आत्मनिषेधी से सारी शक्तियाँ सारे देव-तत्व और सारी सम्भावनायें एक साथ रुक जाती हैं। वह अकेला एकाकी आत्म-बहिष्कृत स्थिति में डूबते व्यक्ति की भाँति व्यर्थ ही हाथ-पैर मारता, थकता और अन्त में अविज्ञात अतल के गहन अन्धकार में डूब जाता है।
आत्मनिषेधी का दुर्भाग्य उसके अन्दर अशुभ एवं नकारात्मक संकेत बनकर किसी प्रेत-पुकार की तरह गूँजता रहता है। उसके मलिन मानस से ध्वनि उठती रहती है कि- ‘मैं यह काम नहीं कर सकता मुझमें उसे करने की शक्ति नहीं है। मेरे पास साधनों का अभाव है। समय मेरे अनुकूल नहीं है। मेरी योग्यता कम है। मेरे भाग्य में सफलता का श्रेय नहीं लिखा गया है। इस प्रकार के नकारात्मक संकेत सुन-सुनकर निर्जीव निर्बलतायें जीवित हो उठती हैं। निराशा, निरुत्साह और भय की भावनायें मानस में खेलने-कूदने और द्वन्द्व मचाने लगेंगी। तन-मन और मस्तिष्क की सारी शक्ति शिथिल पड़ जाती है। अन्तःकरण अवसन्न होकर निष्क्रिय हो जाता है। शरीर ढीला और मन मुरदार हो जाता है। इस प्रकार से भार आनत मनुष्य संसार में कुछ भी तो नहीं कर सकता, सिवाय इसके कि वह हारा, पिछड़ा और हताश-सा आगे बढ़ते हुए लोगों को ईर्ष्या से देखे और मन ही मन दहता-सहता हुआ जिन्दगी के दिन पूरे करे।
एकाग्रता की शक्ति और उसका सुनियोजन | Ekagrata Ki Shakti Aur Uska Niyojan |
तीसरे प्रकार के जो संशयी व्यक्ति होते हैं, उनकी दशा तो और भी खराब होती है। आत्म-विश्वासी जहाँ सराहनीय, आत्मनिषेधी दयनीय होता है, वहाँ आत्म संशयी उपहासास्पद होता है। वह किसी भी पुरुषार्थ के सम्बन्ध में ‘हाँ-न’ के झूले में झूलता रहता है। अभी उसे यह उत्साह होता है कि वह अमुक कार्य कर सकता है, लेकिन कुछ ही देर बाद उसका संशय बोल उठता है- हो सकता है यह काम मुझसे पूरा न हो। शायद मेरी क्षमतायें और योग्यतायें इस काम के अनुरूप नहीं हैं। लेकिन वह अपने इस विचार पर भी देर तक टिका नहीं रह पाता। सोचता है काम करके तो देखा जाए शायद कर लूँ। काम हाथ में लेता है तो हाथ-पैर फूल जाते हैं, अपने अन्दर एक रिक्तता और अयोग्यता अनुभव करने लगता है। भयभीत होकर काम छोड़ देता है। फिर बलात् उसमें लगता, थोड़ा-बहुत करता और इस भाव से उसे अधूरा छोड़ देता है कि हो नहीं पा रहा है बेकार समय नष्ट करने से क्या लाभ।
इस प्रकार संशयी व्यक्ति जीवन भर यही करता रहता है। कामों का साहस नहीं करता और यदि उनमें हाथ डालता है तो कभी पूरा नहीं कर पाता। इसी प्रकार के तर्क-वितर्क और ऊहापोह में उसका सारा जीवन व्यर्थ चला जाता है। शेखचिल्लियों की तरह अस्थिर मन, मस्तिष्क और विश्वास वाले संसार में न तो आज तक कुछ कर पाए हैं और न आगे कुछ कर सकते हैं। उपहासास्पद स्थिति में ही संसार से विदा हो जाते है।
*.....क्रमशः जारी*
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970
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