गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

👉 रूपान्तरण

प्रभु का स्मरण सतत् हो, उनमें समर्पण निरन्तर हो, तो जीवन में अनोखा रूपान्तरण घटित होता है। कुछ ऐसा, जैसे कि मिट्टी फूल बन जाती है और गन्दगी खाद बनकर सुगन्ध में बदल जाती है। मनुष्य के विकार भी शक्तियाँ हैं, जो प्रभु के स्मरण और प्रभु में समर्पण से रूपान्तरित हो जाती हैं। आज जो मनुष्य में पशु जैसा दिखता है, वही दिशा परिवर्तित होने से दिव्यता को उपलब्ध हो जाता है।
  
जीवन का आध्यात्मिक सच यही है कि इसमें जो अदिव्य दिखता है, वह भी बीज रूप में दिव्य है। अपने दृष्टिकोण में यदि आध्यात्मिकता आ सके तो पता चलता है कि वस्तुतः अदिव्य एवं अपवित्र कुछ भी नहीं है। सभी कुछ यहाँ दिव्य है। भेद केवल उस दिव्यता की अभिव्यक्ति के हैं।
  
भगवान् का स्मरण और भगवान् में समर्पण होने से कुछ भी घृणा, द्वेष एवं वैर योग्य नहीं रह जाता। सच तो यह है कि जो एक छोर पर पशु है, वही दूसरे छोर पर प्रभु है। पशु और प्रभु में विरोध नहीं विकास है। यह सत्य आत्मसात हो सके तो फिर आत्मदमन, उत्पीड़न और संघर्ष व्यर्थ हो जाते हैं। भला कहीं कोई अपने को टुकड़ों में तोड़कर सुखी होता है। यह तरीका आत्मशान्ति का नहीं बल्कि आत्मसन्ताप का है। इससे ज्ञान नहीं अज्ञान गहरा होता है।
  
स्वयं की चेतना के किसी अंश को नष्ट नहीं किया जा सकता। इसका दमन भी अधिक समय के लिए सम्भव नहीं है। क्योंकि जिसका दमन किया गया है, जिसे हराया गया है, उसका निरन्तर दमन करना पड़ता, उसे निरन्तर पराजित करना होता है। यह पूर्ण विजय का मार्ग का नहीं है। पूर्ण विजय का मार्ग तो रूपान्तरण है। इसमें दमन नहीं बोध है। इसमें गन्दगी को हटाना नहीं उसे खाद बनाना होता है। परमात्मा का निरन्तर स्मरण और उनमें सतत् समर्पण ही वह रसायनशास्त्र है, जिससे यह सम्भव है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १९७

👉 शान्त विचारों की ठोस शक्ति (भाग १)

हमारे मन में दो प्रकार के विचार आते हैं- एक उद्वेगयुक्त और दूसरे शान्त। भय, क्रोध, शोक लोभ आदि मनोवेगों से पूरित विचार उद्वेगयुक्त विचार हैं और जिसके विचारों में मानसिक उद्वेगों का अभाव रहता है उन्हें शान्त विचार कहा जाता है। हम साधारणतः विचारों के बल को उससे सम्बन्धित उद्वेगों से ही नापते हैं। जब हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति क्रोध में आकर कोई बात कह रहा है तो हम समझते हैं कि वह व्यक्ति अवश्य ही कुछ कर दिखावेगा। पर क्रोधातुर व्यक्ति से उतना अधिक डरने का कारण नहीं जितना कि शान्त मन के व्यक्ति से डरने का कारण है। भावावेश में आने वाले व्यक्तियों के निश्चय सदा डावाँडोल रहते हैं। भावों पर विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के निश्चय स्थिर रहते हैं। वह जिस काम में लग जाता है उसे पूर्ण करके दिखाता है।

उद्वेगपूर्ण विचार वैयक्तिक होते हैं उनकी मानसिक शक्ति वैयक्तिक होती है शान्त विचार वृहद मन के विचार हैं उनकी शक्ति अपरिमित होती है। मनुष्य जो निश्चय शान्त मन से करता है उसमें परमात्मा का बल रहता है और उसमें अपने आपको फलित होने की शक्ति होती है। अतएव जब कोई व्यक्ति अपने अथवा दूसरे व्यक्ति के लिये कोई निश्चय करता है और अपने निश्चय में अविश्वास नहीं करता तो निश्चय अवश्य फलित होता है। शान्त विचार सृजनात्मक और उद्वेगपूर्ण विचार प्रायः विनाशकारी होते हैं। किसी भी प्रकार के विचार में अपने आपको फलित करने की शक्ति होती है। पर यह शक्ति सन्देह के कारण नष्ट हो जाती है। जिन विचारों का हेतु वैयक्तिक होता है उनमें अनेक प्रकार के सन्देह उत्पन्न होते हैं। अतएव उनके विचार की शक्ति नष्ट हो जाती है। जब कोई मनुष्य अपने विचारों में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं लाता तो वे विचार स्वतः ही फलित हो जाते हैं। सन्देहों को रोकने के लिए अपनी आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास होना आवश्यक है।

अपने आपकी ही अनुकूलता ईश्वर और प्रकृति की अनुकूलता के विश्वास के रूप में मनुष्य की चेतना को समक्ष आती हैं। ये भावनायें अच्छे तन-मन की अनुभूति के प्रतिभास मात्र हैं। मनुष्य अपनी आन्तरिक अनुभूति के अनुसार अनेक प्रकार की कल्पनाओं को रचता है। इन कल्पनाओं की वास्तविकता उसकी अज्ञात वास्तविक प्रेरणा पर निर्भर करती है। कल्पनायें वैसी ही आती हैं जैसी उसकी आन्तरिक प्रेरणा होती है। मनुष्य की प्रेरणा ही उसे आशावादी और निराशावादी बनाती है। अर्थात् मन का जैसा रुख रहता है उसी प्रकार की कल्पनायें मन करने लगता है। ईश्वरवादी विश्वास करने लगता है कि ईश्वर उसे आगे ले जा रहा है और जड़वादी विश्वास करने लगता है कि प्रकृति उसे आगे ले जा रही है। प्रगति और अप्रगति के सभी प्रमाण मनुष्य के रुख पर निर्भर रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1950 पृष्ठ 10

Q.9. What is “VAAM MARG”? (Part 9)

Ans. Yogic Sadhanas are carried out in two ways. These are designated as the ‘Dakchin Marg’ and ‘Vaam Marg’ or Tantra. References in this book pertains to the Dakchin Marg - which is the process (Sadhana) of attracting the omnipresent powers of divinity, interacting with them by developing spiritual magnetism and cultivating paranormal faculties therefrom. The Vaam Marg, on the other hand, is the technique of pulling out bio-energy from living beings and utilizing it for exercising psychic control over others and for exorcist activities.

The source of Tantrik power is not the universal divine powers, but the physical energy produced by friction of subtle particles of nature rotating around their axes at tremendous speeds. Tantriks call this energy as Durga or Kali.

In practice, the Tantrik excites the bio-energy of an animate being  by violently killing it or inflicting excruciating pain on it by extraction of flesh or blood. It is tempting for some highly egoistic and ambitious persons to acquire extraordinary powers  through Tantra, But its practise is extremely complex and dangerous. Only an extraordinarily courageous and fearless person learning under an expert can achieve success in Tantra. There are numerous instances of persons becoming mentally deranged, permanently paralysed, sick, losing power of speech, sight or hearing in course of Tantrik practices. The details of Tantra have, therefore, been kept secret and out of reach of common man. In ancient times Tantra was used for welfare activities like self-defence, espionage, treatment of terminally ill and for enhancing the intelligence quotient of mentally retarded. The practice is now extremely rare.  

Q.10. According to the Law of Karma, everyone has to face the consequences of one’s good or bad deeds. How is it then possible for Gayatri to absolve one from sins?

Ans. It has been described that Gayatri dispels the darkness of sin. It does not mean destruction of the result of sin. It means getting rid of sinful tendencies.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 90

👉 समुद्र मंथन के तीन दिव्य रत्न

जीवन समुद्र का मंथन करने पर हमारे हाथ तीन रत्न ही लगते हैं (1) प्रेम की साध (2) ज्ञान की खोज और (3) पीड़ित मानवता के प्रति असह्य करुणा। इन तीनों के जितने अमृत कण हमारे हाथ लगते हैं हम उतने ही धन्य बनते हैं।

एकाकीपन की ऊब— कठोर परिश्रम की थकान और उतार−चढ़ावों के विक्षोभों से भरी इस जिन्दगी में सरसता केवल प्रेम में है। समस्त सुख सम्वेदनाओं की अनुभूति एकदम एक ही केंद्र पर एकत्रित है। प्रेम की पुलकन ही आनन्द भरे उल्लास में परिणत होती है। प्रेमी बनकर भले ही हमें कुछ खोना पड़े पर जो पाते हैं वह खोने से लाख करोड़ गुना अधिक होता है।

सत्य महान् है। मनुष्य क्रमशः उसके उच्च शिखर पर चढ़ता जाता है। जो अब तक जाना जा सका वह अद्भुत है, पर इससे क्या जो जानने को शेष पड़ा है वह अनन्त है। सत्य को जानने खोजने और पाने के प्रयासों में ही अब तक की विविध उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं। आगे इसी प्रयास में खुले मस्तिष्क से लगे रहेंगे तो उसे भी प्राप्त कर सकेंगे जो अब तक प्राप्त नहीं किया जा सका।

संसार में सुख न हो सो बात नहीं, पर पीड़ाएँ भी बहुत हैं। अज्ञान और पतन की भटकन कितनी कष्टकर है इस पर जो सहृदयतापूर्वक विचार करेगा उसकी करुणा उमड़े बिना न रहेगी। आत्मा स्वर्ग से उतर कर इस पृथ्वी पर रहने के लिए इसीलिए तो आया है कि वह करुणार्द्र होकर कष्ट पीड़ितों की सेवा करते हुए मानव जीवन का आनन्द ले सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1974 पृष्ठ 1