शनिवार, 16 जून 2018

👉 हमारी महान् परम्परा

🔷 हमें जिस महान् परम्परा का उत्तराधिकार मिला है, वह ऐसा ही है, जिसमें तृष्णा-वासना की पूर्ति जैसा कुछ नहीं है। श्रम और झंझट बहुत है, फिर भी गम्भीरतापूर्वक देखने से यह प्रतीत होता है कि जो लोग सारी जिन्दगी धन तथा भोग के लिए पिसते-पिलते रहने के पश्चात जो पाते हैं, उससे हमारी उपलब्धियाँ किसी प्रकार कम नहीं। ठीक है, अमीरों जैसे ठाठ नहीं बन सके, पर जो कुछ मिल सका है, वह उतना बड़ा है कि उस पर पहाड़ों जैसी अमीरी न्यौछावर की जा सकती है। सामान्य बुद्धि इस उपलब्धि का मूल्याँकन नहीं कर पाती, पर जो थोड़ी गम्भीरता से समझ और देख सकता है, वह यह विश्वास करेगा ही कि अमीरी की तुलना में यह आध्यात्मिक उपलब्धियाँ भी कम महत्व की, कम मूल्य की नहीं हैं।

🔶 हमने जो पाया है, वही हम अपने उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ जाना चाहते हैं। हमें भी इसी परम्परा के अनुसार कुछ मिला है। हर पुत्र को पिता की सम्पत्ति में हिस्सा मिलता है। जो हमारे निकटतम आत्मीय होंगे, उन्हें हमारी संयमित पूँजी का भी लाभ मिलना चाहिए, मिलेगा भी। गाँधी की संग्रहित पूँजी का बिनोवा, नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद आदि अनेकों ने भरपूर लाभ उठाया। यदि वे लोग गाँधी जी के संपर्क से दूर रहते और अपने दूसरे चतुर लोगों की तरह भौतिक कमाई में जुटे रहते तो वह सब कहाँ से पाते, जो उन लोगों ने पाया। हम गाँधी तो नहीं, पर इतने निरर्थक, दरिद्र एवं खाली हाथ भी नहीं हैं कि जिनके निकट संपर्क में आने वाले को कुछ न मिले। यह खुला रहस्य है कि लाखों व्यक्ति साधारण संपर्क का लाभ उठाकर अपनी स्थिति में जादुई मोड़ दे सकने में सफल हुए हैं और इस संपर्क की सराहना करते हैं। भविष्य में जिन पर हमें अपना उत्तराधिकार सौंपना है, उन्हें वर्तमान स्थिति में ही पड़ा रहना पड़े, ऐसा नहीं हो सकता। वे सहज ही ऐसा कुछ पा सकेंगे, जिसके लिए चिर-काल तक प्रसन्नता एवं सन्तोष अनुभव करते रह सकें।

🔷 आध्यात्मिक महानता की, सत्पात्रता की कसौटी के सम्बन्ध में हम इस तथ्य को अनेकों बार प्रस्तुत कर चुके हैं कि व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव का उत्कृष्ट होना ही उसकी आन्तरिक महानता का परिचायक है। इसी आधार पर संसार में, इसी आधार पर परलोक में और इसी आधार ईश्वर के समक्ष किसी का वजन एवं मूल्य बढ़ता है। अपने दैनिक-जीवन में हम कितने संयमी, सदाचारी, शाँत, मधुर, व्यवस्थित, परिश्रमी, पवित्र, संतुलित, शिष्ट कृतज्ञ एवं उदार हैं, इन सद्गुणों का दैनिक-जीवन में कितना अधिक प्रयोग करते हैं, यह देख, समझकर ही किसी को, उसकी आन्तरिक वस्तु-स्थिति को जाना जा सकता है। जिसका दैनिक-जीवन फूहड़पनों से भरा हुआ है वह कितना ही जप, ध्यान, पाठ, स्नान करता हो, आध्यात्मिक स्तर की कसौटी पर ठूँठ या छूँछ ही समझा जायगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1966 पृष्ठ 46-47
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/May/v2.24

👉 अपनी परिधि का विस्तार करें!

🔷 आत्मा का विकास परमात्म के समान विस्तृत होने में है। जो सीमित है, संकीर्ण है, वह क्षुद्र है। जिसने अपनी परिधि बढ़ा ली, वही महान है। हम क्षुद्र न रहें; महान बनें। असंतोष सीमित अधिकार से दूर नहीं होता। थोड़ा मिल जाय, तो अधिक पाने की इच्छा रहती है। सुरसा के मुख की तरह तृष्णा अधिक पाने के लिए मुँह फाड़ती चली जाती है। आग में घी डालने से वह बुझती कहाँ है? अधिक ही बढ़ती है। तृप्ति तब मिलेगी जब इस संसार में जो कुछ है, सब पा लिया जाय। वह हँसी नहीं, कल्पना नहीं। समग्र को पा सकना स्वल्प पाने की अपेक्षा सरल है।

🔶 मान्यता को विस्तृत कीजिए- यह सारा विश्व मेरा है। नीला विशाल आकाश मेरा। हीरे-मोतियों की तरह, झाड़–फानूसों की तरह जगमगाते हुए सितारे मेरे, सातों समुद्र मेरी सम्पदा, हिमालय मेरा- गंगा मेरी -पवन देवता मेरे, बादल मेरी सम्पत्ति - इस मान्यता में कोई बाधा नहीं, किसी की रोक नहीं। समुद्र में तैरिये, गंगा में नहाइये, पर्वत पर चढ़िये, पवन का आनन्द लूटिए, प्रकृति की सुषमा देख कर उल्लसित हूजिए। कोई बन्धन नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं। सभी मनुष्य मेरे, सभी प्राणी मेरे की परिधि इतनी विस्तृत करनी चाहिए कि समस्त चेतन जगत उसमें समा जाय।

🔷 अपनी सीमित पीड़ा से कराहेंगे, तो कष्ट होगा और दुख, पर जब मानवता की व्यथा को अपनी व्यथा मान लेंगे और लोक पीड़ा की कसक अपने भीतर अनुभव करेंगे, तो मनुष्य नहीं, ऋषि,देवता और भगवान जैसी अपनी अन्तः स्थिति हो जायेगी। अपना कष्ट दूर करने को जैसा प्रयत्न किया जाता है, वैसी ही तत्परता विश्व- व्यवस्था के निवारण में जुट पड़ेगी। इस चेष्टा में लगे हुए व्यक्ति को ही तो महामानव और देवदूत कहते हैं। ईश्वर का अनुग्रह सिद्धियों का अनुदान ऐसी ही उदात्त आत्माओं के चरणों में लोटता है।
        
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1964 पृष्ठ 27

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 June 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 June 2018


👉 विवेकहीन बदले की भावना

🔷 एक दिन एक साँप एक बढ़ई की औजारों वाली बोरी में घुस गया। घुसते समय बोरी में रखी हुई बढ़ई की आरी उसके शरीर में चुभ गई और उसमें घाव हो गया , जिस से उसे दर्द होने लगा और वह विचलित हो उठा। गुस्से में उसने उस आरी को अपने दोनों जबड़ों में जोर से दबा दिया।

🔶 अब उसके मुख में भी घाव हो गया और खून निकलने लगा। अब इस दर्द से परेशान हो कर उस आरी को सबक सिखाने के लिए अपने पूरे शरीर को उस साँप ने उस आरी के ऊपर लपेट लिया और पूरी ताकत के साथ उसको जकड़ लिया। इस से उस साँप का सारा शरीर जगह जगह से कट गया और वह मर गया।

🔷 ठीक इसी प्रकार कई बार, हम तनिक सा आहत होने पर आवेश में आकर सामने वाले को सबक सिखाने के लिए, अपने आप को अत्यधिक नुकसान पहुंचा देतें हैं।

🔶 यहीं ज्ञान और शिक्षा, हमारे जीवन में हमारा मार्गदर्शन करते हैं, और हमारे विवेक को जागृत करते हैं।

🔷 यह जरूरी नहीं कि हमें हर बात की प्रतिक्रिया देनी है, हमें दूसरों की गल्तियों को नजरअंदाज करते हुए  अपने परम पथ पर अग्रसर होना है और यह नहीं कि दूसरे को उसकी गलती की सजा देने के लिए हम अपने लक्ष्य और पथ से विचलित हो जाएं।

🔶 इसलिए अपने विवेक को सकारात्मक कार्यों,विचारों में इस्तेमाल करें।

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...