा भी उनसे, लड़कर हार ही जाते थे।।
दुश्मन तो थर थर कापें थे, जब उनने हुंकारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु दुर्गा अवतारी थी।।   

राव गंगाधर संग फेरे ले, अब झाँसी की रानी थी।
मनु से लक्ष्मी बाई बनी वो, आगे असल कहानी थी।
अंग्रेजों के हड़प नीति ने, झांसी को अवसाद दिया।
किया खजाना जब्त राज्य का, राजकोष बर्बाद किया।।  
झाँसी को रक्षित करने का, संकल्प लिए ये नारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु दुर्गा अवतारी थी।।   

रणचंडी बन कूद पड़ी वह, अंग्रेजों से टकराई थी।
युद्ध भूमि में रण कौशल से, उनको धुल चटाई थी।।
हारी गयी अंग्रेजी सेना, कालपी ग्वालियर भी हारी।
झांसी की रानी काली बन, रिपुओं पर वो थी भारी।।
वीरगति को पायी रानी, वीरांगना अवतारी थी।
वाराणसी की वीर छबीली, मनु दुर्गा अवतारी थी।।   

उमेश यादव

शनिवार, 8 मई 2021

👉 चाफेकर बन्धु

8 मई, 1859 बलिदान दिवस
                    
चाफेकर बन्धु तीन भाई थे, तीनों सगे भाई थे और तीनों को ही फाँसी की सज़ा हुई. उनके नाम थे दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर और वासुदेव हरि चाफेकर.
                   
फाँसी लगने के पश्चात् स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता चाफेकर बन्धुओं की माँ को सांत्वना देने के लिए उनके परिवार में पहुँची. उनकी माँ को देखकर वह स्तब्ध रह गयीं.
                  
उनकी कल्पना के विपरीत वह माँ बिलकुल शान्त, अविचल, मुख मण्डल पर वेदना की एक भी रेखा नहीं बल्कि गर्व से माथा उन्नत. सांत्वना के कोई भी शब्द कहे बिना केवल चरणस्पर्श करके वह वापस आ गयीं.
                   
सन् 1857 में पूना में प्लेग की महामारी फैली. लोग चूहों की तरह फटाफट मरने लगे. सरकार ने उसकी रोकथाम के लिए चार्ल्स रैंड को लगाया. उसके सिपाही रोकथाम के नाम पर हर घर में घुस जाते. जूता पहनकर पूजा गृह तथा रसोईघर में घुस जाते.
                    
महिलाओं द्वारा विरोध करने पर उनसे अशिष्ट एवं अभद्र व्यवहार करते. यहाँ तक घर का सामान उठाकर चले जाते. रैंड की कठोरता के विरुद्ध चाफेकर बन्धुओं ने उसे सबक सिखाने का निश्चय किया.
                   
22 जून,1857 को महारानी विक्टोरिया के राज्यभिषेक की हीरक जयंती का समारोह किया जाना था. दामोदर और बालकृष्ण ने विचार किया कि उस दिन मौज मस्ती के कारण रैंड असावधान होगा तब उसका काम तमाम किया जा सकता है.
                   
सांयकाल के समय गवर्नमेंट हाऊस के विशाल समारोह में लगभग साढ़े सात बजे चार्ल्स रैंड की बग्घी पहुँची. तीनों भाई उसकी घात लगाए बैठे थे. रात्रि 12 बजे समारोह समाप्त हुआ. धीरे-धीरे बग्घी वापस आने लगी और बालकृष्ण ने बग्घी को पहचान लिया.
                    
उसने 'नारया नारया' की आवाज़ लगाई आवाज सुनते ही दामोदर पायदान पर चढ़ गया, बायें हाथ से पर्दा हटाया और बिलकुल पास से रैंड पर गोली दाग़ दी, रैंड वहीं ढेर हो गया. दामोदर भाग खड़े हुए.
                       
रैंड की बग्घी के बिलकुल पीछे मि. आयरिश की बग्घी आ रही थी और वह शराब के नशे में धुत था. उनकी पत्नी ने उन्हें सावधान किया किन्तु निष्फल. इसी दौरान एक युवक ने उस पर गोली चला दी और वो भी वहीं ढेर हो गया. वह युवक था बालकृष्ण चाफेकर.
                      
दोनों अंग्रेज़ी अफ़सरों के वध का गुप्तचर विभाग के अध्यक्ष मि. ब्रुइन को सौंपा गया. किन्तु दो महीनों के प्रयास के पश्चात् निराशा ही हाथ लगी. तब उन्हें पकड़वाने के लिए 20 हज़ार रुपये का ईनाम घोषित किया गया. अंत में रामचंद्र द्रविड़ और गणेश शंकर द्रविड़ इस लोभ में आ गये.
                     
उन्होंने ही मि.ब्रुइन को बताया कि यह काम दामोदर चाफेकर और बालकृष्ण चाफेकर का हो सकता है. दामोदर चाफेकर पकड़े गए लेकिन बाल कृष्ण चाफेकर बच निकले.
                    
दामोदर के ख़िलाफ़ कोई सबूत न होते हुए भी न्यायाधीश ने हत्या का मामला बनाकर 18 अप्रैल,1858 को दामोदर हरि चाफेकर को फाँसी की सज़ा दे दी.
                     
अब बालकृष्ण को पकड़ने की बारी थी. उसे पकड़ने के लिए उसके सगे, सम्बन्धियों को तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही थी. तब बालकृष्ण ने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे भी 12 मई,1858 को फाँसी दे दी गयी.
                      
अब गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंद्र द्रविड़ को सबक सिखाने की बात थी. महादेव रानडे और वासुदेव चाफेकर दोनों ने मिलकर द्रविड़ बन्धुओं को अपनी गोली का शिकार बनाया. गणेश तो वहीं ढेर हो गया, रामचंद्र को अस्पताल ले जाया गया, उसने भी वहाँ पहुँचकर दम तोड़ दिया. 20 हज़ार ईनाम के बदले उन्हें मौत का सामना करना पड़ा.
                     
वासुदेव चाफेकर और महादेव रानडे पकड़े गए. मुकद्दमा चला और फाँसी की सज़ा हुई. वासुदेव चाफेकर को 8 मई और महादेव रानडे को 10 मई को फाँसी दे दी गई.

सोमवार, 8 मार्च 2021

👉 मैं नारी हूँ।


मैं नारी हूँ, मैं शक्ति हूँ ,मैं देवी हूँ, अवतारी हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना,ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं ।।
 
कल्याणी, भवानी, सीता भी मैं,गायत्री गंगा गीता भी मैं।
माँ हूँ तो कन्या भी हूँ मैं, भगिनी,बहु,परिणीता भी मैं।।
मुझको डरना मत सिखलाना, मैं दुर्गा हूँ, काली हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं।।
 
वसुंधरा सी सहिष्णुता और सागर की गहराई मुझमें।
सृष्टि चक्र की धुरी हूँ मैं, जीवन मूल समायी मुझमें।।
प्रलय के झंझावातों में भी, शीतलता हूँ,फुलवारी हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं।।
 
मरू का निर्झर, शांत प्रखर,उन्मुक्त प्रवाह की सरिता हूँ मैं।
सबके हित जीती मैं औरत, सहचरी,श्रीमती,वनिता हूँ मैं।।
किसी का भी नहीं मैं दुश्मन, हर दुश्मन पर भारी हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं।।
 
रण में हूँ मैं ,धन में  हूँ मैं, कला,कौशल,विधान में मैं हूँ।
अभिनय,खेल,विज्ञान में हूँ मैं,तकनीकी अभियान में मैं हूँ।।
सम्पूर्ण जगत की जननी मैं हूँ, स्त्री हूँ मैं,न्यारी हूँ मैं।
अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ,चिंगारी हूँ मैं।।
मैं नारी हूँ, मैं शक्ति हूँ ,मैं देवी हूँ, अवतारी हूँ मैं।।

उमेश यादव

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

👉 जुट पड़ें निर्माण में



फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी,
जुट पड़ें निर्माण में अब छोड़कर आलस सभी।

पौष में हम जम गए थे, राह में हम थम गये थे,
बैठे थे खुद में सिमटकर, अपने में ही रम गए थे,
जो न अब भी जाग पाया, जाग पायेगा कभी?
फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी।

माघ है लाया नया संदेश  फिर  उत्साह का,
फिर उठो पाथेय ले चिंतन करो नव राह का,
जो समय आया है  दुर्लभ वो न आएगा कभी,
फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी।

ये न समझो है कठिन भव बंधनो को तोड़ना,
त्यागकर निज स्वार्थ सब जन-जन से खुद को जोड़ना,
फागुनी उल्लास में अब मन मुदित होंगे सभी,
फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी।

रंग बसंती है मिला गुरुवर से ये अनुदान में,
हम नहीं पीछे हटेंगे, त्याग में बलिदान में,
संकल्प पूरे होते हैं जब मिलके करते हैं सभी,
फिर से गूँजा है बसन्ती राग अब जागें सभी।

~ सुधीर भारद्वाज

सोमवार, 9 मार्च 2020

👉 हमारी होली

ऐसी होली जले ज्ञान की ज्योति जगत मे भरदे।
कलुषित कल्मष जले, नाश पापों तापों का कर दे ।।


आप अपने जीवन में कितनी होलियाँ मना चुके, कितने दिवालियाँ बिता चुके, सावन, सनुने, दौज, दशहरे अबतक कितने बिता दिये, जरा उँगलियों पर गिन कर बताइये तो कितनी बार आपने धूम- धाम से तैयारियाँ  की और कितनी बार आनन्द सामग्री को विसर्जित किया। आपने उनमें खोजा, कुछ क्षण पाया भी, परन्तु ओस की बूँदें ठहरीं कब? वे दूसरे ही क्षण जमीन पर गिर पड़ीं और धूलि में समा गईं। इस बार की होली भी ऐसी ही होनी है। चैत बदी प्रतिपदा, दौज, तीज के बाद त्योहार की एक धुँधली सी स्मृति रह जायगी। और चौथ, पाँचें को ही कोई कष्ट आ गया तो भूल जायेंगे कि इसी सप्ताह हमने किसी त्योहार का आनंद भी उठाया था। ऐसे अस्थिर आनंद पर मेरी बधाई कुछ ज्यादा उपयुक्त न होती पर यह छाया दर्शन भी कोई दुख की बात नहीं है।

मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनायें और साथ ही यह भी चिन्तन करें कि जिसकी यह छाया है उस अखण्ड आनन्द को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग- युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ?? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ??

आइये, उस अखण्ड आनन्द को प्राप्त करने के लिए हृदयों में होली जलावें। सच्चे ज्ञान की ऐसी उज्ज्वल ज्वाला हमारे अन्तरों में जल उठे जिसकी लपटें आकाश तक पहुँच। अन्तर के कपट खुल जावें और उस दीप्त प्रकाश में अपना स्वरूप परख सकें। दूसरे पड़ोसी भी उस प्रकाश का लाभ प्राप्त करें। चिरकाल के जमा हुए झाड़ झंखाड़ इस होलिका की ज्वाला में जल जावें। विकारों के राक्षस जो अँधेरी कोठरी में छिपे बैठे हैं और हमें भीतर ही भीतर खोंट खोंप कर खा रहे हैं इसी होलिका में भस्म हो जावें। अपने सब पाप तापों को जला कर हम लोग शुद्ध स्वर्ण की तरह चमकने लगें। उसी निर्मल शरीर से वास्तविक आनन्द प्राप्त किया जा सकेगा।
अखण्ड- ज्योति परिवार के हृदयों में ईश्वर ऐसी ही होली जला दें।
यही आज मेरी प्रार्थना है।

पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

👉 विश्व स्तरीय चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान


Note :
चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान की यह साधना साधकों को अपने घर पर रह कर ही संपन्न करनी है । इस के लिए शांतिकुंज  नहीं आना होगा । पंजीयन करने का उद्देश्य सभी साधकों की सूचना एकत्र करना एवं शांतिकुंज स्तर पर दोष परिमार्जन एवं संरक्षण एवं मार्गदर्शन की व्यवस्था करना है ।

प्रखर साधना किस लिये ??

#युग परिवर्तन के चक्र को तीव्र करने हेतु
#संक्रमण काल में युगशिल्पियों को तपाने हेतु
#आतंकवादी / आसुरी शक्तियों के निरस्तीकरण हेतु
#वंदनीया माता जी को श्रद्धांजलि हेतु
 # नव सृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करने हेतु

आत्मीय परिजन,

सन् 2026 में परम वंदनीया माताजी के जन्म, अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन एवं श्री अरविन्द महर्षि के अति मानस अवतरण की शताब्दी मनाई जानी है। प्रखर साधना के अभाव में समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन धराशायी हो गये। युग निर्माण आन्दोलन इसलिये प्रखर है क्योंकि इसमें ऋषियुग्म का तप एवं युग साधकों की प्रखर साधना है। इस विषम बेला में और अधिक प्रखरता की अपेक्षा की जा रही है। इस हेतु शांतिकुंज ने  2026 तक वार्षिक चालीस दिवसीय अनुष्ठान की योजना बनाई है।

    क्या करें ??

 * चूँकि विश्व स्तर पर 24000 साधकों द्वारा साधना की जायेगी, इस हेतु जोन/ उप जोन / जिला समितियों को अपनी जवाबदारी सुनिश्चित करनी है।
*  सक्रिय 108 जिलों में 240 साधक प्रति जिले के हिसाब से एवं अन्य जिले में 108 या 51 साधक तैयार/सहमत/संकल्पित करें।
* तपोनिष्ठ पूज्यवर ने 24 लाख के 24 महापुरश्चरण किये थे तो हम छोटा- सा सवा लाख मंत्रों का चालीस दिवसीय अनुष्ठान तो करें ही।
*  पूज्यवर ने 24 वर्षों तक जौ की रोटी और छाछ पर तप किया, हम यथा संभव 40 दिनों तक नमक और (या) शक्कर का त्याग करें।
*  पूज्यवर ने जीवनकाल में 3200 के आसपास पुस्तकें लिखीं, हम चालीस दिनों में दो- तीन पुस्तकों का स्वाध्याय तो कर ही लें ।।
 * उन्होंने करोड़ों व्यक्तियों/साधकों का निर्माण किया, हम अपने जैसे / अपने से बेहतर 24 व्यक्तियों को साधक / कार्यकर्ता बना दें तभी हम उनके पुत्र कहलायेंगे, इससे कम में बात नहीं बनेगी।
*  शान्तिकुन्ज में पाँच दिवसीय मौन (अंत:ऊर्जा) शिविर चलते हैं, अपने जिले में चालीस दिनों में एक दिन, एक दिवसीय मौन शिविर इस दौरान संचालित करें।
 * पूर्णाहुति, समस्त शक्तिपीठों पर एक साथ एक समय पर संपन्न हो।

कैसे करें ?- अनुशासन, अणुव्रत :-

1.  उपासना :: न्यूनतम 33 मालाओं का चालीस दिनों तक जप प्रतिदिन करना है, भले ही
दो या तीन चरणों में हो। जप के साथ हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर उदीयमान भगवान
सविता का ध्यान। जप से पूर्व अनुलाम- विलाम अथवा प्राणसंचार प्राणायाम करें। जप गिनती के लिये नही, अपितु उसकी गहराई को बढ़ाते हुये, भावविह्वल होकर करें। अपनी ही माला से जप करें।
2. साधना :: चालीस दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन, हो सके तो एक समय उपवास, सात्विक, अस्वाद व्रत, न्यूनतम दो घंटे मौन, अपनी सेवा अपने हाथों से, मेरा अनुष्ठान है इस बात का सार्वजनिक प्रचार न करना, अर्थ संयम, विचार संयम के साथ समय संयम का पालन का प्रयास करना। भाव शुद्धि, चित्त शुद्धि का अधिकाधिक प्रयास। साधना का अहंकार न पालें, पूज्यवर करा रहे हैं, यही भाव प्रकट हो। मोह से पिंड छुड़ाने हेतु कभी कभी शक्तिपीठ पर विश्राम करें। लोभ निवारण हेतु अपनी प्रिय वस्तुयें बांटने का प्रयत्न करें। चालीस दिनों तक निंदा से बचना, परिजनों की प्रशंसा को लक्ष्य बनावें, गुण ग्राहक बनें। स्वास्थ्य के अनुकूल हो तो, गोझरण/गौमूत्र/तुलसी जल का सेवन करें इससे ध्यान सहज लगेगा।
3. स्वाध्याय :: स्वाध्याय से श्रद्धा संवर्धन होता है। अत: गायत्री महाविज्ञान, हमारी वसीयत विरासत, महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, लोकसेवियों हेतु दिशा बोध इन पुस्तकों का अनिवार्य स्वाध्याय हो। हमको सब मालूम है इस अकड़ में न रहें, पुस्तकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
4. आराधना :: समयदान, जन संपर्क एवं देवालय सेवा का लक्ष्य रखें। परिणाम की चिंता किये बगैर 40 दिनों में न्यूनतम 10 लोगों तक साहित्य पहुँचा कर उनका हालचाल पूछें एवं अच्छे श्रोता की तरह सुनें, यथोचित समाधान दें। साप्ताहिक रूप से शक्तिपीठ / प्रज्ञापीठ / केन्द्र की स्वच्छता करना। स्नानगृह, शौचालय अनिवार्य रूप से स्वच्छ रखना। प्रज्ञा संस्थान दूर हो तो ग्राम के ही देवालय की स्वच्छता करना। समय बचाने हेतु वाटस्एप एवं अन्य सोशल मीडिया का विवेकयुक्त उपयोग करना।
5. अखण्ड जप/दीपयज्ञ :: इन चालीस दिनों में प्रत्येक साधक अपने निवास पर एक दिन का अखण्ड- जप रखे जिसका समापन दीपयज्ञ से होगा। इस तरह 24000 अखण्ड जप एवं इतने ही दीपयज्ञ भी संपन्न होंगे।
6. अंशदान :: चाय का खर्चा बचा कर 5 रु प्रतिदिन जमा कर रू 200.00 पूर्णाहुति में लगायें। यह क्रम वर्ष भर एवं निरंतर चलने दें। इसका उपयोग विद्या विस्तार में करें।
7. विशेष :: साधना के दौरान सूतक, अशौच इत्यादि की बाधा आवे तो उतने दिन आगे बढ़ा देवें परंतु इसे बहाना न बनावें। ये समस्त अनुशासन घर के लिये हैं, यात्रा, कार्यक्रम, बीमारी आदि में आपद्धर्म का पालन करें। अपनी ही माला से जप करें, हो सके तो अपना ही आसन लें। गोमुखी का प्रयोग अर्थात् माला को ढंक कर जप करें। स्वच्छ वस्त्रों में, संभव हो तो पीले में ही जप करें। अनुष्ठान के पूर्व यज्ञोपवीत को बदल लें। साप्ताहिक रूप से घर पर, संभव हो तो शक्तिपीठ पर यज्ञ में भाग लेवें।
8. चिन्तन :: साधना में हैं तो सारे काम बंद, ऐसा न करें। गुरु कार्य हेतु ही साधना कर रहे हैं, अत: गुरु कार्य ही जीवन साधना है इसका ध्यान रहे। हर सुबह नया जीवन- हर रात नई मौत का चिंतन, आत्म बोध, तत्व बोध की साधना हो। अन्य विषयों पर बेकार की चर्चा में भाग न लें, विनम्रतापूर्वक वहाँ से हट जायें।
9. मौन साधना :: चालीस दिनों में एक बार, एक दिन के मौन शिविर में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
10. वृक्ष गंगा अभियान :: 24000 साधक, तरुपुत्र / तरुमित्र योजना में भाग लेकर वृक्ष देव की स्थापना का संकल्प करें। वृक्ष को पितृवत्, मित्रवत् पालने, रक्षा करने एवं संवर्धन करने हेतु तत्पर हों।
11. पूर्णाहुति :: समस्त शक्तिपीठों में एक साथ एक समय पर संपन्न होगी। न्यूनतम 108 आहुतियाँ देनी ही हैं। साधकों के यज्ञ में कृपणता न हो। लोक जागरण के यज्ञ सादगी, मितव्ययिता के साथ संपन्न करावें किंतु इस पूर्णाहुति को भाव श्रद्धा से युक्त होकर करें। समस्त साधक अपने घर पर तैयार किये गये मिष्ठान्न का गायत्री माता को भोग लगायें। पूर्णाहुति पर कार्यकर्ता सम्मेलन में अनुयाज के संकल्प किये जायें।
12. ब्रह्मभोज :: अनुष्ठान के समापन पर ब्रह्मभोज हेतु सत्साहित्य का वितरण करें।
13. अनुयाज :: 24000 साधक 10 याजकों को प्रशिक्षित कर न्यूनतम दस घरों में 7 मई 2020, गुरुवार  ( वैशाख पूर्णिमा- बुद्ध पूर्णिमा ) को गृहे- गृहे यज्ञ अभियान में यज्ञ करावें तो व्यक्ति निर्माण के साथ वातावरण परिशोधन का क्रम एक साथ चल पड़ेगा एवं कार्यकर्ताओं का सुनियोजन भी होगा।
14. उपरोक्त अनुशासनों के पालन में अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें, अधिक कठोर अभ्यास से स्वास्थ्य संबंधी कष्ट हो सकता है अत: तदनुसार कार्य करें।

‘तुम्हारी शपथ हम, निरंतर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे॥’
आईये, प्रखर साधना अभियान हेतु आपको भाव- भरा आमंत्रण ॥


Registration,@

www.awgp.org http://diya.net.in/
 
https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSd9pL7DFc8ybxUFpWQj5wK2ERbVn1BnlGyfRCI6NFdYMKXG5w/viewform

विस्तृत मार्गदर्शन हेतु प.पू गुरुदेव द्वारा लिखित गायत्री की अनुष्ठान एवं पुरश्चरण साधनाएँ,  का सन्दर्भ लें|
शंका समाधान हेतु शान्तिकुन्ज से पत्र अथवा मेल से सम्पर्क करें।

Contact US : 

For any Question Mail Us:-
 youthcell@awgp.org
Contact No - 9258360652,
                        9258360600


पूर्ण शान्ति की प्राप्ति
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
Poorn Shanti Ki Prapti
Pt Shriram Sharma Acharya
👇👇👇
https://youtu.be/XWDPHgjYpEg


हे प्रभो जीवन हमारा यज्ञ मय कर दीजिये

प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी
👇👇👇
https://youtu.be/dg1ixwuvNvc


देवत्व को बचाने, संघर्ष भी किये हैं।
Devatwa Ko Bachane Sangharsh Bhi Kiye Hai
प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी 
👇👇👇
https://youtu.be/7nHWFLcWZS0

सोमवार, 2 सितंबर 2019

👉 गणेश चतुर्थी की मंगलकामनाएं।

गणपति जी से ग्रहण करने वाली जीवन शिक्षा -

1- विशाल मस्‍तक - जो हमें सिखाता है लीक से हट कर कुछ अलग सोचना और नया करना चाहिए।

2-विशाल आखें - ये बताती है जो दिख रहा उसके परे सत्‍य को देखना चाहिए। यानि सच केवल वो ही नहीं होता जो आंखों के सामने दिखता है।

3-  विशाल कान - ये कहते हैं कि सबकी सुनो और उसे समझो और हमेशा सर्तक रह कर हर धीमी से धीमी आवाज पर भी ध्‍यान दो। कोई भी बात आधी या अनसुनी मत रहने दो। -

4- टूटा दांत - त्‍याग ही सबसे बड़ी बुद्धिमत्‍ता है ये सिखाते हैं एकदंत।

5- कुल्‍हाड़ी - ये इस बात की प्रतीक है कि हमें भौतिकता से जुड़े हर बंधन को काटना होगा, तभी ईश्‍वर की प्राप्‍ति होगी।

6-  लड्डू - गणपति को मोदक प्रिय हैं जो ये कहते हैं कि परिश्रम का फल ही मीठा होता है।

7- विशाल उदर - ये हमें हर परस्‍थिति में अच्‍छे बुरे को पचाने और उचित आचरण करने की शिक्षा देता है।

8- मूषक - गणपति का वाहन मूषक इस बात का प्रतीक है कि वे हमारे मस्‍तिष्‍क के कोने कोने में पल रही हर अच्‍छी बुरी बात को जानते हैं इसलिए सोच हमेशा पवित्र होनी चाहिए।

गणराया तुझ्या येण्याने सुख, समृध्दी, शांती, आरोग्य लाभले सर्व संकटाचे निवारण झाले तुझ्या आशिर्वादाने यश लाभले असाच आशीर्वाद राहू दे…
गणेशचतुर्थीच्या हार्दिक शुभेच्छा !

May Lord Ganesha bless you with Wisdom, Happiness and Joy in your life.

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

👉 बिना चप्पलों के गुजरा बचपन, पढ़ाई के दम पर पाया मुकाम और बन गए इसरो अध्यक्ष

तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के सराक्कलविलाई गांव के एक किसान के बेटे कैलाशवडीवू सिवन (के सिवन) आज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष का पद संभाल रहे हैं। इसके अलावा वह चंद्रयान-2 मिशन का नेतृत्व भी कर रहे हैं। सिवन ने एक सरकारी स्कूल में तमिल माध्यम से पढ़ाई की है। नागेरकोयल के एसटी हिंदू कॉलेज से उन्होंने स्नातक किया। सिवन ने 1980 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।

इसके बाद उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसिज (आईआईएससी) से इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। 2006 में उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। सिवन स्नातक करने वाले अपने परिवार के पहले सदस्य हैं। उनके भाई और बहन गरीबी के कारण अपनी उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर पाए।

उन्होंने कहा, 'जब मैं कॉलेज में था तो मैं खेतों में अपने पिता की मदद किया करता था। यही कारण था कि पिता ने मेरा दाखिला घर के पास वाले कॉलेज में कराया था। जब मैंने 100 प्रतिशत अंकों के साथ बीएससी (गणित) पूरी कर ली तो उन्होंने अपना मन बदल लिया। मेरा बचपन बिना जूतों और सैंडल के गुजरा है। मैं कॉलेज तक धोती पहना करता था। जब मैं एमआईटी में गया तब पहली बार मैंने पैंट पहनी थी।'

सिवन 1982 में इसरो में शामिल हुए थे। यहां उन्होंने लगभग हर रॉकेट कार्यक्रम में काम किया है। जनवरी 2018 में इसरो अध्यक्ष का पदभार संभालने से पहले वह विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) के निदेशक थे। यह सेंटर रॉकेट बनाता है। उन्हें साइक्रोजेनिक इंजन, पीएसएलवी, जीएसएलवी और रियूसेबल लॉन्च व्हीकल  कार्यक्रमों में योगदान देने के कारण इसरो का रॉकेट मैन कहा जाता है।

उन्होंने 15 फरवरी 2017 को भारत द्वारा एकसाथ 104 उपग्रहों को प्रक्षेपित करने में अहम भूमिका निभाई थी। यह इसरो का विश्व रिकॉर्ड भी है। रॉकेट विशेषज्ञ सिवन को खाली समय में तमिल क्लासिकल गाने सुनना और गार्डनिंग करना पसंद है। उनकी पसंदीदा फिल्म राजेश-खन्ना की 1969 में आई आराधना है। उन्होंने कहा, 'जब मैं वीएसएससी का निदेशक था तब मैंने तिरुवनंतपुरम स्थित अपने घर के बगीचे में कई तरह के गुलाब उगाए थे। अब बंगलूरू में मुझे समय नहीं मिल पाता है।'

15 जुलाई को जब चंद्रयान-2 अपने मिशन के लिए उड़ान भरने ही वाला था कि कुछ घंटों पहले तकनीकी कारणों से इसे रोकना पड़ा। इसके बाद सिवन ने एक उच्च स्तरीय टीम बनाई ताकि दिक्कत का पता लगाया जा सके और इसे 24 घंटे के अंदर ठीक कर दिया और सात दिनों बाद चंद्रयान-2 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे में तकनीकी खामी को दूर करने के लिए इसरो के वैज्ञानिकों की प्रशंसा की थी।

रविवार, 7 अप्रैल 2019

👉 26 साल के इंजिनियर ने नौकरी छोड़ जिंदा किए मरते 10 तालाब

मरते तालाबों को जिंदा करने को मकैनिकल इंजिनियर रामवीर तंवर ने अपनी नौकरी को बाय-बाय कह दिया। रामवीर मकैनिकल इंजिनियरिंग में बीटेक हैं और एक एमएनसी में काम करते थे। ग्रेटर नोएडा में रहने वाले रामवीर ने कहा, 'जल संरक्षण के काम में करियर मेरे लिए एसी ऑफिस में बैठने से ज्यादा अहमियत रखता है।' पिछले 5 सालों में रामवीर 10 तालाबों को जिंदा कर चुके हैं।

ग्रेटर नोएडा गौतम बुद्ध नगर जिले का हिस्सा है और यहां सैकड़ों छोटे-छोटे तालाब हैं, जिनकी देखरेख नहीं हो पा रही थी। अब रामवीर ने यह बीड़ा उठाया है। रामवीर ग्रेटर नोएडा के ही एक किसान के बेटे हैं। 60 एकड़ में फैले सूरजपुर वेटलैंड जैसे बड़े जलाशयों को तो वन संरक्षण नियमों के मुताबिक संरक्षण मिला हुआ है लेकिन डाढा गांव में आए दिन पानी की दिक्कत पेश आती थी। यहीं पले-बढ़े रामवीर देखते थे कि किस तरह छोटे-छोटे जलाशय सूख रहे हैं और उनका इस्तेमाल कूड़ा फेंकने के लिए होना लगा, जबकि इन्हीं जलाशयों पर यहां रहने वाले कई परिवारों की पानी की जरूरत निर्भर करती है। वह बताते हैं, 'मैं जलाशयों के साथ होते इस गलत व्यवहार को देखते-देखते हुए बड़ा हुआ हूं।'

21 साल की उम्र में जब रामवीर कॉलेज स्टूडेंट थे, उन्होंने जलाशयों की सफाई के लिए गांववालों की जल चौपाल लगाई। नौकरी छोड़ने के बाद रामवीर पूरी तरह इसी काम में लग गए।

👉 खर्च चलाने को देते हैं ट्यूशन

धीरे-धीरे इस काम के लिए वॉलंटियरों की टीमें बनाई गईं। रामवीर ने बताया, जल्द जल चौपाल एक ऐसा प्लैटफॉर्म बन गई, जो एक गांव से दूसरे गांव जाकर लोगों को जल संरक्षण के बारे में बताते हैं। वे बताते हैं कि जलाशयों में कूड़ा फेंकना बंद करने की जरूरत है। वॉलंटियरों ने सबसे पहले 2014 में डाबरा गांव में जलाशय की सफाई का काम किया। रामवीर बताते हैं कि उस जलाशय में बहुत कूड़ा था। उस साफ करने में महीनों लग गए। इसके बाद एक फिल्टर सिस्सटम बनाकर हमने पानी की सफाई की, उसे सिंचाई के लिए किसानों के उपयोग लायक बनाया। जलाशय को साफ बनाए रखने के लिए उसने मछलीपालन को प्रोत्साहित किया गया।

जलाशयों को जिंदा करने के लिए और लोगों की जरूरत थी, इसके लिए रामवीर ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। वह बताते हैं, हमारे फेसबुक पेज 'बूंद-बूंद पानी' के अब एक लाख से ज्यादा सदस्य हैं। जब भी हमें वॉलंटिअर्स की जरूरत हुई, हम पेज पर अनाउंस कर देते और हर बार करीब 100 लोग संरक्षण के इस काम लिए पहुंच जाते, फिर चाहे इलाका दूरदराज का ही क्यों न हो।

रामवीर ने अपना जॉब छोड़ा और शाम के समय ट्यूशन देकर घर का खर्च चलाते हैं। उनके काम ने लोगों का ध्यान तब खींचा, जब पिछले साल उन्होंने #सेल्फीविदपॉन्ड के के साथ गांववालों को अपने इलाके के जलाशयों की तस्वीरें भेजने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया। इसके बा से स्पॉन्सरशिप के मौके आए। रामवीर ने बताया, 'काफी मेहनत के बाद हमें साल 2018 में 2.5 लाख की सीएसआर फंडिंग मिली।' उन्होंने पूरे पैसे को जलाशयों को जीवंत करने के काम पर लगा दिए।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

👉 नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान

नवरात्र पर्व वर्ष में दो बार आता है (चैत्र  & आश्विन)।
(१) चैत्र नवरात्र जिस दिन आरम्भ होता है, उसी दिन विक्रमी संवत् का नया वर्ष प्रारम्भ होता है। चैत्र नवरात्र का समापन दिवस भगवान् श्री राम का जन्म दिन रामनवमी होता है।

(२) दूसरा नवरात्र आश्विन शुक्ल मे पड़ता है। इससे लगा हुआ विजयदशमी पर्व आता है।

ऋतुओं के सन्धिकाल इन्हीं पर्वों पर पड़ते हैं। सन्धिकाल को उपासना की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। प्रातः और सायं, ब्राह्ममुहूर्त्त एवं गोधूलि वेला दिन और रात्रि के सन्धिकाल हैं। इन्हें उपासना के लिए उपयुक्त माना गया है। इसी प्रकार ऋतु सन्धिकाल के नौ-नौ दिन दोनों नवरात्रों में विशिष्ट रूप से साधना-अनुष्ठानों के लिए महत्त्वपूर्ण माने गये हैं।

नवरात्रि साधना को दो भागें में बाँटा जा सकता है : एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार- विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या ।। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है।

जप संख्या के बारे में विधान यह है कि ९ दिनों में २४ हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। कारण २४ हजार जप का लघु गायत्री अनुष्ठान होता है। प्रतिदिन २७ माला जप करने से ९ दिन में २४० मालायें अथवा २४०० मंत्र जप पूरा हो जाता है। मोटा अनुपात घण्टे में ११- ११ माला का रहता है। इस प्रकार प्रायः २(१/२) घण्टे इस जप में लग जाते हैं। चूंकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से ४५ मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। अस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।

जिनसे न बन पड़े, वे प्रतिदिन १२ माला करके १०८ माला का अनुष्ठान कर सकते हैं।

उपासना की विधि सामान्य नियमों के अनुरूप ही है। स्नानादि से निवृत्त होकर आसन बिछाकर पूर्व को मुख करके बैठें। जिन्होंने कोई प्रतिमा या चित्र किसी स्थिर स्थान पर प्रतिष्ठित कर रखा हो वे दिशा का भेद छोड़कर उस प्रतिमा के सम्मुख ही बैठें। वरूण देव तथा अग्नि देव को साक्षी करने के लिए पास में जल पात्र रख लें और घृत का दीपक या अगरबत्ती जला लें सन्ध्यावन्दन करके, गायत्री माता का आवाहन करें। आवाहन मन्त्र जिन्हें याद न हो वे गायत्री शक्ति की मानसिक भावना करें। धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, फल, चन्दन, दूर्वा, सुपारी आदि पूजा की जो मांगलिक वस्तुएँ उपलब्ध हों उनसे चित्र या प्रतिमा का पूजन कर लें। जो लोग निराकार को मानने वाले हों वे धूपबत्ती या दीपक की अग्नि को ही माता का प्रतीक मान कर उसे प्रणाम कर लें।

अपने गायत्री गुरू का भी इस समय पूजन वन्दन कर लेना चाहिए, यही शाप मोचन है।

इस तरह आत्म शुद्धि और देव पूजन के बाद जप आरम्भ हो जाता है। जप के साथ- साथ सविता देवता के प्रकाश का अपने में प्रवेश होते पूर्ववत् अनुभव किया जाता है। सूर्य अर्घ्य आदि अन्य सब बातें उसी प्रकार चलती हैं, जैसी दैनिक साधना में। हर दिन जो आधा घण्टा जप करना पड़ता था वह अलग से नहीं करना होता वरन् इन्हीं २७ मालाओं में सम्मिलित हो जाता है।

गायत्री मन्त्र एवं भावार्थ

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भावार्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

अनुष्ठान में पालन करने के लिए दो नियम अनिवार्य हैं।

इन नौ दिनों ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

दूसरा अनिवार्य नियम है उपवास। जिनके लिए सम्भव हो वे नौ दिन फल, दूध पर रहें। एक समय अन्नाहार, एक समय फलाहार, दो समय दूध और फल, एक समय आहार, एक समय फल दूध का आहार, केवल दूध का आहार इनमें से जो भी उपवास अपनी सामर्थ्यानुकूल हो उसी के अनुसार साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। जिनसे इतना भी न बन पड़े वे अन्नाहार पर भी रह सकते हैं, पर नमक और शक्कर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन उन्हें भी करना चाहिए। भोजन में अनेक वस्तुएँ न लेकर दो ही वस्तुएँ ली जायें। जैसे- रोटी, दाल। रोटी- शाक, चावल- दाल, दलिया, दही आदि।

अनुष्ठान में पालन करने के लिए तीन सामान्य नियम हैं


कोमल शैया का त्याग

अपनी शारीरिक सेवाएँ अपने हाथों करना
हिंसा द्रव्यों का त्याग (चमड़े के जूते , रेशम, कस्तूरी, मांस, अण्डा )।

अनुष्ठान के दिनों में मनोविकारों और चरित्र दोनों पर कठोर दृष्टि रखी जाय और अवांछनीय उभारों को निरस्त करने के लिए अधिकाधिक प्रयत्नशील रहा जाय। असत्य भाषण, क्रोध, छल, कटुवचन , अशिष्ट आचरण, चोरी, चालाकी, जैसे अवांछनीय आचरणों से बचा जाना चाहिए, ईर्ष्या, द्वेष, कामुकता, प्रतिशोध जैसे दुर्भावनाओं से मन को जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है। जिनसे बन पड़े वे अवकाश लेकर ऐसे वातावरण में रह सकते हैं जहाँ इस प्रकार की अवांछनीयताओं का अवसर ही न आवे। जिनके लिए ऐसा सम्भव नहीं, वे सामान्य जीवन यापन करते हुए अधिक से अधिक सदाचरण अपनाने के लिए सचेष्ट बने रहें ।।

संक्षिप्त गायत्री हवन पद्धति की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। जप का शतांश हवन किया जाना चाहिए। पूर्णाहुति के बाद प्रसाद वितरण, कन्या भोजन आदि का प्रबन्ध अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। गायत्री आद्य शक्ति- मातृु शक्ति है। उसका प्रतिनिधित्व कन्या करती है। अस्तु अन्तिम दिन कम से कम एक और अधिक जितनी सुविधा हो कन्याओं को भोजन कराना चाहिए।

अनुष्ठान के साथ दान की परम्परा जुड़ी हुई है। ज्ञानदान सर्वश्रेष्ठ है। इस दृष्टि से प्रत्येक साधक को चाहिए कि यथाशक्ति वितरण योग्य सस्ता युग साहित्य खरीदकर उन्हें उपयुक्त व्यक्तियों को साधना का प्रसाद कहकर दें।

जिन्हें नवरात्रि की साधनायें करनी हों, उन्हें दोनों बार समय से पूर्व उसकी सूचना हरिद्वार भेज देनी चाहिए, ताकि उन दिनों साधक के सुरक्षात्मक, संरक्षण और उस क्रम में रहने वाली भूलों के दोष परिमार्जन का लाभ मिलता रहे। विशेष साधना के लिए विशेष मार्ग- दर्शन एवं विशेष संरक्षण मिल सके तो उससे सफलता की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है। वैसे प्रत्येक शुभ कर्म की संरक्षण भगवान स्वयं ही करते हैं।

शनिवार, 30 मार्च 2019

👉 Nari Abhuydha

Nari Abhuydha is 5th Annual Women Empowerment program by All World Gayatri Parivar Women Circle Mumbai. There is need for intellectual training, Scientific Education and Character Building Education. We have paid heavily for blindly imitating western ideals.There is a need for harmony of ideals between school & home. Ikkisvi Sadi is Nari Sadi and indian women needs to travel as much as to study for playing a larger role in national life. Education through Indian vernaculars and developing arts,culture, crafts and allied occupations needs to take centre stage.DIYA gives an awakening call for empowering women for a prosperous future. Come join us on 30th March Saturday 2019

Venue: Suraj Hanuman Mandir Ground,Anand Nagar Nr Mudraneshwar Temple, Dahisar East, Mumbai

Timings : Evening 5.00 pm onwards

Contact:
09821393345
09892722773
09892583224
09320922220

Email: mumbai@diya.net.in

Entry is free and open to all.
Pls pass message to all in your circle of influence

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

👉 नारी शक्ति को नमन

नारी तू शक्ति रूपा है,
विष्णु की शक्ति लक्ष्मी है,
शंकर की शक्ति पार्वती है,
ब्रह्मा की शक्ति ब्राह्मणी है,
राम की शक्ति सीता है,
राम की भक्त शबरी है,
कृष्ण की शक्ति राधा है,
कृष्ण की भक्त मीरा है,
राधा की प्रेम पुनीता है,
दिल से प्रेम की सरिता है,
पुरुष की सहचरी और प्रणेता है,
आँखो में सागर, दिल में तड़प,
दिमाग में उंची सोच लिए,
संघर्ष के पथ पर चलती हुई,
हर पथ पर आगे बढ़ते हुए,
मेघावी नारी नवीना है,

सोमवार, 4 मार्च 2019

👉 आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान शिव (अन्तिम भाग)

भगवान् शिव का वाहन वृषभ है। वृषभ सौम्यता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है। तात्पर्य यह कि शिव का साहचर्य उन्हें मिलता है। जो स्वभाव से सरल और सौम्य होते हैं, जिनमें छल-छिद्र आदि विकार नहीं होते। साथ ही जिनमें आलस्य न होकर निरन्तर काम करने की दृढ़ता होती है। श्मशान में उनका निवास है अर्थात् वे मृत्यु को कभी भूलते नहीं। भगवान की शक्ति और नियमों को मृत्यु की तरह अकाट्य मानकर चलने में मनुष्य की आध्यात्मिक वृत्तियां जागृत रहती हैं जिससे वह लौकिक कर्त्तव्यों का पालन करते हुए भी अपने जीवन-लक्ष्य की ओर निष्काम भाव से चलता रह सकता है। मृत्यु को लोग भूले रहते हैं, इसलिए कर्म करते हैं। इस महातत्त्व की उपासना का अर्थ अपने आपको बुरे कर्मों से बचाये रखने के लिये प्रकाश बनाए रखना होता है। इस तरह की जीवन-व्यवस्था व्यक्ति को असाधारण बनाती है। वह शक्ति शिव में पाई जाती है, शिव के उपासकों में भी वह वृत्तियां धुली हुई होनी चाहिए।

यह प्रसंग भगवान् शिव की आध्यात्मिक शक्तियों पर प्रकाश डालते हैं। इनके साथ कथानक और घटनायें भी जुड़ी हुई हैं जो जीवन के आदर्शों की व्याख्या करती हैं इनमें से गंगावतरण की कथा मुख्य है। गंगाजी विष्णुलोक से आती हैं। यह अवतरण महान् आध्यात्मिक शक्ति के रूप में होता है। उसे संभालने का प्रश्न बड़ा विकट था। शिवजी को इसके उपयुक्त समझा गया और भगवती गंगा को उनकी जटाओं में आश्रय मिला। गंगाजी यहां ज्ञान की प्रचण्ड आध्यात्मिक शक्ति के रूप में अवतरित होती हैं। लोक-कल्याण के लिए उसे धरती पर प्रवाहित करने की बात है ताकि अज्ञान से मरे हुए लोगों को जीवन दान मिल सके पर उस ज्ञान को धारण करना भी तो कठिन बात थी जिसे शिव जैसा संकल्प-शक्ति वाला महापुरुष ही धारण कर सकता है। अर्थात् महान बौद्धिक क्रान्तियों का सृजन भी कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जिसके जीवन में भगवान शिव के आदर्श समाये हुए हों वही ब्रह्म-ज्ञान को धारण कर उसे लोक हितार्थ प्रवाहित कर सकता है।

गृहस्थ होकर भी पूर्ण योगी होना शिवजी के जीवन की महत्वपूर्ण घटना है। सांसारिक व्यवस्था को चलाकर भी वे योगी रहते हैं। पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। वे अपनी धर्मपत्नी को भी मातृशक्ति के रूप में देखते हैं। यह उनकी महानता का दूसरा आदर्श है। यहां उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्म-कल्याण की साधना असम्भव नहीं। जीवन में पवित्रता रखकर उसे हंसते खेलते पूरा किया जा सकता है।

यह सभी आदर्श इस बात की शिक्षा देते हैं कि मनुष्य शिव की तरह के पदार्थों और समाज में प्रचलित परम्पराओं का आध्यात्मिक मूल्यांकन करना सीख ले तो निस्सन्देह उसका शारीरिक और सामाजिक जीवन अधिकाधिक निरापद होता चला जायेगा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिव मानव-जीवन की उन सभी आध्यात्मिक विशेषताओं के प्रतीक हैं जिनके बिना मनुष्य-जीवन पाने का अर्थ हल नहीं होता। मनुष्य का धर्म उसकी विवेक-बुद्धि है जिसके सहारे वह ज्ञान-विज्ञान की ओर अग्रसर होता है और मनुष्य से देव बनने में समर्थ होता है। इस की सामर्थ्य प्राप्त करके ही आत्म कल्याण और लोक-हित की परम्परा जीवित रखी जा सकती है। यह सन्देश हमें आदिकाल से भगवान् शिव देते चले आ रहे हैं। इन आध्यात्मिक रहस्यों की ओर से हमें उपेक्षा नहीं रखनी चाहिये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय पृष्ठ 143-145


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शनिवार, 2 मार्च 2019

👉 आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान शिव (भाग 2)

शिव के स्वरूप, अलंकार और जीवन सम्बन्धी घटनाओं का और भी विशद् वर्णन मिलता है। ऐसे प्रत्येक प्रसंग में या तो किसी दार्शनिक तत्व का विवेचन सन्निहित है अथवा व्यावहारिक आचरण की शिक्षा दी गई है। आइये, इन पर एक-एक करके विचार किया जाये—

(1) शिव का स्वरूप— भगवान् शंकर के स्वरूप में जो विचित्रतायें हैं वह किसी मनुष्य की देह में सम्भव नहीं इसलिए उसकी सत्यता संदिग्ध मानी जाती है। पर हमें यह जानना चाहिये कि यह चित्रण सामान्य नहीं, अलंकार है जो मनुष्यों में योग-साधनाओं के आधार पर जागृत होते हैं।

(2) माथे पर चन्द्रमा— चन्द्रमा मन की मुदितावस्था का प्रतीक है अर्थात् योगी का मन सदैव चन्द्रमा की भांति उत्फुल्ल, चन्द्रमा की भांति खिला निःशंक होता है। चन्द्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक भी है अर्थात् उसे जीवन की अनेक गहन परिस्थितियों में रहते हुए भी किसी प्रकार का विभ्रम अथवा ऊहापोह नहीं होता। वह प्रत्येक अवस्था में प्रमुदित रहता है, विषमताओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

(3) नीलकंठ— पुराणों में ऐसी कथा आती है कि देवों और दानवों का रक्तपात बचाने के लिए भगवान शंकर ने विष पी लिया था और तब से इनका कंठ नीला है अर्थात् इन्होंने विष को कंठ में धारण किया हुआ है। इस कथानक का भी सीधा साधा सम्बन्ध योग की सिद्धि से ही है। योगी पुरुष अपने सूक्ष्म शरीर पर अधिकार पा लेता है, जिससे उसके स्थूल शरीर पर बड़े तीक्ष्ण विषों का भी प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह सामान्य मानकर ही पचा लेता है। यह बात इस तरह भी है कि संसार के मान अपमान, कटुता-क्लेश आदि दुख-कष्टों का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। उन्हें भी वह साधारण घटनायें मानकर आत्मसात् कर लेता है और संसार का कल्याण करने की अपनी आत्मिक वृत्ति में निश्चल भाव से लगा रहता है। दूसरे व्यक्तियों की तरह लोकोपकार करते समय उसे स्वार्थ आदि का कोई ध्यान नहीं होता। वह निर्विकार भावना की भलाई में जुटा रहता है। खुद विष पीता है पर औरों के लिए अमृत लुटाता रहता है।
(4) विभूति रमाना— शिव ने सारे शरीर पर भस्म रमा रखी है। योग की पूर्णता पर संयम सिद्धि होती है। योगी अपने वीर्य को शरीर में रमा लेते हैं जिससे उसका सौन्दर्य फूट पड़ता है। इस सौन्दर्य को भस्म के द्वारा अपने आप में रमा लेता है। उसे बाह्य अलंकारों द्वारा सौन्दर्य बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहती। अक्षुण्ण संयम ही उसका अलंकार बन गया है, जिससे उसका स्वास्थ्य और शरीर सब कांतियुक्त हो गये हैं।
(5) तृतीय नेत्र— योग की भाषा में इसे नेत्रोन्मीलन या आज्ञा-चक्र का जागरण भी कहते हैं। उसका सम्बन्ध गहन आध्यात्मिक जीवन से है। घटना प्रसंग जुड़ा हुआ है कि शिवजी ने एक बार तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भी जला दिया था योगी का यह तीसरा नेत्र यथार्थ ही बड़ा महत्व रखता है। सामान्य परिस्थितियों में वह विवेक के रूप में जागृत रहता है, पर वह अपने आप में इतना सशक्त और पूर्ण होता है कि कामवासना जैसे गहन प्रकोप भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं कर पाते। उन्हें भी जला डालने की क्षमता उसके विवेक में बनी रहती है। इसे वैज्ञानिक बुद्धि का प्रतिनिधि भी कहा जा सकता है। पर सबका तात्पर्य यही है कि तृतीय नेत्र होना साधारण क्षमता से उठाकर विशिष्ट श्रेणी में पहुंचा देना है। भारतीय संस्कृति का यह वैज्ञानिक पहलू कहीं अधिक मूल्यवान् भी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय पृष्ठ 141-142

👉 राजा बड़ा या संत

एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज्य ...